मध्य प्रदेश: सिंधिया को चुनौती पुरानी भाजपा से भी, कांग्रेस से भी
सलमान रावी
बीबीसी संवाददाता, भोपाल

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साल 2020 के मार्च महीने की बात है, जब कांग्रेस के क़द्दावर नेता रहे ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बीजेपी का दामन थाम लिया था.
सिंधिया के साथ उनके गुट के 22 कांग्रेस विधायकों ने भी बीजेपी की सदस्यता ले ली. इसके साथ ही मध्य प्रदेश में एक बार फिर बीजेपी की सरकार बनने का रास्ता खुल गया.
बीजेपी साल 2003 से सत्ता में थी लेकिन 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत हुई.
इसके बाद कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस ने मध्य प्रदेश में सरकार बनाई. लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया की बग़ावत के साथ ही 15 महीनों की कमलनाथ सरकार गिर गयी.
इसके साथ ही भारतीय जनता पार्टी एक बार फिर मध्य प्रदेश की सत्ता में आ गयी.
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सिंधिया को बड़ी ज़िम्मेदारी सौंपे जाने के कयास

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जिस समय ज्योतिरादित्य बीजेपी में शामिल हो रहे थे, उस वक़्त ये चर्चा राजनीतिक गलियारों में ज़ोर शोर से चलने लगी कि शायद भारतीय जनता पार्टी उन्हें मध्य प्रदेश में ‘अहम ज़िम्मेदारी’ सौंपेगी.
कयास लगाए जाने लगे कि प्रदेश में नेतृत्व भी बदला जा सकता है.
काफ़ी लंबी चली अटकलों के बाद सिंधिया को केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह दी गयी जबकि उनके साथ भाजपा में शामिल हुए विधायकों में से कुछ को शिवराज सिंह चौहान के मंत्रिमंडल में शामिल किया गया जबकि कुछ को निगमों और मंडलों में जगह दी गयी.
ये तो थी बात विधायकों की. सिंधिया के साथ बीजेपी में शामिल होने वाले उनके क़रीबी नेता भी अपनी महत्वाकांक्षाओं के साथ नए संगठन में शामिल हुए थे.
समय के साथ इस खेमे में असंतोष पनपने लगा है. और विधानसभा चुनावों के क़रीब आते आते जिन नेताओं को कुछ नहीं मिला उनमें एक तरह की ‘छटपटाहट’ देखी जाने लगी है.
कांग्रेस नेता की ‘घर वापसी’
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बैजनाथ सिंह यादव बीजेपी की प्रदेश कार्यकारिणी के सदस्य थे, मगर अचानक उन्होंने कांग्रेस में ‘घर वापसी’ की घोषणा की.
और सिंधिया खेमे के कई दूसरे नेताओं के साथ वो मध्यप्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष कमलनाथ से मिले और कांग्रेस की सदस्यता ले ली.
कांग्रेस में वापस लौटने पर उन्होंने कहा कि साल 2020 से ही उन्हें भाजपा में ‘घुटन’ हो रही थी, इस लिए उन्हें ये क़दम उठाना पड़ा.
राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार संजय सक्सेना के मुताबिक़, बैजनाथ सिंह ने सिर्फ़ ‘घर वापसी’ ही नहीं की बल्कि जिस तरह से वो ग्वालियर से भोपाल आये उसमें एक ‘संदेश’ छिपा हुआ था.
वो कहते हैं, “संदेश उनके भोपाल आने के ‘स्टाइल’ में था. मतलब क़ाफिले में 400 गाड़ियां लेकर वो पहुंचे. स्पष्ट दिख रहा था कि ये संदेश कांग्रेस के लिए तो नहीं था. ऐसा लग रहा था कि ये संदेश सिंधिया खेमे के लिए, और ख़ास तौर पर भारतीय जनता पार्टी के लिए हो सकता था. उन्होंने एक तरह के शक्ति प्रदर्शन की कोशिश भी की जब वो अपने साथ अपने क्षेत्र के लगभग ढाई हज़ार समर्थकों को भी प्रदेश कांग्रेस मुख्यालय लेकर पहुंचे.”
बीबीसी से बात करते हुए वो कहते हैं कि जब सिंधिया ने भाजपा का दामन थामा था तब ये कहा जा रहा था कि उन्हें शिवराज सिंह चौहान के विकल्प के रूप में लाया गया है. चूंकि शिवराज सिंह चौहान 16 सालों से प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में काम कर रहे हैं. उनके अनुसार, ‘सत्ता विरोधी लहर’ से निपटने के उद्देश्य से भाजपा ऐसा सोच रही थी.
हालांकि भाजपा ने कभी ये नहीं कहा कि सिंधिया को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा. लेकिन उनके साथ कांग्रेस से आये नेताओं ने ये एक तरह से मान ही लिया था कि ऐसा ही होगा.
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मध्य प्रदेश के बीजेपी नेताओं का रुख
भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता हितेश वाजपेयी मानते हैं कि सिंधिया खेमे से जो नेता छिटक कर निकल रहे हैं उन्हें लगता होगा कि उनकी अनदेखी हो रही है.
उनका कहना था, “जब ज्योतिरादित्य सिंधिया आये तो उनके साथ उनके सहयोगी भी आये और समर्थक भी. कई राज्य में मंत्री बन गए तो कुछ को महत्वपूर्ण पद भी मिले.
मगर हर किसी को ‘एडजस्ट’ नहीं किया जा सकता था. बहुत सारे ‘अनफिट’ भी थे जो नए संगठन में ‘एडजस्ट’ नहीं कर पा रहे थे. उनमे छटपटाहट स्वाभाविक है. राजनीति में हर कोई महत्वकांक्षी होता ही है.”
हितेश वाजपेयी ने बीबीसी से कहा कि ‘जब सिंधिया के समर्थक भाजपा में आये तो यहाँ भी दो तरह की प्रतिक्रया देखने को मिली. एक वो कार्यकर्ता जिन्होंने आखिर तक इन लोगों को स्वीकार नहीं किया और दूसरे वो जिन्होंने इन्हें स्वीकार कर लिया है.’
वो कहते हैं, “संगठन के वैसे लोग जो कांग्रेस से आयी इस जमात का चुनावों में विरोध करते आ रहे थे या जो ‘हार्डलाइनर्स’ थे, वैसे कार्यकर्ताओं ने इन्हें स्वीकार करने में समय समय पर असहजता व्यक्त की. लेकिन संगठन के फैसले को उन्हें स्वीकार ही करना पड़ा.”

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इसका ताज़ा उदाहरण के पी यादव हैं जो भारतीय जनता पार्टी के गुना से सांसद हैं.
कभी ज्योतिरादित्य सिंधिया के बेहद करीबी रह चुके यादव ने सिंधिया को लोकसभा के चुनावों में हराया था.
यादव ने सिंधिया के ख़िलाफ़ सार्वजनिक रूप से मोर्चा खोल दिया था. नौबत यहाँ तक आ गयी कि भारतीय जनता पार्टी के आला कमान को हस्तक्षेप करना पड़ा और यादव को सिंधिया के सामने खेद प्रकट करना तक पड़ गया.
जानकारों को लगता है कि भारतीय जनता पार्टी को, ‘पुराने समर्पित कार्यकर्ताओं’ और सिंधिया के साथ भाजपा में शामिल हुए नेताओं के बीच चल रही इस रस्साकशी का दंश ग्वालियर और चंबल संभाग में ज़्यादा झेलना पड़ रहा है.
वो कहते हैं कि ऐसा 57 सालों के बाद हुआ है जब पिछले साल कांग्रेस ने ग्वालियर के महापौर की सीट जीत ली.
भारतीय जनता पार्टी को मुरैना के नगर निकाय चुनावों में भी नुक़सान उठाना पड़ा.
भारतीय जनता पार्टी पर नज़र रखने वाले जानकार कहते हैं कि ग्वालियर और चंबल संभाग की 50 प्रतिशत ऐसी सीटें हैं जहां भारतीय जनता पार्टी के ‘पुराने समर्पित नेताओं’ और सिंधिया के साथ भाजपा में आये नेताओं के बीच सीटों को लेकर तना-तनी बनी हुई है.
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पिछला विधानसभा चुनाव था ‘महाराज बनाम शिवराज’

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ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस को अलविदा कहने का घटनाक्रम भी दिलचस्प है.
पिछले विधानसभा चुनावों के दौरान कमलनाथ कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष थे जबकि पार्टी ने सिंधिया को चुनाव समिति का मुखिया बनाया था.
वो पार्टी के मुख्य प्रचारक भी थे. पिछला चुनाव ‘महाराज बनाम शिवराज’ के नारे के साथ लड़ा गया था जिसमें भाजपा ने भी ज्योतिरादित्य सिंधिया को ही अपने निशाने पर रखा था.
चुनाव के परिणाम आये और कांग्रेस को पूर्ण बहुमत के लिए दो सीटें कम पड़ गयीं थीं. इसलिए बहुजन समाज पार्टी और छोटे दल को लेकर बहुमत का आंकड़ा पार किया गया.
ये लगभग तय था कि मुख्य प्रचारक और चुनाव समिति के मुखिया ज्योतिरादित्य सिंधिया ही मुख्यमंत्री बनेंगे.
लेकिन बहुमत कम पड़ने और छोटे दलों से समर्थन हासिल करने के बाद मध्य प्रदेश कांग्रेस के नेताओं ने आलाकमान को ये समझाने में सफलता हासिल कर ली कि अगर सिंधिया को मुख्यमंत्री बना दिया गया तो कई विधायक टूट कर भाजपा में चले जायेंगे.
इस स्थिति से निपटने के लिए कांग्रेस हाई कमान ने 2.5 सालों का फार्मूला निकाला ताकि असंतोष को ख़त्म किया जा सके.
छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस हाई कमान ने यही फार्मूला लागू किया जिसके तहत भूपेश बघेल और टी एस सिंह देव को ढाई - ढाई सालों तक सत्ता का नेतृत्व करना था.
फिर हुआ कि कमलनाथ अगर मुख्यमंत्री बनते हैं तो सिंधिया को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया जाएगा. मगर वो भी नहीं हुआ. फिर बारी आई राज्य सभा के लिए मनोनीत करने की तो उस में भी कांग्रेस ने सिंधिया का नाम ‘दूसरी प्राथमिकता’ में रखा.
इसके बाद से सिंधिया की नाराज़गी सामने आने लगी. सिंधिया ने कांग्रेस के सम्मेलनों के बीच बोलते हुए कहा था, “राज्य में हमारी सरकारी है तो क्या, लोगों के मुद्दों को लेकर मैं सड़क पर भी उतर सकता हूँ.’
सिंधिया के इस बयान पर दिल्ली में पत्रकारों ने कमलनाथ को घेरा था और सवाल किये. इसके जवाब में कमलनाथ ने कहा था ‘जिसको सड़क पर उतरना है वो उतर जाए.’
यहीं से कांग्रेस और सिंधिया के बीच दूरियां बढ़ने लगीं. यहाँ तक कि उनके कहने पर दिग्विजय सिंह खेमे के माने जाने वाले दो विधायकों – बिश्नुलाल सिंह और एदल सिंह कल्सारा भी सिंधिया के साथ हो लिए थे.”
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सिंधिया के सामने चुनौती

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जानकार मानते हैं कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के सामने अपने राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी चुनौती खड़ी हुई है. उन्हें अपना कुनबा यानी अपने समर्थकों और सहयोगियों के बीच अपनी छवि बनाए रहने की चुनौती भी है और साथ ही साथ अपना राजनीतिक भविष्य भी.
यही वजह है कि उन्होंने भाजपा के पुराने समर्पित नेताओं के घरों और संघ के दफ़्तर भी जाना शुरू कर दिया है.
उनके सामने ये भी चुनौती है कि अपने साथ भाजपा में आये नेताओं के लिए आगामी विधानसभा चुनावों में ज़्यादा से ज़्यादा सीटें ले पाएं.
मगर भारतीय जनता पार्टी के नेता हितेश वाजपेयी कहते हैं कि चुनावों में सबसे महत्वपूर्ण बात जो देखी जाती है वो है ‘जीतने की संभावना.’
उनका कहना है कि एक सीट पर कई नातों की दावेदारी रहती है.
उनका कहना था, “मैं भी चुनाव लड़ना चाहता हूँ और संगठन में मेरे और सहयोगी भी हैं जो चुनाव लड़ना चाहते हैं. मगर सवाल उठता है कि संगठन क्या देखता है? संगठन ये नहीं देखता मैं किस खेमे में हूँ या किसके क़रीब हूँ.
संगठन उस नेता पर दांव लगाएगा जिसके जीतने की संभावना सबसे प्रबल हो. वो पुराने भाजपा के नेता हों या सिंधिया के साथ भाजपा में आने वाले हों. अब संगठन सबके नामों और उनके कामों की समीक्षा कर रहा है. चुनाव तो जीतने के लिए लड़ा जाता है. जीतने की संभावना वाले को ही पार्टी टिकट देती है.”

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वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक एन के सिंह मानते हैं कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के सामबे सबसे बड़ी चुनौती है अपने ही समर्थकों और करीबियों के बीच अपना प्रभाव बनाए रखना.
वो कहते हैं कि ‘अगर सिंधिया अपने लोगों के लिए विधानसभा की टिकट का इंतज़ाम नहीं कर पाते हैं तो उनके सामने अलग थलग पड़ जाने का ख़तरा है.’
सिंह कहते हैं, “जब सिंधिया कांग्रेस में थे तो संगठन के अंदर बहुत प्रभावशाली थे. राहुल गाँधी से उनकी दोस्ती की वजह से उनका अलग ही जलवा रहता था. लेकिन अब वो भले ही केन्द्रीय मंत्री बन गए हों, लेकिन ऐसा साफ़ दिखता है कि मध्य प्रदेश की राजनीति में वो अपने प्रभाव वाले क्षेत्र यानी चंबल और ग्वालियर तक ही सीमित रह गए हैं.”
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क्या कहते हैं सिंधिया समर्थक

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लखन सिंह मीणा पहले कांग्रेस में थे और उन्होंने भी ज्योतिरादित्य के साथ साथ भाजपा का दामन थाम लिया था.
इस पूरे प्रकरण पर बीबीसी से बात करते हुए वो कहते हैं कि चुनावों के समय ऐसा ही होता है जब टिकट को लेकर मारा मारी रहती है. कई महत्वाकांक्षी नेता भी टिकट की आस लगाए बैठे रहते हैं.
उन्होंने कहा, “जो लोग जा रहे हैं उन्हें कौन रोक सकता है. मगर ये कहना कि इनके जाने से झटका लगेगा; ये ग़लत है. महत्वाकांक्षा तक तो ठीक है. सबकी होती है. मगर अति महत्वाकांक्षी होना ग़लत है.
जो बैजनाथ सिंह कांग्रेस में वापस चले गए हैं. या उनके साथ जो गए हैं, उससे कोई फ़र्क नहीं पड़ने वाला है. अब हम ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ यहाँ तक आ गए हैं. वो जैसा करेंगे या जहां रहेंगे हमें स्वीकार है. हम सबकुछ सोच समझ कर ही आये थे.”
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