ज्योतिरादित्य सिंधिया की रैली से पहले फ़िरोज़ गांधी के मज़हब की चर्चा क्यों?

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- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, ग्वालियर से
मध्य प्रदेश में भिंड ज़िले के अटेर विधानसभा क्षेत्र का सुरपुरा क़स्बा.
सोमवार को केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की सुरपुरा में शाम छह बजे जनसभा होने वाली है. तैयारियां ज़ोरों पर हैं.
जनसभा के मंच से 500 मीटर की दूरी पर ही हेलिकॉप्टर उतरने के लिए हेलिपैड बनाया गया है. दोपहर के एक बजे हैं. बीजेपी के आठ से दस कार्यकर्ता सुरपुरा में ज़िला पंचायत सदस्य सुखपाल सिंह भदौरिया के घर के बाहर बैठे हैं.
ये आपस में बातचीत कर रह रहे थे तभी हमलोग वहाँ पहुँचे. माइक और कैमरा देख सभी थोड़ी हरकत में आए. इन्होंने हमें बैठने के लिए कुर्सियाँ दीं और चाय पीने के लिए कहा.
हमने पूछा कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के आने से क्या बीजेपी मज़बूत हुई है?
इस सवाल के जवाब में एक बीजेपी कार्यकर्ता ने कहा, ''परिवार बड़ा हुआ है तो इसमें हर्ज़ क्या है. महाराज जी आए हैं तो फ़ायदा ही होगा. अब शिवराज के साथ महाराज भी आ गए. महाराज पहले ग़लत पार्टी में थे. अब वो सही जगह आ गए हैं.''


फ़िरोज़ गांधी को मुसलमान क्यों मानते हैं?
कांग्रेस ग़लत पार्टी कैसे है?
इस सवाल के जवाब में बीजेपी कार्यकर्ता राघवेंद्र सिंह भदौरिया कहते हैं, ''राहुल गांधी को अपनी पहचान नहीं छुपानी चाहिए. उनके नाना मुसलमान थे तो खुलकर अपना नाम भी उसी तरह रखना चाहिए. फ़िरोज़ गांधी तो मुसलमान ही थे. ऐसे में राहुल गांधी हिंदू कैसे बन गए?''
राघवेंद्र सिंह भदौरिया की इस बात से वहाँ बैठे सभी बीजेपी कार्यकर्ता सहमति जताते हैं और कहते हैं कि इस बार महाराज और शिवराज एक साथ हैं और कांग्रेस बुरी तरह से हारेगी.
फ़िरोज गांधी तो पारसी थे आप उन्हें मुसलमान क्यों बता रहे हैं? जब ये बात मैंने कही तो वहाँ एक किस्म की चुप्पी कुछ पलों के लिए होती है और फिर इस चुप्पी को तोड़ते हुए राघवेंद्र कहते हैं, ''हमें तो यही पता है कि वो मुसलमान थे. चलो अब आप कह रहे हो तो मान लिया लेकिन पारसी और मुसलमान में कोई अंतर नहीं होता है क्योंकि मुसलमानों के नाम भी फ़िरोज़ होते हैं.''
दरअसल, फ़िरोज़ एक पर्सियन नाम है, जो इस्लाम के आने से पहले से चला आ रहा है. बाद में इन नामों को मुसलमानों ने भी रखा और अब भी जारी है.
जैसे जमशेद और जहांगीर. भारत के मशहूर कारोबारी जमशेद जी टाटा और मशहूर वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा पारसी ही थे.
जब इनसे जमशेद जी टाटा और होमी भाभा के बारे में पूछा कि क्या ये इन्हें भी वे मुसलमान ही मानते हैं, तब इन्होंने कहा कि नहीं.
तो फ़िरोज़ गांधी को मुसलमान क्यों मानते हैं? इस बार इनकी चुप्पी लंबी रही जो टूटी नहीं.

मध्य प्रदेश में धार्मिक ध्रुवीकरण की गुंजाइश?
मध्य प्रदेश में धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति के लिए बहुत स्पेस नहीं है क्योंकि यहाँ हिंदू 90 फ़ीसदी से ज़्यादा हैं. मध्य प्रदेश में मुसलमान मुश्किल से सात से आठ प्रतिशत हैं.
बीजेपी ने मध्य प्रदेश में किसी भी मुसलमान को टिकट नहीं दिया है. हालाँकि कांग्रेस ने भी महज़ दो मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं.
अटेर विधानसभा क्षेत्र से बीजेपी ने अपने मौजूदा विधायक और शिवराज सिंह चौहान की सरकार में सहकारिता मंत्री अरविंद सिंह भदौरिया को ही टिकट दिया है.
लेकिन इस बार उनकी लड़ाई आसान नहीं है. उन्हें कांग्रेस के हेमंत कटारे से तो टक्कर मिल ही रही है, समाजवादी पार्टी के मुन्ना सिंह भदौरिया भी चुनौती दे रहे हैं.
मुन्ना सिंह भदौरिया इसी अटेर विधानसभा क्षेत्र से 1990 और 1998 में बीजेपी के विधायक बने थे लेकिन टिकट नहीं मिलने के कारण बाग़ी हो गए हैं. इस विधानसभा क्षेत्र में ठाकुरों और ब्राह्मणों का दबदबा है. बीजेपी ने ठाकुर को टिकट दिया है और कांग्रेस ने ब्राह्मण को.
मुन्ना सिंह भदौरिया के बारे में कहा जा रहा है कि वह बीजेपी का वोट ज़्यादा काट रहे हैं इसलिए हेमंत कटारे को फ़ायदा मिल सकता है.
हेमंत कटारे के पिता सत्यदेव कटारे अटेर विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के विधायक बने थे. कांग्रेस ने सत्यदेव कटारे की मौत के बाद उनके बेटे को यहाँ से उम्मीदवार बनाया था. हेमंत पिता की मौत के बाद 2017 में उप-चुनाव में जीते भी थे.

किस ओर बह रही है ग्वालियर-चंबल की हवा
जहाँ ज्योतिरादित्य सिंधिया का हेलिकॉप्टर उतरना है, उसके बगल में कुछ सुरक्षाकर्मी बैठे हैं. सभी मध्य प्रदेश पुलिस के हैं लेकिन आसपास के मुरैना, भिंड और ग्वालियर ज़िलों से हैं. ये चुनाव पर खुलकर बात करने लगे.
एक सुरक्षाकर्मी ने कहा, ''बीजेपी को लग रहा है कि सिंधिया के आने से ग्वालियर-चंबल में उसे बढ़त मिल जाएगी तो मुगालते में है. मैं मुरैना का हूँ और इस बार देमनी विधानसभा क्षेत्र से केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर भी हार रहे हैं. इस बार देमनी में तीन तरफ़ा मुक़ाबला है. बलबीर दंडौतिया बहुजन समाज पार्टी से हैं और ब्राह्मण हैं जबकि बीजेपी और कांग्रेस ने ठाकुरों को उतारा है. दंडौतिया अच्छी टक्कर दे रहे हैं क्योंकि उनके साथ ब्राह्मण, दलित और ओबीसी भी जाएँगे.''
पास में ही बैठे एमपी पुलिस के एक और जवान ने कहा, ''इस बार बीजेपी के ग्वालियर-चंबल इलाक़े में 34 में से सात सीट भी मिल जाए तो मेरा नाम बदल देना. ग्वालियर पूर्व से सिंधिया अपनी मामी माया सिंह को भी नहीं बचा पाएँगे. इस बार शिवपुरी से यशोधरा राजे सिंधिया ने हार के डर से चुनाव नहीं लड़ा.''
हालाँकि बीजेपी नेताओं से बात कीजिए तो उनका कहना है कि अभी भले लग रहा है कि कांग्रेस को बढ़त मिल रही है लेकिन चुनाव आते-आते माहौल बदल जाएगा.

2018 के विधानसभा चुनाव में ग्लावियर-चंबल संभाग की कुल 34 सीटों में से कांग्रेस को 26 सीटों पर जीत मिली थी.
लेकिन 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कमलनाथ की सरकार गिराई तो 22 विधायकों ने कांग्रेस और विधायकी से इस्तीफ़ा दे दिया था.
इसके बाद इन सीटों पर उप-चुनाव हुआ और 22 में से 16 लोग बीजेपी के टिकट से जीतने में कामयाब रहे थे.
इस बार भी बीजेपी ने सिंधिया के इन सभी 16 वफ़ादारों को टिकट दिया है. सिंधिया 22 में से उन लोगों को भी बीजेपी का टिकट दिलाने में कामयाब रहे, जिन्हें उपचुनाव में हार मिली थी.
इस बीच सिंधिया का हेलिकॉप्टर सुरपुरा के आसमान में दस्तक दे चुका था. सुरपुरा के लोग हेलिकॉप्टर की आवाज़ सुन हेलिपैड की ओर भागने लगे.

चुनौतियों से जूझते सिंधिया
हेलिकॉप्टर धूल के गुबार के साथ नीचे उतरा और सिंधिया के स्वागत में नारों से पूरा इलाक़ा गूँज गया. सिंधिया का काफ़िला मंच तक पहुँचा और क़रीब एक हज़ार लोगों की भीड़ भी वहाँ पहुँच चुकी थी.
सिंधिया भाषण देने आए तो लोगों ने तालियों की गड़गड़ाहट से स्वागत किया. सिंधिया के भाषण के अंदाज़ में पीएम मोदी की झलक दिखती है.
सिंधिया लोगों से अपनी बातों पर हाथ उठवाकर सहमति लेते हैं. सिंधिया ने भाषण देते हुए लोगों से पूछा, ''मैंने कमलनाथ की सरकार गिराकर ठीक किया था न? आप लोग हाथ उठाकर कहिए मैंने कुछ भी ग़लत तो नहीं किया था?''
सिंधिया के इस सवाल पर भीड़ हाथ उठाकर कहती है कि नहीं आपने ग़लत नहीं किया था.
जब सिंधिया ऐसा पूछते हैं तो लगता है कि उनमें इस बात लेकर कहीं न कहीं दुविधा है कि कांग्रेस छोड़ने के फ़ैसले से स्थानीय लोग नाराज़ तो नहीं हैं.

ग्वालियर में आम लोगों से पूछिए जो न बीजेपी समर्थक हैं और न कांग्रेस समर्थक तो वे कहते हैं कि सिंधिया लालच में बीजेपी में गए लेकिन इससे उनका कद बड़ा नहीं हुआ है.
सिंधिया से पहले ग्वालियर चंबल इलाक़े में जो बीजेपी का कुनबा था वो भी सिंधिया के आने से नाराज़ है और कई लोगों ने कांग्रेस का दामन थाम लिया है.
सिंधिया की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि बीजेपी में आने के बाद वह ग्वालियर चंबल में बीजेपी के पुराने समर्थकों और नेताओं को अपने साथ कैसे रखें.
सिंधिया ने क़रीब आधा घंटा भाषण दिया और पास के मेहगाँव में दूसरी जनसभा के लिए रवाना हो गए.

सिंधिया कहां लगा रहे हैं ज़ोर?
सिंधिया इन दिनों हर दिन कम से कम नौ से दस जनसभाएँ कर रहे हैं.
उनका पूरा ज़ोर ग्वालियर-ग्वालियर चंबल संभाग पर है. कहा जा रहा है कि बीजेपी में सिंधिया का भविष्य कैसा होगा, ये इस पर भी निर्भर करेगा कि इस बार के चुनाव में ग्वालियर-चंबल की 34 विधानसभा सीटों में से कितनी सीटें जीत पाते हैं.
ग्वालियर के वरिष्ठ पत्रकार राकेश अचल कहते हैं कि सिंधिया परिवार की महिमा ज्योतिरादित्य सिंधिया आगे नहीं बढ़ा पाए.
वे कहते हैं, ''माधवराव सिंधिया का जो औरा था वो उनके बेटे ज्योतिरादित्य सिंधिया में पहले भी नहीं था और बीजेपी में जाने के बाद जो बचा था वो भी नहीं रहा.''
ज्योतिरादित्य सिंधिया से पूछा कि जिस निराशा के बाद उन्होंने कांग्रेस छोड़ी, वही निराशा उन्हें बीजेपी में भी मिली तब क्या करेंगे?
सिंधिया ने बीबीसी से कहा, ''पिछले तीन सालों से मैं बहुत काम कर रहा हूँ. मेरा मक़सद जनसेवा है और यहाँ आकर ख़ूब कर रहा हूँ. कांग्रेस में गिरावट थम नहीं रही थी और मेरा फ़ैसला राजनीतिक से ज़्यादा जनता के लिए था.''
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