मोदी या शिवराज: मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में बीजेपी की जीत का सेहरा किसके सिर?

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- Author, राघवेंद्र राव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
मध्य प्रदेश चुनाव से तक़रीबन तीन महीने पहले अगस्त में भारतीय जनता पार्टी ने उम्मीदवारों की पहली सूची जारी की. इस सूची में मौजूदा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का नाम नहीं था.
इसके बाद पार्टी ने दो और सूचियां जारी की उसमें भी शिवराज सिंह चौहान का नाम शामिल नहीं किया गया.
आख़िरकार पार्टी की चौथी लिस्ट में चौहान का नाम आया और ये साफ़ हो गया कि वो अपने चुनाव क्षेत्र बुधनी से फिर एक बार चुनावी मैदान में उतरेंगे.
लेकिन इस घटनाक्रम के चलते ये अटकलें ज़रूर तेज़ हो गईं कि क्या पार्टी एंटी-इंकम्बेंसी (सत्ता-विरोधी लहर) के ख़तरे से निपटने के लिए चौहान को दरकिनार कर रही है?
साथ ही प्रधानमंत्री मोदी ने जिस तरह राज्य के ग्रामीण और आदिवासी इलाक़ों में चुनाव प्रचार किया, ये माना जाने लगा कि बीजेपी ये चुनाव प्रधानमंत्री मोदी के नाम पर ही लड़ रही है.
रविवार को बीजेपी ने मध्य प्रदेश में शानदार जीत दर्ज की और शिवराज सिंह चौहान एक लाख से ज़्यादा वोटों से चुनाव जीते.
बीजेपी ने एक ऐसा चुनाव जीत लिया जिसे जीतना उसके लिए मुश्किल माना जा रहा था.

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कैसे फतह हुआ मध्य प्रदेश का क़िला?
2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस मध्य प्रदेश में कुल 230 सीटों में से 114 सीटें जीत कर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी और उसकी सरकार बनी थी. बीजेपी को उस साल 109 सीटें मिली थी.
कमलनाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार सिर्फ़ 20 महीने ही चल पाई थी और उसके बाद फिर एक बार शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार बन गई.
इस बार के विधानसभा चुनाव में ये माना जा रहा था कि कांग्रेस बीजेपी को कड़ी टक्कर देगी और शायद सरकार बनाने की स्थिति में आ जाए. लेकिन इस सब के उलट बीजेपी ने राज्य में एक बड़ी जीत हासिल की है.
राजनीतिक विशेषज्ञ मनीषा प्रियम कहती हैं कि मध्य प्रदेश में ये भारतीय जनता पार्टी की ज़ोरदार जीत है.
वे कहती हैं, "यह ज़ोरदार है और अप्रत्याशित भी है ख़ासकर इसलिए क्योंकि शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर को लेकर बहुत सारे दावे थे."
"इस बात की भी चर्चा थी कि राज्य में कमल नाथ के नेतृत्व वाली सरकार को पिछली बार उखाड़ फेंका गया और कहा जा रहा था कि उन्हें हटाने के ख़िलाफ़ ज़मीन पर काफी गुस्सा है."
मनीषा प्रियम के मुताबिक़ ऐसी धारणा थी कि कांग्रेस शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ सत्ता-विरोधी लहर पर सवार होगी और पिछले दरवाज़े से हटाए जाने की वजह से कमलनाथ के प्रति जनता में सहानुभूति होगी.
वे कहती हैं, "कुल मिलाकर ऐसा लग रहा था कि भाजपा रक्षात्मक पिच पर होगी और उसके लिए जीत दर्ज करना मुश्किल होगा. लेकिन उस पर विराम लगा दिया गया है. मध्य प्रदेश के सभी क्षेत्रों में बीजेपी ने शानदार जीत दर्ज की है."

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मध्य प्रदेश विधान सभा चुनाव में बीजेपी के केंद्रीय मंत्रियों और सांसदों को उतारने के फ़ैसले की भी काफ़ी चर्चा रही. लेकिन क्या इस रणनीति से पार्टी को फायदा मिला?
संजय सक्सेना भोपाल के सांध्य प्रकाश अख़बार के संपादक हैं.
वे कहते हैं, "शुरू में तो लग रहा था कि इन लोगों में से दो-तीन को छोड़कर बाक़ी सब हार रहे हैं. इन सांसदों और केंद्रीय मंत्रियों में एक-दो लोग ही थे जो पूरे क्षेत्रों में घूमे लेकिन ज़्यादातर लोग अपनी-अपनी सीट पर ही सिमट गए."
"इसलिए ये कहना मुश्किल है कि इन लोगों को मैदान में उतारने का कितना फ़ायदा हुआ. लेकिन चूँकि इनमें से ज़्यादातर लोग जीत रहे हैं तो उसे बीजेपी के लिए सकारात्मक तौर पर देखा जा रहा है."

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शिवराज का कैसे बुलंद हुआ जलवा
भोपाल में बीबीसी संवाददाता सलमान रावी कहते हैं कि पिछले एक साल से ये माना जा रहा था कि शिवराज सिंह चौहान का चेहरा अब स्वीकार्य नहीं है और राज्य सरकार और इस चेहरे के ख़िलाफ़ एंटी-इंकम्बेंसी है क्यूंकि चौहान लम्बे समय से मुख्यमंत्री रहते आ रहे हैं.
सलमान रावी कहते हैं, "साथ ही कहा जा रहा था कि लोग बदलाव ढूंढ रहे हैं. इन्हीं वजहों ने बीजेपी को बैकफुट पर धकेला और पार्टी को लगा की उनके पुराने गढ़ मध्य प्रदेश में कुछ गड़बड़ हो रही है. साथ ही ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीजेपी में आने से पार्टी के कुछ लोग नाराज़ हुए थे जिससे पार्टी में गुटबाज़ी भी शुरू हो गई थी."
"अमित शाह जब यहाँ आये तो उनसे पूछा गया कि मुख्यमंत्री का चेहरा कौन होगा. तो उन्होंने कहा था कि अगर पार्टी जीतती है तो पार्टी का नेतृत्व इस बात का फ़ैसला करेगा."
"तो चेहरे की एंटी-इंकम्बेंसी से निपटने के लिए पार्टी ने पूरा कैंपेन 'एमपी के मन में मोदी और मोदी के मन में एमपी' पर लेकर खड़ा कर दिया. इससे स्थानीय मुद्दे पीछे चले गए."
सलमान रावी के मुताबिक़ जैसे-जैसे चुनाव की गहमा-गहमी बढ़ती गई तो बीजेपी को एहसास हुआ कि शिवराज सिंह चौहान की लाड़ली बहना और लाड़ली लक्ष्मी जैसी योजनाओं को प्रदेश की महिलाओं से अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है.
वे कहते हैं, "इसी वजह से चुनाव से क़रीब एक महीना पहले बीजेपी को लगा की ये योजनाएं गेम-चेंजर (जो खेल को बदल दे) हो सकती हैं."
"बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व को शायद इस बात का ऐसा हुआ होगा कि अगर मध्य प्रदेश में कोई मास लीडर (जन नेता) है तो वो शिवराज सिंह चौहान ही हैं जो इतने लम्बे समय से मुख्यमंत्री रहे, योजनाएं लेकर आये और पूरे प्रदेश में घूम-घूम कर उनका प्रचार करते रहे."
रावी कहते हैं कि राज्य में दूसरे मास लीडर के तौर पर ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम आया लेकिन सिंधिया का प्रभाव ग्वालियर और चम्बल के इलाक़े तक सीमित था और बीजेपी को इस बात पर संकोच रहा कि क्या सिंधिया पर दांव लगाया जा सकता है?
वे कहते हैं, "तो आख़िरकार सेहरा शिवराज सिंह चौहान के सर ही बंधा और उन्होंने कमान संभाली और उन्होंने पूरे राज्य में तूफानी प्रचार किया."

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जीत का सेहरा किसके सर?
मध्य प्रदेश में बीजेपी की शानदार जीत के बात चर्चा इस बात की है कि इस जीत का नायक कौन रहा--मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी.
संजय सक्सेना कहते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी का चेहरा आगे करना बीजेपी के लिए कारग़र साबित हुआ.
सक्सेना कहते हैं, "बीजेपी का वोटर मोदी और बीजेपी के नाम पर आगे आया है. शिवराज सिंह चौहान को भले ही चेहरा नहीं बनाया गया था लेकिन उनकी लाडली योजना ने महिलाओं को नई ऊर्जा दी."
"तो अगर बीजेपी के प्रति महिलाओं का वोट प्रतिशत बढ़ा है तो लाड़ली बहना को उसके लिए एक बड़ा फ़ैक्टर माना जा रहा है."
सक्सेना के मुताबिक़ बीजेपी की प्रधानमंत्री मोदी के चेहरे को आगे रखने की रणनीति ने रंग दिखाया है.
वे कहते हैं, "पार्टी ने कहा कि बीजेपी चुनाव लड़ रही है और चेहरा मोदी थे तो मध्य प्रदेश में बीजेपी का वोटर जो खिसकता हुआ दिख रहा था या नाराज़ था वो वापस पार्टी की तरफ आ गया. मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित न करने की रणनीति से बीजेपी को फ़ायदा हुआ."
मनीषा प्रियम कहती हैं, "मध्य प्रदेश में बीजेपी की सुगबुगाहट प्रधानमंत्री मोदी ने तब शुरू की जब तीन मौजूदा केंद्रीय मंत्रियों और चार अन्य सांसदों को केंद्र से उम्मीदवार के रूप में लॉन्च किया गया."
वे कहती हैं, "हालाँकि शुरुआत में जो एक केंद्रीय दबदबे वाली चुनावी रणनीति लग रही थी वो कुछ वक़्त के बाद दरकिनार हो गई और शिवराज सिंह चौहान को एक बार फिर अभियान के केंद्र में ला दिया. प्रचार के अंत में पीएम मोदी और शिवराज सिंह चौहान एक साथ सार्वजानिक तौर पर दिखने लगे."
"साथ ही, कई लोग जो यह मानते थे कि शिवराज को टिकट नहीं दिया जाएगा, वो ग़लत साबित हुए. उन्हें फिर से बुधनी से मैदान में उतारा गया और उनके सभी भरोसेमंद लोगों को जगह दी गई. शिवराज सिंह चौहान को उनका उचित स्थान मिला."
मनीषा प्रियम के मुताबिक़ महिलाओं के लिए शिवराज सिंह चौहान की लाडली बहना योजना भी महिलाओं के बीच काफी हिट बताई जा रही है.
वे कहती हैं, "तो मैं कहूँगी कि इस जीत का बहुत सारा श्रेय शिवराज सिंह चौहान के स्थानीय नेतृत्व को जाता है लेकिन अंततः यह पीएम मोदी और चौहान की संयुक्त कार्यप्रणाली थी जिसका नतीजा बीजेपी को इस जीत के तौर पर मिला है."
बीबीसी संवाददाता सलमान रावी कहते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ने अपने चुनाव प्रचार में शहरी इलाक़ों को निशाना नहीं बनाया. "उन्होंने ज़्यादातर ग्रामीण और आदिवासी इलाक़ों में चुनाव प्रचार किया जो कि पारम्परिक तौर पर कांग्रेस के गढ़ हैं. इन इलाक़ों में प्रधानमंत्री मोदी की रैलियों का असर ज़रूर हुआ है."

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कौन होगा मुख्यमंत्री?
बड़ा सवाल अब ये है कि क्या बीजेपी शिवराज सिंह चौहान को ही मुख्यमंत्री बनाएगी या फिर कोई नया चेहरा राज्य की कमान संभालेगा.
मनीषा प्रियम कहती हैं, "मुख्यमंत्री पद के लिए खींचतान तो होगी लेकिन तथ्य ये है कि इस अभियान का नेतृत्व शिवराज सिंह चौहान ने किया है. तथ्य ये भी है कि वो मौजूदा मुख्यमंत्री हैं. और तथ्य ये भी है कि बहुत से लोगों ने देखा है कि जीत की पटकथा उन्होंने कैसे लिखी."
"राजनीति प्रतिस्पर्धा का खेल है लेकिन मैं इस दौड़ में शिवराज सिंह चौहान को सबसे आगे देखती हूँ. अगर उनके साथ कुछ उप-मुख्यमंत्री भी बनाए जाएं तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा. उपमुख्यमंत्रियों में कोई आदिवासी चेहरा हो सकता है."
संजय सक्सेना कहते हैं कि अगर शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री नहीं बनाया जाता है तो जो दो बड़े चेहरे सामने हैं वो हैं ज्योतिरादित्य सिंधिया और प्रहलाद पटेल. व
वे कहते हैं, "क्यूंकि 2024 का आम चुनाव सामने है तो बीजेपी की रणनीति एक ओबीसी चेहरा को सामने लाने की है. ओबीसी चेहरों में सबसे प्रमुख चेहरा है प्रहलाद पटेल का है."
बीबीसी संवाददाता सलमान रावी कहते हैं कि चूंकि 2024 का आम चुनाव क़रीब है तो इस बात की सम्भावना कम है कि शिवराज सिंह चौहान को हटाकर किसी और को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा.

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कांग्रेस से कहां हुई चूक?
मनीषा प्रियम के मुताबिक़ कांग्रेस में टिकट वितरण में ही गड़बड़ी हो गई. वे कहती हैं, "उन्होंने ग़लतियाँ कीं. जनता में इस बात को लेकर लगातार आशंका बनी हुई थी कि कांग्रेस ने ऐसे लोगों को टिकट दे दी है जिनके जीतने की संभावना नहीं थी और इसलिए वो मुक़ाबले में ही नहीं है. पार्टी ने इस धारणा पर कोई स्पष्टीकरण देने की भी कोशिश नहीं की."
मनीषा प्रियम कहती हैं कि कांग्रेस की एक और बड़ी चूक कमलनाथ और दिग्विजय सिंह पर जरूरत से ज्यादा निर्भर करने की भी थी. वे कहती हैं, "इन दोनों नेताओं के आसपास ऐसे नेताओं का कोई इंद्रधनुषी गठबंधन नहीं था जो पार्टी के लिए काम कर रहे थे."
संजय सक्सेना का कहना है कि कांग्रेस की सबसे बड़ी ग़लती ओवर-कॉन्फिडेंस या अति आत्मविश्वास रही.
वे कहते हैं, "वो (कांग्रेस) एंटी-इंकम्बेंसी के सहारे चलते रहे और ये मानकर चलते रहे कि वो जीत ही रहे हैं. तो जिस तरह जनता के बीच उन्हें जाना चाहिए था उस तरह से वो नहीं पहुंचे. कुछ ऐसे लोगों को मैदान में उतरा जो अलग-अलग वजहों से पूरे इलाक़े में चुनाव प्रचार करने नहीं पहुँच पाए."
"कांग्रेस महंगाई और भ्रष्टाचार जैसे लोकल मुद्दे उठा रही थी लेकिन पब्लिक ने मुद्दों को पूरी तरह नकार दिया. मेरा मानना है कि जनता ने सिर्फ़ मुफ़्त योजनाओं को और चेहरे को देखा."
सक्सेना के मुताबिक़ राज्य में सत्ता-विरोधी लहर काफ़ी थी लेकिन कांग्रेस उसका फ़ायदा नहीं उठा सकी.
वे कहते हैं, "बीजेपी एंटी-इंकम्बेंसी से सबक लेते हुए अंदर ही अंदर काम करती रही. जो डायरेक्ट बेनिफिट वाली योजनाएं हैं उनका सबसे ज़्यादा असर हुआ है. लाड़ली बहना जैसी योजना और किसानों को जो धन-सहायता मिल रही है उसका काफ़ी असर हुआ लगता है."
मध्य प्रदेश के चुनावी विश्लेषकों की माने तो कांग्रेस के पास पटवारी नियुक्ति घोटाला, पुरानी पेंशन स्कीम, बेरोज़गारी और महंगाई जैसे बहुत से चुनावी मुद्दे थे लेकिन पार्टी इन मुद्दों को लेकर सड़क पर नहीं उतरी.
सलमान रावी कहते हैं, "कांग्रेस ने आर्मचेयर पॉलिटिक्स की, कमरों में बैठ कर ट्वीट किया और ख़ुद को प्रेस कांफ्रेंस तक सीमित रखा. कांग्रेसी नेता जनता के बीच में नज़र नहीं आए."
वे कहते हैं कि एंटी-इंकम्बेंसी थी ज़रूर लेकिन बीजेपी उससे बहुत अच्छे तरीक़े से निपटी.
सलमान रावी कहते हैं, "और यहीं पर कांग्रेस चूक गई. ये चुनाव कांग्रेस को थाली में परोसा हुआ मिला था. लेकिन कांग्रेस इसका फ़ायदा नहीं उठा सकी. साथ ही पार्टी में ओवर कॉन्फिडेंस दिखा. मतगणना से दो दिन पहले ही कमल नाथ को भावी मुख्यमंत्री बताने वाले बोर्ड लग गए थे."
"जहाँ चुनाव से कई महीने पहले बीजेपी उम्मीदवारों की सूची जारी करने में पहले ही बाज़ी मार चुकी थी वहीं कांग्रेस में ओवर-कॉन्फिडेंस का आलम ये था कि उम्मीदवारों की बजाय कैबिनेट की सूची बन रही थी और किसे क्या पोर्टफोलियो दिया जाएगा उस पर फ़ैसले हो रहे थे."
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