मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा में 'हनुमान भक्त कमलनाथ' को हराना टेढ़ी खीर क्यों है?

कमलनाथ

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    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मध्य प्रदेश से

राजू दहरिया का जन्म वर्ष 1990 में हुआ. वो मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा रेलवे स्टेशन में गाड़ियों की पार्किंग में नौकरी करते हैं.

जब से उन्होंने होश संभाला है, तब से उन्होंने छिंदवाड़ा से कांग्रेस अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ को ही चुनाव जीतते हुए देखा है.

उन्हीं की तरह दूसरे युवक भी हैं, जिन्होंने होश संभालने के बाद से छिंदवाड़ा में या तो कमलनाथ या फिर उनके सांसद पुत्र नकुलनाथ को ही नेता के रूप में देखा है.

इसमें कोई शक नहीं कि छिंदवाड़ा, कमलनाथ का सबसे मज़बूत क़िला है. उन्हें छिंदवाड़ा में किसी भी सीट पर चुनौती देना बड़े-बड़े नेताओं के लिए टेढ़ी खीर है.

वर्ष 1980 से ही वो इस सीट पर सांसद के रूप में जीतते आए हैं.

सिर्फ़ एक बार ही ऐसा हुआ था, जब वर्ष 1993 में उन्हें उप-चुनाव में बीजेपी के सुंदरलाल पटवा से शिकस्त मिली थी.

लेकिन कमलनाथ ने अगले ही चुनाव में पटवा को हरा दिया था और एक बार फिर से सांसद चुन लिए गए थे.

कमलनाथ
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जब पहली बार कमलनाथ चुनाव हारे

ये वो दौर था, जब हवाला में नाम आने के बाद उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा था बल्कि अपनी पत्नी को चुनाव लड़वाया था. उनकी पत्नी जीत गईं थीं.

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फिर हवाला मामले में ‘क्लीन चिट’ मिलने के बाद उनकी पत्नी ने इस्तीफ़ा दे दिया था और उस सीट पर उपचुनाव हुआ, जिसमें कमलनाथ के ख़िलाफ़ भाजपा ने सुंदरलाल पटवा को उतारा. पटवा जीत गए थे. बस यही पहली बार था जब कमलनाथ चुनाव हारे थे लेकिन दो सालों के बाद उन्होंने फिर ये सीट जीत ली थी.

लेकिन विधान सभा का उनका अनुभव नया है, क्योंकि वर्ष 2019 में वो पहली बार विधानसभा का चुनाव लड़े थे और राज्य के मुख्यमंत्री भी बन गए थे.

हालाँकि 15 महीनों में ही उनकी सरकार गिर गई थी, क्योंकि प्रदेश के बड़े नेता और ग्वालियर राज घराने के ‘महाराजा’ ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने समर्थकों के साथ बग़ावत कर दी थी और भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए थे.

सिंधिया के समर्थक 22 विधायकों ने इस्तीफ़ा दे दिया था और फिर बाद में बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ा था.

छिंदवाड़ा ज़िले में विधानसभा की सात सीटें हैं और सभी पर कांग्रेस के मौजूदा विधायक हैं.

इसके अलावा कमलनाथ के पुत्र नकुलनाथ छिंदवाड़ा से सांसद हैं. छिंदवाड़ा को पूरे भारत में कांग्रेस के सबसे मज़बूत गढ़ में से एक माना जाता है, जिसे भेदना मुश्किल काम है.

नकुलनाथ
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कमलनाथ के राजनीतिक जीवन की शुरुआत

शिकारपुर में अपने घर पर बीबीसी से बात करते हुए कमलनाथ उस दौर को याद करते हैं, जब उन्होंने छिंदवाड़ा से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की थी.

वो कहते हैं कि तब ये इलाक़ा पूरे भारत में सबसे पिछड़े इलाक़ों में शुमार हुआ करता था.

उनके पुत्र नकुलनाथ ने अपना अनुभव साझा करते हुए कहा, “पहले कैम्पा कोला चला करती थी. वो यहाँ नहीं मिलती थी. नागपुर से मंगवाना पड़ता था. नागपुर यहाँ से 130 किलोमीटर दूर है. ब्रेड भी नहीं मिलती थी क्योंकि कोई बेकरी यहाँ नहीं हुआ करती थी. वो भी नागपुर से मंगवानी पड़ती थी. ये इतना पिछड़ा हुआ इलाक़ा था.”

नकुलनाथ बताते हैं कि पिछले चार दशकों में छिंदवाड़ा का कायाकल्प किस तरह हुआ और आज यहाँ बड़े-बड़े ‘ब्रांड्स’ के ‘शो रूम’ खुल गए हैं.

कमलनाथ की चार दशकों से ज़्यादा की राजनीति में छिंदवाड़ा का अहम स्थान है.

वो सबसे पहले वर्ष 1991 में केंद्रीय मंत्रिमंडल में बतौर पर्यावरण एवं वन मंत्री (स्‍वतंत्र प्रभार) के रूप में शामिल हुए. फिर वो केंद्रीय कपड़ा मंत्री, वाणिज्‍य एवं उद्योग मंत्री, सड़क एवं परिवहन और राजमार्ग मंत्री, शहरी विकास और संसदीय कार्य मंत्री भी रह चुके हैं.

बीबीसी से वो कहते हैं, “छिंदवाड़ा की आज अपनी अलग पहचान है. मुझे याद है वर्ष 1979 में छिंदवाड़ा क्या था और आज क्या कुछ है. कोई भी क्षेत्र हो. सड़कों की अगर बात करें, सिंचाई की अगर बात करें, तो मैंने एक मिशन के तौर पर छिंदवाड़ा को विकसित करने का प्रयास किया है. हमारे यहाँ बहुत से कौशल विकास केंद्र बने हैं. ऐसा कोई ज़िला पूरे देश में नहीं है, जहाँ इतने सारे स्किल सेंटर्स मौजूद हों. ये 15 साल पहले मैंने बनाए जब ये ‘स्किल इंडिया’ का नाम भी किसी ने नहीं सुना था.”

केके मिश्रा
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कमलनाथ पर भरोसे की वजह क्या है?

मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ता और वरिष्ठ नेता केके मिश्रा कहते हैं कि छिंदवाड़ा एक ऐसा पेड़ है, जिसे कमलनाथ ने सींचा है.

वो कहते हैं कि ऐसे ही इस जगह को कमलनाथ का मज़बूत गढ़ नहीं कहा जाता है.

उनका कहना था, “मज़बूत गढ़ कमलनाथ जी ने छिंदवाड़ा को अगर बनाया है तो उसके पीछे उनकी तपस्या और ईमानदार वचनबद्धता है. विकास कार्यों और औद्योगीकरण का श्रेय उन्हीं को जाता है. लेकिन सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात ये है कि छिंदवाड़ा की जनता से उनका सीधा संबंध है. कमलनाथ हर किसी की ख़ुशियों और दुख दर्द में शामिल होते हैं.”

यहीं शहर में, हमारी मुलाक़ात मानिक लाल चंद्रवंशी से हुई जो छोटा मोटा व्यापार करते हैं.

उन्होंने अपने परिवार का उदाहरण दिया और बताया कि उनके छोटे भाई पंकज बीजेपी के कार्यकर्ता हैं.

वो बताते हैं, “मेरा भाई बीजेपी का कार्यकर्ता है. लेकिन जब वर्ष 2012 में उसका पैर टूट गया था तो उसके इलाज के लिए कमलनाथ जी ने 35 से 40 हज़ार रुपयों का आबंटन कराया था.”

सवाल उठता है कि क्यों कमलनाथ और उनके परिवार के लोगों पर ही छिंदवाड़ा के लोग भरोसा करते रहे हैं?

कमलनाथ

मध्य प्रदेश की राजनीति पर चार दशकों से नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार एनके सिंह मानते हैं कि ऐसा इसलिए है क्योंकि चुनाव जीतने के बाद भी कमलनाथ लोगों से जुड़े ही रहते हैं.

उनका कहना था, “कमलनाथ देश के उन कम नेताओं या राजनेताओं में से हैं जो अपने चुनावी क्षेत्र की वैसे ही देखभाल करते हैं जैसे एक ‘नर्स’ करती है. पूरे-पूरे साल वो लोगों के काम में लगे रहते हैं, उनसे मिलते रहते हैं और उनकी समस्याओं को निपटाते रहते हैं. मैं 40 साल से मध्य प्रदेश कवर कर रहा हूँ. मैंने पाया है कि देश में कोई भी नई योजना आ जाए. भारत सरकार की योजना हो या मध्य प्रदेश सरकार की. सबसे पहले वो योजना छिंदवाड़ा में लागू होती रही है.”

इस बारे में कमलनाथ बताते हैं कि वो लोगों के बीच इस बात को लेकर कोई भेदभाव नहीं करते कि उनके पास आने वाला किस राजनीतिक दल का समर्थक है.

वो बताते हैं, “मुझसे मिलने कोई भी आता है. कोई तकलीफ़ में होता है तो मैं उसकी मदद करने का प्रयास करता हूँ और ये मैं कभी नहीं देखता वो किस पार्टी का है, मैं कहता हूँ कि जिसको तकलीफ़ है, तो तकलीफ़ है.”

कमलनाथ

हिंदुत्व के सहारे कमलनाथ

कमलनाथ की राजनीति विकास और परियोजनाओं के इर्द गिर्द ही घूमती रही. इसका लाभ छिंदवाड़ा को मिलता रहा और कमलनाथ को भी.

लेकिन, पिछले कुछ सालों से उन पर आरोप लगने लगे हैं कि वो मध्य प्रदेश में कांग्रेस को बीजेपी के मुक़ाबले में लाने के लिए हिंदुत्व का सहारा लेने लगे हैं.

जानकार मानते हैं कि ऐसा उन्होंने पिछले विधानसभा के चुनावों से पहले ही करना शुरू कर दिया था. लेकिन पिछले पाँच सालों में और ख़ास तौर पर प्रदेश कांग्रेस कमेटी की कमान संभालने के बाद उन्होंने कांग्रेस पार्टी की राजनीतिक ‘लाइन’ को ही बदल दिया.

इस दौरान उन्होंने पार्टी के सभी ज़िला मुख्यालयों पर हनुमान जयंती के दिन कार्यक्रम आयोजित करवाए. संगठन के कई प्रकोष्ठ बनाए जिनमें सबसे ज़्यादा चर्चा साधु संतों, पुजारियों और आयोजन के प्रकोष्ठों की हो रही है.

कमलनाथ पर आरोप लगने लगे हैं कि उन्होंने बीजेपी के ‘हिंदुत्व’ के मुद्दे को हथियाना शुरू कर दिया है. हाल ही में उन्होंने छतरपुर के बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र शास्त्री और सीहोर के गुरु प्रदीप मिश्रा की कथा भी छिंदवाड़ा में आयोजित की.

उनके क़रीबी दावा कर रहे हैं कि ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ के सहारे कमलनाथ को पिछली बार विधानसभा कामयाबी मिली थी और इस बार भी इसका चुनावी लाभ उन्हें होगा. लेकिन ये बहस का मुद्दा है.

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हालाँकि बीजेपी उन्हें पिछले पाँच सालों से ‘चुनावी हिंदू’ भी कह रही है.

जानकार मानते हैं ऐसा इसलिए है क्योंकि बीजेपी को मध्य प्रदेश में कांग्रेस के बदले स्वरूप या बदली हुई दिशा से चिंतित होने की आवश्यकता भी है, ऐसे समय में जब संगठन के अंदर ही काफ़ी उथल पुथल चल रही है और बग़ावत के स्वर उभर रहे हैं.

मध्य प्रदेश में बीजेपी के प्रवक्ता हितेश वाजपेयी ने बीबीसी से बात करते हुए इस बात से तो इनकार कर दिया कि उनकी पार्टी कमलनाथ और कांग्रेस के इस बदले स्वरूप से किसी भी तरह से ‘चिंतित’ है.

वाजपेयी कहते हैं, “अब बीजेपी को मिल रहे जनसमर्थन को देखकर कांग्रेस हिंदू-हिंदू करने लगी है. कांग्रेस सत्ता में आने के लिए हिंदुत्व की बात कर रही है. क्योंकि उनको तो वोट चाहिए. इसलिए तो खेल कर रहे हैं. स्वाभाविक है हम इनको हँसी मज़ाक में चुनावी हिंदू कह देते हैं.”

असलम शेर ख़ान
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कांग्रेस के अंदर उठती आवाज़ें

लेकिन ये आरोप तब गंभीर हो जाते हैं, जब कांग्रेस के अंदर से ही आवाजें उठने लगीं हैं.

पूर्व ओलंपियन और हॉकी खिलाड़ी असलम शेर ख़ान भोपाल से कांग्रेस के पूर्व सांसद भी हैं.

वो मानते हैं कि अगर कमलनाथ पार्टी के मूल सिद्धांतों से अलग होकर चलेंगे, तो इससे कांग्रेस को नुक़सान ही होगा.

उनका कहना था, “इस बार कमलनाथ जी के नेतृत्व में हिंदुत्व के सहारे पार्टी चुनाव लड़ रही है. बजरंगबली के नाम पर लड़ रही है. मैं समझता हूँ कि मध्य प्रदेश के अंदर कांग्रेस को इससे दीर्घकालिक बड़ा नुक़सान होगा. मुझे ये भी डर है कि ये कांग्रेस उस पिच पर हार जाएगी, क्योंकि हिंदुत्व भारतीय जनता पार्टी का सबसे बड़ा चुनावी हथियार है.”

इस बारे में जब मैंने कमलनाथ से पूछा तो उन्होंने साफ़ इनकार करते हुए कहा कि वो ‘किसी पिच पर नहीं खेल रहे हैं.’

वो कहते हैं, “ये (बीजेपी) वाले पिच बनाते हैं. मैं तो पिच नहीं बनाता. न ही मैं उस पिच पर खेलता हूँ. ये कहना ग़लत होगा कि मैं किसी और की बनाई पिच पर खेल रहा हूँ. मैं अपना काम करता हूँ. अपने हिसाब से और अपने लोगों की ज़रूरतों के हिसाब से. मैं विकास और निष्ठा की पिच पर ही खेलता हूँ.”

हनुमान मंदिर

'ये है कमलनाथ जी की असली पूँजी'

छिंदवाड़ा के सिमरिया में कमलनाथ ने एक भव्य हनुमान मंदिर का निर्माण भी किया है. इससे पहले उन्होंने अपने निवास, यानी शिकारपुर में भी एक भव्य हनुमान मंदिर का निर्माण किया था.

पंडित छवि शंकर शुक्ल, छिंदवाड़ा के श्री सिद्धेश्वर हनुमान मंदिर के पुरोहित हैं और कई सालों से इस मंदिर में पूजा पाठ कर रहे हैं.

वो बताते हैं, “कमलनाथ जी का तो एक मंदिर और है जो शिकारपुर में है. ये लगभग वर्ष 1982-84 में बनकर तैयार हुआ था और इसकी स्थापना भी तभी हो गई थी. तो उस समय से वो और उनका परिवार हनुमान जी की पूजन कर रहे हैं. श्रद्धा है उनकी. हनुमान जी के प्रति विशेष श्रद्धा है उनकी. परमात्मा के प्रति और सनातन धर्म के प्रति.”

मंदिर की स्थापना और सॉफ्ट हिंदुत्व के मुद्दे पर पूछे जाने पर कमलनाथ बोले, “14 साल पहले मैंने हनुमान मंदिर बनाया और छिंदवाड़ा को समर्पित किया. ये धार्मिक भावना थी मेरी. इसमें कहीं से भी कोई राजनीति नहीं थी. भारतीय जनता पार्टी क्यों परेशान हो रही है? अगर मैं मंदिर जाता हूँ तो भाजपा परेशान होती है. अगर मैं पूजा करता हूँ तो परेशान होती है. क्या उन्होंने ठेका धर्म का लिया हुआ है? क्यों ना बनाएँ साधु संतों का प्रकोष्ठ. मैंने 34 प्रकोष्ठ बनाए हैं तो साधु संतों का क्यों नहीं बनाएँ. हम पुजारियों को क्यों ना मान्यता दें? क्यों नहीं? इसमें ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की क्या बात है?”

हम उस दिन छिंदवाड़ा पहुँचे, जिस दिन कमलनाथ अपना नामांकन भर रहे थे. छिंदवाड़ा की सड़कों पर जन सैलाब उमड़ा पड़ा था. दूर दूर तक पार्टी का झंडा लिए, उनके समर्थक, ढोल नगाड़ों और बैंड के साथ आगे आगे चल रहे थे.

अपने इस ‘रोड शो’ के दौरान कमलनाथ शहर के मंदिरों में माथा टेक कर आशीर्वाद ले रहे थे.

कांग्रेस के नेता गौरव शुक्ला ने लोगों की तरफ़ इशारा करते हुए कहा, “देखिए. ये है कमलनाथ जी की असली पूँजी.”

कमलनाथ
बीजेपी

जब कमलनाथ की गिरी सरकार

वर्ष 2018 में कमलनाथ मुख्यमंत्री तो बने थे, लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थकों की बग़ावत की वजह से उनकी सरकार गिर गई थी.

अब वो दावा करते हैं कि सिंधिया के जाने के बाद पैदा हुई चुनौती से उनकी पार्टी उबर गई है. वो ये भी कहते हैं कि उन्हें इस बात की संतुष्टि है कि उन्होंने अपने ‘सिद्धांतों से समझौता नहीं किया’ और बग़ावत के आगे ‘झुके नहीं’.

बीबीसी से बात करते हुए वो कहते हैं, “देखिए बाग़ियों को मनाने की बात नहीं थी. वो तो सीधे तौर पर सौदे की ही बात थी. बाग़ी विधायक मुझे मिलते थे और कहते थे कि हमें इतना पैसा ऑफ़र किया जा रहा. मैं मुख्यमंत्री था, मैं भी सौदा कर सकता था. लेकिन मैं सौदा करके कुर्सी पर बैठने को तैयार नहीं था.”

कमलनाथ के ख़िलाफ़ भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज नेता भी चुनाव लड़ने से कतराते हैं. चाहे वो लोकसभा का चुनाव हो या विधानसभा का चुनाव हो.

ज़ाहिर सी बात है कि उनके राजनीतिक क़द और जनता पर उनकी पकड़ इतनी मज़बूत है कि उसमे सेंध लगाना आसान काम नहीं है.

लेकिन, 2018 में पहली बार जब वो विधानसभा का चुनाव लड़ रहे थे तो भारतीय जनता पार्टी के विवेक बंटी साहू उनके ख़िलाफ़ खड़े हुए थे और उनके ख़िलाफ़ उन्होंने 90 हज़ार वोट हासिल किए थे.

इस बार फिर बंटी साहू कमलनाथ के ख़िलाफ़ चुनावी मैदान में उतरे हुए हैं. साहू भी अपनी सीट पर पूरा ज़ोर लगाए हुए हैं.

परासिया रोड पर अपने चुनाव कार्यालय में बीबीसी से बात करते हुए वो कमलनाथ को चुनौती देते हुए कहते हैं, “कमलनाथ जी को कहाँ होना चाहिए? पूरे प्रदेश में घूमना चाहिए. पार्टी के उम्मीदवारों के नामांकन भरवाने में उनके साथ होना चाहिए. आज हमारे मुख्यमंत्री जी (शिवराज सिंह चौहान) हर विधानसभा स्तर पर जा रहे हैं. हमारे नेताओं के, उम्मीदवारों के नामांकन भरवा रहे हैं. लेकिन, कमलनाथ जी आठ दिनों से छिंदवाड़ा में ही जमे हुए हैं. तो ये क्या दिखा रहा है? ये दिखा रहा है कि वो चुनाव हार रहे हैं. जो हेलिकॉप्टर में घूमते थे, अब वो सड़क पर आ गए हैं और रोड शो कर रहे हैं.”

कमलनाथ और बीबीसी संवाददाता सलमान रावी
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छिंदवाड़ा में कमलनाथ की लोकप्रियता

वैसे तो छिंदवाड़ा में एक ही नाम का सिक्का चलता है. वो है कमलनाथ के नाम का.

जानकार कहते हैं कि वो कमलनाथ ही हैं जो अपने संगठन की लाइन से हटकर भी चलते हैं और उनपर कोई कार्रवाई भी नहीं होती है और ना ही कोई कारण पूछा जाता है.

इसलिए वो छिंदवाड़ा में हर तरह का राजनीतिक प्रयोग भी करते रहते हैं. अब उन्होंने ख़ुद को ‘हनुमान भक्त कमलनाथ’ के रूप में स्थापित कर लिया है.

वरिष्ठ पत्रकार संजय सक्सेना मानते हैं कि कमलनाथ का काम करने का तरीक़ा बिल्कुल अलग है और वो पार्टी की तय की गई हुई लाइन से अलग हटकर भी काम करते हैं.

वो कहते हैं कि पिछले विधानसभा चुनावों से पहले कमलनाथ ने एक तरह से ख़त्म हो गई कांग्रेस में दोबारा जान फूँक दी थी.

वो कहते हैं, “आज मध्य प्रदेश में कांग्रेस अगर मज़बूत हुई है और अगर वो भारतीय जनता पार्टी को चुनौती देने के काबिल हुई है तो उसका क्रेडिट कमलनाथ को ही जाता है. इसलिए उनके निर्णयों को पार्टी हाईकमान भी अनदेखा कर देता है. छिंदवाड़ा की अगर सातों सीटें कांग्रेस के पास हैं तो वो कमलनाथ की वजह से ही. इस इलाक़े में टिकट किसको मिलेगा ये सिर्फ़ कमलनाथ तय करते हैं और पार्टी उनकी सलाह पर ही चलती है. इसलिए इस क़िले को भेदना आसान नहीं है.”

लेकिन इसकी वजह से पार्टी का एक तबक़ा असंतुष्ट भी रहता है. ये तबक़ा है बड़े नेताओं का, जो दबी ज़ुबां से कहते हैं कि अब पार्टी में कमलनाथ के सामने उनकी कुछ चलती नहीं है.

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