प्रियंका गांधी की रैली में क्या दिग्विजय सिंह को तवज्जो नहीं मिली?

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- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, भोपाल
ग्वालियर के ‘मेला ग्राउंड’ में शुक्रवार यानी 21 जुलाई को कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी की जनसभा की कामयाबी के लिए प्रदेश के हर कांग्रेस नेता ने अपनी पूरी ताक़त झोंक दी थी.
कई बड़े नेता कई दिनों से ग्वालियर में डेरा डाले हुए रहे.
ग्वालियर और उसके आसपास का इलाक़ा कांग्रेस के लिए इस बार के विधानसभा के चुनावों में बहुत अहमियत रखता है. ख़ास तौर पर चंबल और मुरैना का इलाक़ा, जहाँ हमेशा से ही सिंधिया राजघराने का बड़ा प्रभाव रहा है.
कांग्रेस के एक गुट पर तो पूरी तरह से सिंधिया राजघराने का ही आधिपत्य तब तक रहा जब तक ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने 22 समर्थक विधायकों और कई नेताओं के साथ भारतीय जनता पार्टी में शामिल नहीं हो गए.
वर्ष 2018 के विधानसभा के चुनावों तक मध्य प्रदेश कांग्रेस में मुख्य तौर पर तीन गुट ही ऐसे माने जाते रहे जिनकी प्रदेश या पार्टी की राजनीति पर असरदार पकड़ रही. पूर्व मुख्यमंत्री कमल नाथ का गुट, पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया के गुट.
ज्योतिरादित्य सिंधिया की बग़ावत के बाद ग्वालियर, चंबल, भिंड और मुरैना के इलाक़ों में कांग्रेस के लिए एक अलग तरह की चुनौती सामने आ गई है. वो संगठन की भी है और नेताओं की भी.

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सिंधिया के दबदबे की काट की कोशिश
भारतीय जनता पार्टी में अपने समर्थक कांग्रेसियों के साथ शामिल हुए ज्योतिरादित्य सिंधिया ने न सिर्फ़ कांग्रेस के लिए बल्कि इलाक़े के बीजेपी के पुराने नेताओं के लिए भी चुनौती खड़ी कर दी है.
यही वजह है कि सिंधिया के इस दबदबे की काट करने के लिए प्रियंका गांधी का ग्वालियर का कार्यक्रम कांग्रेस के लिए बहुत महत्वपूर्ण था.
इस बारे में प्रदेश कांग्रेस कमिटी की तरफ़ से प्रवक्ता पीयूष बबेले ने एक बयान जारी करके कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, संगठन के प्रदेश प्रभारी और महासचिव जयप्रकाश अग्रवाल, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष गोविंद सिंह, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव, प्रदेश उपाध्यक्ष अशोक सिंह सहित बड़े नेताओं ने तीन दिन से ग्वालियर में डेरा डाला हुआ था.
बयान में ये भी कहा गया कि “ग्वालियर-चंबल संभाग की सभी सीटें जीतना ही इस बार कांग्रेस पार्टी का लक्ष्य है.”
कांग्रेसी गुटबाज़ी की झलक
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कांग्रेस के नेताओं के इनकार के बावजूद प्रियंका गांधी की इस रैली के बहाने ही सही कांग्रेस की गुटबाज़ी की झलक भी मिलने लगी.
प्रियंका गांधी के स्वागत के लिए पार्टी के तीन प्रमुख नेताओं की ओर से जारी किए गए पोस्टरों में दिग्विजय सिंह का चेहरा नहीं था.
इनमें सबसे महतवपूर्ण ख़ुद कमलनाथ के पुत्र नकुल नाथ का पोस्टर है. नकुलनाथ ने अपने ट्विटर हैंडल से इस पोस्टर को शेयर भी किया.
कांग्रेस की तरफ़ से प्रियंका गांधी के ग्वालियर में स्वागत की जो तस्वीर जारी की गई है, उसमें कमलनाथ और नकुलनाथ स्वागत करते दिख रहे हैं जबकि इस तस्वीर में न दिग्विजय सिंह हैं और न ही उनके विधायक पुत्र जयवर्धन सिंह.
उसी तरह मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के पुत्र अजय सिंह के पोस्टर से भी दिग्विजय सिंह का चेहरा ग़ायब रहा.
अजय सिंह वर्ष 2018 तक विधानसभा में विपक्ष के नेता रहे लेकिन वो 2018 का चुनाव हार गए थे और कहा जाता है कि तब से ही वो ख़ुद को संगठन में अलग-थलग हुआ महसूस कर रहे हैं.
उन्होंने भी पोस्टर को ट्वीट किया, जिसकी वजह से संगठन में अंतर्कलह की बात उठनी शुरू हो गई.
तीसरे ऐसे नेता हैं पार्टी के विधायक सज्जन सिंह वर्मा जो दिग्विजय सिंह की आलोचना करते रहते हैं. इनके पोस्टर से भी दिग्विजय सिंह की तस्वीर नदारद रही.
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कांग्रेस की आपदा में बीजेपी का अवसर

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भारतीय जनता पार्टी भी इसी मौके की ताक में थी और पार्टी के प्रवक्ता हितेश वाजपेयी ने अपने ट्विटर हैंडल से एक वीडियो शेयर किया जिसमें दिग्विजय सिंह को ऐसे दिखाया गया जैसे उन्हें कोई तरजीह ही नहीं मिल रही हो. वाजपेयी ने लिखा, “क्या से क्या हो गए, देखते देखते. मंच पर टोटल बेवजह, दिग्विजय..”
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वाजपेयी कहते हैं कि अपने चुनावी अभियान में प्रियंका गांधी ग्वालियर आईं थीं तो ऐसे संकेत थे कि मंच से बड़े नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया पर हमलावर होंगे और ख़ासकर दिग्विजय सिंह खुलकर सिंधिया का विरोध करेंगे.
मगर, वो कहते हैं, “जिस प्रकार से दिग्विजय सिंह को मंच नहीं दिया गया. कमलनाथ के पुत्र, नकुलनाथ ने भी भाषण दिया. ग्वालियर के निकट राघोगढ़ के राजा (दिग्विजय सिंह) को ग्वालियर में बोलने का मौक़ा तक नहीं मिला. उनके बेटे जयवर्धन सिंह को भी बोलने का मौक़ा नहीं दिया गया जबकि छोटे नेताओं ने भी मंच से भाषण दिया."
क्या कांग्रेसी नेताओं ने मिटा दी दरारें?

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मध्य प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता अब्बास हफ़ीज़ ने इन बातों को ख़ारिज करते हुए कहा कि दिल्ली में आला कमान के साथ हुई बैठक के बाद सभी नेताओं ने आपसी गिले-शिकवे भुला दिए और साथ में मिलकर चुनाव लड़ने का संकल्प लिया. वो कहते हैं कि सब मिलकर काम कर रहे हैं ताकि पार्टी की जीत सुनिश्चित हो.
बीबीसी से बात करते हुए अब्बास हफ़ीज़ कहते हैं, "75 वर्ष की उम्र में दिग्विजय सिंह ने राज्य की 66 विधानसभा सीटों का दौरा किया है. किसके लिए किया? पार्टी के लिए किया. पार्टी को मज़बूत करने के लिए किया. जिन सीटों पर पिछली बार कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा था, उन सीटों पर जीत दिलाने की ज़िम्मेदारी भी दिग्विजय सिंह ने अपने ऊपर ली है. वो संगठन के फ़ैसले कमलनाथ पर ही छोड़ रहे हैं और ख़ुद पार्टी को बूथ स्तर पर मज़बूत करने का काम कर रहे हैं."
मध्य प्रदेश की राजनीति के जानकार मानते हैं कि ये अंतर्कलह की शुरुआत बिल्कुल नहीं है. मार्च के महीने में ठीक विधानसभा के बजट सत्र की शुरुआत से पहले कांग्रेस कमिटी अपने जितने भी बयान जारी कर रही थी उनमें प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष कमलनाथ को ‘भावी मुख्यमंत्री’ कहकर संबोधित कर रही थी. कई जगह पोस्टर भी लग गए थे.
इससे पार्टी के बड़े नेताओं में असहजता दिख तो रही थी, मगर ये बात बाहर निकल आई जब कांग्रेस के कद्दावर नेता और प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अरुण यादव ने पत्रकारों से बात करते हुए साफ़ तौर पर कहा, “पार्टी में मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने की परंपरा नहीं है.”
फिर कांग्रेस विधायक दल के नेता गोविन्द सिंह भी कूद पड़े और सवाल किया कि अगर "भावी मुख्यमंत्री ख़ुद चुनाव हार गए तब क्या होगा मुख्यमंत्री के चेहरे का?"
देवास के विधायक सज्जन सिंह वर्मा ने अपने आवास पर पत्रकारों से बात करते हुए कटाक्ष किया और कहा, “गोविंद सिंह जी कभी-कभी भूल जाते हैं कि वो विपक्ष के नेता हैं. वो नेता तब बने जब उन्हें विधायकों ने चुना. पार्टी में वरिष्ठ हैं तो सबने मान लिया कि चलो गोविंद सिंह जी बन रहे हैं, बना दो.”

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अंतर्कलह परत-दर-परत

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ये बात यहीं तक नहीं है. कांग्रेस हाई कमान ने जयप्रकाश अग्रवाल को मध्य प्रदेश में पार्टी का प्रभारी नियुक्त किया तो प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ उनकी शिकायत लेकर पार्टी हाई कमान के दरवाज़े तक पहुँच गए.
मई की 29 तारीख़ को दिल्ली में मध्य प्रदेश कांग्रेस को लेकर बैठक बुलाई गई, जिसमें राहुल गाँधी और केसी वेणुगोपाल के अलावा राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे भी मौजूद थे. ये बैठक राज्य में संगठन की इकाई में अंतर्कलह को ख़त्म करने के लिए बुलाई गई थी.
इस बैठक में मौजूद एक प्रमुख नेता ने नाम नहीं लिखने की शर्त पर बताया कि कांग्रेस के विधायक दल के नेता गोविन्द सिंह सहित कुछ अन्य नेताओं ने केंद्रीय नेताओं को स्पष्ट रूप से बताने की कोशिश की कि प्रदेश में संगठन के अंदर ‘सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है.’
बैठक में मध्य प्रदेश के नेताओं ने कमलनाथ के काम करने के तरीक़ों की आलोचना करते हुए साफ़ किया कि प्रदेश में 'संगठन नाम की चीज़ ही नहीं बची है.'
इस बैठक में कमलनाथ के अलावा दिग्विजय सिंह भी शामिल थे जबकि राहुल गाँधी की भारत जोड़ो यात्रा से उनके विश्वासपात्र बन गए विधायक जीतू पटवारी और विधायक उमंग सिंघर को 'ज़ूम' के ज़रिए जोड़ा गया.

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बैठक में अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी के नेताओं ने प्रदेश के नेताओं के बीच सामंजस्य बिठाने की कोशिश की और फिर लंबी चली बैठक के बाद पत्रकारों से बात करते हुए राहुल गाँधी ने दावा कर डाला, “मध्य प्रदेश में कांग्रेस 135 सीटें जीतेगी.’
कांग्रेस पर लंबे समय से नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक रशीद किदवई कहते हैं कि कांग्रेस में गुटबाज़ी पहले से ही हावी रही है जब प्रदेश का विभाजन भी नहीं हुआ था.
यानी छत्तीसगढ़ अलग राज्य नहीं बना था. तब भी चार खेमे थे जैसे स्वर्गीय माधवराव सिंधिया का खेमा, कमल नाथ, दिग्विजय सिंह और अरुण यादव के खेमे.
वो कहते हैं कि मध्य प्रदेश के विभाजन के बाद भी कई खेमे मज़बूती से अपनी जगह बनाए रहे जबकि क्षेत्रीय नेताओं का भी अपने अपने इलाकों में महत्व की वजह से बड़ा प्रभाव बना रहा.
किदवई मानते हैं कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के जाने के बाद कांग्रेस पार्टी के मध्य प्रदेश में दो खेमे ही प्रमुख तौर पर रह गए हैं. वो ये भी कहते हैं कि पिछले चुनाव में भी दोनों खेमों ने मिलकर काम किया था, जिसका परिणाम हुआ कि प्रदेश में कांग्रेस की सरकार का एक लम्बे अरसे से के बाद गठन हुआ. इसके अलावा भी सिंधिया के जाने के बाद कमलनाथ को संगठन में सामंजस्य बनाये रखने का भी श्रेय जाता है.
वैसे भी कमलनाथ को भी इस का श्रेय मिलता है कि उन्होंने कांग्रेस को भारतीय जनता पार्टी से सीधे टक्कर लेने की स्थिति में ला दिया है.

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किदवई का कहना है कि संगठन में दिग्विजय सिंह का 'बार्गेनिंग पावर' इसलिए भी है कि वो ज़मीनी नेता हैं जिनका पूरे प्रदेश पर प्रभाव है जबकि कमल नाथ को लोग 'सोफिस्टिकेटेड' नेता के रूप में ही देखते हैं.
वह कहते हैं, "दिग्विजय सिंह नगर निगम के अध्यक्ष भी रहे हैं, विधायक भी रहे हैं, सांसद भी और मुख्यमंत्री भी, इसलिए उनका अपना प्रभाव तो है ही. अब जो दिख रहा है कि दिग्विजय सिंह और कमलनाथ ने वर्ष 2018 के विधानसभा के चुनावों से पहले ही हाथ मिला लिया था. इससे दोनों को फ़ायदा हुआ. कमलनाथ मुख्यमंत्री बन गए और दिग्विजय सिंह के पुत्र जयवर्धन सिंह राज्य में कैबिनेट मंत्री बन गए."
2018 में जब कमलनाथ की सरकार का गठन हुआ था तो उनके मंत्रिमंडल में कोई राज्यमंत्री नहीं था. सभी कैबिनेट रैंक के मंत्री थे.
जानकार कहते हैं कि ऐसा इस लिए हुआ होगा क्योंकि जयवर्धन सिंह को मंत्रिमंडल में शामिल करना था. उसमें वरिष्ठ और नए नेताओं में सामंजस्य बनाए रखने के लिए ऐसा किया गया होगा.
इस बात पर वरिष्ठ पत्रकार संजय सक्सेना कहते हैं कि ग्वालियर संभाग और मालवा के इलाक़े में भारतीय जनता पार्टी को कड़ा मुक़ाबला देने की स्थिति में लाने की कोशिश दिग्विजय सिंह ही कर रहे हैं.
सक्सेना कहते हैं कि प्रदेश में अब भी जातीय समीकरण चुनावों में बड़ी भूमिका निभाता है. कहीं ठाकुर, तो कहीं ब्राह्मण या फिर आदिवासी, दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग. उसी हिसाब से क्षेत्रीय नेताओं का भी अपने अपने इलाक़ों में प्रभाव रहा है और उस प्रभाव के आधार पर ही उनकी महत्ता संगठन में बनी हुई है.

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वो कहते हैं, "ये बात सच है कि अब सिर्फ़ दो ही खेमे हैं. या तो नेता कमलनाथ के साथ हैं या फिर दिग्विजय सिंह के साथ. मगर दोनों नेताओं ने संकेत दे दिए हैं कि उनमें आपस में कोई मतभेद नहीं है इसलिए भी अब नेता चुनाव को ध्यान में रखते हुए ही काम कर रहे हैं.
प्रदेश कांग्रेस कमिटी में कई महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके पार्टी के वरिष्ठ नेता मानक अग्रवाल स्वीकार करते हैं कि प्रदेश की राजनीति प्रमुख तौर पर तीन वर्गों को लेकर होती रही. जैसे एक वर्ग ठाकुर जाति तो दूसरा ब्राह्मण. तीसरे वर्ग में अन्य पिछड़ा वर्ग, दलित और आदिवासी आते रहे.
वो कहते हैं कि वैसे तो हमेशा से प्रदेश में दो दलों का ही वर्चस्व रहा, लेकिन उत्तर प्रदेश से लगे ज़िलों की कुछ सीटों पर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का भी प्रभाव है जहां से उनके कुछ उम्मीदवार जीतते आ रहे हैं.
अलग-अलग वर्गों की राजनीति करने वाले नेता संगठन में मज़बूत स्थान बनाते चले गए. इसमें दो सबसे प्रमुख नाम हैं सुरेश पचौरी, जो ब्राह्मणों के गुट के नेता के रूप में स्थापित हुए जबकि दूसरा महत्वपूर्ण नाम है अरुण यादव का जिनके पिता सुभाष यादव उप मुख्यमंत्री रह चुके थे और अन्य पिछड़ा वर्ग के मज़बूत नेताओं में से एक रहे.
अरुण यादव भी मनमोहन सिंह की सरकार में राज्य मंत्री थे और बाद में उन्हें प्रदेश कांग्रेस कमिटी का अध्यक्ष बनाकर मध्य प्रदेश भेज दिया गया था.

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भोपाल में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार दिनेश निगम त्यागी कहते हैं कि दिग्विजय सिंह को सिर्फ़ इस बात का नुक़सान उठाना पड़ गया कि वो नापतोल कर नहीं बोलते हैं जबकि राजनीति में ये बेहद ज़रूरी है.
उनका कहना है कि कई बार ऐसा हुआ है कि उनके बोलने की वजह से पार्टी को नुक़सान भी उठाना पड़ा है और उनकी छवि 'हिन्दू विरोधी' की बनती चली गई.
उनका कहना है, "हालांकि ऐसा नहीं है. दिग्विजय सिंह सुबह उठकर योग भी करते हैं और नियमित रूप से पूजा-पाठ भी. लेकिन उनकी छवि ऐसी बना दी गई है. अभी हाल ही में उन्होंने जबलपुर से कांवड़ यात्रा शुरू की और इससे पहले नर्मदा यात्रा कर चुके हैं. वो हर महत्वपूर्ण शक्ति स्थल जाकर पूजा अर्चना करते रहे हैं."
वे कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष के बारे में कहते हैं, "कमलनाथ की छवि 'उद्योगपति' की होने के बावजूद अब उन्हें ‘हनुमान भक्त कमलनाथ’ के रूप में कांग्रेस प्रोजेक्ट कर रही है. वो भाजपा को हिंदुत्व की पिच पर चुनौती दे रहे हैं इसलिए, मुझे लगता है कि दिग्विजय सिंह से ज़्यादा भारतीय जनता पार्टी को कमलनाथ से चुनौती मिल रही है. वो 2018 में बीजेपी को हराने में कामयाब भी हो चुके हैं."
मध्य प्रदेश की राजनीति को क़रीब से देखने वाले विश्लेषकों का कहना है कि आने वाला विधानसभा चुनाव कमल नाथ और दिग्विजय सिंह के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों ही अपनी अगली पुश्त यानी बेटों को आगे कर रहे हैं.
विचार न भी मिलते हों लेकिन दोनों का साथ आना न सिर्फ़ उनके, बल्कि उनके बेटों के राजनीतिक भविष्य और अस्तित्व के लिए भी बेहद ज़रूरी है.
वैसे दिग्विजय सिंह भी ने वर्ष 2018 में भी बतौर मुख्यमंत्री कमलनाथ का समर्थन किया था और अब भी वो सार्वजनिक रूप से कमल नाथ को ही कांग्रेस के मुख्यमंत्री का चेहरा बताते रहे हैं.
कांग्रेस पार्टी के मीडिया प्रकोष्ठ के अध्यक्ष केके मिश्रा का कहना है कि शुक्रवार को हुई अपनी ग्वालियर की जनसभा में ख़ुद प्रियंका गांधी ने हर विवाद को विराम दे दिया जब उन्होंने मंच से कहा, “कमल नाथ जी आपकी सरकार बनते ही मध्य प्रदेश में दिव्यांगों की पेंशन बढ़ाना.”
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