मध्य प्रदेश: चंबल के 'बाग़ी' क्यों नहीं चल पाए सियासत में

- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
मध्य प्रदेश के श्योपुर ज़िले की कराहल तहसील से लहरोनी गांव की दूरी 15 किलोमीटर होगी.
मूसलाधार बारिश की वजह से यह छोटा रास्ता बड़ी मुश्किल से तय हो पा रहा था. दोपहर का वक़्त था, लेकिन घने-काले बादलों की वजह से ऐसा लग रहा था जैसे रात होने वाली है.
जगह-जगह सड़क पर मवेशी दिखते हैं. किसी तरह रास्ता तय कर हम लहरोनी पहुंचे. रास्ते में कुछ मज़दूर एक मकान में बैठे नज़र आए.
हमने 'मुखिया जी' के घर का रास्ता पूछा, तो एक मजदूर उनके घर का रास्ता दिखाने के लिए हमारे साथ हो लिया. उस मज़दूर ने इशारे से बताया, ये मुखिया जी का फ़ार्म है .
मुखिया जी से हमारी ये पहली मुलाक़ात थी. टिन शेड के नीचे चारपाई पर सफ़ेद लिबास में बैठे 75 साल के मुखिया जी, अपनी मूंछों पर ताव दे रहे थे. हमारे आने की ख़बर उन्हें पहले दे दी गई थी. ठीक उसी तरह जैसे वो 1975 से 1984 के दौर में चंबल के बीहड़ों और श्योपुर के जंगलों में पत्रकारों से मिला करते थे.

तब उनका लिबास खाकी हुआ करता था. बड़े-बड़े बाल थे. हाथों में बंदूक़ होती थी.
लेकिन अब उन पर उम्र हावी होती जा रही है. बंदूक़ वो अब भी रखते हैं, लेकिन 'आत्मरक्षा' के लिए. वो कहते हैं- "अब ज़रूरी है. दुश्मनियां भी बहुत हैं."
रमेश सिकरवार चंबल के उन आख़िरी डाकुओं में से हैं, जिन्होंने अस्सी के दशक में आत्मसमर्पण कर दिया था. उन्होंने मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के कहने पर 27 अक्तूबर, 1984 को हथियार डाल दिए थे.
उनके अलावा उनकी गैंग के 32 अन्य सदस्यों ने भी आत्मसमर्पण कर दिया था. फिर 10 साल की सज़ा काटने के बाद उन्होंने अपनी नई ज़िंदगी शुरू की.
मध्य प्रदेश का चंबल संभाग दशकों तक डकैतों के आतंक का गढ़ रहा.
फिर विनोबा भावे, जय प्रकाश नारायण और गांधीवादी सुब्बा राव के प्रयासों की वजह से 654 से भी ज़्यादा डकैतों ने आत्मसमर्पण किया.
डकैतों के उदय और अस्त होने की कहानी

डकैतों के आत्मसमर्पण का सिलसिला 1960, 1970 और 1980 के दशकों तक चलता रहा. इस दौरान लगभग एक हज़ार डकैतों ने आत्म समर्पण किया. इससे चंबल डकैतों के आतंक से मुक्त हो पाया.
बहुत सारे डकैत सज़ा काटकर आम ज़िंदगी में लौटे. कइयों ने अपनी क़िस्मत राजनीति में भी आज़माई. कुछ चुनाव भी लड़े.
लेकिन ये मध्य प्रदेश की राजनीति में उतने सफल नहीं हो पाए, जबकि समाज के एक बड़े तबक़े पर इनका प्रभाव आज भी मौजूद है.
इनमें से एक हैं मलखान सिंह, जो 80 साल के हो गए हैं. हाल ही में वो भारतीय जनता पार्टी छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए हैं.
गुना के इलाक़े के अलावा मुरैना और चंबल संभाग के एक बड़े हिस्से में उनका बहुत प्रभाव है.

रमेश सिकरवार आज भी चंबल संभाग के एक बड़े इलाक़े में वो 'रॉबिनहुड' की तरह देखे जाते हैं.
60 के दशक में मध्य प्रदेश के चंबल के जंगल और बीहड़ों में बेहद दुर्दांत डाकुओं का दबदबा था. हिंसा, हत्या, अपहरण और फ़िरौती वसूलने की वारदातों की वजह से चंबल को पूरे देश में सबसे ज़्यादा कुख्यात माना जाने लगा. इस दौरान इस इलाक़े में कई खूँखार डकैतों की तूती बोलती थी.
मध्य प्रदेश के अपराध अनुसंधान विभाग यानी सीआईडी के आंकड़ों के मुताबिक 1960 से लेकर 1976 तक 654 डकैतों ने अलग-अलग स्थानों पर आत्मसमर्पण किया था.
इनमे बटेश्वर और राजस्थान के धौलपुर के अलावा जहां सबसे बड़े पैमाने पर आत्मसमर्पण हुआ था, वो था मुरैना जिले का जौरा गांव में जहां सुब्बा राव का गांधी सेवाश्रम स्थित है.
आत्मसमर्पण करने वाले डकैतों ने जेल की सज़ा पूरी होने के बाद गांधी सेवाश्रम में रहकर लोगों की सेवा का भी काम शुरू किया.
डकैत और राजनीति

आत्मसमर्पण करने वाले ज़्यादातर डकैतों ने खेतीबाड़ी करना ही पसंद किया और कुछ ने राजनीति में भी क़िस्मत आज़माने की कोशिश की.
आत्मसमर्पण करने वाले डकैत प्रेम सिंह का 2013 में निधन हो गया था. वो कांग्रेस के टिकट पर सतना से विधायक भी रहे थे.
एक और कुख्यात डकैत रह चुके मोहर सिंह ने भी राजनीति में क़िस्मत आज़माने की कोशिश की. वो 90 के दशक में भारतीय जनता पार्टी से जुड़ गए थे.
फिर 1995 में वो भिंड ज़िले की महगांव क़स्बे में नगर पालिका के अध्यक्ष भी बन गए. अस्सी के दशक में उन्होंने कांग्रेस पार्टी के लिए प्रचार भी किया था.
सिकरवार पुराने दिनों की याद करते हुए कहते हैं कि सरकार ने उन पर तीन लाख रुपये का इनाम रखा था, जबकि उनके अन्य साथियों पर 50-50 हज़ार रुपए का इनाम था.

वो बताते हैं, "मर्डर करें और गैंग में शामिल हो जाएं. बिना मर्डर के हम गैंग में किसी को शामिल नहीं करते थे. जब हमने आत्मसमर्पण किया था उस समय हमारे अलावा कोई कोई गैंग ही नहीं था मध्य प्रदेश में. एक ही गैंग था. सिर्फ़ हमारा. उससे पहले जितने गैंग थे उन्होंने 1982 में आत्म समर्पण कर दिया था."
सगे चाचा के साथ हुए विवाद ने उनकी ज़िंदगी बदल दी थी. ज़मीन का झगड़ा था और चाचा ने सिकरवार की ज़मीन पर क़ब्ज़ा कर लिया था.
वे बताते हैं, "इतना परेशान कर दिया चाचा जी ने. पुलिस और प्रशासन ने हमारे साथ इंसाफ़ नहीं किया. हमने रिश्तेदारों को इकठ्ठा किया. रिश्तेदारों ने भी हमारी नहीं सुनी. रिश्तेदार भी पैसे वाले चाचा की तरफ़दारी करते रहे."
"कहीं जब न्याय नहीं मिला, तो पिता जी ने कहा- कोई रिश्तेदार नहीं सुनेगा, न कोई प्रशासन सुनेगा. इन दुष्टों को मारो तुम. मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है. मेरे पास एक टोपीदार बंदूक़ थी, जिसे लेकर मैं फ़रार हो गया था. एक साल मैं अकेला ही रहा. उसके बाद फिर हमने चचा को पकड़ा. उनको निपटा दिया."
कैसा रहा डकैतों का अनुभव

इमेज स्रोत, Prashant Panjiar/The India Today Group via Getty Images
पुलिस के साथ आंख-मिचौली खेलते रहने वाले सिकरवार ने आत्मसमर्पण करने का फ़ैसला किया. प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह की पहल पर उन्होंने ये फ़ैसला लिया.
वो कहते हैं, "अर्जुन सिंह ने पिताजी को बुलवाया पौरी में. उन्होंने कहा अपने बच्चे को तुम हाज़िर कराओ किसी तरह. तो पौरी में अर्जुन सिंह से अकेले में मिला. उसके चार दिनों बाद सुब्बा राव जी और राजगोपाल भाई पहुंचे, वो चार-पांच दिन अपने साथ गैंग में रहे. वो बोले हम तुम्हारे बच्चों की देखभाल करेंगे किसी बात की कोई चिंता नहीं करो. हमने उनकी बात मान ली."
सिकरवार को आत्मसमर्पण किए अब 38 साल बीत गए हैं. इस बीच उन्होंने राजनीति में भी अपनी क़िस्मत आज़माई. लेकिन ना तो वो उतना सफल हो पाए और ना ही उनसे पहले आत्मसमर्पण करने वाले मलखान सिंह.
श्योपुर के जंगलों और चंबल के बीहड़ों में रहने के बावजूद रमेश सिकरवार की छवि 'रॉबिनहुड' जैसी ही बनी रही थी. उनका दावा है कि आज भी आदिवासियों के बीच उनकी वैसी ही पैठ है, जैसी पैठ तब थी जब वो बाग़ी का जीवन बिता रहे थे.

वो बताते हैं कि फ़रारी काटते वक़्त उन्होंने कई आदिवासी लड़कियों की शादी करवाई. इसी वजह से उनके साथ आदिवासी समाज खड़ा है.
उनका कहना था, "यहां 60 हज़ार वोट आदिवासियों के हैं, हम जिस जगह कहेंगे पूरा आदिवासी समाज उधर ही जाएगा. चाहे कोई नेता कुछ भी करता रहे, वो किसी की नहीं सुनते. बोलते हैं मुखिया जी जो कहेंगे वही करेंगे."
सिकरवार फ़िलहाल भारतीय जनता पार्टी में हैं. वो बताते हैं कि मुरैना के सांसद नरेंद्र सिंह तोमर के कहने पर उन्होंने भाजपा की सदस्यता ली थी.
इससे पहले 2008 में उन्होंने समाजवादी पार्टी के टिकट पर विजयपुर विधानसभा की सीट से चुनाव भी लड़ा था. लेकिन उस समय उनको 16 हज़ार वोट ही मिले थे.
सिकरवार कहते हैं कि चुनावों के समय राजनीतिक दल के नेता उनके पास समर्थन के लिए आते हैं.

वो राजनीति में ज़रूर हैं, लेकिन इसमें उनका मन नहीं लगता है. उन्होंने कहा, ''बंदूक़ से ज़्यादा भारी है किसी दल का झंडा उठाना.''
उनका कहना है कि सरकारी अमले के लोगों के रवैए ने ही डकैतों को जन्म दिया. वो इसके लिए मुख्य तौर पर पुलिस और पटवारियों की कार्यशैली और भ्रष्टाचार को ज़िम्मेदार मानते हैं.
वो कहते हैं, ''कहीं भी पटवारी को देख लो आप. ज़मीन का अगर सीमांकन कराएंगे, तो तुम्हारी ज़मीन नाप देंगे मेरे लिए और मेरी नाप देंगे किसी और के लिए. मरो तो तुम मरो उसको तो पैसा चाहिए.''
लक्कू आदिवासी, लहरोनी गांव के सरपंच हैं. वो बताते हैं कि कई दशक से उनका समाज सिकरवार के साथ जुड़ा हुआ है. वो ये भी कहते हैं कि इस बार भी वो लोग उन्हें चुनाव लड़ने के लिए दबाव दल रहे हैं. लेकिन सिकरवार चुनाव लड़ने के लिए तैयार नहीं हुए हैं.

लक्कू बताते हैं कि उनके समाज ने हमेशा सिकरवार से पूछ कर ही वोट डाला है और आगे भी ऐसा करते रहेंगे. इसका कारण यहीं के कसिया सहरिया बताते हैं.
वो कहते हैं कि अगर रमेश सिकरवार नहीं होते, तो आदिवासियों की ज़मीनों पर दबंगों का क़ब्ज़ा हो जाता. उनका कहना था कि जब जब दबंग और रसूखदार लोगों ने आदिवासियों की ज़मीन हड़पने की कोशिश की, तब तब रमेश सिकरवार बीच में आ गए और उनकी ज़मीन बच गई.
एकता परिषद् से जुड़े दौलत राम गौड़ का कहना था कि न सिर्फ़ आदिवासी बल्कि समाज के दबे-कुचले तबक़े के लोग रमेश सिकरवार को बहुत मानते हैं. वो कहते हैं, "अगर कोई आदमी किसी से पीड़ित है, परेशान है तो शिकायत लेकर मुखिया जी के पास पहुंच जाता है. वो फ़ौरन कहते हैं कि चलिए, मैं चलता हूं, गाड़ी उठाकर उनके साथ चल देते हैं."
डकैतों का आचरण संविधान के अनुकूल नहीं

लेकिन कई लोग ऐसे हैं जिन्हें आत्मसमर्पण करने वाले डकैतों के 'रॉबिनहुड' जैसा बनने पर आपत्ति है.
मध्य प्रदेश पुलिस में रहे भारतीय पुलिस सेवा के पूर्व अधिकारी शैलेन्द्र श्रीवास्तव कहते हैं कि ये आचरण संविधान के अनुकूल नहीं है.
श्रीवास्तव ने बीबीसी से कहा कि लोकतंत्र में सबकी अपनी-अपनी ज़िम्मेदारी और अपनी-अपनी भूमिका निर्धारित की गई है.
उनका कहना था, ''पुलिस क़ानून बनाने का काम नहीं कर सकती और सज़ा नहीं दे सकती है. ये अदालत का काम है. प्रजातंत्र में हर व्यक्ति की भूमिका वर्णित की गई है. हमें संविधान के तहत चलना ही होगा. क़ानून को हाथ में लेकर किए गए काम के परिणाम भी ठीक नहीं होते हैं. इसलिए उनका महिमामंडन न करते हुए क़ानून के सहारे ही चलना होगा. डकैत रह चुके लोग इंसाफ़ करने वाले कौन होते हैं ? ये उनका काम नहीं है.''

डकैतों की ज़िंदगी पर लिखने वाले और इस समस्या पर लंबे समय से नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई मानते हैं कि जो डकैत सज़ा काटने के बाद आम ज़िंदगी में लौटे और उन्होंने किसी राजनीतिक दल का दामन थाम नेता तो बन गए, लेकिन उनका हाल भी उन फ़िल्म अभिनेताओं जैसा ही हुआ जिन्होंने राजनीति में अपनी क़िस्मत आज़माई थी.
वो कहते हैं, "बड़े-बड़े एक्टर जो राजनीति में आए, उनको आटे-दाल का भाव पता चल गया. उन्हें पता चल गया कि नेता उनको हमेशा हाशिए पर ही रखते हैं. यह बात जिन डकैतों ने ने सरेंडर किया, उनके संबंध में भी उतनी ही प्रासंगिक है. सिकरवार और मलखान सिंह के साथ भी यही हुआ. वो राजनीति में आए तो, लेकिन, आने के बाद उन्हें पता चला कि ये किस तरह की दलदल है."
भिंड के वरिष्ठ पत्रकार रामभुवन सिंह कुशवाहा के अनुसार, डकैत किसी ख़ास वजह से हथियार उठाते थे. लेकिन इसके बावजूद वो ग़रीबों के लिए ही काम करते थे.

राजनीति में आने के बाद भी वो व्यवस्था का हिस्सा नहीं बने और उत्पीड़न के विरुद्ध आवाज़ भी उठाते रहे.
वे कहते हैं, "वो राजनीति में ज़रूर आए, लेकिन नेताओं वाले गुण या तिकड़म उनमें नहीं आ पाई. इसलिए वो राजनीति में सफल नहीं हो सके."
राजनीति में भले ही वो आत्मसमर्पण करने वाले ये डकैत कोई ज़्यादा करिश्मा न दिखा पाए हों, लेकिन समाज के जिस तबक़े से ये आते हैं, उनके बीच अब भी इनका एक इशारा नेताओं के भाग्य का फैसला कर सकता है.
इनमे सबसे प्रमुख नाम है पान सिंह तोमर का. उनके नाम से चंबल का पूरा इलाका थर्राता था.
पान सिंह, सेना के जवान थे और अच्छे धावक भी थे. फिर ज़मीन के विवाद को लेकर वो 'बाग़ी' बन गए थे.
पुलिस के साथ मुठभेड़ में उनकी मौत हो गई थी जबकि उनके भतीजे बलवंत सिंह ने आत्मसमर्पण कर दिया था. पान सिंह का परिवार बाद में झांसी में रहने लग गया.
मध्य प्रदेश के चंबल के अलावा इन डकैतों का आतंक मध्य प्रदेश से लगे उत्तर प्रदेश और राजस्थान के इलाकों में भी रहा.
वो डकैत जिनसे कांपता था चंबल

इमेज स्रोत, GETTY IMAGES
इसके अलावा प्रदेश के विंध्य इलाके में भी डकैत सक्रिय रहे.
पत्रकार रामभुवन सिंह कुशवाहा कहते हैं कि चित्रकूट के इलाक़े में शिवकुमार पटेल उर्फ़ ‘ददुआ’ और अम्बिका पटेल उर्फ़ ‘ठोकिया’ का बड़ा आतंक रहा.
वो इतने प्रभावशाली थे कि टिकट मिलने के बाद उम्मीदवार उनसे मदद की गुहार लगाया करते थे.
ददुआ के छोटे भाई और पुत्र सक्रिय राजनीति में रहे और समाजवादी पार्टी से उत्तर प्रदेश में सांसद और विधायक भी रहे.
मोहर सिंह को भी चंबल के आतंक के रूप में जाना जाता रहा है. उन पर 300 से ज़्यादा हत्या, लूट और अपहरण के मामले दर्ज थे.
उन्होंने 1982 में आत्मसमर्पण कर दिया था. मोहर सिंह कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के लिए प्रचार करते रहे. लेकिन ख़ुद कभी विधानसभा या लोक सभा का चुनाव नहीं लड़ा.
लेकिन उनका समर्थन उम्मीदवारों की हार-जीत तय कर देता था. कोरोना काल में उनका निधन हो गया था.
रमेश सिकरवार के अलावा पुराने डकैतों में अब सिर्फ़ मलखान सिंह ज़िंदा हैं. उन्होंने हाल ही में कांग्रेस का दामन थामा है.
मलखान सिंह नगर पालिका का चुनाव लड़ चुके हैं. वो कांग्रेस के लिए ग्वालियर और चंबल संभाग में प्रचार की कमान संभाले रहे हैं.
उन्होंने 1996 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर भिंड से चुनाव लड़ा था. लेकिन हार गए थे.
अर्जुन सिंह ने कैसे कराया डकैतों का आत्मसमर्पण

इमेज स्रोत, Getty Images
कई दशकों तक दस्यु समस्या पर अख़बारों में रिपोर्ट करने वाले वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई ने इस समस्या पर लिखी अपनी किताब 'लीडर्स, पॉलिटिशिएंस, सिटिज़न्स' में उन डाकुओं का ज़िक्र किया है जिन्होंने आत्मसमर्पण के बाद राजनीति में भी अपनी अपनी क़िस्मत आज़माई.
इनमे फूलन देवी, मान सिंह, मोहर सिंह आदि प्रमुख हैं.
किदवई कहते हैं कि मध्य प्रदेश और चंबल से लगे उत्तर प्रदेश और राजस्थान से दस्यु समस्या ख़त्म करने में मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह का अहम योगदान है.
वो कहते हैं कि अर्जुन सिंह ने हज़ार से ज़्यादा डकैतों को आत्मसमर्पण करने के लिए प्रेरित किया.
वे बताते हैं, ''उन्होंने इस समस्या के समाधान के लिए नीति भी बनाई और गांधीवादी नेताओं को अपने साथ लिया. अगर अर्जुन सिंह न होते तो दस्यु समस्या नियंत्रण से बाहर हो जाती. अर्जुन सिंह की ही पहल पर ख़ून-ख़राबा रुका और डकैतों ने एक-एक कर आत्मसमर्पण करना शुरू कर दिया. ये बहुत बड़ा क़दम था क्योंकि इसकी वजह से ये समस्या पूरी तरह से ख़त्म हो गई, नहीं तो इसका भी वैसा ही हाल होता जैसे नक्सलवाद का हुआ.''

अर्जुन सिंह की पहल से डकैतों को सरकारी तंत्र पर विश्वास हुआ. यही वजह है कि इतने बड़े पैमाने पर डकैत हथियार डालने को राज़ी हो गए.
फूलन देवी का यूँ तो प्रभाव उत्तर प्रदेश में ही ज़्यादा रहा, लेकिन उन्होंने आत्मसमर्पण मध्य प्रदेश के भिंड में 13 फरवरी 1983 को किया था.
उनके आत्मसमर्पण के लिए भिंड के तत्कालीन एसपी राजेन्द्र चतुर्वेदी ने अपने बेटे को डकैतों के पास गिरवी रख दिया था.
सेवानिवृत आईपीएस अधिकारी शैलेन्द्र श्रीवास्तव कहते हैं कि जो डकैत उत्तर प्रदेश में आतंक मचाए हुए थे वो भी मध्य प्रदेश की सरकार की आत्मसमर्पण नीति से आकर्षित हुए थे.
इसलिए ज़्यादातर डकैतों ने मध्य प्रदेश में ही आत्मसमर्पण करना बेहतर समझा.
उन्होंने भिंड के एमजेएस कॉलेज में अपने साथियों के साथ समर्पण किया था जिसके बाद कुछ सालों तक वो मध्य प्रदेश की जेल में ही रहीं. फिर उन्हें तिहाड़ जेल भेज दिया गया था.
1994 में उन्हें रिहा कर दिया गया. 1996 में वे उत्तर प्रदेश की मिर्ज़ापुर सीट से लोकसभा चुनाव जीता. 2001 में दिल्ली में उनकी हत्या कर दी गई.
अब कैसी है स्थिति?

इमेज स्रोत, GETTY IMAGES
अब चंबल संभाग डकैत मुक्त हो गया है.
हालांकि एक-आध जगह पर किसी डकैत के सक्रिय होने की ख़बर पुलिस को अब भी मिलती रहती है.
लेकिन सूचना और तकनीक के विकसित होने की वजह से पुलिस अब इन बीहड़ों की निगरानी आधुनिक पद्धति से करती है.
भारतीय पुलिस सेवा के पूर्व अधिकारी शैलेन्द्र श्रीवास्तव दावे के साथ कहते हैं कि अब ये समस्या पूरी तरह ख़त्म हो चुकी है. वो भी जड़ से.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)













