ज्योतिरादित्य सिंधिया की बीजेपी में जाने के बाद अपने गढ़ में ताक़त बढ़ी या घटी-ग्राउंड रिपोर्ट

ज्योतिरादित्य सिंधिया.

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    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, ग्वालियर से

कांग्रेस ने 2018 में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का गढ़ माने जाने वाले ग्वालियर-चंबल संभाग की 34 में से 26 सीटें जीत कर मध्य प्रदेश की सत्ता हासिल की थी.

इस जीत का कारण था तत्कालीन बीजेपी सरकार के ख़िलाफ़ चली ‘सत्ता विरोधी लहर’. इस जीत का इंतज़ार कांग्रेस 2003 से कर रही थी.

जीत का सेहरा ज्योतिरादित्य सिंधिया के सिर पर बंधा. उनके समर्थक काफ़ी उत्साहित थे. उन्हें उम्मीद थी कि सिंधिया मध्य प्रदेश की राजनीति का सबसे ऊँचा आसन ग्रहण करेंगे.

लेकिन ग्वालियर-चंबल संभाग में मिली बंपर जीत के बाद भी मध्य प्रदेश में कांग्रेस के दो अनुभवी चेहरों, कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के आगे ज्योतिरादित्य सिंधिया की नहीं चली.

उन्हें लगा कि अगर मुख्यमंत्री नहीं बन पाए तो प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बन जाएँगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

फिर राज्यसभा में भेजने की बात आई तो राजनीति में उनसे सीनियर दिग्विजय सिंह ने बाज़ी मार ली.

ज्योतिरादित्य सिंधिया का कांग्रेस से मोहभंग

प्रमोद भार्गव.

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बस इसी के बाद से संकेत मिलने लगे कि सिंधिया अपनी पार्टी से नाराज़ चल रहे हैं. ग्वालियर-चंबल संभाग में दशकों से कांग्रेस की राजनीति सिंधिया राजघराने के इर्द-गिर्द ही घूमती रही. यही कांग्रेस की राजनीति का केंद्र रहा.

संभाग के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक प्रमोद भार्गव बताते हैं कि सांसद का टिकट हो या पार्षद का, सभी उम्मीदवारों की लिस्ट सिंधिया के महल से ही जारी होती थी.

लेकिन 2019 में सिंधिया, गुना लोकसभा सीट पर अपने ही एक पूर्व सहयोगी केपी यादव से चुनाव हार गए. यादव बीजेपी के टिकट पर लड़े थे.

इसके बाद जो हुआ वो कई दशकों तक नहीं हुआ था. सिंधिया परिवार का कांग्रेस से रिश्ता ख़त्म हो गया.

ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने समर्थक विधायकों और नेताओं के साथ बीजेपी में शामिल हो गए. इससे प्रदेश की 15 माह पुरानी कांग्रेस की कमलनाथ सरकार गिर गई.

सिंधिया समर्थक विधायकों ने सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया. वे उपचुनाव लड़कर जीते और मंत्री बने. सिंधिया को बीजेपी ने राज्यसभा भेज दिया और उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल कर लिया.

उनके जाते ही ग्वालियर-चंबल संभाग में कांग्रेस संगठन का सफाया हो गया. बीजेपी पहले से और भी ज़्यादा मज़बूत हो गई. जिस सिंधिया घराने के ख़िलाफ़ वो राजनीतिक मोर्चाबंदी करती रही, वही अब उसका हिस्सा बन चुके थे.

'बीजेपी में सिंधिया समर्थकों का बोलबाला'

वीरेंद्र रघुवंशी
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भार्गव कहते हैं, "बीजेपी की ओर से किए गए इस तख़्ता पलट का असर बहुत दिनों तक नहीं टिक पाया. समय के साथ भाजपा में आए सिंधिया समर्थकों और संगठन के पुराने कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच 36 का रिश्ता बनता चला गया."

वीरेंद्र रघुवंशी शिवपुरी की कोलारस विधानसभा सीट से बीजेपी के विधायक चुने गए थे. वो सिंधिया समर्थकों पर संगठन पर क़ब्ज़ा कर लेने का आरोप लगाते हैं.

रघुवंशी से जब बीबीसी ने बात की तो वो बीजेपी में ही थे. लेकिन दो दिन बाद ही उन्होंने अपने पद और पार्टी, दोनों से इस्तीफ़ा दे दिया.

उन्होंने कहा कि बीजेपी के पुराने कार्यकर्ताओं पर नए आए नेताओं ने ‘दमन चक्र’ चलाया और उन पर 'झूठे मामले' भी दर्ज किए गए.

बीजेपी के पूर्व विधायक

उन्होंने कहा, "ये कहते हुए मुझे कोई संकोच नहीं है कि जो कांग्रेस से आए थे, वो संगठन पर क़ब्ज़ा करते चले गए और हम त्याग करते चले गए. संगठन ने हमसे त्याग करने को कहा था."

उन्होंने कहा,"हम लोगों की उपेक्षा भी हुई और शोषण भी हुआ. अफ़सोस इस बात का है कि संगठन ने पुराने मूल कार्यकर्ताओं की पीड़ा समझने की कोशिश ही नहीं की. सरकार बनवा देने की वजह से सिंधिया जी के सामने हम लोगों की पार्टी के अंदर कोई औकात ही नहीं रह गई थी."

बीजेपी सांसद के बदले सुर

गुना से बीजेपी सांसद केपी यादव.

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इमेज कैप्शन, गुना से बीजेपी सांसद केपी यादव.

वैसे तो गुना से बीजेपी सांसद केपी यादव ने भी विरोध के स्वर बुलंद किए थे. उनके बयान मीडिया में सुर्खियां भी बने. लेकिन बाद में पार्टी के कहने पर उन्होंने ‘परिस्थितियों से समझौता’ कर लिया.

उनसे हमारी मुलाकात अशोक नगर ज़िले में हुई. इस दौरान वो अपने पिछले बयानों से पलट गए.

उन्होंने कहा, ''मैं स्वयं बचपन से जानता हूँ, राजमाता साहब भी इस क्षेत्र में हमेशा आती थीं लोगों से मिलने. स्वर्गीय माधवराव सिंधिया जी भी इस क्षेत्र में आते थे लोगों से मिलने और माननीय ज्योतिरादित्य सिंधिया जी आज भी इस क्षेत्र में आते हैं लोगों से मिलने. मैंने चुनाव कांग्रेस के ख़िलाफ़ लड़ा था. सिंधिया जी उनके उम्मीदवार थे. अब वो हमारे साथ हैं. अब हम उनके साथ मिलकर वो सब कुछ करेंगे जो पार्टी के लिए बेहतर हो."

प्रमोद भार्गव

सिर्फ़ रघुवंशी ही नहीं, पुरानी बीजेपी के कई नेताओं ने कांग्रेस का दामन थाम लिया है. कई सिंधिया समर्थक नेताओं ने भी कांग्रेस में वापसी कर ली है.

प्रमोद भार्गव कहते हैं, "भाजपा भी कई खेमों में बँट गई है. एक है नाराज़ भाजपा जिसमे पुराने नेता हैं, जो ख़ुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं. एक है महाराज की भाजपा और एक भाजपा है शिवराज सिंह चौहान के वफ़ादार भाजपा नेताओं की जमात."

बीजेपी का डैमेज कंट्रोल

नरेंद्र सिंह तोमर का स्वागत करते कार्यकर्ता.

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बीजेपी भी ‘डैमेज कंट्रोल’ करने उतरी तो उसने इसी संभाग के एक अन्य क़द्दावर नेता और केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को संगठन की ज़िम्मेदारी सौंप दी. लेकिन विश्लेषक मानते हैं कि पार्टी की इस पहल से एक नया गुट बन गया है.

हालाँकि ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थक मानते हैं कि साथ छोड़कर जाने वालों का चुनावी नतीजों पर कोई असर नहीं पड़ेगा. उनका यह भी मानना है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया एक न एक दिन प्रदेश के मुख्यमंत्री जरूर बनेंगे.

शैलेंद्र सिंह पहले कांग्रेस में थे फिर वो ‘महाराज’ (ज्योतिरादित्य सिंधिया) के साथ बीजेपी में आ गए.

वो दावा करते हुए कहते हैं कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीजेपी में शामिल होने से ग्वालियर-चंबल संभाग में संगठन को पहले से ज़्यादा मज़बूती मिली है.

वो कहते हैं, "जो भाजपा में पहले कमी थी, या जो गड्ढा था भाजपा के लिए, वो अब भर गया है."

सिंधिया समर्थकों की उम्मीद

आनंद रघुवंशी.

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समाप्त

सिंधिया के चुनाव क्षेत्र के क़द्दावर नेता आनंद रघुवंशी पार्टी के महासचिव हैं. उनसे बात कर साफ़ लगने लगा कि सिंधिया के साथ बीजेपी में आए नेता नहीं चाहते हैं कि अगर चुनाव में बीजेपी जीतती है तो फिर से शिवराज सिंह चौहान को ही मुख्यमंत्री बनाया जाए.

वे कहते हैं, "आम आदमी ये चाहता है कि सिंधिया जी को बहुत ऊँचे पद पर बैठाया जाए. उन्हें प्रदेश की कमान सौंपी जाए. शिवराज सिंह चौहान ने अभी तक बहुत अच्छा काम किया है प्रदेश के लिए. हम चाहते हैं कि उन कामों पर सिंधिया जी मुख्यमंत्री बनकर चार चांद लगा दें."

इस संभाग के आम लोग की भी आने वाले विधानसभा चुनाव में काफ़ी दिलचस्पी हैं. बात अगर सिंधिया घराने की राजनीति की हो, तो उनकी रुचि और भी बढ़ जाती है.

मॉर्निंग वॉक करते हुए मिले महेश के पूर्वज भी सिंधिया घराने की प्रजा रहे हैं. उनका परिवार सिंधिया की ओर से दान दी हुई ज़मीन पर घर बनाकर रह रहा है.

वो मानते हैं कि 'महाराज' के बीजेपी में जाने से पूरी चुनावी लडाई एकतरफ़ा हो गई है.

वहीं नीरज इस बार के विधानसभा चुनाव में पहली बार वोट डालेंगे. वो 21 साल के हो गए हैं.

वो मानते हैं कि इस बार विधानसभा के चुनाव काफ़ी दिलचस्प होने वाले हैं, क्योंकि ये ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीजेपी में आने के बाद यह पहला चुनाव होगा.

वो कहते हैं, "भाजपा ने अपना कोई मुख्यमंत्री का चेहरा आगे नहीं किया है. इसलिए आप कह नहीं सकते. अगर भाजपा चुनाव जीतती है, तो सिंधिया जी भी मुख्यमंत्री हो सकते हैं."

ये बात सही है कि इस संभाग में कांग्रेस को सिंधिया के जाने से बड़ा नुक़सान हुआ है. सिंधिया घराने से कांग्रेस को हमेशा से ही राजनीतिक लाभ मिलता रहा.

ज्योतिरादित्य सिंधिया का असर

कांग्रेस विधायक लक्ष्मण सिंह.

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कांग्रेस विधायक और दिग्विजय सिंह के भाई लक्ष्मण सिंह से हमारी मुलाक़ात राघोगढ़ में हुई.

वह कहते हैं, "सिंधिया परिवार का वर्चस्व इस इलाक़े में रहा है और आज भी है. भले ही वो भाजपा में क्यों ना चले गए हों. वो जब कांग्रेस में थे तब तक उसका लाभ पूरी तरह से कांग्रेस को मिला. उनके स्वर्गीय पिताजी माधवराव जी महाराज जब ज़िंदा थे, तब भी कांग्रेस को बहुत लाभ मिला था. और ज्योतिरादित्य के रहने से तो मिला ही. अब वो भाजपा में चले गए हैं तो भाजपा को भी उनकी मौजूदगी का लाभ मिला ही है. उनकी सरकार बनी है. उन्हें और भी लाभ मिलेगा."

लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया के सांसद प्रतिनिधि रह चुके अमित शर्मा ऐसा नहीं मानते. उन्हें लगता है कि उनके 'महाराज' ने जल्दबाज़ी में कांग्रेस छोड़ने का फ़ैसला किया.

वो कहते हैं, "मुख्यमंत्री बनने का मौक़ा महाराज को कांग्रेस में रहते हुए था. अगर वो थोड़ा इंतज़ार कर लेते तो कांग्रेस में उनको शायद जल्द ही मुख्यमंत्री बनने का मौक़ा मिल भी जाता. मुझे नहीं लगता कि भाजपा इतनी जल्दी इतने बड़े मुकाम पर उनको बैठने देगी."

राजनीतिक विश्लेषकों को लगता है कि ये दौर ज्योतिरादित्य सिंधिया की अग्निपरीक्षा का है.

ये चुनाव उनके राजनीतिक अस्तित्व के लिए बेहद महत्वपूर्ण होंगे.

वो मानते हैं कि अगर सिंधिया के नेतृत्व में इस संभाग में बीजेपी को शिकस्त मिलती है तो फिर उनका राजनीतिक क़द कम हो जाएगा.

प्रमोद भार्गव कहते हैं, "भाजपा में आने के बाद सिंधिया को राज्यसभा की सदस्यता दी गई. उन्हें केंद्रीय मंत्री का पद मिला. उनका मकान भी वापस मिल गया दिल्ली में. ये सब तात्कालिक सुविधाएँ हैं. लेकिन इसके जो दीर्घकालिक परिणाम निकलने वाले हैं या और जैसा कि हम देख रहे हैं, ये फ़ैसला उनके लिए चुनौतियों से भरा हुआ ही रहेगा."

कांग्रेस की कोशिश

कांग्रेस विधायक जयवर्धन सिंह की सभा.

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इमेज कैप्शन, कांग्रेस विधायक जयवर्धन सिंह की सभा.

इस बीच ग्वालियर-चंबल संभाग में पूरी तरह साफ होने के बाद कांग्रेस ने एक बार फिर अपना संगठन खड़ा करने की मुहिम चलाई. इस संभाग में कांग्रेस का पता सिंधिया का राजमहल ही हुआ करता था. इसलिए संगठन के लिए सब कुछ शून्य से शुरू करने की चुनौती थी.

मैदान ख़ाली था. हालांकि कांग्रेस के क़द्दावर नेता दिग्विजय सिंह राघोगढ़ के राजा रहे हैं. लेकिन सिंधिया घराने जैसे बरगद के पेड़ के नीचे उनका सिक्का इस संभाग में चला, लेकिन सीमित इलाक़ों में. अब ज्योतिरादित्य सिंधिया के जाने के बाद ख़ाली जगह को भरने के लिए राघोगढ़ ने पूरा ज़ोर लगा दिया है.

दिग्विजय सिंह के पुत्र जयवर्धन सिंह राघोगढ़ के विधायक हैं. सिंधिया के बीजेपी में जाने के बाद ही उन्होंने लोगों के बीच जाना शुरू कर दिया. उन्होंने अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए पूरी ताक़त लगा दी.

भार्गव और दूसरे राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि बेशक सिंधिया का गढ़ रहा है ग्वालियर-चम्बल का संभाग, लेकिन 2019 से सिंधिया के इस गढ़ में जयवर्धन सेंध लगा रहे हैं.

भार्गव कहते हैं, "जयवर्धन सिंह लगातार ग्वालियर-चंबल संभाग के क्षेत्रों का दौरा कर रहे हैं. जिस दिन भाजपा नेता जितेंद्र जैन गोटू कांग्रेस में शामिल हुए उसके अगले दिन ही जयवर्धन सिंह ने बदरवास के इलाक़े में बड़ा कार्यक्रम किया. मैं इतने दशकों से पत्रकारिता कर रहा हूँ लेकिन आज तक मैंने एक बार ज्योतिरादित्य सिंधिया के कार्यक्रम में ऐसी भीड़ तब देखी थी जब वो महाराज माधवराव सिंधिया की मृत्यु के बाद यहां आए थे. उसके बाद किसी नेता के लिए इतनी भीड़ उमड़ी है तो वो जयवर्धन सिंह हैं.''

अब कांग्रेस का क्या होगा

मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष आरपी सिंह.

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राजनीतिक हलकों के अलावा सामाजिक हलके में भी इस बात को लेकर काफ़ी जिज्ञासा है कि कांग्रेस अब कहां खड़ी है. सवाल उठता है कि क्या सिंधिया घराने के बिना कांग्रेस का इस संभाग में कोई वजूद रहेगा?

क्या सिंधिया के बिना कांग्रेस 2018 जैसे विधानसभा के चुनाव परिणामों के बारे में सोच भी सकती है?

इस सवाल के जवाब में मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष आरपी सिंह कहते हैं कि बरगद के नीचे या आसपास दूसरे किसी पेड़ को फलने-फूलने का मौक़ा नहीं मिलता है.

वो कहते हैं कि सिंधिया के कांग्रेस में रहते कोई दूसरा नेता सोच भी नहीं सकता था कि वो पार्टी के अंदर ही किसी अहम स्थान पर पहुंच सकता है.

वो कहते हैं कि सिंधिया के जाने के बाद कांग्रेस के कई समर्पित नेता और कार्यकर्ता निकल कर आए और उन्होंने संगठन को दोबारा खड़ा करने का बीड़ा उठा लिया.

उनका कहना है, "जो हमारे नेता हैं वो टैलेंटेड लोग हैं. सिंधिया जी जब कांग्रेस छोड़कर गए तो भाजपा को लगा कि उनके पास एक ‘एसेट’ आ गया है. वो और भी मज़बूत हो गए हैं. लेकिन हुआ उसका बिल्कुल ही उलट. इन सबके बावजूद, 57 साल बाद ग्वालियर में महापौर हमारा बना. नगर निगम में भी हमने बहुत अच्छा किया. मुरैना में भी हमारा महापौर बना. और सबसे बड़ी बात ये है कि वो पार्टी जो एक घर से या महल से संचालित होती थी, वो पार्टी अब सांगठनिक तौर पर चल रही है."

सिंधिया परिवार की राजनीति

ग्वालियर में सिंधिया राज घराने के महल का गेट.

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सिंधिया राज घराने की सक्रिय राजनीति में भागेदारी 1962 में शुरू हुई जब महाराज जीवाजी राव सिंधिया की विधवा राजमाता विजयराजे सिंधिया ने कांग्रेस के टिकट से लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीता.

इससे पहले भारत की आज़ादी के बाद जब 'ग्वालियर स्टेट' का भारत में विलय हुआ था, तो महाराज जीवाजी राव सिंधिया को मध्य प्रांत राज्य का 'राज प्रमुख' या राज्यपाल बना दिया गया था.

ये 28 मई, 1948 की बात है और जीवाजी राव 31 अक्तूबर 1956 तक इस पद पर बने रहे. बाद में मध्य प्रांत का भारत में विलय हो गया था.

राजमाता ने कांग्रेस का साथ छोड़ दिया. वो बीजेपी के संस्थापकों में रहीं. उनकी दोनों बेटियों ने भी राजनीति में छलांग लगाई. वसुंधरा राजे सिंधिया पांच बार बीजेपी की सांसद रहीं और दो बार राजस्थान की मुख्यमंत्री रहीं.

वहीं यशोधरा राजे सिंधिया दो बार बीजेपी की सांसद रहीं. वो फ़िलहाल मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री हैं.

राजमाता के बेटे माधवराव सिंधिया ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत भारतीय जनसंघ से की. वो 1971 में सांसद बने. बाद में वो कांग्रेस में शामिल हो गए.

ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस से की. लेकिन अब वे बीजेपी में हैं.

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