छत्तीसगढ़ में बीजेपी की वो रणनीति जो भूपेश बघेल पर पड़ी भारी

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- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
रविवार सुबह, चार राज्यों में चुनावी नतीजों के दिन, दिल्ली में कांग्रेस दफ़्तर के बाहर कुछ उत्साही कार्यकर्ता ढोल-नगाड़ों के इंतज़ाम के साथ हैं. राम और हनुमान के स्वरूप में कलाकार भी हैं.
दफ़्तर की बाहरी दीवार पर बड़े-बड़े बैनर हैं, जिनमें भगवान राम और उनके चरणों में बैठे हनुमान की तस्वीर है.
नीचे राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और अन्य कांग्रेसी नेता हैं.
जैसे-जैसे टीवी स्क्रीन पर चुनावी रुझान आगे बढ़ते हैं, कांग्रेसी कार्यकर्ताओं की भीड़ छँटने लगती है. दस बजे तक राजस्थान और मध्य प्रदेश में बीजेपी की बढ़त स्पष्ट हो जाती है, लेकिन रुझानों में छत्तीसगढ़ में कांटे की टक्कर दिखती है.
अब भी कुछ कार्यकर्ता दफ़्तर के बाहर बचे हैं, लेकिन जैसे-जैसे छत्तीसगढ़ में नतीजे बीजेपी की तरफ़ करवट लेते हैं, कांग्रेस दफ़्तर में सन्नाटा पसर जाता है.
ढोल-नगाड़े वालों को वापस भेज दिया जाता है. अब तक चार राज्यों में से दो पर बराबरी से संतोष करते दिख रहे कार्यकर्ता भी उदास हो जाते हैं.

लंबे समय से कांग्रेस के समर्पित कार्यकर्ता और मूल रूप से बिहार के रहने वाले पांडे (वो अपना सिर्फ़ उपनाम ही बताते हैं), उदास और नाराज़ हैं.
सख़्त लहज़े में वो कहते हैं, “हमारी पार्टी का नेतृत्व देश का मिजाज़ नहीं समझ पा रहा है. राहुल गांधी मेहनत तो बहुत कर रहे हैं, लेकिन जनता तक उनका संदेश नहीं पहुँच रहा है. संगठन की कमियों को दूर नहीं किया जा रहा है.”
पांडे अपनी बात पूरी कर ही रहे थे कि एक अन्य समर्पित कार्यकर्ता अपना आक्रोश ज़ाहिर करते हुए कहता है, “राजस्थान, मध्य प्रदेश का समझ आता है, लेकिन छत्तीसगढ़ में ये हार पचा पाना आसान नहीं है. कहीं तो कोई बहुत बड़ी कमी है, जिसे सुधारा नहीं जा रहा है.”
छत्तीसगढ़ के निवर्तमान मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने नतीजों की पूर्व संध्या तक दावा किया था कि वो बहुमत से वापसी कर रहे हैं.
अधिकतर एग्ज़िट पोल और चुनावी सर्वे में भी उन्हें बढ़त दिखाई दिखाई गई थी. कुछ एग्ज़िट पोल में कांटे की टक्कर का दावा किया गया था. लेकिन अंतिम नतीजे आते-आते कांग्रेस 36 सीटों पर सिमट गई और बीजेपी के खाते में 54 सीटें चली गईं.

कांग्रेस प्रवक्ता अलका लांबा इस हार पर कहती हैं, “हमारे लिए सबसे ज़्यादा चौंकाने वाला मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ है. हम मान कर चल रहे थे कि छत्तीसगढ़ में कोई सरकार विरोधी लहर नहीं है और हमारे पाँच साल के काम पर बहुमत मिलता दिख रहा था. वहां हार क्यों हुई, इस पर मंथन करने की ज़रूरत है. पार्टी नेतृत्व इसकी गहनता से समीक्षा करेगा.”
कांग्रेस के कई और कार्यकर्ता इसी तरह की बात करते हुए कहते हैं, “छत्तीसगढ़ की हार अप्रत्याशित है, समझ नहीं आ रहा है कि हम क्यों हारे.”
हालांकि राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि छत्तीसगढ़ में हार की एक बड़ी वजह भूपेश बघेल का आत्मविश्वास और अपनी हक़ीक़त से बड़ी छवि पेश करना भी है.
इसके अलावा विश्लेषक मानते हैं कि हिंदुत्व के मुद्दों की काट कांग्रेस नहीं ला सकी. मोदी के चेहरे का मुक़बाला कांग्रेस नहीं कर सकी.

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक विजय त्रिवेदी कहते हैं, “छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की हार, पार्टी की सबसे बड़ी हार है. बीजेपी भी छत्तीसगढ़ के चुनाव को मुश्किल मान रही थी. भूपेश बघेल ने ये माहौल बनाया था कि वो जीत रहे हैं और बड़ी ताक़त के साथ जीत रहे हैं. हालांकि ज़मीन पर लहर उनके ख़िलाफ़ थी, जिसे कोई पकड़ नहीं पाया.”
वहीं वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक सुरेश महापात्रा मानते हैं कि बीजेपी ने छत्तीसगढ़ अपनी रणनीति से जीता है.
महापात्रा कहते हैं, “ये परिणाम भारतीय जनता पार्टी की रणनीतिक जीत है. पार्टी ने दो चरणों में उम्मीदवारों को उतारा, बहुत बारीकी से अध्ययन किया कि कहाँ वो पीछे रह गए थे और इसी को ध्यान में रखकर घोषणापत्र बनाया.''
''बीजेपी ने अपनी नीति के केंद्र में पहली बार किसान और धान को रखा. महिलाओं के लिए महतारी योजना की घोषणा की. किसानों की ऋण माफ़ी का जो माहौल कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र से बनाया था, भाजपा उस तरफ़ नहीं गई, बल्कि धान की एकमुश्त क़ीमत देने और पुराने दो साल का बोनस देने का वादा किया. छत्तीसगढ़ में धान की क़ीमत और खेत और खलिहान के आसपास ये चुनाव परिणाम नज़र आ रहा है.”

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चुनावी अभियान के दौरान छत्तीसगढ़ में भ्रष्टाचार का मुद्दा भी हावी रहा.
महापात्रा कहते हैं, “भूपेश सरकार के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के जो आरोप थे, उन पर भी आख़िर तक भूपेश बघेल जवाब नहीं दे पाये.”
वहीं विजय त्रिवेदी कहते हैं, “भूपेश बघेल ने अपने आप को बहुत बड़ा नेता समझा और सिर्फ़ अपने दम पर चुनाव लड़ा. इसकी क़ीमत भी उन्हें चुकानी पड़ी. भ्रष्टाचार के मुद्दे भी केंद्र में रहे. हालांकि महादेव ऐप के मुद्दे का बहुत असर नहीं होगा, लेकिन जो भ्रष्टाचार के अन्य मामले थे, उन्होंने ज़रूर चुनाव को प्रभावित किया.”
बीजेपी के चुनाव अभियान में हिंदुत्व से जुड़े मुद्दे भी हावी रहे. कांग्रेस ने सॉफ़्ट हिंदुत्व के ज़रिये वोटों को रिझाने की कोशिश की लेकिन नाकाम रही.
महापात्रा कहते हैं, “सांप्रदायिक मुद्दों ने भी ध्रुवीकरण किया, बीजेपी ने बिरनपुर हिंसा में मारे गए भुवनेश्वर साहू के पिता ईश्वर साहू को उम्मीदवार बनाया. इसके अलावा बस्तर में धर्मांतरण में एक बड़ा मुद्दा था. इससे भी ध्रुवीकरण हुआ. ये कह सकते हैं कि भाजपा अपने मुद्दों को जनता तक पहुँचाने में कामयाब रही और ये भाजपा की रणनीतिक जीत है.”
वहीं विजय त्रिवेदी मानते हैं कि कांग्रेस हिंदुत्व के मुद्दे पर कभी भी बीजेपी का मुक़ाबला नहीं कर सकती है.
विजय त्रिवेदी कहते हैं, “हिंदुत्व बीजेपी का मूल मुद्दा है. कांग्रेस ने इसकी नक़ल करने की कोशिश की, लेकिन ये सत्य है कि इस मुद्दे पर कांग्रेस कभी भी बीजेपी पर हावी नहीं हो पाएगी.”
वहीं हिंदुत्व के सवाल पर कांग्रेस नेता अलका लांबा कहती हैं, “भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सांप्रदायिकता की राजनीति नहीं करती है, कांग्रेस अपने काम पर वोट मांगती है, हम मंदिर या मस्जिद को चुनावी मुद्दा नहीं बनाते हैं.”

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तीन राज्यों में कांग्रेस की हार का असर भविष्य में इंडिया गठबंधन पर पड़ सकता है.
माापात्रा कहते हैं, “राष्ट्रीय राजनीति पर इन नतीजों का असर पड़ेगा. ये सिर्फ़ छत्तीसगढ़ नहीं बल्कि मध्य प्रदेश और राजस्थान का भी चुनाव था. मध्य प्रदेश में सरकार विरोधी लहर ख़ारिज हुई है. राजस्थान में भाजपा ने वापसी की है. कांग्रेस को जातिगत जनगणना से उम्मीद थी, वो भी पूरी नहीं हुई.''
''इस जनादेश का असर राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ेगा क्योंकि छत्तीसगढ़ में ओबीसी, आदिवासी और दलित बड़ी संख्या में हैं. कांग्रेस ने छत्तीसगढ़ में ज़ोर शोर से जातिगत जनगणना का मुद्दा उठाया था, इसे जनता ने स्वीकार नहीं किया है. अब देखना होगा राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस इस मुद्दे पर कैसे आगे बढ़ेगी.”
वहीं अलका लांबा कहती हैं कि कांग्रेस जातीय जनगणना के मुद्दे पर पीछे नहीं हटेंगी. उन्होंने कहा, “हमने जातीय जनगणना की बात ज़रूर की है. जहाँ-जहाँ हम सत्ता में आएंगे, हम जातीय जनगणना कराएंगे. ये हमारे मुद्दे हैं और रहेंगे.”
विजय त्रिवेदी मानते हैं कि इंडिया गठबंधन में कांग्रेस के नेतृत्व पर अब सवाल उठेंगे.
त्रिवेदी कहते हैं, ''इन चुनाव नतीजों का असर इंडिया गठबंधन पर भी पड़ेगा. अगर कांग्रेस जीतती तो इंडिया गठबंधन में वो बड़ी ताक़त बनकर उभरती, लेकिन अब कांग्रेस उस स्थिति में नहीं रहेगी. अखिलेश को नाराज़ किया, अब वो सवाल कर सकते हैं.''
''इंडिया गठबंधन में कांग्रेस को सिरमौर या लीडर होने के लिए अब बड़ी मशक्कत करनी होगी. तीनों राज्यों, छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश में बीजेपी से कांग्रेस का सीधा मुक़ाबला था और इसमें कांग्रेस की क़रारी हार हुई है. मध्य प्रदेश में भाजपा की 18 सालों से सरकार थी, लेकिन फिर भी कांग्रेस उसे टक्कर नहीं दे पाई. ऐसे में कांग्रेस पर सवाल तो उठेंगे ही.”

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विश्लेषक मानते हैं कि सभी विश्लेषणों से परे, इस चुनाव का एक सच ये भी है कि बीजेपी ने इन तीनों राज्यों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना चेहरा बनाया और जनता ने एक बार फिर उस पर मुहर लगाई है.
त्रिवेदी कहते हैं, “नरेंद्र मोदी के चेहरे पर बीजेपी ने ये चुनाव जीता है. फिर से ये साबित हो गया है कि नरेंद्र मोदी किसी भी स्थिति में वोट पार्टी की तरफ़ खींच सकते हैं. तीनों राज्यों के चुनावों में भाजपा ने अपने राज्य नेतृत्व के क्षत्रप नेताओं को चेहरा घोषित नहीं किया था.''
''ये चुनाव मोदी के चेहरे पर लड़ा गया. डॉ. रमन सिंह, वसुंधरा राजे और मौजूदा सीएम शिवराज सिंह के चेहरे पर ये चुनाव नहीं लड़ा गया. मध्य प्रदेश में तो नारा भी दिया गया ‘मोदी के मन में एमपी, एमपी के मन में मोदी’. नरेंद्र मोदी की छवि का मुक़ाबला कांग्रेस नहीं कर सकी.”
दोपहर होते-होते कांग्रेस के दफ़्तर में सन्नाटा पसर गया. बाहरी राज्यों से आए पार्टी के गिने-चुने कार्यकर्ता ही दफ़्तर में रह गए.
एक समर्पित कार्यकर्ता ने कहा, “राहुल गांधी ने बहुत मेहनत की, लेकिन कांग्रेस अभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का तोड़ नहीं खोज पा रही है. राज्यों के चुनावों में स्थानीय मुद्दे लापता हो गए और जनता ने एक बार फिर मोदी के चेहरे पर वोट कर दिया.”
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