रेलवेमैन: भोपाल गैस त्रासदी के ज़ख़्म 39 साल बाद हुए ताज़ा, फिर उभरा दर्द

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- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
साल 1984. दिसंबर महीने की 2 और 3 तारीख़ की दरमियानी रात.
कलीम भाई भोपाल के ‘यूनियन कार्बाइड’ कारख़ाने के ‘सेवेन प्लांट’ में अपनी पाली में काम कर रहे थे. रात के 12 बजने वाले थे.
वो ‘गत्ते के डिब्बों’ को तैयार कर रहे थे जिसमें ‘सेवन’ नाम का ‘पाउडर’ भरा जाता था.
वो कहते हैं कि पहले ये पदार्थ अमेरिका से आयात किया जाता था. लेकिन फिर इसका उत्पादन भोपाल के यूनियन कार्बाइड के कारख़ाने में होने लगा. ये एक तरह का ‘कीटनाशक’ था.
कलीम इस डिब्बे में पदार्थ भर कर उस पर सील लगाने का काम करते थे. वो दिहाड़ी मज़दूर थे जो ज़्यादातर रात की पाली में ही काम किया करते थे.
उस दिन भी रात की पाली के लिए वो समय से कारख़ाने पहुँच गए थे. उनका दावा है कि वो रोज़ की तरह अपने दूसरे सहयोगियों के साथ काम पर लग गए.

कलीम अब 70 साल के हो गए हैं और अपने बेटे के साथ साइकिल की मरम्मत की दुकान चलाते हैं. भोपाल के काज़ी कैंप के बावड़ी में उनका मकान है. भोपाल गैस त्रासदी के समय भी वो इसी मोहल्ले में ही रहा करते थे.
मगर अब वो दूसरे मकान में ‘शिफ्ट’ हो चुके हैं. ये मोहल्ला यूनियन कार्बाइड के कारख़ाने से दूर तो है मगर 1984 की उस रात को जब कारखाने से गैस रिसाव हुआ, तो उसने इस इलाक़े को भी अपनी चपेट में ले लिया.
आज भोपाल गैस त्रासदी को 39 साल हो गए हैं. इस घटना में हज़ारों लोगों की मौत हुई जबकि लाखों लोग गैस की चपेट में आकर ख़तरनाक रूप से बीमार हो गए. आने वाले कई सालों तक भी प्रभावित लोगों की मौतों का सिलसिला जारी रहा.

नेटफ़्लिक्स की सिरीज़ ने घटना की याद ताज़ा की
यूनियन कार्बाइड कारख़ाने में काम करने वाले वो कर्मचारी, जो घटना के समय प्लांट के अन्दर ‘डयूटी’ पर मौजूद थे, वो या तो गैस रिसाव में मारे गए या फिर गंभीर रूप से बीमार पड़ने के बाद आने वाले कुछ महीनों या सालों में बीमारी से जूझते हुए दुनिया से चले गए.
जो इस हादसे में बच गए उनकी अब काफ़ी उम्र हो चली है. कुछ ने हमेशा के लिए भोपाल को अलविदा कह दिया था. इतने सालों के बाद अब इक्का-दुक्का ही लोग बचे हैं जिन्होंने कारख़ाने के अंदर इस घटना को अपनी आँखों के सामने घटते देखा था.
कलीम भाई उन्हीं चुनिन्दा लोगों में से एक हैं. उन्हें साल 1988 में मध्य प्रदेश के सिंचाई विभाग में नौकरी मिल गयी थी. वो 2016 में सेवानिवृत हुए हैं.
बीबीसी से बात करते हुए वो उस रात को याद करते हैं और सिहर उठते हैं. बीच-बीच में काफ़ी देर तक वो चुप हो जाते हैं. वे पुरानी यादों में खो जाते हैं. और बात करते-करते उनका गला भर जाता है.
बोलते हैं, “तब से तबियत ठीक नहीं रहती है. फेफड़े ख़राब हो गए हैं. टीबी भी हो गयी थी. कोरोना भी हुआ था, मगर ऊपर वाले की मर्ज़ी है कि मैं आपके सामने बैठा हूँ.”
कलीम के परिवार के लोग भाग्यशाली थे जो गैस रिसाव से प्रभावित तो हुए मगर ठीक भी हो गए. मगर उस रात एक पल ऐसा भी आया था जब परिवार के लोगों को लगा कि कलीम ज़िंदा नहीं होंगे.
मगर, अपने कई साथियों की मुक़ाबले कलीम बहुत भाग्यशाली रहे.

कलीम बताते हैं, “उस रात ठंड भी थी. दिसंबर में पहले बहुत ठंड पड़नी शुरू हो जाया करती थी. मैं ड्यूटी पर था. मेरे साथ साबिर भाई, माता प्रसाद, गंगा राम प्रजापति और अनवर मियां काम कर रहे थे."
"तभी साबिर भाई ने ‘पाइप’ की तरफ़ इशारा किया जहां से पानी ‘लीक’ कर रहा था. अगले ही पल सायरन बजने लगा. सायरन की आवाज़ ‘मिथाइल आइसोसाइनेट’ के ‘प्लांट’ की तरफ़ से आ रही थी. किसी ने कहा कि ये ‘ड्रिल’ हो रही है. मगर तभी आवाज़ आई – भागो.... भागो. जान बचाओ...!!!”
वैसे भोपाल गैस त्रासदी के 39 सालों के बाद, उस रात का भयानक मंजर फिर से लोगों की यादों में ताज़ा हो गया, जब हाल ही में ‘नेटफ़्लिक्स’ पर चार भाग की एक ‘सिरीज़’ – ‘द रेलवेमेन’ आई.
वैसे तो ये 1984 को हुई त्रासदी की ‘अनकही कहानी’ है, लेकिन इसका ज़्यादातर हिस्सा उस रात भोपाल रेलवे स्टेशन पर मची अफ़रा-तफ़री के इर्द-गिर्द बुना गया है.
इसमें मध्य रेलवे के तत्कालीन महाप्रबंधक गौरी शंकर, भोपाल रेलवे स्टेशन के सहायक स्टेशन मास्टर ग़ुलाम दस्तगीर के प्रयासों को कहानी के केंद्र में रखा गया है.
इसके अलावा कहानी में दो अन्य किरदार हैं – एक उस समय पत्रकार रहे राजकुमार केसवानी और कारखाने के ‘सुपरवाइज़र’ बरकतुल्लाह.

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'किसी ने उस रात की कहानी कही तो'
सिरीज़ में मध्य रेलवे के महाप्रबन्धक की भूमिका आर माधवन ने निभायी है जबकि इसके मुख्य कलाकार केके मेनन हैं जिन्होंने भोपाल रेलवे स्टेशन के सहायक स्टेशन मास्टर ग़ुलाम दस्तगीर की भूमिका निभायी है.
इनके अलावा दिवंगत अभिनेता इरफ़ान खान के बेटे बाबिल ख़ान ने भी ‘लोको पायलट’ की भूमिका निभायी है.
भोपाल गैस पीड़ितों के लिए काम करने वाली संस्था ‘भोपाल ग्रुप फ़ॉर इनफार्मेशन एंड एक्शन’ की संयोजक रचना ढींगरा का कहना है कि बेशक सिरीज़ में ज्यादा हिस्सा रेलवे कर्मचारियों पर केंद्रित रहा है लेकिन इस बहाने इस त्रासदी के कारणों को भी दर्शाया गया है.
वो कहती हैं कि पहली बार ऐसा हुआ है कि जब इस त्रासदी को लेकर इस तरह की फ़िल्म बनी है.
बीबीसी से बात करते हुए वो कहती हैं कि उन्हें हमेशा इस बात को लेकर हैरानी होती रही है कि इतनी बड़ी त्रासदी पर किसी ने कोई फ़िल्म बनाने की पहल क्यों नहीं की.
वो कहती हैं, “रेलवे के कर्मचारियों के ज़रिये ही सही, किसी ने इस त्रासदी की कहानी को छुआ तो है. यही बड़ी बात है.”

वैसे इस सिरीज़ की कहानी वास्तविक घटनाओं से प्ररित ज़रूर है. मगर कहानी काल्पनिक है और इसके कई किरदार भी काल्पनिक हैं जिनके बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं रही है.
कलीम भी उस समय ‘प्लांट’ में मौजूद लोगों के बारे में कुछ बता पाने की स्थिति में नहीं हैं.
वो कहते हैं, “जब शोर हुआ, हम सब गेट की तरफ़ भागने लगे. हमारी आँखें जल रहीं थीं. हमें सांस लेने में परेशानी हो रही थी. हम आश्वस्त हो गए थे कि ये गैस रिसाव है और हवा में ‘मिथाइल आइसोसाइनेट’ फैल चुकी थी.”
“मैं भाग कर कितनी दूर निकल गया था उसका उस समय अनुमान नहीं था. मैं रेलवे की पटरी पर पहुँच गया था और पटरी पर दौड़ता रहा. मैं बहुत दूर निकल गया, फिर और भागने की हिम्मत नहीं बची तो वहीं रुका रहा."
"सुबह हो गयी और हवा में गैस का असर कम होने लगा. मुझे अपने परिवार की चिंता सता रही थी. लेकिन मैं घर जाने की बजाय अपने साथियों की तलाश में प्लांट की तरफ़ चला गया. साबिर भाई, माता प्रसाद, गंगा राम प्रजापति और अनवर मियां का कोई अता-पता नहीं था. उनसे फिर कभी मेरी मुलाक़ात नहीं हुई.”

'लाशें ही लाशें देखीं'
कलीम के घर से कुछ किलोमीटर दूर भोपाल के कबाड़खाने के इलाक़े में साबिर नाम के एक शख्स रहते हैं. लेकिन ये वो साबिर नहीं हैं जिनकी बात कलीम कर रहे थे.
साबिर ‘मिथाइल आइसोसाइनेट’ के प्लांट में बतौर मज़दूर काम करते थे. वो कहते हैं कि ज़रूरत पड़ने पर वो कभी-कभी मशीन भी चला लेते थे.
जिस वक्त हम साबिर से मिलने गए वो बेहद बीमार थे. उन्होंने बताया कि उन्हें सांस लेने में परेशानी होती है और उनके सिर्फ़ 20 प्रतिशत फेफड़े ही काम करते हैं.
हले हदीस मस्जिद के सामने पतली-सी गली में मकानों के झुरमुट के बीच उनका छोटा-सा घर है जहां कम वॉट का एक बल्ब जल रहा है. घर की दीवारों से पानी का रिसाव हो रहा है.
टूटी-फूटी गड्ढों वाली सड़क पर नालियां बह रहीं हैं. इस वजह से इलाक़े में बदबू फैली हुई है.
साबिर कहते हैं, “उस दिन भी एक बदबू फैली थी जो आज तक दिल और दिमाग़ से जा नहीं पा रही है. अब हमें इस बदबू में रहना पड़ता है. उस दिन मैं डयूटी ख़त्म कर के छह बजे तक घर आ गया था.
"रात में शोर हुआ और अफ़रा-तफ़री मची. लोग इधर-उधर भाग रहे थे. पता चला कि कारखाने में गैस लीक हुई है. मैं अपने साथियों की मदद करने के लिए मुंह पर कपड़ा लपेट कर प्लांट की तरफ़ भागा. मगर रास्ते में मैंने लाशें ही लाशें पड़ी देखीं."
"मैं प्लांट के अंदर जा नहीं पाया और रास्ते में ही बेहोश हो गया. फिर कई दिनों तक मैं अस्पताल में रहा. तब से मुझे सांस लेने में परेशानी हो रही है. वो ज़हरीली गैस फेफड़ों को ख़त्म कर देती है.”

साबिर ग़ुरबत में ज़िन्दगी गुजार रहे हैं. उनके पास मोबाइल फ़ोन भी नहीं है और टीवी भी नहीं. इसलिए ‘नेटफ़्लिक्स’ की सिरीज़ – ‘द रेलवेमैन’ के बारे में उन्हें कुछ पता नहीं है.
लेकिन उनके मोहल्ले के जिन लोगों ने इसे देखा है वो इसकी सराहना कर रहे हैं. हालांकि भोपाल रेलवे स्टेशन के तत्कालीन सहायक स्टेशन मास्टर गुलाम दस्तग़ीर के परिवार के लोग इससे खुश नहीं हैं.
उनका कहना है कि सीरीज़ बनाने वालों ने किरदार के नाम बदल दिए हैं जो ग़लत था. उनके बेटे शादाब ने नेटफ़्लिक्स को नोटिस भी भेजा है.
नेटफ़्लिक्स पर प्रसारित ‘रेलवेमैन’ सिरीज़ के अंत में बताया गया कि गुलाम दस्तगीर को मृत समझ कर उन्हें अस्पताल के मुर्दा घर ले जाया गया था जहां वो उठकर बैठ गए थे. लेकिन उनके बेटे शादाब और परिवार के दूसरे सदस्य इससे इनकार करते हैं.
वो कहते हैं कि अगर उनके पिता उस दिन बहादुरी का परिचय नहीं देते और स्टेशन को छोड़कर भाग जाते तो प्लेटफार्म पर जमा हज़ारों की भीड़ लाशों में तब्दील हो जाती.
उन्होंने बॉम्बे-गोरखपुर एक्सप्रेस ट्रेन को भी भोपाल स्टेशन से फ़ौरन रवाना करवाया था और स्टेशन पर मूर्छित होकर गिरे लोगों को भी माल गाड़ी में लादकर सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया था.

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लेकिन, भोपाल ग्रुप फ़ॉर इनफार्मेशन एंड एक्शन की संयोजक रचना ढींगरा कहती हैं, “हम भोपाल गैस हादसे की कहानी ताक़तवर तरीक़े से बताने के लिए 'द रेलवेमैन' के निर्माताओं और कलाकारों को धन्यवाद देते हैं."
"यह वास्तव में खुशी की बात है कि निर्माताओं ने आपदा के पीछे कॉर्पोरेट साजिशों और सरकारी उदासीनता और उसके लंबे समय के परिणामों को स्पष्टता के साथ उजागर किया है."
"हमें उम्मीद है कि इस सिरीज़ की सफलता अन्य फ़िल्म निर्माताओं को भोपाल में चल रही दुनिया की सबसे भयानक औद्योगिक हादसे की पूरी कहानी बताने के लिए प्रोत्साहित करेगी.'
भोपाल के गैस पीड़ितों के लिए काम करने वाले कई संगठनों ने त्रासदी के 39 वें वर्ष इस बात को लेकर संतोष व्यक्त किया है कि उनके प्रयासों से अमेरिकी कंपनी ‘द डाओ केमिकल कम्पनी’ के अधिकारी इस मामले के सिलसिले में आख़िरकार भोपाल की अदालत में पेश हुए.

भोपाल गैस पीड़ित महिला स्टेशनरी कर्मचारी संघ की अध्यक्ष रशीदा बी का कहना है कि ‘द डाओ केमिकल कम्पनी’ यूनियन कार्बाइड की मालिक होने की वजह से उसकी आपराधिक ज़िम्मेदारियों के लिए भी ज़िम्मेदार है.
वहीं गैस पीड़ित निराश्रित पेंशनभोगी संघर्ष मोर्चा के अध्यक्ष बालकृष्ण नामदेव कहते हैं कि तकनीकी तौर पर यूनियन कार्बाइड कंपनी पिछले 31 वर्षों से अदालत से फ़रार रही है.
उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र भेजकर अपील की है कि जांच एजेंसियां ‘डाओ केमिकल’ का ‘त्वरित अभियोजन’ करें ताकि लगभग चार दशकों से इंतज़ार कर रहे भोपाल के लोगों को न्याय मिल सके.
इस भीषण औद्योगिक दुर्घटना में 25,000 लोग मारे गए थे.
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