राहुल गांधी के लिए विधानसभा चुनाव के नतीजे कितना बड़ा झटका?

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- Author, मोहम्मद शाहिद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
“मैं कांग्रेस की मुसीबत समझता हूं. बरसों से एक ही फ़ेल प्रोडक्ट को बार-बार लॉन्च करते हैं. हर बार लॉन्चिंग फ़ेल हो जाती है और अब उसका नतीजा ये हुआ है कि मतदाताओं के प्रति उनकी नफ़रत भी सातवें आसमान पर पहुंच गई है.”
10 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव के दौरान संसद में ये बात कांग्रेस नेता राहुल गांधी को लेकर कही थी.
दरअसल ऐसा इसलिए कहा जाता रहा है क्योंकि राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए पार्टी 2019 के लोकसभा चुनाव में कोई ख़ास कमाल नहीं कर सकी. इसके अलावा कई राज्यों में हुए चुनावों में या तो कांग्रेस की सरकार जाती रही या विपक्ष में होने का बावजूद भी वो वहां कुछ ख़ास कमाल नहीं कर सकी.
इस फ़ेहरिस्त में उत्तर भारत के कई राज्य हैं जहां पर कांग्रेस से कुछ करिश्मे की उम्मीद जताई जा रही थी लेकिन राहुल गांधी के चुनाव प्रचार के बावजूद वो नाकाम ही रही.
कांग्रेस पार्टी में अब राहुल गांधी अध्यक्ष पद पर नहीं हैं लेकिन पार्टी गांधी परिवार के इर्द-गिर्द ही घूमती रही है. राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस अपनी सरकार गंवा चुकी है और मध्य प्रदेश में भी उसे बीजेपी ने बुरी तरह हराया है. वहीं, मिज़ोरम में उसे सिर्फ़ एक सीट मिली है.
हालांकि, तेलंगाना में उसने इतिहास बनाते हुए केसीआर की बीआरएस पार्टी को हरा दिया है.
तो अब सवाल उठता है कि पांच विधानसभा चुनावों में से चार में मिली हार क्या गांधी परिवार या कहें राहुल गांधी की हार है?

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राहुल गांधी की कितनी बड़ी हार?
राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में बीजेपी के चुनाव प्रचार की बात करें तो इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आगे थे जबकि राज्य के नेता और दूसरे केंद्रीय नेता पीछे थे.
वहीं कांग्रेस के चुनाव प्रचार की बात करें तो इसमें राज्य के नेता आगे थे और राहुल गांधी बैक सीट पर थे. उन्होंने राजस्थान में थोड़ा कम प्रचार किया लेकिन तेलंगाना में काफ़ी प्रचार किया.
उनके चेहरे और उनके दिए नारों को तेलंगाना के अलावा बाक़ी राज्यों में काफ़ी ज़ोर-शोर से इस्तेमाल नहीं किया गया. अगर छत्तीसगढ़ की बात करें तो वहां भूपेश बघेल अपनी सरकार की ख़ासियतें गिनवाते रहे. इसी तरह राजस्थान में अशोक गहलोत चुनाव को लीड कर रहे थे.
मध्य प्रदेश की बात करें तो वहां पर कमलनाथ ने चुनाव की ज़िम्मेदारी उठा रखी थी. तेलंगाना में चुनाव का ज़िम्मा रेवंत रेड्डी के कंधों पर था.
इस तरह से देखा जाए तो अलग-अलग राज्यों में कांग्रेस के अलग-अलग चेहरे थे तो क्या इन हारों के लिए राहुल गांधी को ज़िम्मेदार ठहराया जाना चाहिए?
कांग्रेस को कवर करने वाले एक पत्रकार (नाम न सार्वजनिक करने की शर्त पर) कहते हैं कि कांग्रेस हारी है तो इसका अर्थ है कि उसकी लीडरशिप पर लोगों ने विश्वास नहीं जताया है और लीडरशिप का मतलब गांधी परिवार होता है.
वो इसको आसान शब्दों में समझाते हुए कहते हैं कि चुनाव के दौरान कांग्रेस के राज्य और केंद्र के नेता बराबरी पर चुनाव प्रचार कर रहे थे तो ये बघेल, गहलोत और कमलनाथ की हार है. वहीं केंद्रीय स्तर पर ये गांधी परिवार और राहुल गांधी की हार है.

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी कहती हैं कि इन विधानसभा चुनावों में न ही राहुल गांधी के चेहरे को आगे रखा गया था और न ही उनको लेकर काफ़ी आकर्षण था.
वो कहती हैं, “सभी राज्यों में उनके वहां के स्थानीय नेता चुनाव लड़ रहे थे. छत्तीसगढ़ में मुझे कई लोगों ने कहा था कि वो अपने उम्मीदवार से नाराज़ हैं लेकिन वो बघेल की लीडरशिप की वजह से कांग्रेस को वोट देंगे. छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान को लेकर साफ़ था कि अगर कांग्रेस चुनाव जीतती है तो वहां का मुख्यमंत्री कौन होगा.”
“राजस्थान में लोग गहलोत की बात करते थे और कभी भी राहुल गांधी की बात नहीं करते थे. राहुल ने अपनी ज़्यादा रैलियां तेलंगाना में कीं. इस तरह से ये राहुल गांधी नहीं बल्कि राज्य के नेताओं की हार है क्योंकि वो तो चुनावों में आगे भी नहीं थे.”
कांग्रेस को बारीकी से समझने वाले वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई कहते हैं कि राजनीतिक दलों की ओर से ऐसा नैरेटिव बनाया जाता है कि जो पार्टी का बड़ा नेता होता है जीत का सेहरा उसके सिर ही बंधता है.
वो कहते हैं कि कांग्रेस ने इस बार के विधानसभा चुनावों को राज्य के नेताओं पर ही छोड़ा हुआ था और राहुल गांधी-प्रियंका गांधी सिर्फ़ कैंपेनर की भूमिका में थे, इस वजह से मुझे लगता है कि यह राहुल गांधी के इर्द-गिर्द का चुनाव नहीं था.

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‘भारत जोड़ो यात्रा’ का कितना रहा असर?
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने बीते साल सितंबर में दक्षिण भारत में कन्याकुमारी से ‘भारत जोड़ो यात्रा’ की शुरुआत की थी. तक़रीबन 4 हज़ार किलोमीटर लंबी 137 दिन की इस यात्रा में उन्होंने दक्षिण से उत्तर भारत को नापा था.
ये यात्रा तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक होते हुए तेलंगाना भी गई थी. कांग्रेस ने कर्नाटक विधानसभा चुनाव भी जीता था और इस जीत का श्रेय राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा को भी दिया गया था.
तेलंगाना में कांग्रेस ने जीत दर्ज की है लेकिन भारत जोड़ो यात्रा मध्य प्रदेश और राजस्थान से भी गुज़री वहां पर कांग्रेस का बुरा हश्र हुआ.
क्या भारत जोड़ो यात्रा का कोई असर उत्तर भारत में होता नहीं दिख रहा है? इस सवाल पर नीरजा चौधरी कहती हैं कि भारत जोड़ो यात्रा की वजह से राहुल गांधी की छवि बदली है और लोग उन्हें गंभीरता से देखते हैं और मानते हैं कि वो ईमानदार हैं लेकिन उन्हें पीएम मोदी की टक्कर का नहीं मानते हैं.
वो कहती हैं कि अगर आप किसी नौजवान तबके में पूछें कि क्या राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी को चुनौती देते हैं तो आप जवाब पाएंगे कि वो उस सवाल पर हंस रहे हैं, हालांकि वो उनकी भारत जोड़ो यात्रा की तारीफ़ करते हैं लेकिन उनको एक सक्षम नेता की तौर पर नहीं देखते हैं.
इसके साथ ही नीरजा कहती हैं कि भारत जोड़ो यात्रा की कामयाबी को भी पार्टी काफ़ी बढ़ा-चढ़ाकर पेश करती है, कर्नाटक और तेलंगाना में कांग्रेस को वहां के स्थानीय नेताओं की वजह से जीत मिली.

जातिगत जनगणना और ‘नफ़रत के बाज़ार में मोहब्बत की दुकान’
राजस्थान, छत्तीसगढ़ के चुनाव प्रचार में राहुल गांधी का भाषण लगभग तय रहता था जिसमें वो राज्य सरकार की तारीफ़ करते थे और सरकार बनने पर जातिगत जनगणना का वादा करते थे.
वहीं मध्य प्रदेश के चुनाव प्रचार में वो केंद्र और राज्य सरकार पर हावी रहते थे.
इसी तरह से तेलंगाना के चुनाव प्रचार में वो केसीआर और पीएम मोदी पर हमलावर रहते थे और कांग्रेस की सरकार बनने पर कई लाभ देने का वादा करते थे.
इस चुनाव प्रचार के दौरान वो एक वादा ज़रूर करते रहे कि कांग्रेस पार्टी की सरकार जातिगत जनगणना कराएगी लेकिन इस वादे को स्थानीय नेता उतने ज़ोर-शोर से नहीं उठाते रहे.
स्थानीय नेता अपने जातिगत समीकरण और स्थानीय मुद्दों पर वोट मांग रहे थे.
इसके साथ ही वो अपने पुराने नारे ‘नफ़रत के बाज़ार में मोहब्बत की दुकान खोलने आया हूं’ को भी दोहराते रहे. विधानसभा चुनावों के परिणाम बताते हैं कि जातिगत जनगणना के वादे का जादू चुनावों में नहीं चल सका.
इसके साथ ही राहुल गांधी इन विधानसभा चुनावों में सांप्रदायिक और नफ़रत की राजनीति का मुद्दा भी उठाते रहे. इस पर रशीद किदवई कहते हैं कि वैचारिक लड़ाई में राहुल गांधी की हार ज़रूर हुई है.
वो कहते हैं, “राहुल गांधी कहते हैं कि वो मोहब्बत की दुकान चला रहे हैं लेकिन ये दुकान मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में उजड़ गई. इसके लिए उनको कारणों की खोज करनी होगी. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की जहां बात आती है वहां पर कांग्रेस में सभी नेता अलग-अलग बातें करते हैं वहीं बीजेपी और नरेंद्र मोदी सीधी बात करते हैं.”
“राहुल गांधी का दोष ये है कि वो अपनी विचारधारा की कभी व्याख्या नहीं कर पाए. जातिगत जनगणना पर उनकी पार्टी में कोई एकमत नहीं था. 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने चौकीदार चोर है का नारा दिया जबकि उनकी पार्टी के नेता ही इस नारे से कन्नी काटते नज़र आए.”
“राहुल गांधी के नारे को स्थानीय नेता आगे नहीं बढ़ा पाए. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान में पिछड़ों की अच्छी ख़ासी संख्या है जो बीजेपी की ओर है. इस समुदाय को कांग्रेस जातिगत जनगणना का मतलब नहीं समझा पाई. जनता से कांग्रेस सीधे संवाद नहीं कर पाई.”

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2024 में क्या राहुल गांधी दे पाएंगे चुनौती?
कांग्रेस में राहुल गांधी जब से लीडिंग रोल में आए हैं तब से पार्टियों ने कामयाबी के कम और नाकामयाबी के झंडे अधिक गाड़े हैं. इसी बीच 2024 के लोकसभा चुनाव में छह महीने से भी कम का समय बचा है.
क्या राहुल गांधी 2024 में बीजेपी और नरेंद्र मोदी को चुनौती दे पाएंगे? इस पर रशीद किदवई कहते हैं कि मल्लिकार्जुन खड़गे कांग्रेस के अध्यक्ष हैं और राहुल गांधी पार्टी सांसद हैं, उनको अपनी भूमिका तय करनी होगी.
“2024 में राहुल गांधी को तय करना होगा कि क्या वो इंडिया गठबंधन का चेहरा होंगे या सिर्फ़ प्रचारक होंगे. ये बहुत ज़रूरी होता है कि जो आप पाने की कोशिश कर रहे हैं. उसके बारे में बताएं. राहुल गांधी के बारे में बहुत घालमेल नज़र आता है कि क्या 2019 में वो पीएम पद का चेहरा थे या नहीं थे. क्या वो इंडिया गठबंधन के पक्षधर हैं.”
वहीं नीरजा चौधरी कहती हैं कि ‘पार्टी को इसकी समीक्षा करनी होगी कि उसे आगे क्या करना है. भारत ग्राउंड लेवल पर बहुत तेज़ी से बदल रहा है और उसका रेस्पॉन्स नरेंद्र मोदी हैं. 2024 में राहुल गांधी प्रधानमंत्री की भूमिका में होंगे ये कहीं नहीं कहा गया. कांग्रेस राहुल-राहुल करती रहती है तो वो मोदी के सामने आ जाते हैं.’
“अगर आज की बात करें तो राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को टक्कर देने की क्षमता में नहीं हैं. कल होंगे या नहीं ये कहा नहीं जा सकता है. इन चार राज्यों में मिली हार को राहुल गांधी की हार नहीं कहा जाना चाहिए जबकि तेलंगाना में कांग्रेस को जीत केसीआर के अंहकार की वजह से मिली. वहां पर कांग्रेस का संगठन अच्छा था और जनता को बदलाव चाहिए था तो उसने तुरंत कांग्रेस को चुना.”
विश्लेषकों का मानना है कि भारत जोड़ो यात्रा ने राहुल गांधी के इमेज मेकओवर में बड़ी अहम भूमिका निभाई, उनकी छवि मेहनतकश और गंभीर राजनेता के तौर पर बनी. मोदी सरकार को अदानी से लेकर चीन जैसे मुद्दों पर वो घेर भी पा रहे थे.
इसी बीच हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में कांग्रेस को जीत मिली. इंडिया गठबंधन का गठन हुआ. इसकी बैठकों में विपक्षी नेता राहुल गांधी को लेकर गंभीर भी दिखते थे.
इन सबको लेकर राहुल गांधी का कद लगातार बढ़ता जा रहा था. लेकिन हिंदी बेल्ट के विधानसभा चुनावों में जहां कांग्रेस बुरी तरह हारी, ये राहुल गांधी के बढ़ते कद के लिए बड़ा झटका है. अब उनको नए सिरे से अपनी रणनीति बनानी होगी.
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