राहुल गांधी की 'भारत जोड़ो न्याय यात्रा': कांग्रेस और 'इंडिया' गठबंधन को कितना फ़ायदा

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- Author, दीपक मंडल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कांग्रेस नेता राहुल गांधी 'भारत जोड़ो यात्रा' के बाद आज से 'भारत जोड़ो न्याय यात्रा' शुरू करने जा रहे हैं.
पार्टी के मुताबिक़, ये यात्रा पूरब से पश्चिम यानी मणिपुर से मुंबई तक होगी. इसे कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे थौबल ज़िले में हरी झंडी दिखाकर शुरू कराएंगे.
इस यात्रा को कांग्रेस की शुरुआती पसंद राजधानी इंफाल के बजाय थौबल ज़िले से शुरू किया जाएगा. राज्य में आठ महीने पहले शुरू हुई जातीय हिंसा से थौबल भी प्रभावित रहा है.
14 जनवरी से शुरू हो रही ये यात्रा 20 मार्च तक चलेगी. यानी 2024 के लोकसभा चुनाव से थोड़े दिनों पहले तक.
राहुल गांधी की 'भारत जोड़ो' यात्रा ठीक एक साल पहले ख़त्म हुई थी. इसके तहत उन्होंने तमिलनाडु में कन्याकुमारी से लेकर कश्मीर तक की यात्रा की थी.
भारत जोड़ो न्याय यात्रा के दौरान राहुल गांधी 14 राज्यों के 85 ज़िलों से गुजरेंगे. यात्रा मणिपुर से शुरू होकर नगालैंड, असम, मेघालय, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात से गुजरते महाराष्ट्र में मुंबई पर समाप्त होगी.
इस दौरान वह 6500 किलोमीटर की दूरी तय करेंगे. जबकि 'भारत जोड़ो यात्रा' के दौरान राहुल गांधी ने 4000 किलोमीटर की यात्रा की थी.
क्या है 'भारत जोड़ो न्याय यात्रा'?

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कांग्रेस महासचिव और पार्टी के संचार प्रभारी जयराम रमेश ने कहा कि राहुल गांधी की 'भारत जोड़ो' यात्रा ने लोगों को आर्थिक असमानता, सामाजिक ध्रुवीकरण और राजनीतिक तानाशाही के प्रति जागरूक किया है.
वहीं 'भारत न्याय' यात्रा पर ज़ोर आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक न्याय पर होगा. देश में लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के प्रति लोगों को जागरूक किया जाएगा.
ऐसा माना जाता है कि 'भारत जोड़ो' यात्रा ने राहुल गांधी की राजनीतिक छवि निखारने में अहम भूमिका निभाई थी.
कई लोग मानते हैं कि शुरू में इस यात्रा को बहुत गंभीरता से नहीं लिया जा रहा था.
राहुल गांधी ने इस यात्रा में बेरोज़गारी, किसानों की दिक्क़त, अर्थव्यवस्था की धीमी रफ्तार, भ्रष्टाचार और गवर्नेंस का मुद्दा उठाया था.
'भारत जोड़ो' यात्रा से राहुल और कांग्रेस को क्या मिला?

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राहुल गांधी ने इस यात्रा के दौरान कर्नाटक और तेलंगाना में ख़ासा समय बिताया था. तेलंगाना में ये यात्रा 15 दिन चली थी. कर्नाटक में राहुल ने 22 दिन बिताए थे.
राजस्थान के छह जिलों में राहुल की भारत जोड़ो यात्रा 16 दिनों तक चली थी. मध्य प्रदेश में 12 दिनों तक ये यात्रा चली थी.
राजस्थान और मध्य प्रदेश में कांग्रेस को इस यात्रा का चुनावी फ़ायदा नहीं मिला. हालांकि कई लोग मानते हैं कि इस यात्रा से कांग्रेस के समर्थकों कैडरों का उत्साह जरूर बढ़ा.
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक शरद गुप्ता कहते हैं, "भारत जोड़ो यात्रा से कांग्रेस से ज़्यादा राहुल को फ़ायदा हुआ. इस यात्रा ने राहुल की छवि बदल दी. लोग अब उन्हें गंभीरता से लेते हैं और सुनते हैं."
वो कहते हैं, "इस लंबी यात्रा ने राहुल को काफी थका भी दिया था. इसलिए पिछली यात्रा की तरह इस बार इस यात्रा का एक बड़ा हिस्सा वाहनों से होगा. ये तीन चार महीने लंबी यात्रा नहीं होगी. और इसमें पिछली यात्राओं की कमियों से सबक लिया जाएगा."
भारत न्याय यात्रा से क्या मिलेगा?

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'द हिंदू बिजनेसलाइन' की राजनीतिक संपादक पूर्णिमा जोशी कहती हैं, "राहुल गांधी की 'भारत न्याय यात्रा' कांग्रेस और विपक्ष के दूसरे दलों के लिए भी बेहतर नतीजे दे सकती है. क्योंकि राहुल गांधी अलग तरह के राजनीतिक नेता हैं. वह एक स्टेट्समैन राजनीतिज्ञ की तरह दिखने की कोशिश कर रहे हैं. उन्होंने पार्टी पद छोड़ दिया है. वो प्रधानमंत्री बनेंगे या नहीं ये भी पता नहीं."
वो कहती हैं, "राहुल जनहित के मामलों के मुद्दे उठाते हैं और काफी मुखर होकर बोलते हैं. उद्योग घरानों के भ्रष्टाचार या प्रधानमंत्री पर वह काफी स्पष्ट बोलते हैं. ऐसा करने वाले वे अकेले विपक्षी नेता हैं."
हालांकि शरद गुप्ता कहते हैं कि 'भारत न्याय यात्रा' की चुनावी सफलता इस दौरान उठाए गए मुद्दों पर निर्भर करेगी.
वो कहते हैं, "भारत जोड़ो यात्रा के दौरान कई राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे थे लेकिन राहुल हिमाचल और गुजरात को छोड़ कर कहीं चुनाव प्रचार के लिए नहीं गए. हालांकि ये यात्रा लोकसभा चुनाव से पहले खत्म हो जाएगी और राहुल को कैंपेनिंग का पर्याप्त समय मिलेगा. लेकिन इस यात्रा का चुनावी फायदा इस बात पर निर्भर करेगा कि मुद्दे कितने स्पष्ट तरीके से उठाए जाते हैं. क्योंकि भारत यात्रा के दौरान उठाए गए मुद्दों में स्पष्टता नहीं थी."

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शरद गुप्ता कहते हैं, "भारत न्याय यात्रा के दौरान जो मुद्दे उठाए जाने हैं वो ऐसे नहीं हैं जो लोगों को बहुत भावनात्मक तौर पर छुए. भारत जोड़ो यात्रा में 'नफरत के बाजार में मोहब्बत की दुकान' नारा दिया गया था. लेकिन राहुल गांधी इस नारे को पिछले काफी समय से इस्तेमाल नहीं कर रहे हैं."
वो कहते हैं, "लालकृष्ण आडवाणी ने जब रथयात्रा की थी तो अयोध्या का राम मंदिर एक भावनात्मक मुद्दा था. उन्होंने बीजेपी को वोट देने की अपील नहीं की थी लेकिन इस मुद्दे का फायदा पार्टी को मिला. इसलिए मुद्दा काफी अहम है."
भारत न्याय यात्रा 'इंडिया' अलायंस को फायदा दिलाएगी

भारत न्याय यात्रा जिन राज्यों से गुजरेगी, वहां कांग्रेस और 'इंडिया' के सहयोगियों से सीटों का तालमेल एक बड़ी चुनौती है. जिन राज्यों में कांग्रेस और इंडिया के सहयोगी दलों में शामिल दलों के बीच सीटों का तालमेल एक बड़ा मुद्दा हैं वो हैं पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र.
अब देखने की बात होगी कि राहुल की इस यात्रा को इंडिया के सहयोगी दलों का कितना समर्थन मिलेगा. दूसरी ओर 'इंडिया' गठबंधन में शामिल सभी दल इसी यात्रा के दौरान अलग-अलग जगहों पर संयुक्त रैली करेंगे.
सवाल ये है कि कांग्रेस और इंडिया अलायंस के सहयोगी आपसी खींचतान से ऊपर उठकर इस यात्रा का अपने पक्ष में किस हद तक इस्तेमाल कर चुनावी फायदा मिल सकते हैं.
इस सवाल के जवाब में पूर्णिमा जोशी कहती हैं, "राजनीतिक दलों को जनसंपर्क अभियानों का फायदा मिलता है. कांग्रेस को भी मिलेगा. लेकिन विपक्ष के पास न तो कोई लीडरशिप है और न कोई राजनीतिक कार्यक्रम. यहां तक इनके बीच सीटों के तालमेल को लेकर भी कोई खास संजीदगी नहीं दिखती, जबकि बीजेपी के पास ये सभी चीजें हैं. ऐसे में न्याय यात्रा का फायदा बहुत ज्यादा होगा कहा नहीं जा सकता."
कांग्रेस कहां चूक रही है?

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विश्लेषकों का कहना है कि विपक्ष का काम है सरकार की खामियों को गिनाना और गवर्नेंस का एक वैकल्पिक मॉडल देना. कांग्रेस थोड़ी-बहुत खामियां तो गिना देती है लेकिन वैकल्पिक मॉडल नहीं दे पा रही है.
शरद गुप्ता कहते हैं, "कांग्रेस ने नरेंद्र मोदी के पीएम किसान योजना के छह हजार रुपये के बदले सालाना 72 हजार रुपये देने का वादा किया. लेकिन लोगों को इस पर विश्वास नहीं हुआ. इसलिए यहां विश्वसनीयता का भी संकट का भी मामला है."
वो कहते हैं, "कांग्रेस बीजेपी के प्रचार का मुकाबला नहीं कर पा रही है. जैसे मनरेगा, आधार जैसे कांग्रेस के चलाए गए कार्यक्रम को भी लोग ये मानने लगे हैं कि ये मोदी जी ने चलाए हैं. इसके अलावा कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों को पिछले दस साल से ये सोचते आ रहे हैं कि लोग मोदी सरकार से जब नाराज होंगे तो एक दिन हमारे पास आएंगे."
शरद गुप्ता ये भी कहते हैं कि राहुल गांधी जिस तरह से आज मेहनत कर रहे हैं उसी तरह दस साल पहले शुरू किया होता तो शायद 2019 की तस्वीर कुछ और रहती.
उनके मुताबिक़ विपक्ष 'एक्टिव कैंपेनिंग के बदले 'पैसिव फेवरिज्म' चाहता है. राजनीति में जब तक पार्टियां सक्रिय नहीं होंगी और अपना कार्यक्रम और काम लेकर लोगों के पास नहीं जाएंगी तब तक मतदाता उनके पीछे नहीं आएंगे.
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