'इंडिया अलायंस' की बैठक से जुड़ी विपक्ष की उम्मीदें कितनी पूरी हुईं?

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- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
28 विपक्षी दलों की इंडिया अलायंस की चौथी बैठक ऐसे दिन हुई जिस दिन मौजूदा शीतकालीन सत्र के दौरान 49 और सांसदों को निलंबित कर दिया गया. इससे अब तक निलंबित सांसदों की कुल संख्या 141 तक पहुंच गई है.
देश के प्रमुख विपक्षी नेताओं के बीच करीब तीन घंटे चली बैठक के बाद कांग्रेस प्रमुख मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा, "हम लड़ेंगे, मैदान में जाएंगे."
एक ट्वीट में उन्होंने कहा, "ये लोकतंत्र की धज्जियाँ उड़ाने जैसा है, सदन की मर्यादा पर गहरी ठेस है."
अलायंस की बैठक में अखिलेश यादव, डी राजा, शरद पवार, अरविंद केजरीवाल, राहुल गांधी, सोनिया गांधी, लालू यादव जैसे विपक्ष के नेता शामिल थे.
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करीब तीन महीनों के लंबे फ़ासले के बाद ये बैठक ऐसे वक्त हो रही है जब संसदीय चुनाव बेहद नज़दीक है और प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस तीन बड़े राज्य भाजपा से सीधे मुकाबले में हार चुकी है.
विपक्ष के सामने चुनौती है कि कैसे भाजपा को लगातार तीसरा संसदीय चुनाव जीतने से रोका जाए.
राजनीतिक विश्लेषक और स्वराज इंडिया से जुड़े योगेंद्र यादव के मुताबिक बैठक से जो सकारात्मक बात सामने आई वो ये "कि तीन महीने के अंतराल के बाद इंडिया अलायंस ज़िंदा है. और बीच में जो शंका व्यक्त की जा रही थी कि अलायंस बचा भी है कि नहीं बचा है, बचेगा भी कि नहीं बचेगा, ये बैठक उन शंकाओं को निर्मूल साबित करती है."
दिल्ली के अशोका होटल में हुई बैठक में 22 दिसंबर को सांसदों के निलंबन पर देशभर में प्रदर्शन की बात हुई, सीटों पर तालमेल पर बातचीत हुई, और बैठक में मौजूद नेताओं के मुताबिक वहां बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी ने इंडिया अलायंस के चेहरे के तौर मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम पेश किया, जिसे कांग्रेस प्रमुख ने खारिज कर दिया.
वीसीके नेता थिरुमवलवन ने समाचार एजेंसी पीटीआई से बातचीत में कहा, "ममता बनर्जी ने प्रस्ताव रखा है कि हमें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को अपना प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित करना चाहिए."
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क्या बोले खड़गे?
इस पर पूछे पत्रकारों के एक सवाल के जवाब में मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा, "पहले सभी लोगों को जीत कर आना है."
याद रहे कि बैठक से एक दिन पहले ही पत्रकारों से बातचीत में ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री पद के लिए एक चेहरे को आगे बढ़ाने को नकार दिया था.
बैठक के बाद मल्लिकार्जुन खड़गे ने कुछ देर पत्रकारों के एक बड़े समूह के सामने अपनी बात रखी और सिर्फ़ एक या दो सवालों के जवाब दिए.
बैठक की उम्मीदों पर योगेंद्र यादव कहते हैं, "जो न्यूनतम था वो हुआ, लेकिन न्यूनतम से ज़्यादा की जो उम्मीद थी, वैसा नहीं हुआ."
वो कहते हैं, "इस मीटिंग से जो उम्मीद थी कि एक नया एजेंडा देश के सामने रखा जाएगा या फिर प्लान ऑफ़ एक्शन अनाउंस होगा (वो नहीं हुआ). 22 तारीख को प्रदर्शन की घोषणा हुई, लेकिन इतनी संख्या में सांसदों को निष्काषित करना बिल्कुल अभूतपूर्व है. और मेरी उम्मीद थी कि इस पर विपक्ष की प्रतिक्रिया ज़्यादा तीखी होगी और कुछ बड़ी चीज़ की घोषणा होगी. वो भी नहीं हुई."
बैठक से पहले बीबीसी से बातचीत में योगेंद्र यादव ने कहा था, "विपक्ष की जो 2024 लड़ने की उम्मीद है, वो इस मीटिंग की सफलता पर निर्भर करती है. अगर ये मीटिंग कामयाब होती है तो इतने भर से 2024 का चुनाव जीता नहीं जाएगा, लेकिन उस उम्मीद को ज़िंदा रखने के लिए इस मीटिंग का कामयाब होना ज़रूरी है."

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राजनीतिक विश्लेषक जगरूप सिंह ने मंगलवार की बैठक को "एक अच्छी शुरुआत बताया."
वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत दीक्षित के मुताबिक बैठक के बाद ऐसा कोई कार्यक्रम सामने नहीं आया जिससे ये पता चले कि ये विपक्षी गठबंधन महिलाओं, युवाओं और किसानों को अपनी ओर खींचने के लिए क्या कर रहा है.
वो कहते हैं, "नई पीढ़ी मज़बूत कार्यक्रम के साथ मज़बूत नेता चाहती है."
इस बीच कांग्रेस ने एक राष्ट्रीय अलायंस समिति का गठन किया है जिसके सदस्य अशोक गहलोत, भूपेश बघेल, सलमान खुर्शीद, मोहन प्रकाश और मुकुल वासनिक जैसे नेता हैं.

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मल्लिकार्जुन खड़गे बनाम नरेंद्र मोदी?
मल्लिकार्जुन खड़गे गांधी परिवार के नज़दीक माने जाते हैं.
उन्हें इंडिया अलायंस का चेहरा बनाए जाने की बात पर सीवोटर के फाउंडर एडिटर यशवंत देशमुख को आश्चर्य नहीं "क्योंकि उनके नाम की चर्चा पिछले दो महीने से थी."
विश्लेषक मिलन वैष्णव के मुताबिक इंडिया ब्लॉक के पास नरेंद्र मोदी के मुकाबले कोई चेहरा न होना उसकी स्थिति कमज़ोर बनाता है.
यशवंत देशमुख कहते हैं, "मल्लिकार्जुन खड़गे की रेटिंग कर्नाटक में कम है, आप पूरे भारत को तो भूल ही जाइए. रोचक बात ये है कि वो दलित चेहरा हैं जिससे भाजपा के लिए उन पर हमला करना बहुत मुश्किल होगा लेकिन वो उन्हें नज़रअंदाज़ भी कर सकती है और गांधी परिवार पर हमला करना जारी रख सकती है."
यशवंत देशमुख के मुताबिक उन्हें आश्चर्य नहीं कि मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम ममता बनर्जी ने आगे रखा क्योंकि "उन्हें जल्द अहसास हो गया था कि उनकी जगह बंगाल में है, और उन्हें उसी पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए."
इंडिया अलायंस के चेहरे के तौर पर मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम आगे किए जाने पर योगेंद्र यादव कहते हैं, "विपक्ष के लिए सबसे समझदारी यही है कि ये चुनाव मोदी बनाम मुद्दा की तरह लड़ा जाए. और खड़गे जी ने खुद जो स्पष्टीकरण दिया, उससे यही साफ़ होता है. और ये बात बिल्कुल सही है एमपी का सवाल पहले है, पीएम का सवाल बाद में."
उधर वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत दीक्षित मल्लिकार्जुन खड़गे के नाम का प्रस्ताव किए जाने को ममता बनर्जी की गुगली बताते हैं, ताकि वो खुद अपना नाम आगे कर सकें.
उन्हें लगता है कि मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम इसलिए आगे किया गया ताकि नीतीश कुमार और शरद पवार के नाम को किनारे कर के उनके नाम को रद्द किया जा सके ताकि दूसरे दौर में ममता बनर्जी का नाम आगे हो.
वो कहते हैं, "बिहार कभी भी खड़गे के नाम को स्वीकार नहीं करेगा क्योंकि नीतीश कुमार अपना नाम आगे बढ़ाना चाहते हैं. ममता भी खुद के नाम को आगे बढ़ाना चाहती हैं."

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सीटों पर तालमेल को लेकर बातचीत
इंडिया अलायंस की इस बैठक को लेकर इस बात की बहुत चर्चा थी कि इसमें सीटों पर तालमेल को लेकर बात आगे बढ़ेगी.
प्रेसवार्ता में मल्लिकार्जुन खड़गे ने बताया कि इस बारे में बातचीत होगी और अगर बातचीत में कुछ व्यवधान आता है तो गठबंधन के नेता उस पर फ़ैसला करेंगे.
योगेंद्र यादव के मुताबिक इससे ये पता चलता है कि "एक तंत्र बन चुका है. सीटों पर तालमेल पर सारी बातें तीन महीनों से रुकी हुई थीं. तो रुका हुआ सिलसिला दोबारा शुरू हो गया है. और ये भी तय हो गया है कि राज्य के स्तर में मामला नहीं सुलझा तो उसे राष्ट्रीय स्तर पर सुलझा लिया जाएगा, जो बिल्कुल सही फ़ैसला है. तो कम से कम रुकी हुई बात शुरू हो गई है, वो महत्वपूर्ण है."
बैठक से एक दिन पहले ही पत्रकारों से बातचीत में ममता बनर्जी ने कहा था कि बंगाल में वामपंथी पार्टियों और कांग्रेस के साथ गठजोड़ पर उनकी खुली सोच है.
यशवंत देशमुख के मुताबिक ये बात महत्वपूर्ण है क्योंकि उनके मुताबिक राज्य की पार्टियों को कांग्रेस की ज़रूरत नहीं.
वो कहते हैं, "ममता बनर्जी को बंगाल में जीत के लिए कांग्रेस की ज़रूरत नहीं. वो समझ रही हैं कि कांग्रेस देशभर में फैली हुई है और कांग्रेस को केंद्र में रखे बगैर आगे नहीं बढ़ा जा सकता. बात ये है कि जो संदेश कांग्रेस को दिया जा रहा है, क्या कांग्रेस उसे स्वीकार करेगी?"
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