राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा से महात्मा गांधी और चंद्रशेखर की लीग में खड़े हो पाएंगे?

चंद्रशेखर

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    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

"मैं ना तो शंकराचार्य बनने चला हूं और ना ही विनोबा भावे. ये यात्रा निश्चित तौर पर राजनीतिक है. लेकिन मैं इसे पारंपरिक राजनीति से भिन्न रखना चाहता हूं. मैं चाहता हूं कि अब उन लोगों को एक जगह होना चाहिए जो साधारण नागरिक के पक्ष में सामाजिक परिवर्तन चाहते हैं. इसलिए पदयात्रा शुरू करने से पहले मैंने लिखित वक्तव्य जारी किया. सभी दलों के राजनीतिज्ञों से सम्पर्क किया. मैं चाहता कि मेरी पदयात्रा किसी पार्टी तक सीमित ना रहे."

भारत के आठवें प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने 1983 में अपनी पदयात्रा के बारे में ये बात वरिष्ठ पत्रकार उदयन शर्मा के साथ बातचीत में कही थी.

उदयन शर्मा ने महाराष्ट्र में चंद्रशेखर की यात्रा को चार दिन तक लगातार कवर किया था.

यूं तो चंद्रशेखर 1962 में पहली बार राज्यसभा पहुँचे थे. जिस समय उन्होंने पदयात्रा का एलान किया, वो एक राजनीतिक पार्टी के अध्यक्ष थे.

उस वक़्त उनकी इस यात्रा का मज़ाक भी उड़ाया गया था, जिसमें उनके पार्टी के कई लोग भी शामिल थे.

उन पर आरोप भी लगा कि वो पार्टी से ऊपर अपनी छवि बनाना चाहते हैं. कुछ ने कहा कि जनता पार्टी से ज़्यादा महत्व ख़ुद को देते हैं. लेकिन जो बात वो अपनी पार्टी के दूसरे नेताओं को न समझा पाए, उसे समझाने के लिए भारत में पदयात्रा के लिए निकल पड़े. पानी, कुपोषण, स्वास्थ्य जैसे जिन पांच मुद्दों को लेकर उन्होंने यात्रा शुरू की थी, वो आज भी भारत में अहम राजनीतिक है.

एक तथ्य ये भी है कि उनकी इस राजनीतिक यात्रा के सात साल बाद 1990 में वो कुछ महीने के लिए भारत के प्रधानमंत्री भी बने. लेकिन उनकी पदयात्रा का हासिल क्या रहा और पीएम बनने में उसका कितना योगदान रहा- इस पर जितने मुँह उतनी बातें आज भी होती है.

उनका तर्क था कि भारत की 90 करोड़ (1983) आबादी में 17 करोड़ जीवन भर पदयात्री ही हैं, जिन्हें साइकिल, बस तक नसीब नहीं होता.

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चंद्रशेखर की यात्रा का स्मरण आज क्यों? अगर रिपोर्ट पढ़ते ही आपके जेहन में ये ख़्याल आ रहा है तो उसका जवाब भी पढ़ लीजिए.

भारत को कदमों से नापने की एक कवायद 21वीं सदी में भी शुरू होने जा रही है. कांग्रेस ने कन्याकुमारी से कश्मीर तक की 'भारत जोड़ो' पदयात्रा का एलान किया है, जिसे 7 सितंबर को उनके नेता राहुल गांधी शुरू करेंगे.

इस वजह से भारत में पुरानी पदयात्राओं का इतिहास एक बार फिर खंगाला जा रहा है.

भारतवासियों की यादों में पड़ी इस धूल को साफ़ करने की एक कोशिश इस रिपोर्ट में की गई है.

उससे पहले कांग्रेस की इस यात्रा के कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं पर ग़ौर फरमाए.

भारत जोड़ो

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भारत जोड़ो यात्रा

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कांग्रेस के उदयपुर सम्मेलन में 'भारत जोड़ो' यात्रा शुरू करने का प्रस्ताव पास हुआ था. तय हुआ है कि इस यात्रा का नेतृत्व राहुल गांधी करेंगे. 7 सितंबर 2022 को शाम 5 बजे ये यात्रा कन्याकुमारी से शुरू होगी और 150 दिन बाद कश्मीर जाकर ख़त्म होगी.

मिले क़दम, जुड़े वतन - भारत जोड़ो यात्रा की टैगलाइन है.

इस पदयात्रा के ज़रिए 3570 किलोमीटर का सफ़र तय करने का कार्यक्रम बनाया गया है.

जहां सुबह तीन घंटे और शाम को तीन घंटे में हर रोज़ 20 किलोमीटर पैदल कवर करने का कार्यक्रम है.

ये यात्रा 12 राज्यों और 2 केंद्र शासित प्रदेश से होकर गुजरेगी.

इस यात्रा में तीन तरह के पदयात्री शामिल होंगे.

100 भारत यात्री जो यात्रा में शुरुआत से अंत तक रहेंगे. राहुल गांधी भी पदयात्रा में भारत यात्री के तौर पर शामिल होंगे.

100 अतिथि यात्री जो उन राज्यों से होंगे, जहां से ये यात्रा नहीं गुज़र रही है.

100 प्रदेश यात्री, उन प्रदेशों से होंगे जहां से यात्रा गुज़र रही होगी.

इस तरह से एक समय में कुल 300 पदयात्री इस पदयात्रा में शामिल होंगे.

इन यात्रियों के रुकने के लिए अलग तरह के कंटेनर की व्यवस्था की गई है, जिसमें सोने, खाने और टॉयलेट की व्यवस्था होगी.

भारत जोड़ो लोगो

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भारत जोड़ो की ज़रूरत क्यों?

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इस पदयात्रा की ज़रूरत पर बात करते हुए कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि ये यात्रा भारत में फैली आर्थिक असमानता, सामाजिक ध्रुवीकरण और राजनीतिक तनाव के ख़िलाफ़ भारत को जोड़ने का एक प्रयास है.

उन्होंने इन तीनों मुद्दों को विस्तार से समझाते हुए ये भी कहा, "भारत में आर्थिक असमानता महंगाई, बेरोज़गारी, जीएसटी की वजह से हैं. सामाजिक ध्रुवीकरण जाति, धर्म, भाषा, खाना, पहनावा के नाम पर हो रहा है. राजनीतिक तनाव के लिए राज्यों और केंद्र के बीच बढ़ती खाई ज़िम्मेदार है जो जाँच एजेंसियों के ग़लत इस्तेमाल से और बढ़ती जा रही है."

हालांकि कांग्रेस की पदयात्रा के कई राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं.

कांग्रेस ये यात्रा तब निकाल रही है जब केवल दो राज्यों में उनकी सरकार और दो राज्यों में गठबंधन सरकार बची है.

2014 से 2022 तक 49 लोकसभा और विधानसभा चुनाव हुए हैं, जिनमें से 39 कांग्रेस हारी है.

एक सच्चाई ये भी है कि कांग्रेस का अगला अध्यक्ष कौन?- इस बारे में फिलहाल सुगबुगाहट तेज़ है.

जिस सितंबर माह में इस पदयात्रा की शुरुआत हो रही है, वही महीना अध्यक्ष पद के चुनाव के कार्यक्रम तय करने के लिए पहले मुकर्रर किया गया था.

इसके अलावा 2024 में होने वाले लोकसभा के चुनाव में पीएम मोदी के सामने विपक्ष का नेतृत्व कौन करेगा- इसके बारे में विपक्षी नेताओं की तरफ़ से रोज़ नए नाम उछाले जा रहे हैं.

साथ ही विपक्ष की एकता में बिखराव की खबरें भी अलग अलग तरीक़े से हर हफ़्ते सामने आती ही रहती है.

इस वजह से राहुल गांधी की इस पदयात्रा को लेकर विपक्ष और सत्तापक्ष की नज़रें भी टिकीं होंगी ही. कांग्रेस को भी इस बात का अहसास है.

शायद इस वजह से कांग्रेस इस यात्रा में अपनी पार्टी का झंडा नहीं बल्कि तिरंगा लेकर चलेगी. पदयात्रा में लोहियावादी, वामपंथी, समाजवादी संगठनों, कांग्रेस आलोचकों और सिविल सोसाइटी को जुड़ने के लिए आमंत्रण भेजा है.

बाक़ी राजनीतिक पार्टियों के जुड़ने का विकल्प भी खुला रखा है. जैसा कि चंद्रशेखर ने अपनी पदयात्रा के दौरान किया था.

ग़ौरतलब है कि राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के दौरान ही कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव भी होगा और संसद का सत्र भी चलेगा.

ऐसे में राहुल गांधी भारत यात्री होते हुए चुनाव प्रचार और संसद के कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे? ये देखना दिलचस्प होगा.

इन तमाम वजहों से कांग्रेस की इस पदयात्रा को राजनीतिक चश्मे से देखा जा रहा है.

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भारत में पदयात्राओं का संक्षिप्त इतिहास

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राहुल की पदयात्रा का ज़िक्र आते ही गांधी, चंद्रशेखर, विनोबा भावे की पदयात्रा की याद ख़ुद-ब-ख़ुद चली आती है.

वैसे तो 20वीं और 21वीं सदी के पहले से भी पदयात्राओं का इतिहास रहा है.

शंकराचार्य से पहले गौतम बुद्ध और बाद में गुरु नानक और महात्मा गांधी ने इस तरह की पदयात्रा की थी.

आज़ाद भारत में इस तरह की यात्रा आचार्य विनोबा भावे (1951), पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर (1983), वाईएसआर (2003) चंद्रबाबू नायडू (2013) दिग्विजय सिंह की (2017) नर्मदा यात्रा शामिल है. कुछ इतिहासकार इसमें बाबा आमटे की यात्रा को भी जोड़ते हैं.

इन पदयात्राओं को इतिहासकार अलग अलग खांचे में बांटते हैं. गौतम बुद्ध, गुरु नानक, विनोबा भावे की यात्राओं को महात्मा गांधी, पूर्व पीएम चंद्रशेखर, वाईएसआर, चंद्रबाबू नायडू, दिग्विजय सिंह की राजनीतिक पदयात्राओं से अलग करार देते हैं.

एक आधार ये दिया जाता है कि राजनीति से जुड़ा शख़्स अगर ऐसी यात्रा निकालता है तो वो पदयात्रा राजनीतिक ही है.

इस लिहाज़ से राहुल गांधी की पदयात्रा भी राजनीतिक ही है.

ऐसे में एक सवाल ये भी उठता है कि क्या राहुल इस तरह की यात्रा के साथ ख़ुद को गांधी, चंद्रशेखर, विनोबा भावे की लीग में खड़े करना चाहते हैं? बाक़ी दूसरी राजनीतिक पदयात्राएं हाल की है.

इस सवाल के लिए किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले ज़रूरी है कि पुरानी यात्राओं का 'उद्देश्य और उनके हासिल' पर चर्चा की जाए.

दांडी यात्रा

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गांधी का दांडी मार्च

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भारत की आज़ादी से पहले महात्मा गांधी ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ छोटी लेकिन दमदार पदयात्रा निकाली थी. महात्मा गांधी को पूरे भारत में दांडी यात्रा ने मशहूर किया और अंग्रेजों के ख़िलाफ़ लड़ाई का भारतीय चेहरा बना दिया.

उस समय भारत में एक मन यानी 40 किलो नमक की क़ीमत 10 पैसे हुआ करती थी. उस पर सरकार ने बीस आने (क़ीमत का साढ़े 12 गुना) कर लगा दिया.

गांधी ने अहमदाबाद से 241 किलोमीटर दूर दांडी जाकर नमक क़ानून तोड़ने का फ़ैसला किया.

उन्होंने अपने साथ जाने के लिए 79 कार्यकर्ताओं का चयन किया. उसमें ख़ुद महात्मा गांधी भी शामिल थे. उस वक़्त उनकी उम्र 61 साल थी. रोज़ाना वो 24 किलोमीटर चलते थे. हालांकि उनके लिए घोड़े का इंतजाम भी था, लेकिन उस पर गांधी जी एक दिन भी नहीं बैठे. उनके पैरों में चलने की वजह से छाले भी पड़ गए.

राहुल के मुकाबले महात्मा गांधी की यात्रा छोटी ज़रूर थी, लेकिन दांडी मार्च ने पदयात्राओं के लिए सफ़लता की बड़ी गहरी लकीर खींची है.

राहुल गांधी 52 साल के हैं. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक वो एक दिन में 20 किलोमीटर की दूरी तय करेंगे. उनके साथ 300 सहयात्री भी होंगे.

गांधी की यात्रा के उद्देश्य पर बीबीसी से बात करते हुए गांधीवादी लेखक कुमार प्रशांत कहते हैं, "गांधी की दांडी यात्रा के दो महत्वपूर्ण उद्देश्य थे. पहला शिथिल पड़ी कांग्रेस में एक नई जान फूंकना और दूसरा नमक पर कर लगा कर जो लूट चल रही है उसे वापस करवाना."

कुमार प्रशांत कहते हैं, "इन उद्देश्यों पर गांधी के दांडी मार्च को परखें तो भारत के इतिहास में कोई दूसरी पदयात्रा हो ही नहीं सकती. 241 किलोमीटर की यात्रा 25 दिन तक चली. इस आंदोलन में ना सिर्फ़ नमक क़ानून तोड़ा गया, बल्कि देशभर में आंदोलन की नई अलख जगाई. इस पदयात्रा में शामिल हर यात्री को उन्होंने ख़ुद चुना, एक लिस्ट बनाई. सभी राज्यों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया. महिलाओं को जानबूझ कर इससे दूर रखा गया, जिन्हें शराबबंदी के लिए काम सौंपा गया."

वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय कहते हैं कि कांग्रेस के बड़े नेता गांधी की इस यात्रा के ख़िलाफ़ थे. बावजूद इसके गांधी की दांडी यात्रा ने भारतीयों के अंदर स्वतंत्रता के लिए नया संकल्प पैदा किया.

इस लिहाज़ से देखें तो राहुल गांधी की भारत जोड़ो पदयात्रा कुछ हद तक महात्मा गांधी की यात्रा से प्रभावित नज़र आती है.

यात्रा के दौरान उनके पास भी ट्रक पर लदे कंटेनर होंगे लेकिन वो केवल आराम करने के लिए होंगे.

उन्होंने भी 100 भारत यात्री चुने हैं जो पूरी यात्रा में उनके साथ होंगे.

भले ही यात्रा का उद्देश्य कांग्रेस वाले भारत को जोड़ने का बता रहे हैं, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो कांग्रेस आज भी वैसी ही शिथिल पड़ी है. इस यात्रा से एक उम्मीद जगी है कि वो कांग्रेस में जान फूंक पाएं.

चंद्रशेखर की बुकलॉन्च पर पीएम मोदी और हरिवंश

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चंद्रशेखर की भारत यात्रा

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आज़ाद भारत में गांधी की तरह की एक पदयात्रा पूर्व पीएम चंद्रशेखर ने भी निकाली थी, जो यात्रा के वक़्त अपनी पार्टी के अध्यक्ष थे.

6 जनवरी 1983 को उन्होंने यात्रा शुरू की थी, 25 जून को दिल्ली में ख़त्म हुई. इस दौरान चंद्रशेखर रोज़ 45 किलोमीटर रोज़ पैदल चलते थे. इस दौरान कुल 4200 किलोमीटर की पैदल यात्रा थी.

उनकी यात्रा के पाँच अहम उद्देश्य थे. पीने का पानी, कुपोषण से मुक्ति, हर बच्चे की पढ़ाई, हर इंसान को स्वास्थ्य का अधिकार और सामाजिक सद्भाव.

पदयात्रा के जुड़ी तमाम बाते चंद्रशेखर ने अपनी जीवनी में लिखी है.

एक ज़माने में चंद्रशेखर के सूचना सलाहकार रहे और इस वक़्त राज्यसभा के उप-सभापति हरिवंश ने बीबीसी से बातचीत में चंद्रशेखर की यात्रा पर विस्तार से बात की.

उन्होंने चंद्रशेखर पर किताब : चंद्रशेखर-द लास्‍ट आइकन ऑफ़ आइडियोलॉजिकल पॉलिटिक्‍स भी लिखी है और उनके करीबी भी माने जाते हैं.

"चंद्रशेखर ने यात्रा शुरू की तो उनका मन उस समय पार्टी में चल रहे राजनीतिक विवाद से खिन्न था. उन दिनों पार्टी के अंदर आपसी झगड़े रोज़ाना की बात थी, जिसे लेकर पार्टी के बाहर वो कुछ बोल भी नहीं सकते थे. इस बात की उन्हें घुटन थी, वो सबकुछ छोड़ कर इससे निकलना चाहते थे. ये विचार जब चंद्रशेखर के मन में आया तो पहले उन्होंने अपनी पार्टी के दो नेताओं को दक्षिण भारत भेजा. नेताओं ने वापस आकर कहा कि भारत यात्रा का विचार कष्टकारी और निरर्थक है. फिर उनके पास दो युवा आए जो सामाजिक बदलाव के लिए काम करना चाहते थे. जब यात्रा शुरू की तो उन्होंने साफ़ कह दिया था कि ये पार्टी का कार्यक्रम नहीं है. केरल के पार्टी नेताओं ने उनकी मदद भी नहीं की थी."

चंद्रशेखर की किताब के आधार पर हरिवंश ने ये बातें बीबीसी से साझा की.

चंद्रशेखर ने अपनी किताब में आगे लिखा, "उस पदयात्रा के बाद विपक्ष की राजनीति में फँसना मेरी भूल थी. इस यात्रा के तुरंत बाद मुझे भारत यात्रा का दूसरा चरण शुरू करना था जो मैं नहीं कर सका. जनजागरण का इसके बाद प्रयास होता तो यात्रा के दूरगामी परिणाम होते. लेकिन वो नहीं हो सकता."

यानी चंद्रशेखर ख़ुद इस यात्रा को सफल करार नहीं देते थे.

हरिवंश कहते हैं, "चंद्रशेखर ने इस यात्रा की शुरुआत 3500 रुपये से किया था. रास्ते में रहने खाने का ख़र्च भी यात्रा में शामिल लोग ही उठाते थे गांव के लोग उठाते, किसी से उन्होंने लिया नहीं. दिल्ली आते आते साढ़े सात लाख रुपये बच गए थे. जिस पैसे से उन्होंने भारत यात्रा केंद्र पूरे देश में बनाए. उनके परिवार का कोई सदस्य भारत यात्रा केंद्र का सदस्य नहीं रहा."

हरिवंश के मुताबिक़ राजनीतिक चेतना जगाने के नज़रिए से देखें तो चंद्रशेखर की पदयात्रा सफल रही. भारत यात्रा केंद्रों को चंद्रशेखर की पदयात्रा का वो सबसे बड़ा हासिल बताते हैं. देश के जिन इलाकों से उनकी पदयात्रा गुज़री वहां व्यापक जनसमर्थन उन्हें मिला. लेकिन दिल्ली में राजनीति सत्ता की चलती है, इसलिए दिल्ली में चंद्रशेखर की यात्रा जब समापन के दौर में पहुँची तो रेस्पॉन्स वैसा नहीं रहा, जैसा अपेक्षित था.

उनकी पदयात्रा के समापन के बाद अगले दिन चंद्रशेखर रामलीला मैदान पहुँचे.

वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय भी वहां ये देखने पहुँचे कि दिल्ली उनका कैसे स्वागत कर रही है.

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अपने उस अनुभव को बीबीसी से साझा करते हुए उन्होंने कहा, " उस दिन रामलीला मैदान में कितने यात्री और सहयात्री थे उससे केवल 100-200 अतिरिक्त लोग ही वहां पहुँचे थे. मैं ये देख कर काफी निराश हुआ. मैं फिर उनका भाषण सुनने के लिए रुका भी नहीं."

रामलीला मैदान हमेशा बड़ी सभाओं के लिए जाना जाता है.

बाद में एक गांधीवादी विचारक धर्मपाल से रामबहादुर राय ने पूछा, "दिल्ली वालों ने चंद्रशेखर की इतनी निर्मम उपेक्षा क्यों की?"

धर्मपाल ने राम बहादुर राय को जवाब में कहा, "भारत में पदयात्रा 5 हजार किलोमीटर की करें या 100 किलोमीटर की करें - ये कभी वीरता का काम नहीं माना जाता. वीर भाव समाज में पैदा नहीं होता. इसलिए ऐसे लोगों का अभिनंदन भी नहीं होता."

राम बहादुर राय का कहना है चंद्रशेखर की पदयात्रा का हासिल एक ही है- जो पाँच मुद्दे उन्होंने उस वक़्त उठाए वो आज भी अहम हैं. पीएम मोदी ने इस बार लाल किले से जो संकल्प दोहराए हैं- उसमें भी चंद्रशेखर के मुद्दे झांक रहे हैं.

राहुल गांधी

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गांधी और चंद्रशेखर की लीग में शामिल हो पाएंगे?

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चंद्रशेखर की यात्रा के बाद भी और पहले भी कई पदयात्राएं भारत में और हुईं.

लेकिन महात्मा गांधी की तरह की क्रांति किसी पदयात्रा से दोबारा पैदा नहीं हुई.

फिर राहुल गांधी की यात्रा से कितनी उम्मीदें बांधी जा सकती है?

इस सवाल पर गांधीवादी विचारक कुमार प्रशांत कहते हैं, "राहुल गांधी की इस यात्रा की तुलना इतिहास में किसी पदयात्रा से की जा सकती है, तो वो चंद्रशेखर की पदयात्रा है. वो भी इस मायने में कि अगर कांग्रेस के मन में इस यात्रा को इवेंट बनाने का सपना है तो वैसा ही इवेंट चंद्रशेखर की पद यात्रा भी था, जिसका की उद्देश्य नहीं था. लेकिन मैं व्यक्तिगत तौर पर चाहता हूं कि इस वक़्त भारत जिस संकट काल से गुजर रहा है, उसमें ये सफल यात्रा सफल हो."

राजनीतिक पदयात्राओं की सफलता पर राम बहादुर राय कहते हैं, "नेता के तौर पर आपने समाज के लिए क्या किया है या आपके बारे में लोग क्या सोचते हैं, उससे यात्रा का प्रभाव निर्धारित होता है. राहुल गांधी की पदयात्रा कोई यात्रा नहीं है. ये एक राजनीतिक कार्यक्रम है."

कई राजनीतिक जानकार इस बात यात्रा में राहुल कितने दिन शामिल होंगे इस पर भी शक जाहिर कर रहे हैं.

कांग्रेस के बड़े नेता रहे गुलाम नबी आज़ाद ने भी शुक्रवार को राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा पर कटाक्ष करते हुए पाँच पन्ने के अपने इस्तीफे में लिखा कि फिलहाल पार्टी नेतृत्व को 'भारत जोड़ो' की जगह 'कांग्रेस जोड़ो' यात्रा शुरू करने की ज़रूरत है.

चंद्रशेखर ने जिस तरह से पार्टी की अंदरूनी राजनीति से परेशान होकर अपनी पदयात्रा का प्लान बनाया था, जिस तरह से गांधी ने शिथिल पड़ी कांग्रेस में स्फूर्ति लाने की कोशिश में दांडी मार्च की शुरुआत की थी - कांग्रेस भी आज उसी दोराहे पर खड़ी है. इतिहास के दोनों पदयात्राओं की वजहें आज की कांग्रेस को परेशान कर रही हैं.

लेकिन ये यात्रा आज के संदर्भ में यात्रा होगी या इवेंट - इस पर सत्ता पक्ष, विपक्ष और कांग्रेस के कार्यकर्ताओं की नजरें टिकीं हैं.

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