मध्य प्रदेश: शिवराज के शासन में कौड़ी के भाव लहसुन बेच तबाह हो रहे किसान

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- Author, शुरैह नियाज़ी
- पदनाम, भोपाल से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
मध्य प्रदेश में लहसुन की खेती करने वाले किसान इस वक़्त ख़ून के आँसू रो रहे हैं.
आलम ये है कि कई जगहों पर किसानों को लहसुन एक रुपये प्रति किलो की क़ीमत में बेचना पड़ रहा है.
कमोबेश ये हालात उन सभी जगहों पर हैं जहाँ किसानों ने बेहतर मुनाफ़े की उम्मीद में लहसुन बोया था.
शिव पाटीदार सीहोर में किसान हैं और उन्होंने भी अपनी ज़मीन पर लहसुन लगाया था. लेकिन अब हालात ये हो गई है कि वो अपनी लागत भी नहीं निकाल पा रहे.

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क्या है स्थिति?
शिव पाटीदार ने बताया, "मैंने लहसुन का बीज ख़रीदने में ही 27,000 रुपये ख़र्च किए थे. उसके बाद उसे चौपने की मजदूरी गई 5,000 रुपये और 3,000 हज़ार रुपये की खाद लगी. कुल मिलाकर 35,000 हज़ार रुपये का ख़र्च आया. और अब मेरा माल बिक रहा है कुल 6,000 हज़ार रुपये में. इसका मतलब है कि तक़रीबन 29,000 हज़ार रुपये का मुझे घाटा हो रहा है."
कुछ ऐसा ही हाल एक अन्य किसान रामेश्वर का है.

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उन्होंने बताया, "इस बार उत्पादन तो बहुत हुआ, लेकिन लागत ही नहीं निकल पा रही. मुश्किल से भाव मिल रहा है. आज ही मैंने 400 रुपये क्विंटल मतलब 4 रुपये किलो की क़ीमत से लहसुन बेचा है. इतने में तो लागत निकालना ही मुश्किल हो रहा है."
लहसुन की स्थिति ये हो गई है कि मंदसौर की शामगढ़ मंडी में एक किसान को लहसुन 1 रुपये किलो में बेचना पड़ा. एक रुपये किलो की वजह से बहुत से किसानों ने उसे फेंकना ही बेहतर समझा क्योंकि मंडी ले जाकर उसे बेचने में उनके और भी ज़्यादा पैसे लग जाते.
लहसुन की इतनी ख़राब क़ीमत को लेकर किसानों ने कई जगह प्रदर्शन भी किए हैं ताकि सरकार से उन्हें कुछ मदद मिल सके.

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क्यों गिरे लहसुन के दाम?
जानकारी के मुताबिक़, नीमच में इस साल जनवरी में लहसुन 60 से लेकर 80 रुपये किलो तक बिका.
लेकिन उसके बाद इसके भाव गिरने का सिलसिला जो शुरू हुआ तो स्थिति यहाँ तक आ पहुंची.
लहसुन के इस हाल में पहुंचने की मुख्य वजह भावांतर योजना को बताया जा रहा है.
इस योजना के तहत शिवराज सिंह चौहान सरकार ने फ़ैसला किया था कि समर्थन मूल्य के नीचे बेचने पर राज्य सरकार किसानों को बाज़ार भाव और एमएसपी के बीच के अंतर को मुआवज़े के तौर पर देगी. लेकिन लहसुन के लिए सरकार ने 800 रुपये प्रति क्विंटल का रेट फ़िक्स कर रखा है.
आरोप है कि कारोबारी लहसुन को बहुत कम क़ीमत पर ख़रीद रहे हैं जिसकी वजह से किसानों को भारी नुकसान हो रहा है.
स्थानीय किसान यूनियन के केदार सिरोही ने कहा, "बहुत ज़्यादा स्थिति ख़राब है. यह बात बिल्कुल सही है कि लहसुन एक रुपये किलो में बिक रहा है. किसान फेंकने को भी तैयार है. सरकार की जो नीति है वो पूरी तरह से गुमराह करने वाली है. भावांतर जब लाए थे तो सोयाबीन का भी यही हाल हुआ था."

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'लहसुन बोने वाले किसान रो रहे हैं'
मध्य प्रदेश लहसुन उत्पादन को लेकर देश में अव्वल राज्यों में शामिल है.
मालवा को लहसुन उत्पादन के मामले में 'गढ़' माना जाता है, लेकिन लहसुन उत्पादन करने वाले किसान अब रो रहे हैं.
प्रदेश में 20 ज़िले ऐसे हैं जहाँ किसान बड़ी तादाद में लहसुन का उत्पादन करते हैं. प्रदेश में वैसे ही किसानों की स्थिति अच्छी नहीं है.
पहले प्याज़, फिर टमाटर और अब लहसुन के चलते किसानों के पास कुछ भी नहीं बचा है. यही वजह है कि पिछले 10 दिनों में 6 किसानों ने मौत को गले लगाया है.
वहीं सरकार का मानना है कि इस तरह की स्थिति पैदा होती रहती है. लहसुन के भाव काफ़ी ऊपर चले जाते हैं, तो कभी नीचे आ जाते हैं.

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18 लाख मैट्रिक टन पैदावार
किसान कल्याण राज्य मंत्री बालकृष्ण पाटीदार कहते हैं, "सरकार ने किसानों के हित में नीति बनाई है. लहसुन को लेकर सरकार ने फ़ैसला भी कर लिया है कि बाज़ार में वो किसी भी क़ीमत में बिके, सरकार 800 रुपये प्रति क्विंटल किसान को देगी. वैसे भी यह कोई स्थाई भाव नहीं है. कभी 6000 रुपये बिकता है तो कभी 500 रुपये."
प्रदेश में लहसुन का कुल रक़बा 1.46 लाख हेक्टेयर है और उत्पादन लगभग 18 लाख मीट्रिक टन हुआ है.
किसानों के मुद्दों पर बात करने वाले नेताओं का कहना है कि 'सरकार की भावांतर योजना का फ़ायदा सबसे ज़्यादा व्यापारी उठा रहे हैं. भावांतर योजना में ख़रीद होने पर व्यापारी माल को बहुत कम भाव में ख़रीदते हैं. बाद में व्यापारी भारी मुनाफ़ा कमाएंगे.'
ये व्यापारी किसानों से सस्ते में लहसुन ख़रीद रहे हैं और भावांतर योजना ख़त्म होते ही ये लहसुन लगभग 5 हज़ार रुपये क्विंटल में बेची जाएगी.
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