तेलंगाना में कैसे जीती कांग्रेस, केसीआर की पार्टी से कहाँ हुई चूक

रेवंत रेड्डी

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इमेज कैप्शन, कांग्रेस के तेलंगाना प्रदेशाध्यक्ष रेवंत रेड़्डी (बाएं) और केसीआर
    • Author, विनीत खरे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

साल 2014 में प्रदेश बनने के बाद पहली बार देश के सबसे नए राज्य तेलंगाना में कांग्रेस सरकार बनाने जा रही है. 119 सदस्यों वाली विधानसभा में जीत के लिए 60 सीटों में जीत चाहिए.

राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में हार के बीच इस दक्षिणी राज्य में कांग्रेस की जीत पार्टी के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. वो भी ऐसे वक्त जब संसदीय चुनाव में कुछ ही महीने रह गए हैं, और कांग्रेस विपक्षी दलों के साथ इंडिया अलायंस के माध्यम से केंद्र की भाजपा सरकार को टक्कर देने की तैयारी में है.

वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व सांसद सुरेश कुमार शेतकर जीत को बेहद महत्वपूर्ण बताया और जीत के लिए राहुल गांधी के नेतृत्व में भारत जोड़ो यात्रा और प्रदेश कांग्रेस प्रमुख रेवंत रेड़्डी की भूमिका को श्रेय दिया.

शेतकर के मुताबिक जीत की वजह सत्ता विरोधी लहर थी और नई कांग्रेस सरकार के लिए किसानों और युवाओं की समस्याओं को सुलझाना प्राथमिकताएं होंगी.

शेतकर ने कहा, “हम बिल्कुल कास्ट सर्वे पर ज़ोर देंगे.”

कांग्रेस प्रमुख मल्लिकार्जुन खड़गे ने जीत के लिए जहां तेलंगाना के मतदाताओं को धन्यवाद दिया, सत्तारूढ़ भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) नेता केटी रामाराव ने कांग्रेस को मुबारक देते हुए दोबारा वापस आने की बात कही है

कांग्रेस की जीत या बीआरएस की हार?

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जानकारों के मुताबिक कुछ महीनों तक पहले तक शायद ही किसी ने सोचा हो कि कांग्रेस तेलंगाना में सरकार बना पाएगी, लेकिन कर्नाटक की जीत के बाद कांग्रेस की उम्मीदें बढ़नी शुरू हो गई थीं.

विधानसभा जीत की हैट्रिक की तलाश में केसीआर को उम्मीद थी कि किसानों, दलितों, महिलाओं आदि को ध्यान में रखकर लाई गई सरकारी स्कीमों का उन्हें फ़ायदा होगा, लेकिन वोटरों ने उन्हें नकार दिया.

बीआरएस की नज़दीकी एआईएमआईएम के भी वोट थोड़ा कम हुए हैं.

बीआरएस की हार के लिए राज्य में कथित सत्ता के केंद्रीकरण, युवा बेरोज़गारी, लोगों की उम्मीदों के मुताबिक विकास न होना, भाजपा से नज़दीकियों के आरोप आदि को ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है.

वरिष्ठ पत्रकार किंगशुक नाग के मुताबिक ये जीत कांग्रेस की जीत नहीं, बल्कि बीआरएस की हार है.

वो कहते हैं, “तेलंगाना में भाजपा नहीं है, इसलिए जब लोगों ने बीआरएस के खिलाफ़ वोट देने का फ़ैसला किया, तो उन्हें लगा कि वो कहां जाएं. वो कांग्रेस के पास गए. उनके पास यही विकल्प उपलब्ध था.”

पाशम यादगिरी

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक पाशम यादगिरी के मुताबिक चुनावी नतीजे “बीआरएस के कुशासन के खिलाफ़ लड़ रहे लोगों की सफ़लता है.”

वो कहते हैं, “जब तेलंगाना का निर्माण हुआ तो तेलंगाना के पास 60,000 करोड़ का अतिरिक्त राजस्व था. आज ये अतिरिक्त राजस्व सात लाख करोड़ के घाटे में बदल गया है.”

बीबीसी से बातचीत में बीआरएस नेता दासोजू श्रावण ने हार के लिए लोगों की बदलाव की चाहत को ज़िम्मेदार ठहराया.

वो कहते हैं, “तेलंगाना में जितना विकास हुआ है, ऐसा दूसरे किसी राज्य में नहीं हुआ. चाहे मूलभूत सुविधाएं हों, कल्याणकारी योजनाएं हों, वेल्थ क्रिएशन हो, या फिर उद्योग, तेलंगाना सबमें नंबर एक है. फिर भी हम हार गए."

"केसीआर से लोगों को प्यार है लेकिन चंद विधायकों के खिलाफ़ लोगों की नाराज़गी थी जिस पर हमने ध्यान नहीं दिया. दूसरी वजह थी, युवाओं में गुस्सा जिसकी वजह से ये स्थिति पैदा हुई.”

केसीआर

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इमेज कैप्शन, केसीआर को सरकारी योजनाओं से लाभ मिलने की उम्मीद थी, मगर ऐसा हो नहीं पाया.
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तेलंगाना यात्रा के दौरान हमने पाया था कि परीक्षा के पेपर लीक और परीक्षा में देरी से कई छात्र क्षुब्ध थे.

तेलंगाना राज्य के लिए आंदोलन की तीन मुख्य वजहें थीं - नौकरियां, पानी और आर्थिक स्थायित्व.

सरकार की ओर से लगातार नौकरियां देने की बातें कही गईं, लेकिन जानकारों के मुताबिक ज़मीन पर उम्मीदें पूरी नहीं हुईं.

हैदराबाद में 23 साल की प्रवल्लिका की अक्टूबर में आत्महत्या के बाद युवाओं ने प्रदर्शन किए थे.

वोटिंग से पहले मीडिया में प्रकाशित पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे के मुताबिक जिन राज्यों में जल्द ही विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, उनमें युवा बेरोज़गारी दर तेलंगाना में ज़्यादा थी.

तेलंगाना की हमारी यात्रा में हमें कई छात्रों ने कहा कि नौकरी नहीं मिलने की वजह से वो अपने घर नहीं जा पाते, ये सोचकर कि परिवार से क्या कहेंगे, और नौकरी न होने की वजह से उनकी शादी नहीं हो रही है, उनका जीवन जैसे आगे नहीं बढ़ पा रहा है. छात्रों ने हमसे कहा था कि उनके लिए बेरोज़गारी चुनाव में महत्वपूर्ण मुद्दा होगा.

बेरोज़गारी की शिकायतों पर बीआरए नेता के कविता ने बीबीसी से बातचीत में सर्वे को चुनौती देने की बात कही थी और कहा था कि उनकी सरकार ने दस सालों में करीब 2.2 लाख सरकारी नौकरियां दीं और युवाओं के लिए ढेर सारी निजी मौके पैदा किए.

तेलंगाना में कांग्रेस की जीत का 'इंडिया' पर असर

कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष रेवंत रेड्डी

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इमेज कैप्शन, कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष रेवंत रेड्डी ने राज्य सरकार और सीएम केसीआर के ख़िलाफ़ आक्रामक ढंग से अभियान छेड़ा हुआ था.

भाजपा के खिलाफ़ इंडिया अलायंस की शुरूआत तो ज़ोरशोर से हुई थी लेकिन जानकारों के मुताबिक फिर ऐसा लगा कि उसमें ब्रेक सा आ गया.

कहा गया कि कांग्रेस पांच राज्यों में नतीजों का इंतज़ार कर रही है, और पार्टी को विश्वास है कि चुनाव में अच्छे नतीजों से इंडिया अलायंस में उसकी स्थिति मज़बूत होगी.

नतीजे आ गए हैं और कांग्रेस के लिए नतीजे सुखद नहीं हैं.

मल्लिकार्जुन खाड़गे ने अपने ट्वीट में इंडिया दलों के साथ “दोगुने जोश से लोकसभा चुनाव में तैयारी” की बात की है.

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राजनीतिक विश्लेषक मनीशा प्रियम के मुताबिक नतीजों के बाद हिंदी बेल्ट में भाजपा से मुकाबला करने की कांग्रेस की क्षमता कम हुई है.

वो कहती हैं, “भाजपा से सीधी हार के बाद कांग्रेस के लिए विंध्य के उत्तर में ऐसा कोई राज्य नहीं है, जहां वो सीधे भाजपा का मुकाबला कर सके.”

वो कहती हैं कि भाजपा के अच्छे प्रदर्शन के बाद इंडिया अलायंस में भी कांग्रेस की स्थिति कमज़ोर हुई है.

तेलंगाना में जीत पर वो कहती हैं कांग्रेस के लिए दक्षिण में उम्मीद हो, लेकिन संख्या बल तो उत्तर में है.

केसीआर पर सत्ता के केंद्रीकरण के आरोप

बीजेपी

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तेलंगाना में केसीआर के नेतृत्व में सरकार की हार के कई कारण बताए जा रहे हैं. उनमें प्रमुख है सत्ता के केंद्रीकरण का आरोप जो लंबे समय से लगाया जाता रहा है.

आरोप लगते हैं कि राज्य में सभी महत्वपूर्ण फ़ैसले एक ही परिवार के सदस्य ले रहे हैं. इन आरोपों में केसीआर के बेटे केटीआर, उनकी बेटी के. कविता, रिश्तेदार हरीश राव और संतोष राव का नाम आता है.

आरोप लगते रहे हैं कि विधायकों को कई दिनों तक केसीआर से मुलाकात का समय नहीं मिलता. जानकारों के मुताबिक केसीआर सरकार पर अपने आलोचकों के खिलाफ़ कार्रवाई के भी आरोप लगे जिससे लोगों में असंतोष बढ़ा.

सरकार ने कुछ वर्ष पहले हैदराबाद में प्रदर्शन स्थल धरना चौक की जगह बदल दी थी. इस कदम की काफ़ी आलोचना हुई थी.

किंगशुक नाग

वरिष्ठ पत्रकार किंगशुक नाग कहते हैं, “लोग केसीआर से बहुत परेशान थे. केसीआर सरकार को किसी पारिवारिक शासन की तरह चला रहे थे. इसलिए उनसे लोग नाराज़ थे. उन्हें जितनी भी सीटें मिली हैं वो उनकी सरकार की कल्याणकारी योजनाओं की वजह से मिलीं, नहीं तो पार्टी को और नुकसान होता.”

सत्ता के केंद्रीकरण के आरोपों पर बीआरएस नेता दासोजू श्रावण दूसरी राजनीतिक पार्टियों का उदाहरण देते हैं.

वो कहते, “खुद को राष्ट्रीय पार्टी कहने वाली कांग्रेस में राहुल गांधी फ़ैसले लेते हैं. खड़गे जी का पार्टी प्रमुख होना प्रतीकात्मक है. भाजपा में नरेंद्र मोदी और अमित शाह फ़ैसले लेते हैं. आप स्टालिन, देवगौड़ा जी की पार्टी, अखिलेश यादव, लालू यादव आदि के नेतृत्व वाली पार्टियां अगर देखें तो वो सभी नेताओं पर केंद्रित हैं.”

वो कहते हैं, “लोगों को बदलाव चाहिए था. हमने उसे स्वीकार किया है.”

सरकारी स्कीमों का राजनीतिक फ़ायदा क्यों नहीं?

केसीआर की बेटी कविता अपने भाई केटीआर

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इमेज कैप्शन, केसीआर की बेटी कविता अपने भाई केटीआर को राखी बांधती हुईं (फाइल फोटो). केसीआर पर सिर्फ़ अपने परिवार के सदस्यों को बढ़ावा देने के आरोप लगे थे.

अपने कार्यकाल में केसीआर ने समाज के कई वर्गों के लिए रायथु बंधु और दलित बंधु स्कीम जैसी स्कीमें शुरू की थीं.

रायथु बंधु के अंतर्गत हर किसान को फसल सीजन के लिए बीज, उर्वरक, कीटनाशक, श्रम और अन्य निवेश जैसे इनपुट की खरीद के लिए प्रत्येक सीजन 5,000 रुपए प्रति एकड़ का प्रावधान था. दलित बंधु के अंतर्गत लोगों को आर्थिक सहायता की बात थी.

बीबीसी से बातचीत में बीआरएस नेता के कविता ने कहा था, “हमने इको सिस्टम्स बनाएं जैसे टी हब, टी वर्क्स, टास्क जो अंतरराष्ट्रीय स्तर के हैं. यहां एससी प्राइड, एसटी प्राइड, सीएम्स प्राइड जैसी स्कीमें हैं. ये स्कीमें आम लोगों को उद्यमी बनने के लिए ट्रेनिंग दे रही हैं.”

लेकिन वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक पाशम यादगिरी सरकारी स्कीमों जैसे रायथु बंधु और दलित बंधु स्कीम “धोखा” बताते हैं जिससे समाज के कई वर्ग जैसे किसान, दलित, आदिवासी आदि नाराज़ थे.

आरोप लगे हैं कि इन स्कीमों के अंतर्गत ऐसे ज़रूरतमंद हैं जिन्हें सरकारी स्कीम का फ़ायदा नहीं मिल पाया.

एआईएमआईएम से नाराज़गी?

केसीआर

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पिछले विधानसभा चुनाव में जहां 88 सीटों के साथ टीआरएस को 47.4 प्रतिशत वोट मिले थे, अब ये प्रतिशत घटकर 37.35 हो गया है.

इसी तरह पिछले विधानसभा चुनाव में जहां कांग्रेस को 19 सीटों पर जीत के साथ 28.7 प्रतिशत वोट मिले थे, ये वोट प्रतिशत बढ़कर 39.40 प्रतिशत दिखता है.

वरिष्ठ पत्रकार विराहत अली के मुताबिक बीआरएस पर जिस तरह एंटी इनकंबंसी का असर दिखा, एआईएमआईएम से भी उसके वोटर नाराज़ थे.

साल 2018 में सात सीटों के साथ एआईएमआईएम को जहां 2.7 प्रतिशत वोट मिले थे, ताज़ा जानकारी के मुताबिक ये प्रतिशत थोड़ा घटकर 2.2 प्रतिशत हुआ.

हैदराबाद एआईएमआईएम का गढ़ रहा है, जहां मुसलमानों का बड़ी संख्या रहती है. आंकड़ों के मुताबिक तेलंगाना में करीब 13 प्रतिशत मुस्लिम वोटर हैं.

मतदान प्रतिशत

भाजपा के साथ क़रीबी के आरोप

पत्रकार विराहत अली के मुताबिक पार्टी पर लगातार भाजपा से नज़दीकियों के आरोप लग रहे हैं, जिस वजह से प्रदेश में कई मुसलमानों ने कांग्रेस को वोट दिया. पार्टी प्रमुख असदउद्दीन उवैसी भाजपा से नज़दीकियों के आरोपों से इनकार करते रहे हैं.

विराहत अली के मुताबिक कई महीनों से एआईएमआईएम के वोटरों में बहस चल रही थी कि जब पार्टी प्रदेश के बाहर दूसरे राज्यों में उम्मीदवार खड़े कर रही है तो तेलंगाना में हिंदुत्व का चेहरा कहे जाने वाले बंडी संजय कुमार और टी राजा सिंह के खिलाफ़ उम्मीदवार क्यों नहीं खड़े कर रही है.

असदुद्दीन ओवैसी

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इमेज कैप्शन, एआईएमआईएम सांसद असदुद्दीन ओवैसी

कांग्रेस भी एआईएमआईएम को भाजपा की बी-टीम होने के आरोप लगाती रही है. ओवैसी ने इन आरोपों से भी इनकार किया है.

विराहत अली के मुताबिक लिकर घोटाला मामले में बीआरएस नेता के. कविता की गिरफ़्तारी नहीं होने से बीआरएस और भाजपा के बीच नज़दीकियां होने के आरोपों को बल मिले जिससे मुसलमान वोट छिटककर कांग्रेस की ओर गया.

के कविता ने कथित घोटाले में सभी आरोपों से इनकार किया है. एआईएमआईएम के रणनीति और पार्टी के प्रदर्शन पर हमने असदुद्दीन ओवैसी से संपर्क करने की कोशिश की लेकिन उनसे बात नहीं हो पाई.

इन नतीजों का अगले साल के संसदीय चुनावों पर क्या असर होगा, ये देखना दिलचस्प होगा.

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