अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक दर्जे पर क़ानूनी विवाद जानिए- प्रेस रिव्यू

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी

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भारत के चीफ़ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता में सुप्रीम कोर्ट की सात जजों की बेंच फ़िलहाल अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक दर्जे को लेकर 57 साल पुराने विवाद मामले की सुनवाई कर रही है.

अंग्रेज़ी के अख़बार द हिंदू ने इस पूरे विवाद को विस्तार से समझाते हुए एक लेख छापा है.

अख़बार लिखता है कि एक संगठन को अल्पसंख्यक दर्जा मिले इसके लिए उसका 'अल्पसंख्यक चरित्र' होना चाहिए.

संविधान के तीसरे भाग की धारा 30(1) के तहत सभी धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को देश में अपनी पसंद के शैक्षिक संस्थानों को स्थापित और संचालित करने का अधिकार दिया गया है.

इसका क्लॉज़ 2 ये सुनिश्चित करता है कि किसी शैक्षणिक संस्था के अल्पसंख्यक दर्जे के बावजूद सरकार सभी शैक्षणिक संस्थान को आर्थिक सहायता देने के मामले में, उनके साथ 'भेदभाव नहीं करेगी'. इसमें प्राइमरी स्कूलों से लेकर प्रोफ़ेशनल शिक्षा के लिए बनाई गई संस्थाएं शामिल होंगी.

इन संस्थाओं को न तो दाखिला देने के मामले में और न ही नौकरी के मामले में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी रिज़र्वेशन को लागू करना होगा.

इसके अलावा ये संस्थाएं 50 फ़ीसदी सीटें अपने समुदाय के छात्रों के लिए रिज़र्व कर सकती हैं और दूसरी संस्थाओं के मुक़ाबले कर्मचारियों पर अधिक नियंत्रण भी रख सकती हैं.

2002 के टीएमए पाई फाउंडेशन के एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि किसी संस्था के 'अल्पसंख्यक' होने का फ़ैसला उस राज्य की जनसांख्यिकी के आधार पर किया जाएगा न कि राष्ट्रीय जनसंख्या के आधार पर.

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मुसलमानों में शिक्षा की कमी को देखते हुए सुधारवादी नेता सर सैय्यद अहमद ख़ान ने 1877 में मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज (एमएओ कॉलेज) की स्थापना की थी.

एमएओ कॉलेज और मुस्लिम यूनिवर्सिटी एसोसिएशन को एएमयू में लाने के लिए द अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी एक्ट 1920 (एएमयू एक्ट) पास किया गया.

1951 में एएमयू एक्ट में संशोधन किया गया और इसमें मुसलमानों के लिए धार्मिक शिक्षा को बाध्यकारी बनाने और यूनिवर्सिटी कोर्ट में मुसलमानों के प्रतिनिधित्व के मैन्डेट को हटा दिया गया.

इस एक्ट में 1965 में एक बार फिर संशोधन किया गया और कोर्ट की शक्तियों को कार्यपालिका के साथ साथ दूसरे निकायों के बीच बाँट दिया गया, जिसमें गवर्निंग बॉडी के लिए सदस्यों के नामांकन की ज़िम्मेदारी राष्ट्रपति को दी गई.

इस विवाद की शुरुआत 1967 में हुई जब सुप्रीम कोर्ट ने एस अज़ीज़ बाशा बनाम भारत सरकार मामले में एएमयू एक्ट में 1951 और 1965 में हुए संशोधन की समीक्षा की.

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि चूंकि एएमयू की स्थापना मुसलमानों ने की है इसके कामकाज के संचालन का हक़ उनके पास होना चाहिए. लेकिन सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने संविधान में किए गए संशोधनों को बरकरार रखा.

बेंच ने कहा कि न तो अल्पसंख्यक मुसलमानों ने इसकी स्थापना की है और न ही वो इसका प्रबंधन करते हैं. कोर्ट ने कहा कि इस एक्ट को केंद्रीय क़ानून के ज़रिए लागू किया गया था.

कोर्ट के इस फ़ैसले को लेकर देशभर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए, जिसके बाद 1981 में एएमयू एक्ट में एक और संशोधन किया गया, इसमें इसके अल्पसंख्यक दर्जे पर मुहर लगाई गई.

साल 2005 में एएमयू ने स्नातकोत्तर मेडिकल सीटों में से 50 फ़ीसदी को मुसलमान छात्रों के लिए रिज़र्व किया. इसी साल डॉक्टर नरेश अग्रवाल बनाम भारत सरकार मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने रिज़र्वेशन पॉलिसी को रद्द कर दिया और कहा कि 1981 का संशोधन अधिकार क्षेत्र से बाहर था.

इसके बाद 2006 में भारत सरकार और यूनिवर्सिटी दोनों ने ही सुप्रीम कोर्ट में अपील की. लेकिन 2016 में यूनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक दर्जे को मानने से इनकार करते हुए भारत सरकार इस अपील से ख़ुद को अलग कर लिया. अब इस मामले को अकेला यूनिवर्सिटी देख रहा है.

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अदालत में किस मोड़ पर है मामला

सर्वोच्च अदालत इस मामले में दो मुद्दों पर गौर कर रहा है- किसी शिक्षण संस्था के लिए अल्पसंख्यक दर्जा तय करने का पैमाना क्या होना चाहिए और क़ानून के तहत बनाए गए किसी शिक्षण संस्था को ये दर्जा दिया जाना चाहिए.

याचिकाकर्ताओं की दलील है कि एएमयू को अल्पसंख्यक संस्था का दर्जा दिया जाना चाहिए, लेकिन भारत सरकार एस अज़ीज बाशा मामले में आए फ़ैसले के पक्ष में है.

वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन टीएमए पाई फाउंडेशन के मामले आए सुप्रीम कोर्ट के फै़सले को आधार बना कर दलील देते हैं कि एएमयू को दिए गए क़ानूनी रेगुलेशन या सरकार की तरफ से दी गई आर्थिक मदद, इस शैक्षणिक संस्थान को उसके अल्पसंख्यक चरित्र से वंचित नहीं करते.

यह तर्क दिया गया कि संविधान की धारा 30 के तहत अल्पसंख्यक समुदाय ने इसकी 'स्थापना' की और क़ानून लागू कर इसे केवल यूनिवर्सिटी के तौर पर 'शामिल' किया गया.

वहीं सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलील है कि एएमयू एक 'वफादार' संस्था है जिसने अपने हक़ ब्रितानी सरकार को दे किए और 1920 में बने क़ानून के अनुसार सेक्युलर चरित्र को अपना लिया.

हालांकि चीफ़ जस्टिस ने बीच में कहा है कि एयमयू का राजनीतिक झुकाव का असर उसके अल्पसंख्यक दर्जे पर नहीं पड़ता.

इस मामले में जो भी फै़सला होगा वो देश के सभी अल्पसंख्यक संस्थानों के अधिकारों और क़ानूनी मान्यता को प्रभावित करने वाली मिसाल बन सकता है.

मणिपुर में मैतेई समूहों ने तीन विधायकों को पीटा

आरामबाई तेन्गोल के सदस्य

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बुधवार को मणिपुर के इम्फाल में कट्टरपंथी सशस्त्र मैतेई समूह आरामबाई तेन्गोल ने तीन विधायकों को पीटा और उन्हें शपथ लेने को मजबूर किया. इन विधायकों में से दो बीजेपी के और एक कांग्रेस के हैं.

अख़बार इकोनॉमिक टाइम्स के अनुसार, ये घटना इम्फाल के कांन्गला फोर्ट इलाक़े में हुई जहां कट्टरपंथियों ने नेताओं की एक नस्लीय बैठक बुलाई थी.

अख़बार लिखता है कि अब तक इस बात का पता नहीं चल सका है कि बीते साल मई से नस्लीय हिंसा के कारण जारी तनाव के माहौल में राज्य की एन बीरेन सिंह सरकर ने एक नस्लीय बैठक होने की इजाज़त क्यों दी.

कांग्रेस के प्रवक्ता जयराम रमेश ने कांग्रेस के विधायक पर हुए हमले की निंदा की है. उन्होंने कहा कि "कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच हुई सभी पार्टियों के सांसदों, विधायकों और मंत्रियों की बैठक में कांग्रेस नेता पर हमले की हम निंदा करते हैं."

अख़बार ने लिखा है कि मैतेई समूह ने "राज्य की अखंडता की सुरक्षा" की शपथ लेने के लिए एक बैठक की अपील की थी, जिसमें 37 विधायकों के साथ-साथ दो सांसद शामिल हुए थे. इससे पहले प्रदेश में बड़ी संख्या में केंद्रीय और राज्य के अर्ध सैनिक बलों की तैनाती की गई थी.

बैठक से पहले सोमवार और मंगलवार को केंद्रीय गृह मंत्रायल की तीन सदस्यीय एक टीम में आरामबाई तेन्गोल के नेताओं से बात की थी. इस टीम में सलाहकार एके मिश्रा, ज्वायंट डायरेक्टर आईबी मनदीप सिंह तुली और ज्वायंट डायरेक्टर एसआईबी राजेश कुंबले शामिल थे.

बैठक में सभी विधायकों और सांसदों ने राज्य की रक्षा से जुड़े एक प्रस्ताव पर दस्तखत किए. अख़बार लिखता है कि मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह बैठक में मौजूद नहीं थे लेकिन उन्होंनं भी प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे.

ये बैठक मैतेई और कुकी समुदाय के लोगों के बीच शुरू हुई हिंसा के 9 महीनों के बाद कराई जा रही थी.

पाकिस्तान से आरोप को भारत ने किया ख़ारिज

शाहिद लतीफ़

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भारत ने पाकिस्तान के विदेश सचिव के उस आरोप को खारिज कर दिया है जिसमें उन्होंने कहा था कि 2023 में दो पाकिस्तानियों की जो हत्या हुई थी उसमें भारतीय एजेंसियों का हाथ था.

इंडियन एक्सप्रेस में छपी एक ख़बर के अनुसार, भारत ने इसे पाकिस्तान का प्रॉपोगैंडा करार दिया है और इसे "झूठा और ग़लत इरादे से" लगाया आरोप रहा है. ये दोनों पाकिस्तानी नागरिक भारत में आतंकवादी घोषित किए गए हैं.

इससे पहले पाकिस्तान के विदेश सचिव मोहम्मद सायरस सज्जाद काज़ी ने शाहिद लतीफ़ और मोहम्मद रियाज़ की हत्या में भारतीय एजेंसियों का हाथ होने की बात की थी. माना जाता है कि 2016 में पठानकोट में मौजूद भारतीय वायु सेना स्टेशन पर हुए हमले का मास्टरमाइंड शाहिद लतीफ़ ही था, वहीं मोहम्मद रियाज़ लश्कर-ए-तैबा से जुड़ा आतंकवादी था जिसने राजौरी के एक गांव पर हमला किया था.

इससे जवाब में भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जायसवाल ने कहा, "हमने पाकिस्तान के विदेश सचिव के बयान से जुड़ी रिपोर्टें देखी हैं. ये उसकी झूठ और दुर्भावना से प्रेरित भारत विरोधी प्रोपोगैंडा की नई कोशिश है."

जायसवाल ने कहा कि दुनिया को पता है कि पाकिस्तान आतंकवाद, संगठित अपराध और अवैध अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों का केंद्र रहा है. भारत और दूसरे देश पाकिस्तान को बार-बार चेतावनी देते रहे हैं कि वो एक दिन अपने ही बनाए आतंक के जाल में फंस जाएगा.

इससे पहले गुरुवार को पाकिस्तान के विदेश सचिव ने मीडिया से कहा था कि भारतीय एजेंटों और पिछले साल सियालकोट और रावलकोट में दो पाकिस्तानी नागरिकों की हत्या के बीच संबंधों के बारे में उनके पास "विश्वसनीय सबूत" हैं.

पेटीएम पेमेन्ट्स बैंक के फास्टैग बेचने पर रोक

टोल नाकों से जुड़े मामलों का काम देखने वाली भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) से जुड़ी इंडियन हाइवेज़ मैनेजमेन्ट कंपनी (आईएचएमसीएल) ने पेटीएम पेमेन्ट्स बैंक के नए फास्टैग बेचने पर रोक लगा दी है.

अख़बार टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपी एक ख़बर के अनुसार एजेंसी ने एक ऑडिट किया था जिसके बाद पाया कि पेटीएम पेमेन्ट्स बैंक सर्विस लेवल अग्रीमेन्ट के तहत दिए नियमों का पालन नहीं कर रहा.

पेटीएम पेमेन्ट्स बैंक के नेशनल इल्क्ट्रॉनिक टोल कलेक्शन के तहत आने वाले सभी नए टोल प्लाज़ा के लिए फास्टैग जारी करने पर भी रोक लगा दी है.

बीते शुक्रवार को बैंक के लिखी एक चिट्ठी में आईएचएमसीएल ने पेटीएम से जवाब मांगा है कि नियमों का पालन न करने के लिए क्यों उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए.

अख़बार लिखता है कि हालांकि इससे बैंक के पहले से जारी किए फास्टैग पर कोई असर नहीं पड़ेगा. पेटीएम देश के सबसे अधिक फास्टैग जारी करने वाला बैंक है.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने पेटीएम पेमेन्ट्स बैंक से इस बारे में सवाल किया था, जिसका अब तक उन्हें जवाब नहीं मिला है.

वहीं एनएचएआई अधिकारियों ने अख़बार को बताया है कि कई और एजेंसियां भी उनके रडार पर हैं और इसने ख़िलाफ़ भी आने वाले वक्त में कार्रवाई हो सकती है.

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