बीजेपी की जीत के बाद उत्तर बनाम दक्षिण भारत की बहस के मायने क्या हैं?

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- Author, आदर्श राठौर
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद 'उत्तर भारत बनाम दक्षिण भारत' की बहस छिड़ गई है.
रविवार को एक्स (पहले ट्विटर) पर बहुत से लोगों ने यह कहना शुरू कर दिया कि बीजेपी की जीत सिर्फ़ हिंदी पट्टी के राज्यों में हो सकती है, जहाँ पर 'जन्मदर ज़्यादा और साक्षरता दर कमज़ोर' है.
उनकी टिप्पणियां राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बीजेपी के जीतने और तेलंगाना में ख़राब प्रदर्शन के संदर्भ में थीं.
इस विषय पर कई एक्स यूज़र्स एक-दूसरे से वाद-विवाद करते नज़र आए.
यहाँ तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी एक्स पर एक पत्रकार के वीडियो को रीपोस्ट किया. इसमें पत्रकार ने बताया था कि कैसे 'चुनावों के नतीजे आने के बाद एक वर्ग उत्तर भारत बनाम दक्षिण भारत के बीच खाई पैदा करने की कोशिश कर रहा है.'
पीएम मोदी ने लिखा था, "उनके विभाजनकारी एजेंडे से सावधान रहें. 70 साल की आदत इतनी आसानी से नहीं जाएगी."
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इसके बाद, मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब विपक्षी दलों के गठबंधन इंडिया की सदस्य, द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) के सांसद सेंथिलकुमार ने संसद में चुनाव के नतीजों के सम्बंध में एक ऐसी टिप्पणी की, जिसके लिए बाद में उन्हें माफ़ी भी मांगनी पड़ी.
मंगलवार को लोकसभा में जम्मू-कश्मीर से जुड़े दो विधेयकों पर चर्चा के दौरान सेंथिलकुमार ने कहा, “इस देश के लोगों को सोचना चाहिए कि बीजेपी की ताक़त बस इतनी है कि यह मुख्य तौर पर हिंदी पट्टी, जिसे हम आमतौर पर गोमूत्र राज्य कहते हैं, वहीं जीत सकती है.”
उनके शब्दों को सदन की कार्यवाही के रिकॉर्ड से हटा दिया गया है.
इसके आगे उन्होंने कहा था, “आप दक्षिण भारत में नहीं आ सकते, क्योंकि तमिलनाडु, केरल, आंध्र, तेलंगाना और कर्नाटक में हम बहुत मज़बूत हैं. इसलिए हम हैरान नहीं होंगे कि इन राज्यों को भी केंद्र शासित प्रदेश बनाकर आप अप्रत्यक्ष रूप से यहां सत्ता में आ जाएं. क्योंकि आप वहां आकर दक्षिणी राज्यों पर शासन चलाने का सपना भी नहीं देख सकते.”

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उन्होंने ऐसा जम्मू-कश्मीर आरक्षण (संशोधन) अधिनियम और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम पर चर्चा के दौरान कहा था.
सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और यहाँ कांग्रेस के नेताओं ने भी उनके इस बयान की आलोचना की है, और उनकी अपनी पार्टी ने भी इस बयान से किनारा कर लिया.
तमिलनाडु बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष के. अन्नामलाई ने कहा, “उत्तर भारतीय मित्रों को पानी पूरी बेचने वाला, टॉयलेट बनाने वाला वगैरह बोलने के बाद अब 'इंडी एलायंस' के घटक डीएमके के सांसद गोमूत्र को लेकर मज़ाक कर रहे हैं.”
सेंथिलकुमार ने उन शब्दों के इस्तेमाल के लिए संसद में भी खेद प्रकट किया, मगर बीजेपी इसे लेकर आक्रामक बनी हुई है. केंद्रीय मंत्री मीनाक्षी लेखी ने इस टिप्पणी को 'सनातनी परंपरा और सनातनियों का अपमान' क़रार दिया.
तेलंगाना के भावी सीएम भी विवाद में

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अभी सेंथिलकुमार के बयान पर हो रहा हंगामा थमा भी नहीं था कि तेलंगाना के भावी सीएम रेवंत रेड्डी का एक विवादित बयान सामने आ गया.
चुनाव से पहले दिए एक इंटरव्यू में कथित तौर पर रेड्डी ने कहा था कि उनका डीएनए तेलंगाना वाला है, जबकि केसीआर (तेलंगाना के पूर्व सीएम) का डीएनए बिहार का है. रेड्डी का कहना था कि उनका डीएनए केसीआर के डीएनए से बेहतर है.
इस पर प्रतिक्रिया देते हुए केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने बुधवार को कहा कि यह 'उत्तर भारतीयों का अपमान है.'
उन्होंने कहा कि कांग्रेस की सोच देश को बाँटने वाली है और 'इंडिया गठबंधन उत्तर और दक्षिण के बीच खाई पैदा करने की कोशिश कर रहा है.'
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उत्तर- दक्षिण का कथित विभाजन

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यह पहला मौक़ा नहीं है जब उत्तर भारत बनाम दक्षिण भारत पर राजनीति हो रही है और इसे स्वाभिमान की लड़ाई बनाने की कोशिश की जा रही है.
उत्तर और दक्षिण भारत के इस कथित विभाजन का लंबा इतिहास रहा है और उत्तर और दक्षिण भारत के राज्यों की प्रभावशाली पार्टियां इसे लेकर आक्रामक रही हैं.
इस बार भी राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के बाद राजनेताओं के बयानों के अलावा, सोशल मीडिया पर भी इस तरह कि टिप्पणियों और पोस्टों की बाढ़ सी आ गई.
वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामासेशन का मानना है कि उत्तर और दक्षिण भारत के राज्यों में विभाजन को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है, जबकि हक़ीक़त अलग है.

उन्होंने कहा, “मैं तमिलनाडु से हूँ और मेरा पूरा जीवन उत्तर भारत में बीता है. ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि पूर्वी और उत्तर भारत से बड़ी संख्या में लोग दक्षिण जाते हैं. वे वहां नौकरी करते हैं, संपत्ति ख़रीदते हैं और वहीं बस जाते हैं. वे वहां की भाषाएं भी सीखते हैं. इन लोगों के मन में विभाजन नहीं है, लेकिन इस समय इस कथित विभाजन को लेकर राजनीति की जा रही है."
डीएमके सांसद की टिप्पणी का ज़िक्र करते हुए वरिष्ठ पत्रकार कहती हैं कि डीएमके की राजनीति शुरू से ही उत्तर भारत के विरोध पर केंद्रित रही है, फिर चाहे वह हिंदी थोपे जाने के विरोध का मुद्दा हो या फिर केंद्र में शुरू की कांग्रेस सरकारों पर दक्षिण के साथ सौतेला व्यवहार करने के आरोप हों.
वह कहती हैं, “इन आरोपों में सच्चाई हो सकती है, लेकिन जिस तरह की राजनीति पर डीएमके का ज़ोर रहता है, उससे उत्तर और दक्षिण के विभाजन का संदेश जाता है. आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और केरल में भी यह भावना हो सकती है कि केंद्र उनके साथ सौतेला व्यवहार करता है, मगर वहाँ तो इस तरह के विभाजन की बात नही होती.”
अपना-अपना वोट बैंक साधने की कोशिश?

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राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विषय राजनीतिक दलों का गढ़ा हुआ है और इसे वे ध्रुवीकरण के लिए इस्तेमाल करते हैं.
वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा कहते हैं कि भले ही उत्तर और दक्षिण भारतीय राज्यों में सांस्कृतिक, भाषायी और परंपराओं के आधार पर अंतर है, लेकिन यह अंतर राजनीतिक विभाजन के रूप में ज़्यादा उभरकर आता है.
विनोद शर्मा कहते हैं कि जिन मुद्दों को बीजेपी उत्तर भारत में इस्तेमाल करती है, उन्हें दक्षिणी राज्यों के दल अपने हिसाब से इस्तेमाल करते हैं.

वह कहते हैं, “मिसाल के लिए, दक्षिणी राज्यों में सनातन धर्म कोई बहुत बड़ा मसला नहीं है. लेकिन वे यहां इस पर यह संदेश देने के लिए बात करते हैं कि हम दक्षिण के लोग, उत्तर से अलग हैं और भारतीय जनता पार्टी उत्तर की पार्टी है जो हमारे यहां के रीति रिवाजों को नहीं समझती.”
राधिका रामासेशन का भी मानना है कि दक्षिण भारतीय नेताओं के हालिया बयान और उनपर बीजेपी का रुख़, दोनों ही राजनीतिक हितों को साधने के लिए है.
वह कहती हैं, “अक्सर दक्षिण भारत के राज्य अपने यहां ज़्यादा आर्थिक विकास और ज़्यादा आय होने के बदले केंद्र से ज़्यादा सहयोग मांगते हैं. उनकी मांग वाजिब हो सकती है, लेकिन उत्तर-दक्षिण विभाजन का मुद्दा भावनात्मक ज़्यादा है. डीएमके और बीजेपी, दोनों इसे भुनाना चाहते हैं क्योंकि इससे उन्हें फ़ायदा मिलता है."
“हाल के चुनावों के नतीजों में तीन राज्यों में बीजेपी को जीत मिलना दिखाता है कि उसने यहाँ अपने वोट बैंक को और मज़बूत किया है. ऐसे में वह उत्तर में हिंदुत्व को आगे करना चाहती है, वहीं डीएमके दक्षिण में अपनी राजनीति को आगे बढ़ाना चाहती है.”
दक्षिण में बहती है 'अलग हवा', मगर क्यों?

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बीजेपी काफ़ी समय से दक्षिण भारत में पैठ बनाने की कोशिश कर रही है, लेकिन उसका प्रभाव कर्नाटक तक ही सीमित रहा है. दक्षिण के सिर्फ़ इसी राज्य में वह सरकार बना पाई है.
ऐसा तब है, जब बीजेपी पिछले दस साल से अपनी लोकप्रियता और ताक़त के चरम पर नज़र आ रही है. और फिर कर्नाटक में तो उसे इसी साल हुए चुनाव में सत्ता गंवानी पड़ी थी.
लेकिन दक्षिण भारतीय राज्यों की चुनावी परिस्थितियां अक्सर उत्तर भारतीय राज्यों से अलग रहती हैं.
जैसे कि 1977 के लोकसभा चुनाव में जब हिंदी पट्टी के राज्यों में काग्रेस की बुरी तरह से हार हुई थी, तब भी दक्षिण के राज्यों में उसने अच्छा प्रदर्शन किया था.
उत्तर भारत के अधिकतर राज्यों में जहां बीजेपी और कांग्रेस जैसे दल मज़बूत स्थिति में हैं, वहीं दक्षिणी राज्यों में लंबे समय से क्षेत्रीय दल हावी रहे हैं.
तमिलनाडु में डीएमके की सरकार है, आंध्र प्रदेश में वाईएसआर कांग्रेस की, केरल में सीपीएम सत्ता में है और पुद्दुचेरी में ऑल इंडिया एन.आर कांग्रेस की सरकार है. हाल के चुनावों से पहले तेलंगाना में भी बीआरएस की सरकार थी.

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विश्लेषकों का कहना है कि भाषा को लेकर एकजुटता और सामाजिक आंदोलनों के कारण आई जागरूकता के चलते दक्षिण भारतीय राज्यों में वे मुद्दे ख़ास असर नहीं डालते, जो उत्तर भारत में काफ़ी प्रभाव छोड़ रहे होते हैं.
जैसे कि, वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा मानते हैं कि बीजेपी के ज़्यादातर नेताओं का हिंदी इस्तेमाल करना दक्षिण में उसकी अपील को कम करता है.
दक्षिण भारत के राज्यों में भाषा का मुद्दा काफ़ी अहम रहा है. तमिलनाडु में 1960 के दशक में 'हिंदी थोपे जाने' के विरोध में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे, जिनमें हिंसा भी हुई थी.
विनोद शर्मा कहते हैं, “आप देखेंगे कि पश्चिम बंगाल और ओडिशा में भी बीजेपी के मुद्दे काम नहीं करते. बिहार में उनकी रणनीति संकट में दिखती है. यूपी में उनके मुद्दे चलते हैं. गुजरात में भी चलते हैं, लेकिन वे दक्षिण को नहीं भाते.”
“कर्नाटक के अलावा कहीं और बीजेपी सरकार इसलिए नहीं बना पाई, क्योंकि जिस तरह के मुद्दों को वह उत्तर में इस्तेमाल करती है, वे दक्षिण में कारगर नहीं होते. अगर होते भी हैं, तो ज़्यादा समय तक नहीं. जैसे कि कर्नाटक में. हो सकता है कि वहां हिंदुत्व का कुछ हिस्से में असर हुआ हो लेकिन धर्म को लेकर उत्तर और दक्षिण में लोगों का रुख़ अलग होता है.”
इसके लिए विनोद शर्मा दक्षिण भारत में शिक्षा के बेहतर स्तर को ज़िम्मेदार बताते हैं और कहते हैं कि उत्तर भारत की तुलना में इन राज्यों में लोग बेहतर ढंग से चर्चा और विश्लेषण करते हैं.
सामाजिक विकास और जागरूकता

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साल 1940 में जस्टिस पार्टी के ईवी रामास्वामी 'पेरियार' ने मद्रास प्रेसिडेंसी और आसपास के क्षेत्रों को मिलाकर द्रविडनाडु बनाने की मांग की थी.
पहले ये मांग सिर्फ़ तमिलभाषी क्षेत्रों के लिए थी, लेकिन बाद में द्रविडनाडु में आज के आंध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटक, ओडिशा को भी शामिल करने की बात कही गई थी.
पेरियार ने ही 'आत्म सम्मान' आंदोलन चलाया था. तमिलनाडु के राजनीतिक पार्टियां डीएमके और एआईडीएमके इसी आंदोलन से निकली थीं.
वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामासेशन कहती हैं, “राजशाही के समय कर्नाटक के राजा वाडियार ने गैर ब्राह्मणों को आगे लाने के लिए आरक्षण दिया था. फिर तमिलनाडु में तो जस्टिस पार्टी और पेरियार के आंदोलन का बड़ा प्रभाव रहा है.”
राधिका कहती हैं कि इन सुधारवादी क़दमों और आंदोलनों के कारण ही धर्म और जाति से जुड़े वे मुद्दे दक्षिण भारत में उतना असर नहीं दिखाते, जिनका उत्तर में गहरा होता है.
वह बताती हैं कि दक्षिण की राजनीति में अगड़ी जातियों का दबदबा कम हुआ है और दबी हुई जातियां आगे आकर लगभग हर क्षेत्र में अच्छा कर रही हैं.
“तेलंगाना में ओबीसी और अन्य कुछ हद तक पिछड़ी जातियां हावी हैं. आंध्र प्रदेश में भी रेड्डी हावी हैं. तमिलनाडु में ओबीसी हावी है. कर्नाटक में लिंगायत हैं, जो कि ओबीसी नहीं हैं मगर वे कुछ हद तक पिछड़े हैं. वहां भी ब्राह्मणों का महत्व नहीं है.”
दक्षिण के राज्यों की नाराज़गी और चिंताएं

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आज़ादी के बाद दक्षिण भारतीय राज्यों से भारत के दो ही प्रधानमंत्री रहे हैं- कर्नाटक के एच.डी देवेगौड़ा और आंध्र प्रदेश के पीवी नरसिम्हा राव.
केंद्र में कम प्रतिनिधित्व मिलने को लेकर भी दक्षिण भारतीय राज्य लंबे समय से शिकायत करते रहे हैं.
बीबीसी तेलुगू सेवा के संपादक जीएस राममोहन बताते हैं कि दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंताएं 2026 में होने वाले परिसीमन को लेकर और बढ़ गई हैं.
उन्होंने बताया, “पुनर्सीमांकन करने के जो पैमाने हैं, उन्हें लेकर दक्षिण भारतीय राज्यों के नेता नाख़ुशी ज़ाहिर करते रहे हैं. आंध्र के मुख्यमंत्री वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी ने तो खुलकर इस पर बात नहीं की, लेकिन अन्य राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने खुलकर नाराज़गी जताई है."

राममोहन कहते हैं, “इन राज्यों की पहली चिंता है कि अगर आबादी के आधार पर परिसीमन किया गया तो दक्षिण भारत के राज्यों को एक तरह से इस बात के लिए सज़ा दी जाएगी कि उन्होंने अपने यहां आबादी बढ़ने की दर पर काबू पाया लिया है. उत्तर के मुक़ाबले दक्षिण के राज्यों की सीटें और कम होने से उनका प्रतिनिधित्व कमज़ोर होगा और केंद्र से मोलभाव करने की ताक़त घटेगी.”
2011 की जनगणना के मुताबिक़, दक्षिण भारत के राज्यों की आबादी बढ़ने की दर उत्तर भारतीय राज्यों की तुलना में तेज़ी से गिरी थी.
एक दूसरी चिंता भी है, जो केंद्र से आर्थिक सहयोग को लेकर जुड़ी है. राम मोहन बताते हैं, "इन राज्यों से बड़ी मात्रा में केंद्र सरकार को टैक्स मिलता है, लेकिन कई राज्यों के सीएम कहते रहे हैं कि इसके बदले में उन्हें केंद्र से बहुत कम आर्थिक मदद मिलती है.”
तेलंगाना के सीएम रहते हुए के. चंद्रशेखर राव ने भी इसकी शिकायत की थी. इसके अलावा, कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने तो केंद्र से अधिक फंड की मांग करते हुए यह कहा था कि 'कर्नाटक समेत दक्षिण भारत के राज्य केंद्र को उत्तर भारत से ज़्यादा टैक्स देते हैं.'
क्या दक्षिण से लग सकता है बीजेपी के 'विजय रथ' को ब्रेक?

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बीजेपी दक्षिण को साधने के लिए लंबे समय से कोशिश कर रही है, लेकिन उसे यहां क्षेत्रीय पार्टियों के साथ गठबंधन के भरोसे ही रहना पड़ा है.
वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामासेशन कहती हैं कि 2024 में भी उसे गठबंधन पर ही निर्भर रहना पड़ेगा. उनका कहना है कि इंडिया गठबंधन हो या न हो, इससे दक्षिण भारत में बीजेपी के प्रदर्शन पर कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा.
उन्होंने कहा, "दक्षिण भारत के राज्यों में बीजेपी का प्रदर्शन वैसा नहीं रहेगा, जैसे प्रदर्शन की उसे उत्तर, पश्चिम या पूर्वोत्तर से उम्मीद है. भले ही तेलंगाना में इस बार बीजेपी को वोट प्रतिशत बढ़ा है, लेकिन कांग्रेस को वह तभी टक्कर दे पाएगी, जब बीआरएस से गठबंधन करे."
तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, केरल और पुद्दुचेरी को मिला लिया जाए तो यहां 130 लोकसभा सीटें हैं. ये लोकसभा की कुल 543 सीटों का सिर्फ़ एक चौथाई हैं.
2014 के चुनावों में जब बीजेपी सत्ता में आई थी, तब उसे दक्षिण भारत से सिर्फ़ 21 सीटें (लगभग 15 प्रतिशत) मिली थीं. उसे मिली कुल सीटों में दक्षिण भारत की सीटों की हिस्सेदारी मात्र सात फ़ीसदी थी.

2019 के लोकसभा चुनावों में जब बीजेपी ने रिकॉर्ड सीटें हासिल की, तब भी सिर्फ़ कर्नाटक में उसकी लहर दिखी थी, जहां की 28 में 25 सीटों पर उसके उम्मीदवार जीते थे. इसके अलावा एक सीट तमिलनाडु में मिली थी.
आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और केरल में उसका ख़ाता भी नहीं खुल पाया था.
वहीं, इंडिया गठबंधन पर राधिका रामासेशन कहती हैं कि इसके दल दक्षिण में सीटें हासिल कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए पहले कई विरोधाभासों पर क़ाबू पाना होगा.
वह कहती हैं, "कांग्रेस कर्नाटक और तेलंगाना में अकेली है. आंध्र प्रदेश में वह जगन मोहन रेड्डी के साथ गठबंधन तो कर नहीं सकती. तो क्या वह टीडीपी के साथ गठबंधन करेगी? टीडीपी और कांग्रेस एक-दूसरे को वोट कैसे ट्रांसफ़र करेंगे, जबकि कई सालों तक वे एक-दूसरे के ख़िलाफ़ थे?"
उनका कहना है कि ऐसी ही समस्या का सामना कांग्रेस को केरल में करना पड़ेगा, जहां पर लेफ़्ट के साथ जुड़ना उसके लिए असंभव दिखता है.
साथ बने रहना इंडिया गठबंधन की 'मजबूरी'

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हाल ही में केरल के मुख्यमंत्री पी. विजयन ने राहुल गांधी को वायनाड में आकर चुनाव लड़ने के बजाय उत्तर भारत में बीजेपी के साथ लड़ने की नसीहत दी है.
इसके अलावा भी इंडिया गठबंधन के कई सहयोगी दलों में अभी से टकराव और असहमतियां मुखर होकर नज़र आ रही हैं.
जैसे कि छह दिसंबर को दिल्ली में इंडिया गठबंधन की बैठक होनी थी, मगर इसे रद्द कर दिया गया. चर्चा है कि बाक़ी दल इस बात से नाराज़ थे कि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने बिना मशवरा किए ही यह बैठक रख दी थी.
इसके अलावा, डीएमके नेताओं के कथित हिंदुत्व विरोधी बयानों और हाल ही में तेलंगाना में कांग्रेस के भावी सीएम रेवंत रेड्डी के 'बिहार का डीएनए' वाले बयान पर भी कई दलों ने आपत्ति जताई है.
ऐसी स्थिति में सभी दलों का एकसाथ लड़ना कितना आसान दिखता है? सीटों का बंटवारा कैसे हो पाएगा? इस पर वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा कहते हैं कि इंडिया गठबंधन के दल जानते हैं कि वे 'साथ रहेंगे, तभी बचे रहेंगे.'

उन्होंने कहा, "जहां ये दल राज्यों में आमने-सामने हैं, वहां वे एक-दूसरे पर बोलते रहेंगे. लेकिन इंडिया गठबंधन को राष्ट्रीय नज़रिये से देखना चाहिए. भारतीय राजनीति की परतों को देखें तो यह विरोधाभास नया नहीं है. और विरोधाभासों के बावजूद इनके साथ आने का श्रेय बीजेपी की हावी हो जाने की नीति को जाता है."
वह कहते हैं, "ऐसा लगता है कि बीजेपी का लक्ष्य है कि भारत की राजनीतिक से प्रतिस्पर्धा की भावना ख़त्म करके एक ही पार्टी का शासन लाना है. लेकिन प्रतिस्पर्धा लोकतंत्र की आत्मा है और इससे लोगों को विकल्प मिलते हैं. विपक्षी दल जानते हैं कि अगर बीजेपी जीतती रही तो हम सभी पार्टियों और नेताओं को अलग-अलग निशाने पर लिया जाएगा, इसलिए साथ रहकर ही मुक़ाबला किया जा सकता है."
लेकिन विश्लेषकों का यह भी कहना है कि इंडिया गठबंधन को दक्षिण भारत के राज्यों की ज़्यादातर सीटें जीतने का तभी फ़ायदा हो सकता है, जब वह देश के बाक़ी हिस्से में अभी अच्छा प्रदर्शन करे.
वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामासेशन कहती हैं कि इंडिया गठबंधन अभी सिर्फ़ तमिलनाडु में अच्छे तरीक़े से काम कर रहा है, ऐसे में बाक़ी जगहों पर कौन सा गठबंधन बनेगा और वह कितना टिकेगा, इस पर ही बहुत कुछ निर्भर करेगा.
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