ज्ञानवापी मामला: हाई कोर्ट ने पूजा रोकने के मुलायम सरकार के आदेश को ग़लत क्यों कहा- प्रेस रिव्यू

इमेज स्रोत, ANI
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सोमवार को ज्ञानवापी मस्जिद के दक्षिणी तहखाने में हिन्दुओं को पूजा जारी रखने का फ़ैसला दिया है.
इससे पहले वाराणसी ज़िला अदालत ने हिन्दुओं को यहाँ पूजा की इजाज़त दी थी, जिसके ख़िलाफ़ अंजुमन इंतज़ामिया मस्जिद कमिटी ने अपील की थी. हाई कोर्ट ने इस अपील को ख़ारिज कर दिया है.
मस्जिद के जिस हिस्से में पूजा हो रही है, उसे 'व्यासजी का तहखाना' कहा जाता है.
इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के अनुसार, व्यास परिवार ने इस पर अपना अधिकार होने का दावा किया था. 1993 में जब उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार थी, तब व्यास परिवार को यहां पूजा बंद करने का मौखिक आदेश दिया गया था.
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि 'व्यास परिवार और श्रद्धालुओं को धार्मिक पूजा और अनुष्ठान करने से रोकना ग़लत था.'
ज्ञानवापी मस्जिद के धार्मिक चरित्र पर चल रही बहस के बीच सितंबर 2023 में व्यास परिवार ने एक मुक़दमा दायर किया था.
व्यास परिवार का कहना है कि व्यासजी का तहखाना 1551 में उनके पास रहा है और 1993 में उत्तर प्रदेश सरकार का आदेश आने तक लगातार यहाँ पूजा हो रही थी.

इमेज स्रोत, ANI
इस साल 31 जनवरी को वाराणसी ज़िला अदालत ने तहखाने में पूजा करने की अनुमति दे दी थी.
मस्जिद की प्रबंधक कमिटी ने इस आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी. उन्होंने दलील दी कि दीन मोहम्मद बनाम भारत सरकार के सचिव (1937) मामले में सिविल कोर्ट ने पहले ही आदेश दिया हुआ है कि 'यह मस्जिद हनफ़ी मुस्लिम वक़्फ़ की संपत्ति है और इस पर मुसलमानों का अधिकार है.'
कमिटी का कहना है कि इसमें मस्जिद के नीचे की ज़मीन और यहाँ तक कि तहखाना भी शामिल है.
प्रबंधक कमिटी ने उपासना स्थल अधिनियम (विशेष प्रावधान) 1991 के अनुच्छेद चार का भी हवाला दिया था.
यह प्रावधान कहता है कि किसी भी उपासना स्थल का जो धार्मिक चरित्र 15 अगस्त 1947 को था, उसे बदला नहीं जा सकता.
कमिटी की दलील थी कि 'इसका मतलब है कि दीन मोहम्मद मामले में कोर्ट का फ़ैसला अंतिम है और व्यास परिवार को तहखाने में पूजा का अधिकार देकर मस्जिद का धार्मिक चरित्र नहीं बदला जा सकता.'
व्यास परिवार की दलील

इमेज स्रोत, ANI
व्यास परिवार ने दलील दी कि दीन मोहम्मद मामले में आया आदेश वास्तव में उनके ही पक्ष में था. उन्होंने भारत के सचिव की ओर से दाख़िल नक्शे को आधार बनाते हुए कहा कि इसमें एक जगह को स्पष्ट तौर पर व्यास जी का तहखाना लिखा हुआ है.
उन्होंने कहा कि 'इस नक्शे पर कभी कोई विवाद नहीं हुआ और व्यास परिवार को दीन मोहम्मद मामले में पक्षकार नहीं बनाया गया, ऐसे में यह तहखाना परिवार के ही कब्ज़े में ही रहा.'
उन्होंने यह भी दावा किया कि मस्जिद का व्यास जी के तहखाने पर कभी कब्ज़ा नहीं रहा और राज्य सरकार को परिवार को वहां पूजा करने से नहीं रोकना चाहिए था.
उन्होंने भी उपासना स्थल अधिनियम का हवाला देते हुए कहा कि राज्य सरकार की ओर से पूजा करने से रोके जाने पर तहखाने का धार्मिक चरित्र बदल गया, जहां कि लगातार पूजा हो रही थी.

इमेज स्रोत, Getty Images
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने तथ्यों की प्रथम दृष्टया पड़ताल के बाद प्रतिवादियों के पक्ष में अंतरिम आदेश जारी किया है.
इसमें लिखा गया है कि 'व्यास परिवार के स्वामित्व वाले व्यास तहखाने का 1937 में अस्तित्व होना सबूत है कि उनका 1993 तक यहां लगातार कब्ज़ा था.'
कोर्ट ने कहा कि “प्रथम दृष्टया पाया है कि राज्य सरकार द्वारा 1993 से व्यास परिवार और श्रद्धालुओं को पूजा और अनुष्ठान करने से रोका जाना एक ग़लत फ़ैसला था.”
31 जनवरी को वाराणसी ज़िला अदालत का आदेश आने के बाद ज्ञानवापी विवाद मामले में मुख्य याचिकाकर्ता राखी शाह ने ज्ञानवापी के बाक़ी तहखानों में भी एएसआई का सर्वे करवाने की मांग की है ताकि उनका धार्मिक चरित्र भी पता लगाया जा सके.
अख़बार के मुताबिक़, इलाहाबाद हाई कोर्ट के ‘तहखाने पर कब्ज़ा और लगातार पूजा होने’ के आधार पर दिए गए आदेश से इन तहखानों की धार्मिक प्रकृति की पड़ताल होने की संभावनाएं भी खुल गई हैं.
रूसी सेना से 'मुक्त' करवाए गए भारतीय

भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि रूसी सेना में शामिल हुए कई भारतीयों को सेवामुक्त कर दिया गया है.
द हिंदू की ख़बर के अनुसार, विदेश मंत्रालय का कहना है कि ऐसा रूसी प्रशासन के सामने इस मुद्दे को मज़बूती से उठाने के बाद हुआ है.
विदेश मंत्रालय ने कहा है कि 'मीडिया में कुछ ऐसी ग़लत ख़बरें देखी हैं, जिनमें कहा जा रहा है कि रूसी सेना के साथ जुड़े भारतीय वहां से हटने के लिए मदद चाह रहे हैं.'
द हिंदू ने ख़बर दी थी कि रूसी सेना में सुरक्षा सहायक के तौर पर भर्ती कई भारतीयों ने घर लौटने के लिए मॉस्को में भारत के दूतावास से संपर्क किया था मगर उन्हें कोई जवाब नहीं मिला.
26 फ़रवरी को जारी बयान में मंत्रालय ने कहा, “मॉस्को में भारतीय दूतावास के ध्यान में आए ऐसे हर मामले को रूसी प्रशासन के साथ मज़बूती से उठाया गया है और जो मामले मंत्रालय के संज्ञान में आए हैं, उन्हें नई दिल्ली में रूसी दूतावास के साथ उठाया गया है. इसका नतीजा यह रहा है कि कई भारतीयों को पहले ही सेवामुक्त कर दिया गया है.”
“रूसी सेना से समय से पहले अलग होना चाह रहे भारतीय नागरिकों के मामलों को हम प्राथमिकता के साथ रूसी प्रशासन के साथ उठाने के लिए प्रतिबद्ध हैं.”
राजस्थान के शिक्षा मंत्री ने अकबर पर दिया ये बयान

इमेज स्रोत, X/madandilawar
राजस्थान के शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने मुगल बादशाह अकबर को ‘बलात्कारी’ बताते हुए कहा कि स्कूलों की किताबों में अकबर को‘महान शख़्सियत’ बताना बंद कर देना चाहिए.
हिंदुस्तान टाइम्स की ख़बर के अनुसार, मदन दिलावर ने कहा कि 'अकबर कभी महान शख़्सियत नहीं रहे, बल्कि आक्रांता और बलात्कारी थे.'
राजस्थान के शिक्षा मंत्री ने कहा, “वह मीना बाज़ार चलाया करते थे ताकि सुंदर महिलाओं को लाएं और बाद में बलात्कार करें. ऐसी शख़्सियत को महान करना बेवकूफ़ी है.”
अख़बार के अनुसार, उन्होंने ये बातें इस विषय पर चर्चा के दौरान कहीं कि क्या राज्य सरकार स्कूली किताबों में कुछ बदलाव करेगी.
मंत्री ने कहा कि वह 'कुछ बदलाव नहीं चाहते, बस अनैतिक बातों को ठीक करना चाहते हैं.'
हिंसक खालिस्तान समर्थकों पर कार्रवाई करें देश: जयशंकर

इमेज स्रोत, REUTERS
विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा है कि भारत दूसरे देशों के प्रशासन से यह उम्मीद रखता है कि हिंसक प्रदर्शनों या भारतीय दूतावासों में तोड़फोड़ जैसे मामलों में शामिल खालिस्तान समर्थकों के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाए.
हिंदुस्तान टाइम्स की ख़बर के अनुसार, जयशंकर ने कहा कि भारतीय दूतावासों और वाणिज्य दूतावासों पर स्मोक बम फेंकने जैसी गतिविधियां और एक मित्र देश के ख़िलाफ़ हिंसा और उससे अलगाव की वकालत करने को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं कहा जा सकता.
भारत ने हाल के महीनों में ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, ब्रिटेन और अमेरिका में कई जगहों पर हुई घटनाओं में कथित खालिस्तान समर्थकों की ओर से हिंसक प्रदर्शनों और भारतीय दूतावासों में तोड़फोड़ के ख़िलाफ़ कार्रवाई की अफील की थी.
हाल में लंदन में भारतीय उच्चायोग के बाहर हिंसक प्रदर्शन हुआ था और सैन फ्रैंसिस्को वाणिज्य दूतावास में आग लगाने की कोशिश हुई थी.
एस. जयशंकर ने एक मीडिया कनक्लेव में कहा, “हमारे दूतावासों पर हमला करने वाले किसी के ख़िलाफ़ अगर देश जांच नहीं करते या कार्रवाई नहीं करते तो इससे एक संदेश जाता है. मुझे नहीं लगता कि अपनी छवि को लेकर इस तरह का संदेश देना इन देशों के लिए ठीक रहेगा.”
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)












