मध्य प्रदेश: दल-बदल क़ानून कैसे हुआ बेमानी?

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- Author, गुरप्रीत सैनी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस से इस्तीफा देने के बाद मध्य प्रदेश के 22 कांग्रेस विधायकों ने भी इस्तीफा दे दिया. अब अटकलें लगाई जा रही हैं कि ये लोग बीजेपी में शामिल हो सकते हैं. वहीं मध्य प्रदेश कांग्रेस का दावा है कि बीजेपी के भी कुछ विधायक उनके संपर्क में हैं.
ये मामला नया नहीं है. कर्नाटक समेत दूसरे राज्यों में पहले भी ऐसा हो चुका है कि विधायक अपनी पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी का दामन थाम लेते हैं.
हालांकि ऐसे बाग़ी विधायकों को दल-बदल करने से रोकने के लिए एक क़ानून मौजूद है. दल बदल क़ानून कहता है कि स्वेच्छा से पार्टी छोड़ने वाले विधायक या सांसद की सदस्यता ख़त्म हो सकती है.
संविधान के जानकार कहते हैं कि 1985 में ये कानून आने के बाद कुछ हद तक तो दल बदल पर लगाम लगी, लेकिन अब लग रहा है कि ये क़ानून काफ़ी नहीं है.
संविधान विशेषज्ञ फैज़ान मुस्तफ़ा कहते हैं, "पहले गोवा, मणिपुर, झारखंड जैसे छोटे राज्यो में ये हो रहा था. लेकिन अब बड़े-बड़े राज्यों में चुनाव का मतलब ख़त्म होता जा रहा है. जनता किसी पार्टी को चुनती हैं, फिर उस पार्टी के लोगों को दूसरी पार्टी अपने पैसे के बूते या सत्ता का ग़लत इस्तेमाल कर अपनी तरफ आकर्षित कर लेती है और वो लोग उस पार्टी से टूटकर दूसरी पार्टी में चल जाते हैं. ये जनादेश के साथ खिलवाड़ है."

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मध्य प्रदेश के हालिया घटनाक्रम से पहले पिछले साल कर्नाटक में भी ये सब हो चुका है. वहां भी कांग्रेस-जेडीएस की गठबंधन सरकार को संकट में डालते हुए 17 विधायकों ने इस्तीफा दे दिया था.
लेकिन कर्नाटक के विधानसभा अध्यक्ष ने तत्कालीन मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा के विश्वासमत से पहले ही 14 विधायकों को अयोग्य ठहरा दिया था. वो तीन को पहले ही अयोग्य ठहरा चुके थे. कुल 17 विधायकों को अयोग्य घोषित किए जाने से कर्नाटक विधानसभा में सदस्यों की संख्या 225 से घटकर 208 हो गई है. और बहुमत का आँकड़ा 105 हो गया था.
हालांकि बाग़ी विधायकों ने विधान सभा अध्यक्ष के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. उन्होंने कहा कि हमने तो इस्तीफा दे दिया है, अब हमें अयोग्य क्यों ठहराया जा रहा है. लेकिन कोर्ट ने कहा कि इस्तीफे का मतलब ये नहीं है कि आपको अयोग्य ना ठहराया जाए.

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हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा कि स्पीकर को ये अधिकार नहीं है, कि वो सदन की बची हुई अवधि तक बाग़ी विधायकों की सदस्यता निरस्त कर दे. यानी अयोग्य ठहराते वक्त स्पीकर को ये अधिकार नहीं होगा कि वो बाग़ी विधायकों के विधान सभा के बचे हुए कार्यकाल तक चुनाव लड़ने पर रोक लगा दे.
इसके बाद कर्नाटक में कुछ महीनों में दोबारा चुनाव कराए गए. इसमें बागी हुए विधायक भी बीजेपी के टिकट से लड़े और कई जीत भी गए. मुस्तफा कहते हैं कि मध्य प्रदेश में भी ऐसा हो सकता है, तो ऐसे में दल बदल क़ानून अब बेमानी होता लगता है.
वो कहते हैं कि इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से दल बदल आसान हो गया है.

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'कानून में बदलाव की ज़रूरत'
फैज़ान मुस्तफा के मुताबिक़ दल बदल क़ानून में बदलाव लाने की ज़रूरत है.
वो कहते हैं, "क़ानून में संशोधन कर ये प्रावधान किया जाना चाहिए कि दल बदल करने वाला विधायक पूरे पांच साल के टर्म में चुनाव नहीं लड़ सकता. या फिर वो अविश्वास प्रस्ताव में वोट देंगे तो तो वोट काउंट नहीं किया जाएगा."
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील विराग गुप्ता कहते हैं कि दल-बदल क़ानून के दायरे से बचने के लिए विधायक या सांसद इस्तीफा दे रहे हैं. लेकिन ऐसा प्रावधान किया जाना चाहिए कि जिस पीरियड के लिए वो चुने गए थे, अगर उससे पहले उन्होंने स्वेच्छा से त्यागपत्र दिया, तो उन्हें उस वक्त तक चुनाव नहीं लड़ने दिया जाएगा.

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वो कहते हैं, "देशव्यापी कोई बहुत बड़ी वजह हो, आदर्शों की बात है या कोई बहुत उसूलों की बात है. तब तो ठीक है, लेकिन बिना वजह त्याग पत्र देने के बाद अगला चुनाव आप फिर से लड़ रहे हैं. तो ये तकनीकी तौर पर तो सही है. लेकिन व्यावहारिक तौर पर ये सारे लोग कानून में बारूदी सुरंग लगा रहे हैं. किसी भी कानून को तोड़ने वाले उसका तरीका निकाल लेते हैं, यहां जो तोड़ निकाला गया है, उसे रिसॉर्ट संस्कृति का नाम दिया जा रहा है."
क्या है दल बदल क़ानून
दल-बदल क़ानून एक मार्च 1985 में अस्तित्व में आया, ताकि अपनी सुविधा के हिसाब से पार्टी बदल लेने वाले विधायकों और सांसदों पर लगाम लगाई जा सके.
1985 से पहले दल-बदल के ख़िलाफ़ कोई क़ानून नहीं था. उस समय 'आया राम गया राम' मुहावरा ख़ूब प्रचलित था.
दरअसल 1967 में हरियाणा के एक विधायक गया लाल ने एक दिन में तीन बार पार्टी बदली, जिसके बाद 'आया राम गया राम' प्रचलित हो गया.
लेकिन 1985 में राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार इसके ख़िलाफ़ विधेयक लेकर आई.
1985 में संविधान में 10वीं अनुसूची जोड़ी गई. ये संविधान में 52वाँ संशोधन था.
इसमें विधायकों और सांसदों के पार्टी बदलने पर लगाम लगाई गई. इसमें ये भी बताया गया कि दल-बदल के कारण इनकी सदस्यता भी ख़त्म हो सकती है.

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कब-कब लागू होगा दल-बदल क़ानून
1. अगर कोई विधायक या सांसद ख़ुद ही अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है.
2. अगर कोई निर्वाचित विधायक या सांसद पार्टी लाइन के ख़िलाफ़ जाता है.
3. अगर कोई सदस्य पार्टी व्हिप के बावजूद वोट नहीं करता.
4. अगर कोई सदस्य सदन में पार्टी के निर्देशों का उल्लंघन करता है.
विधायक या सांसद बनने के बाद ख़ुद से पार्टी सदस्यता छोड़ने, पार्टी व्हिप या पार्टी निर्देश का उल्लंघन दल-बदल क़ानून में आता है.

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लेकिन इसमें अपवाद भी है...
अगर किसी पार्टी के दो तिहाई विधायक या सांसद दूसरी पार्टी के साथ जाना चाहें, तो उनकी सदस्यता ख़त्म नहीं होगी.
वर्ष 2003 में इस क़ानून में संशोधन भी किया गया. जब ये क़ानून बना तो प्रावधान ये था कि अगर किसी भूल पार्टी में बँटवारा होता है और एक तिहाई विधायक एक नया ग्रुप बनाते हैं, तो उनकी सदस्यता नहीं जाएगी.
लेकिन इसके बाद बड़े पैमाने पर दल-बदल हुए और ऐसा महसूस किया कि पार्टी में टूट के प्रावधान का फ़ायदा उठाया जा रहा है. इसलिए ये प्रावधान ख़त्म कर दिया गया.
इसके बाद संविधान में 91वाँ संशोधन जोड़ा गया. जिसमें व्यक्तिगत ही नहीं, सामूहिक दल बदल को असंवैधानिक करार दिया गया.
विधायक कुछ परिस्थितियों में सदस्यता गँवाने से बच सकते हैं. अगर एक पार्टी के दो तिहाई सदस्य मूल पार्टी से अलग होकर दूसरी पार्टी में मिल जाते हैं, तो उनकी सदस्यता नहीं जाएगी.
ऐसी स्थिति में न तो दूसरी पार्टी में विलय करने वाले सदस्य और न ही मूल पार्टी में रहने वाले सदस्य अयोग्य ठहराए जा सकते हैं.

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तो इन परिस्थितियों में नहीं लागू होगा दल बदल क़ानून:
1. जब पूरी की पूरी राजनीतिक पार्टी अन्य राजनीति पार्टी के साथ मिल जाती है.
2. अगर किसी पार्टी के निर्वाचित सदस्य एक नई पार्टी बना लेते हैं.
3. अगर किसी पार्टी के सदस्य दो पार्टियों का विलय स्वीकार नहीं करते और विलय के समय अलग ग्रुप में रहना स्वीकार करते है.
4. जब किसी पार्टी के दो तिहाई सदस्य अलग होकर नई पार्टी में शामिल हो जाते हैं.
स्पीकर के फ़ैसले की हो सकती है समीक्षा
10वीं अनुसूची के पैराग्राफ़ 6 के मुताबिक़ स्पीकर या चेयरपर्सन का दल-बदल को लेकर फ़ैसला आख़िरी होगा. पैराग्राफ़ 7 में कहा गया है कि कोई कोर्ट इसमें दखल नहीं दे सकता. लेकिन 1991 में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने 10वीं अनुसूची को वैध तो ठहराया लेकिन पैराग्राफ़ 7 को असंवेधानिक क़रार दे दिया.
सुप्रीम कोर्ट ने ये भी स्पष्ट कर दिया कि स्पीकर के फ़ैसले की क़ानूनी समीक्षा हो सकती है.
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