नज़रियाः शिवराज सिंह के लिए समाधान ही समस्या बन गई

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- Author, राकेश दीक्षित
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिन्दी के लिए
बीते एक साल में मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार, ख़ास तौर पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की लगातार फ़जीहत देखकर आपको किसानों की 'बददुआओं' के असर पर भरोसा हो सकता है.
बुधवार को जहाँ से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने मध्य प्रदेश में नवंबर-दिसंबर में होने जा रहे विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी के अभियान का ज़ोरदार आग़ाज़ किया, उसी मंदसौर ज़िले के छह पाटीदार किसान पिछले साल इसी दिन पुलिस की गोलियों से मरे थे.
तब पूरा पश्चिमी मध्य प्रदेश किसान आंदोलन से उपजी हिंसा की चपेट में था. दस-दिनों तक चलने वाले आंदोलन के दौरान दर्जनों वाहन जलाए गए, सैंकडों मकान-दुकान तबाह हो गए और हज़ारों टन फल, सब्ज़ियों और दूध सडकों पर फेंके गए. सैंकड़ों किसान गिरफ़्तार हुए. दर्जनों पुलिस से झड़प में ज़ख़्मी हुए.

किसानों की मांग थी कि उन्हें अपनी खेती की लागत और फसल का वाजिब दाम मिले. वे चाहते थे कि शिवराज सरकार अपनी पार्टी के वायदे के मुताबिक़ स्वामीनाथन समिति की रिपोर्ट अमल में लाए.
रिपोर्ट में किसानों को फसल पर लागत का डेढ़ गुना पैसा बतौर समर्थन मूल्य देने की सिफ़ारिश है. उनकी एक बड़ी मांग क़र्ज़-माफ़ी भी थी.

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आनन-फानन की घोषणा, कारगर नहीं हुई
लेकिन शिवराज सरकार ने आंदोलन को कांग्रेस की साज़िश बताई और अपना दामन पाक-साफ़ जताने की कोशिश की. आंदोलनकारियों का आक्रोश शांत करने के लिए ख़ुद शिवराज सिंह चौहान भोपाल में 'सत्याग्रह' पर बैठे, हर मृतक के परिवार को अभूतपूर्व एक करोड़ रुपया मुआवज़ा देने की घोषणा की और पुलिस फ़ायरिंग की जाँच के लिए एक न्यायिक आयोग गठित कर दिया.
एक और आयोग किसानों की फसल का दाम तय करने के लिए भी गठित करने की घोषणा कर दी. इतना सब कुछ आनन-फ़ानन में हुआ पर किसानों की असली मांगें जस की तस बनी रहीं.
नतीजतन, किसानों का ग़ुस्सा तो बढ़ा ही, कांग्रेस को 15 साल से सत्ता पर क़ाबिज़ बीजेपी सरकार को घेरने का एक बड़ा मुद्दा मिल गया. तब से लगातार किसानों का आक्रोश शिवराज सरकार को बेचैन कर रहा है.
मंदसौर हिंसा के बाद सरकार ने किसानों का दिल जीतने की जितनी कोशिशें की सब नाकाम हुईं. न केवल नाकाम हुईं बल्कि उनसे किसान और बदहाल हुए.
बीते एक साल में सरकार ने किसानों को उनकी फसल का वाजिब दाम दिलाने के लिए जो भी योजनाए लागू कीं, उनसे सरकार को तो करोड़ों रुपए का नुक़सान हुआ ही, व्यापारियों और भष्ट अफ़सरों की मौज हो गई.

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समस्याओं के बीच नर्मदा परिक्रमा
इसीलिए आज मध्य प्रदेश के अन्नदाताओं का ग़ुस्सा सातवें आसमान पर है. मध्य प्रदेश की लगभग 8.5 करोड़ आबादी में 70 फ़ीसदी किसान हैं. प्रदेश की 230 सीटों में 170 ग्रामीण हैं जहाँ किसानों के वोट निर्णायक हैं.
इन्हीं सब बातों के मद्देनज़र कांग्रेस ने राहुल गाँधी की मध्य प्रदेश में पहली रैली के लिए मंदसौर हिंसा की पहली बरसी का दिन चुना.
खेती पर मंडराता संकट कांग्रेस के लिए गेमचेंजेर साबित हो सकता है.
अब ज़रा पलट कर देखते हैं कि कैसे पिछला एक साल मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के लिए एक के बाद एक सियासी मुसीबतें लाता रहा.
पिछले साल की एक जून से किसानों का ग़ुस्सा सड़क पर फूटने के पहले शिवराज और उनकी सरकार खेती पर मंडरा रहे संकट से बेख़बर थे.
इधर प्याज़, मूंग और सोयाबीन की ज़बरदस्त पैदावार के कारण इन फसलों के दाम लगातार टूट रहे थे, उधर मुख्यमंत्री अपनी 144 दिन की नर्मदा परिक्रमा यात्रा में व्यस्त थे.
प्रदेश के 16 ज़िलों से गुज़रने वाली इस राजनीतिक यात्रा के ज़रिये शिवराज अपना वोटबैंक पुख़्ता करने की जुगत में लगे थे.
क़रीब 600 साधु-संतों, फ़िल्मी कलाकारों, खेल सितारों और सेलिब्रिटी ने राज्य सरकार के बुलावे पर इस यात्रा में शिरकत की.
पूरा सरकारी अमला इसे सफल बनाने में झोंक दिया गया. मुख्यमंत्री जगह-जगह नर्मदा किनारे पूजा-पाठ में लगे रहे.

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फ़जीहत और जगहंसाई
किसानों की बात सुनने की सरकार में किसी के पास समय नहीं थी. वहां चर्चाएँ ज़्यादातर नर्मदा मैया को साफ़ रखने और नदी के किनारे साढ़े छह करोड़ पेड़ लगा कर गिनीज़ बुक में विश्व रिकॉर्ड बनाने को हो रही थीं.
एक जून को किसान सडकों पर आ गए. अगले चार दिन में आंदोलन व्यापक और हिंसक हो गया. सरकार के ख़ुफ़िया अमले को इसकी तीव्रता का अंदाज़ ही नहीं लगा.
पांच जून से हालत बेक़ाबू होने लगे तो सरकार सक्रिय हुई. सख़्ती से किसानों का दमन हुआ जिसकी एक परिणिति मंदसौर में पुलिस फ़ायरिंग में हुई.
यहीं से शिवराज सरकार की फ़जीहत शुरू हुई. ख़ुद के "सत्याग्रह" पर हुई जगहंसाई के बाद मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि सरकार किसानों से आठ रुपए प्रति किलो की दर से प्याज़ ख़रीदेगी और दो रुपए किलो बेचेगी. घोषणा से व्यापारियों और अफ़सरों की बन आई.
प्रदेश के प्याज़ उत्पादन के ज़्यादा की ख़रीदी हुई. लाखों टन ख़रीदा गया प्याज़ या तो खुले में या गोदामों में बर्बाद हो गया.
उपार्जित फसल का बड़ा हिस्सा अफ़सरों और व्यापारियों ने बेच खाया. सरकारी अनुमान के मुताबिक़ प्याज़ की ख़रीदी में सरकार को 700 करोड़ रुपए का नुक़सान हुआ.
प्याज़ उगाने वाले ठगे के ठगे रह गए. यही हाल मूँग और सोयाबीन की फ़सलों का हुआ. इन फ़सलों में भी किसान वाजिब दाम पाने में नाकाम रहे.

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टुकड़ों-टुकड़ों वाला फैसला
कुछ दिनों बाद सरकार ने भावान्तर योजना शुरू की. किसानों से कहा गया कि उनकी फ़सल की बिक्री का वास्तविक मूल्य और समर्थन मूल्य का जो अंतर है वो सीधे उनके बैंक खातों में जमा हो जाएगा. अफ़सरों-व्यापारियों के भ्रष्ट गठजोड़ ने इस योजना का भी पलीता लगा दिया.
अधिकतर किसान समर्थन मूल्य पर अपनी फसलें नहीं बेच पाए. मंडियों पर ही व्यापारियों के हाथों ठगा गए.
खरबों का नुक़सान उठाने के बाद भी शिवराज सरकार समझ नहीं पा रही कि किसानों को आख़िर कैसे ख़ुश करें. इसके पास कोई एक मुकम्मल नीति या रणनीति है, ऐसा नज़र नहीं आता.
टुकड़ों-टुकड़ों में कैबिनेट फ़ैसले लेती आ रही है. कभी कोई फ़ैसला बिजली के बिल माफ़ करने का होता है तो कोई डिफ़ॉल्टर किसानों को ब्याज अदा करने में छूट देने का.
किसानों के आक्रोश की अभिव्यक्ति का मौक़ा आया फ़रवरी, 2018 में हुए दो विधानसभा उपचुनावों में. बीजेपी गुना ज़िले की मुंगावली और शिवपुरी ज़िले की कोलारस सीटों पर कांग्रेस से हार गई. दोनों ग्रामीण सीटें हैं.
इन उपचुनावों के दौरान एक और घोटाला उजागर हुआ वो था वोटर लिस्ट में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियों का. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और गुना सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया, जिनके हाथों में दोनों उपचुनावों की कमान थी, वोटर लिस्ट में धांधलियों की शिकायत लेकर चुनाव आयोग पहुंचे.
शिकायतें सही पाई गईं. दोनों ज़िलों के कलेक्टर हटाए गए. कांग्रेस अच्छे अंतर से जीती और सरकार की भद्द पिटी.

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मंत्री बनने से पहले बाबा की धमकी
इन दो पराजयों से मुख्यमंत्री उबरे भी नहीं थे कि उन्होंने एक और मुसीबत मोल ले ली. एक अप्रैल को सरकार की तरफ़ से ख़बर आई कि पांच साधु-संतों को नर्मदा के संरक्षण के लिए एक समिति बनाकर उसमे मनोनीत कर दिया गया है. पाँचों को राज्य मंत्री का दर्जा दिया गया.
इस फ़ैसले से सियासी हलक़ों में ख़ासी हलचल मची. इसकी बड़ी वजह थी कि एक दिन पहले दर्जा प्राप्त मंत्रियों में से एक कंप्यूटर बाबा ने सरकार के कथित भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ यात्रा निकलने की धमकी दी थी.
कंप्यूटर बाबा का आरोप था कि नर्मदा किनारे साढ़े छह करोड़ पेड़ लगाकर विश्व रिकार्ड बनाने की शिवराज सरकार की योजना सरासर फ़र्जी है.
पेड़ तो उतने नहीं लगे पर इसके नाम पर करोड़ों रुपयों का भष्टाचार हुआ, ऐसा बाबाओं का आरोप था. मीडिया ने बढ़-चढ़ कर इस फ़ैसले को बाबाओं द्वारा मुख्यमंत्री का ब्लैकमेल होना बताया. झेंपे शिवराज इस पर कोई संतोषजनक सफ़ाई नहीं दे सके.
एक मई को कांग्रेस ने अपने क़द्दावर नेता कमल नाथ को मध्य प्रदेश का अध्यक्ष मनोनीत किया. साथ ही ज्योतिरादित्य सिंधिया को राज्य के चुनाव में प्रचार के अभियान की कमान सौंप दी.
दोनों के मनोनयन से कांग्रेस में नई जान आ गई है. पर शिवराज के लिए ज़्यादा विचलित करने वाली ख़बर उनकी पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने चार मई को दी.

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शिवराज को संकेत
शाह ने नए बीजेपी राज्य अध्यक्ष राकेश सिंह का चुनिंदा भाजपा कार्यकर्ताओं से परिचय करते हुए कहा कि पार्टी मध्य प्रदेश में अगला चुनाव कार्यकर्ता और संगठन के दम पर लड़ेगी न कि किसी चेहरे पर.
संकेत साफ़ था कि शिवराज सिंह चौहान बीजेपी की ओर से मुख्यमंत्री का चेहरा शायद नहीं होंगे. शिवराज ने भी इस संकेत को पकड़ा है. हाल ही में उन्होंने कहा कि चेहरे से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, कामकाज पर चुनाव लड़ा जाता है.
मंदसौर में राहुल गाँधी ने मध्य प्रदेश कांग्रेस कार्यकर्ताओं के लिए प्रचार की रूप रेखा तय कर दी. कांग्रेस पहले से ही आक्रामक मुद्रा में आ चुकी है.
कमलनाथ के अध्यक्ष बनने के बाद जिस तत्परता और गंभीरता से पार्टी ने फ़र्ज़ी वोटरों के मुद्दे पर शिवराज सरकार को घेरा है, उससे बीजेपी बचाव की मुद्रा में है.
फ़िलहाल तो कांग्रेस ने 60 लाख फ़र्ज़ी वोटरों के होने की शिकायत की है. चुनाव आयोग ने आरोपों में दम समझकर बाक़ायदा जाँच भी कर ली है.
इतने पैमाने पर फ़र्जी वोट का मिलना और उनका वोटर लिस्ट से हटाया जाना शिवराज सिंह और उनकी पार्टी के लिए शुभ संकेत तो कतई नहीं है
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