मध्य प्रदेश में ‘पाँव-पाँव वाले भैया’ शिवराज क्या पार करा पाएँगे बीजेपी की नैया

शिवराज सिंह चौहान

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    • Author, सलमानी रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

मध्य प्रदेश में सीहोर ज़िले का सलकनपुर. ये बुधनी विधानसभा क्षेत्र में आता है, जहाँ विंध्यवासिनी बीजासन देवी सिद्धपीठ और मंदिर है.

मंदिर, पहाड़ी के ऊपर है. नीचे एक हेलिपैड बना हुआ है, जहाँ पुलिस और सरकारी अमला तैनात है.

तभी ख़ामोशी को चीरता हुआ हेलिकॉप्टर धूल उड़ाते हुए पहुँचा.

इस हेलिकॉप्टर से मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी पत्नी और दोनों बेटों के साथ उतरे.

उन्होंने अपने जूते उतारे और हाथ जोड़कर वहीं से विंध्यवासिनी बीजासन देवी को प्रणाम किया.

ये उनकी 'कुल देवी' का मंदिर है. आज का दिन चौहान के लिए ख़ास है, क्योंकि आज वो बुधनी में अपना ‘रोड शो’ करने जा रहे हैं.

बुधनी उनकी जन्मभूमि भी है और कर्मभूमि भी.

यहीं पास में रेहटी तहसील है, जहाँ पर उनके दो रथ पहले से ही तैयार खड़े हैं. परिवार सहित रथ पर सवार होकर वो बुधनी के लिए निकल पड़े.

रास्ते में जगह-जगह स्वागत द्वार हैं और साथ ही लोगों का हुजूम भी है.

शिवराज सिंह चौहान मध्य प्रदेश के सबसे लंबे कार्यकाल वाले मुख्यमंत्री हैं.

वर्ष 2005 से वो चार बार राज्य के सियासी सिंहासन पर विराजमान हुए.

इस दौरान वर्ष 2018 में उन्हें बहुमत हासिल नहीं हुआ और कांग्रेस के कमलनाथ ने कमान संभाली.

लेकिन दो सालों के बाद यानी 2020 में वो फिर से प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए.

बुधनी उनका विधानसभा क्षेत्र है, जहाँ से उन्होंने अपना पहला विधानसभा का चुनाव जीता था.

वो विदिशा से पाँच बार सांसद भी रहे. लेकिन 2006 से वो फिर बुधनी से लगातार विधानसभा का चुनाव जीत रहे हैं.

आजकल बुधनी विधानसभा क्षेत्र में चुनाव का प्रचार अपने पूरे शबाब पर है.

इस बार मुक़ाबला रोचक

शिवराज सिंह चौहान

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लेकिन इस बार का चुनाव बड़ा रोचक है, क्योंकि इस बार भारतीय जनता पार्टी ने शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री पद का चेहरा नहीं बनाया है.

जबकि, वो मध्य प्रदेश के सबसे लंबे कार्यकाल वाले मुख्यमंत्री हैं.

रथ में जब उनके इंटरव्यू के लिए मुझे बुलाया गया, तो रात के आठ बज चुके थे.

नसरुल्लाह गंज पहुँचते-पहुँचते रात के नौ बज चुके थे. पूरा दिन, हर पचास मीटर पर स्वागत कर रहे लोगों की भीड़ के बीच जाना और उन्हें संबोधित करते रहने के बावजूद शिवराज सिंह चौहान के चेहरे पर कोई थकान नहीं दिख रही थी.

उन्होंने मुझे बताया कि उन्हें रोड शो ख़त्म कर रात को एक बजे तक इंदौर भी पहुँचना हैं, जहाँ उनकी बैठक गृह मंत्री अमित शाह के साथ होने वाली है.

अमित शाह की बात आई, तो मुझे भोपाल में अमित शाह के संवाददाता सम्मलेन की याद आ गई, जब उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा था कि अगर भारतीय जनता पार्टी जीत जाती है, तो मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री कौन होगा ये संगठन तय करेगा.

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यानी उन्होंने स्पष्ट संदेश दे दिया था कि शिवराज सिंह चौहान के चेहरे को आगे कर इस बार का विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ रही है उनकी पार्टी.

यही सवाल मैंने शिवराज सिंह चौहान से किया, तो उन्होंने कहा,''देखिए हम एक बड़े मिशन का अंग हैं. और, वो मिशन है वैभवशाली, गौरवशाली, संपन्न, समृद्ध भारत के निर्माण का. उस मिशन का एक अंग होने के नाते, हम क्या काम करेंगे ये हमारा दल, हमारी विचारधारा तय करती है. इस लिए कौन कहाँ रहेगा हमको इसकी चिंता कभी नहीं रहती है. हमारे मन में भी ये बात नहीं आती है. केवल एक ही बात हम सोचते है हम कैसे और बेहतर ढंग से काम करें.''

उनकी बात पूरी भी नहीं हो पाई थी कि रथ के ब्रेक लग गए और लोगों का एक बड़ा हुजूम उनके स्वागत के लिए सामने खड़ा था.

मेरी ओर मुख़ातिब होते हुए उन्होंने कहा, ''देखो मेरी जनता आ गई है. सामने जनसैलाब है. मुझे थोड़ा लोगों के बीच जाना पड़ेगा.''

वो थोड़ी देर के लिए रथ से उतर कर चले गए, लेकिन मेरे दिमाग़ में ये सवाल बार बार घूमता रहा कि आख़िर मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह जैसे नेता को भारतीय जनता पार्टी किनारे क्यों कर रही है?

शिवराज की लोकप्रियता बनाम लाडली बहना योजना

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जानकार मानते हैं कि भारतीय जनता पार्टी समय-समय पर नेतृत्व का परिवर्तन करती रहती है.

वो कहते हैं कि इसके लिए शिवराज सिंह चौहान को भी मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए.

पाँच दशकों से भी ज़्यादा से मध्य प्रदेश की राजनीति पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार रमेश शर्मा कहते हैं, ''इसमें कोई शक नहीं है कि शिवराज सिंह की प्रदेश में अपनी एक अलग पकड़ है. लेकिन इसमें भी कोई शक नहीं है कि भारतीय जनता पार्टी का कैडर भी काम करता है.''

वो कहते हैं, ''आपको याद होगा उमा भारती का चेहरा अपने समय में सबसे बड़ा चेहरा था. लेकिन इसके बावजूद जब भारतीय जनता पार्टी ने निर्णय लिया और शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री बनाया, तो पूरा का पूरा कैडर उनके साथ आया. अब भी अगर पार्टी कुछ ऐसा ही निर्णय लेती है, तो ऐसा ही होगा.''

उन्होंने महाराष्ट में देवेंद्र फडणवीस, हरियाणा में मनोहरलाल खट्टर और उत्तराखंड में पुष्कर सिंह धामी का उदाहरण भी दिया.

जानकार ये भी मानते हैं कि शिवराज सिंह की लोकप्रियता उनके द्वारा शुरू की गई कई योजनाओं की वजह से है. ख़ास तौर पर महिलाओं के लिए.

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मुख्यमंत्री रहते हुए शिवराज सिंह चौहान ने महिलाओं को केंद्रित करते हुए कई योजनाएं शुरू कीं. जैसे लाडली लक्ष्मी और लाडली बहना योजना.

जानकार कहते हैं कि इन योजनाओं ने ज़मीनी स्तर पर अपना असर ज़रूर छोड़ा है और इससे शिवराज सिंह चौहान की महिलाओं के बीच लोकप्रियता और भी बढ़ी है.

लाडली लक्ष्मी योजना और पहले से चल रही थी. लेकिन चुनावों से चार महीने पहले लाडली बहना योजना को लागू किया गया, जिसकी वजह से शिवराज सिंह चौहान पर विपक्ष ने निशाना साधना शुरू कर दिया है.

कांग्रेस के प्रवक्ता केके मिश्रा ने सवाल उठाते हुए कहा, ''18 महीनों से शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री हैं. 15 महीनों को छोड़ दें तो मध्य प्रदेश में भाजपा की ही सरकार चली आ रही है. लाडली बहनों की याद उन्हें चुनाव के समय ही क्यों आई?''

लाडली बहना योजना का कितना असर?

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लाडली बहना योजना ज़मीन पर कितनी कारगर साबित हुई, इसकी समीक्षा अभी शुरू नहीं हुई है.

रेहटी तहसील की मुस्लिम बस्ती में हमारी मुलाक़ात सकीना बी से हुई. वो पसमांदा समाज से आती हैं. जिस घर में अभी वो रह रही हैं, वो आवास योजना के तहत बना हुआ पक्का मकान है.

पूछे जाने पर उन्होंने कहा, ''सब तो सुविधा दी है मामा ने. घर मकान दिया है रहने के लिए. नहीं तो हमारी व्यवस्था ही नहीं थी कि हम मकान बना सकते. लाडली बहना का पैसा दिया है और लाडली लक्ष्मी योजना से हमारी बच्चियों को पढाई लिखाई का बहुत सहारा मिला. नल की सुविधा भी दी. मुफ़्त में अनाज भी दे रहे हैं. मामा सब कुछ तो कर रहे हैं हमारे लिए.''

हमारी बातें दूर खड़ी होकर सुन रहीं सज्जो बी अचानक बोल पड़ीं, ''शिवराज सिंह चौहान हमारे भाई हैं, हमारे बच्चों के मामा हैं.''

सकीना बी

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दशकों तक इस इलाक़े में काम करते रहने की वजह से शिवराज सिंह चौहान के व्यक्तिगत रिश्ते भी बहुत मज़बूत हैं.

मोहम्मद सलीम भी इसी इलाके में रहते हैं. वो गर्व से कहते हैं, ''वो सब बच्चों के मामा हैं. लेकिन हमारे अंकल हैं. चाचा हैं वो हमारे क्योंकि वो हमारे वालिद साहब के दोस्त हैं.''

शिवराज सिंह चौहान अपनी शुरू की गई योजनाओं को लेकर बहुत गंभीर रहते हैं और ख़ुद ही उनकी निगरानी भी करते हैं.

अपने चुनावी रथ में बीबीसी से बात करते हुए वो दावा करते हैं कि ये योजनाएँ ‘गेम चेंजर’ इसलिए हैं, क्योंकि इनसे ‘महिलाओं के जीवन में बड़ा परिवर्तन’ आया है.

वो बताते हैं, ''ये बहनों का सम्मान है. उनके जीवन को बदलने का एक अभियान है. ये भी है कि बहनों को लगा कि हमारे भाई ने हमारे लिए कुछ किया है. तो बहनें एकजुट होकर, आप देख रहे हैं, साथ खड़ी हैं. पैसे भी दे रही हैं चुनाव लड़ने के लिए, प्रचार के लिए भी निकल रहीं हैं. ये महिलाएँ ऐसे पहले कभी नहीं निकलती थीं.''

'पाँव-पाँव वाले भैया' का नाम कैसे पड़ा

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बातों बातों में शिवराज सिंह चौहान बुधनी में बिताए अपने बचपन और अपने दोस्तों की बातें भी करते हैं. उन्हें वो दौर याद है और उनके दोस्तों को भी.

उनके पुराने दोस्तों में से एक मान सिंह पवार सीहोर में रहते हैं.

वो उस दौर को याद करते हैं जब सभी दोस्त एक साथ मिलकर काम किया करते थे. खाना भी पकाया करते थे.

बुधनी विधानसभा के शाहगंज में हमारी मुलाक़ात उनके पुराने साथी चंद्र प्रकाश पाण्डेय से हुई. वो प्रचार में जुटे हुए थे.

उन्होंने बताया, ''शिवराज जी ने बुधनी में बचपन से ही काफ़ी संघर्ष किया है. यहाँ आंदोलन भी किए. बुधनी विधानसभा हो या पूरा संसदीय क्षेत्र, पूरा इलाक़ा उन्होंने पैदल ही नाप दिया. पैदाल यात्राएँ कीं. शुरू के बुधनी विधानसभा में तो 90 प्रतिशत लोगों को तो वो व्यक्तिगत रूप से जानते हैं.''

शिवराज सिंह बताते हैं कि बुधनी और सीहोर कभी कांग्रेस पार्टी का गढ़ हुआ करता था. राजनीति के अपने शुरुआती दिनों में उन्हें भाजपा के संगठन की नीव रखने और फिर उसके विस्तार के लिए काफ़ी मेहनत करनी पड़ी थी. इसकी वजह से उनका नाम ‘पाँव पाँव वाले भैया भी पड़ गया था.

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वो कहते हैं, “ये इलाक़ा पहले कभी कांग्रेस का मजबूत गढ़ हुआ करता था. मैंने यहाँ शुरुआती दिनों से ही काम करना शुरू कर दिया था. लोगों में जागृति लाने का प्रयास किया. पैदल पैदल गाँव-गाँव घूमा. इसलिए मुझे लोग पाँव पाँव वाले भैया कहते हैं...”

ऐसा नहीं है कि उन्होंने समाज के किसी एक वर्ग के लिए काम किया. बुधनी के रहने वाले हर वर्ग के लोगों के बीच शिवराज सिंह चौहान एक अलग स्थान रखते हैं.

सरफ़राज़ लेथ मशीन का कारखाना चलाते हैं. रोड शो के दौरान वो मुख्यमंत्री का स्वागत बड़े जोश से कर रहे थे.

हमने पूछा तो वो बोले,''हमारा ये रिश्ता है कि वो हमारे मामा हैं.और हम उनको तहे दिल से चाहते हैं. उनके अलावा वोट किसी और को नहीं देते हैं. मामा के अलावा वोट किसी को नहीं देते हैं. हमारा ये लक्ष्य है कि वापस मामा ही बैठें (मुख्यमंत्री की कुर्सी पर).''

'पाँव पाँव वाले भैया’' से लेकर 'मामा' तक के उनके सफ़र के बीच कई दशक बीत गए.

टीवी कलाकार से मुक़ाबला

विक्रम मस्ताल शर्मा

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स्थानीय कार्यकर्ताओं में भी ख़ासा जोश है जो रोड शो में सुबह से लगे हुए हैं.

आगे-आगे उनकी गाड़ियाँ चल रही हैं. वो नारे लगा रहे हैं. इनमे से एक हैं बीजेपी कार्यकर्ता अभिषेक भार्गव, जो बताते हैं कि बुधनी विधानसभा में संघर्ष ‘एकतरफ़ा’ है.

अभिषेक कहते हैं कि हमेशा की तरह शिवराज सिंह चौहान नामांकन भर कर प्रदेश के दूसरे इलाक़ों में प्रचार करने चले जाते हैं और बुधनी में प्रचार की कमान कार्यकर्ताओं के हाथों में ही रहती है.

लेकिन इस बार कांग्रेस पार्टी ने बुधनी सीट से शिवराज सिंह चौहान के ख़िलाफ़ टीवी के एक कलाकार पंडित विक्रम मस्ताल शर्मा को उतारा है जिन्होंने हाल ही में रामायण पर आधारित एक सीरियल में हनुमान का किरदार निभाया है.

शर्मा बुधनी विधानसभा के ही रहने वाले हैं, लेकिन राजनीति में उनका ये पहला क़दम है.

अभिषेक भार्गव

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शिवराज सिंह चौहान के रोड शो के फ़ौरन बाद हम पंडित विक्रम मस्ताल शर्मा से मिलने उनके सलकनपुर आवास पर पहुँचे.

मुख्यमंत्री के रोड शो में उमड़े जनसैलाब के बारे में पूछे जाने पर वो कहते हैं, ''उनको (शिवराज सिंह चौहान को) बार-बार जन आशीर्वाद यात्राएँ निकालनी पड़ रही हैं. आपको बार-बार हर पाँच-दस किलोमीटर पर सभाएँ करनी पड़ रही हैं.''

वो कहते हैं, '' पहले ऐसा तो नहीं होता था जो अभी पिछले 5-6 महीनों से हो रहा है. शिवराज सिंह चौहान कहते थे कि वो प्रचार के लिए बुधनी आएँगे ही नहीं. शिवराज जी कहते थे कि मेरी जनता चुनाव जिताएगी.''

शर्मा का दावा है कि ‘सत्ता विरोधी’ लहर की वजह से मुख्यमंत्री की परेशानी बढ़ गई है और कांग्रेस उन्हें बुधनी सीट पर कड़ी टक्कर दे रही है.

वो शिवराज सिंह चौहान द्वारा महिलाओं के लिए शुरू की गई योजनाओं को ‘पब्लिसिटी स्टंट’ बताते हैं और आगे कहते हैं,''आप देखिए लाडली बहना चार महीनों (चुनाव से चार महीने पहले) पहले क्यों याद आई. माननीय प्रधान मंत्री यहाँ (मध्य प्रदेश) आते हैं बड़ी सभाएँ करते हैं. उन सभाओं में वो माननीय शिवराज जी का नाम तक नहीं लेते हैं. किसी योजना का नाम नहीं लेते हैं. मोदी जी क्या कहते हैं? कहते हैं मध्य प्रदेश के मन में है मोदी. तो शिवराज सिंह चौहान जी कहाँ हैं ?”

उनके साथ मौजूद कांग्रेस के पुराने कार्यकर्ता, संतोष वर्मा भी दावा करते हैं कि इस बार बुधनी सीट पर मुक़ाबला कड़ा है.

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वैसे तो शिवराज सिंह चौहान के सामने कई चुनौतियाँ हैं. जानकारों को लगता है कि उनमें से सबसे बड़ी चुनौती का जो उन्हें सामना करना पड़ रहा है, वो है संगठन में चल रही अंतर्कलह.

लेकिन शिवराज सिंह चौहान कहते हैं कि हर संगठन में ऐसा होता रहता है.

बीबीसी से बात करते हुए वो कहते हैं, ''ये स्वाभाविक रूप से होता रहता है कुछ मात्रा में. लेकिन भाजपा के कार्यकर्ता सिद्धांत और मूल्यों के लिए काम करते हैं. छोटी मोटी घटनाएँ या मामले सामने आते रहते हैं. ये सब कुछ निजी स्वार्थों की वजह से होता है. लेकिन बड़े तौर पर भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता एक बड़े मिशन के लिए काम करते हैं. इसलिए ये अंतर्कलह बहुत लंबी नहीं चलती.''

पार्टी का रुख़ देखते हुए ये चुनाव भी शिवराज सिंह चौहान के लिए ख़ास है. ऐसा इसलिए क्योंकि नेतृत्व परिवर्तन की अटकलों के बीच भी वो मध्य प्रदेश में पार्टी के एक मात्र ‘मास लीडर’ हैं.

यानी ऐसे नेता जिनकी पूरे राज्य में आम लोगों के बीच पकड़ है. इस लिए विधासभा के चुनावों के परिणामों पर उनका राजनीतिक भविष्य भी निर्भर करने वाला है.

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