मध्य प्रदेश: कमल के कारण संकट में कमलनाथ सरकार

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- Author, शुरैह नियाज़ी
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, भोपाल से
मध्यप्रदेश में चल रहे सियासी संकट के बीच अब दोनों ही पार्टी कांग्रेस और भाजपा अपने-अपने विधायकों को बचाने की क़वायद में जुट गई हैं.
भाजपा ने मंगलवार देर रात अपने विधायकों को भोपाल से दिल्ली रवाना कर दिया. भाजपा के 106 विधायक प्लेन से दिल्ली गये और बताया जा रहा है कि उसके बाद उन्हें किसी अन्य स्थान पर ले जाया गया है.
इन विधायकों को 5 बसों में भरकर एयरपोर्ट तक लाया गया. जिसके बाद ये लोग यहां से रवाना हो गये.
हालांकि भोपाल से रवाना होने से पहले विधायकों ने दावा किया कि वो होली मिलन के लिये भोपाल से जा रहे है.
भाजपा विधायक संजय पाठक ने कहा, "हम होली मिलन के लिये जा रहे हैं. इससे से ज्यादा इसमें कोई मतलब नहीं निकाला जाना चाहिये."
वहीं दूसरे विधायकों ने भी होली मिलन की ही बात कही. कुछ ने बताया कि वो 4-5 दिन भोपाल से बाहर रह सकते हैं.
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दूसरी तरफ़ कांग्रेस भी अपने बचे विधायकों को दूसरी जगह ले जाने की तैयारी कर रही है. ऐसी ख़बरें मिल रही हैं कि कांग्रेस विधायकों को राजस्थान या छत्तीसगढ़ ले जाया जा सकता है.
कांग्रेस के पास इस वक़्त 92 विधायक हैं. मंगलवार यानी होली के दिन तेज़ी से बदले घटनाक्रम में 22 विधायकों ने पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया.
19 विधायक सिंधिया समर्थक थे जिन्होंने पहले ई-मेल के ज़रिये अपने इस्तीफ़े भेजे उसके बाद भाजपा के भूपेंद्र सिंह उनके लिखित इस्तीफ़े अपने साथ लेकर भोपाल पहुंचे. वहीं तीन विधायकों ने अपने इस्तीफ़े अपने-अपने क्षेत्रों से भेज दिये.
इस्तीफ़े लेकर विपक्ष के नेता गोपाल भार्गव, नरोत्तम मिश्रा और अन्य भाजपा नेता राज्य विधानसभा के अध्यक्ष एन पी प्रजापति से मिले और उन्हें ये इस्तीफ़े सौंपा.
भूपेंद्र सिंह ने कहा कि उम्मीद है कि कांग्रेस के और विधायक भी इस्तीफ़ा देंगे. उन्होंने कहा, "कई और विधायक पार्टी के संपर्क में है जिन्होंने भाजपा से मिलने की इच्छा जताई है."
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उधर कांग्रेस ने भी अब अपनी सरकार को बचाने के लिये पूरी कोशिश तेज़ कर दी है.
कांग्रेस हाईकमान ने तीन वरिष्ठ नेताओं मुकुल वासनिक, हरीश रावत और दीपक बावरिया को संकट का हल तलाशने के लिये भोपाल भेजने का फ़ैसला किया है.
वही कांग्रेस के दो नेताओं ने बेंगलुरु का भी रुख़ किया है जहां पर वो असंतुष्टों को मनाने की कोशिश करेंगे.
सज्जन सिंह वर्मा और गोविंद सिंह नाराज़ विधायकों से मिल कर समस्या का हल निकालने की कोशिश करेंगे.
वही जनसंपर्क मंत्री पीसी शर्मा ने बातचीत में दावा किया है कि सरकार को बहुमत सिद्ध करने में कोई दिक्क़त नहीं आएगी.
उन्होंने कहा, "पूरी कांग्रेस एक साथ खड़ी है. पार्टी असंतुष्ट विधायकों को मना कर वापस ले आयेंगे. उन्हें ग़लत तरीक़े से बग़ैर पूरी जानकारी के लेकर चले गये है."
मुख्यमंत्री कमलनाथ ने भी दावा किया है कि सरकार के लिये बहुमत साबित करना बहुत मुश्किल काम नहीं है. उन्होंने दावा किया कि, "यहां से गये सभी विधायकों के संपर्क में हूं. उन्हें बहुत जल्दी हम लेकर आ जायेंगे."
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क्या भाजपा में शामिल होंगे सिंधिया?
मंगलवार को कांग्रेस विधायक दल की बैठक में बचे हुये विधायकों ने मुख्यमंत्री कमलनाथ पर अपना विश्वास जताया.
वहीं मंगलवार को सुबह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाक़ात के बाद कांग्रेस से इस्तीफ़ा देने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपनी चुप्पी नहीं तोड़ी है.
वो आगे क्या करेंगे इसके बारे में दिनभर क़यास लगाये जाते रहे. कुछ ने दावा किया कि वो भाजपा से जुड़ रहे हैं वहीं कुछ यह दावा करते रहे कि उन्होंने अलग पार्टी बनाने का फ़ैसला कर लिया है.
बताया जा रहा है कि 13 तारीख़ को भोपाल पहुंच कर सिंधिया विधिवत रुप से भाजपा में शामिल हो सकते है.
लेकिन सिंधिया के मन में क्या चल रहा है और उन्होंने इतना बड़ा क़दम किस वजह से उठाया यह बात उनके मुंह खोलने पर ही पता चल सकती है.
13 तारीख़ को राज्यसभा के नामांकन का अंतिम दिन है. माना जा रहा है कि सिंधिया उस दिन राज्यसभा के लिये भी अपना नामांकन भरेंगे.

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भाजपा की चुप्पी टूटेगी...
उधर भाजपा भी फ़िलहाल अपने पत्ते पूरी तरह से नहीं खोल रही है.
पार्टी के विधायक दल की बैठक मंगलवार को हुई. लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पहले ही साफ़ कर दिया कि इस बैठक में राज्यसभा चुनाव को लेकर चर्चा की जानी है और उसके अलावा इसका कोई मक़सद नही है.
भाजपा इस पूरे घटनाक्रम में ताक़तवार बनकर उभरी है. भाजपा का पलड़ा भारी नज़र आ रहा है. हालांकि कांग्रेस नेता दावा कर रहे है कि "स्थिति क़ाबू मैं है."
मध्यप्रदेश में राज्यसभा की कुल 11 सीटें हैं जिनमें से तीन सीटों पर 26 मार्च को चुनाव होना है. इन तीन सीटों पर फ़िलहाल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रभात झा और पूर्व केंद्रीय मंत्री सत्यनारायण जटिया हैं जिनका कार्यकाल 9 अप्रैल को पूरा हो रहा है.
विधानसभा में अभी की स्थिति में माना जा रहा था कि राज्यसभा की तीन सीटों में से एक-एक सीट कांग्रेस और भाजपा को मिल रही है, और एक सीट के लिए घमासान होना है. राज्य में कांग्रेस और भाजपा की ओर से राज्यसभा जाने के इच्छुक उम्मीदवारों की सूची लंबी है.
वहीं दावे के विपरित कांग्रेस अभी असहाय-सी नज़र आ रही है. मुमकिन है कि पार्टी अंतिम समय में कुछ लोगों को वापस अपने पाले में लाने में कामयाब हो जाये.

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कांग्रेस पार्टी 2018 के विधानसभा चुनाव में जीत कर 15 साल बाद सत्ता में लौटी थी.
उस वक़्त कांग्रेस के 114 विधायक जीते थे और भाजपा के 109. लेकिन आज की स्थिती में भाजपा के पास 107 विधायक हैं तो कांग्रेस की संख्या 93 तक पहुंच गई है.
230 सदस्यों वाली विधानसभा में सरकार बनाने के लिए 116 विधायकों का समर्थन ज़रूरी होता है. बसपा के 2, सपा के एक और निर्दलीय 4 विधायक हैं जिन्होंने कांग्रेस को अब तक समर्थन दिया हुआ था.
लेकिन सिंधिया के पार्टी छोड़ने से एक बात साफ़ हो गई कि पार्टी के अंदर की जा रही अपेक्षा के चलते उन्हें यह क़दम उठाना पड़ा जिसकी वजह से कांग्रेस पार्टी प्रदेश में अल्पमत में आ गई है.
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