राजस्थान,छत्तीसगढ़ में बीजेपी से पिछड़ी कांग्रेस, क्या लोकसभा चुनाव में भरपाई कर पाएगी?

राहुल गांधी और मोदी

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    • Author, मानसी दाश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

हाल ही में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव संपन्न हुए, जिनमें तीन राज्यों में बीजेपी ने, एक में कांग्रेस ने और एक में ज़ोरम पीपल्स मूवमेन्ट ने जीत हासिल की.

जहां कांग्रेस शासित छत्तीसगढ़ और राजस्थान में बीजेपी ने बहुमत हासिल किया वहीं मध्य प्रदेश में उसने अपनी पकड़ को और पुख्ता किया है.

कांग्रेस नेता पी चिदंबरम ने रविवार को एक अख़बार में लेख लिखकर कहा है कि चार राज्यों में (राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना) कांग्रेस का वोट शेयर 40 फ़ीसदी रहा है. ये लगभग उतना ही है जितना 2018 में था.

उनका कहना है कि मध्य प्रदेश को छोड़ दिया जाए तो बाकी दो हिंदी भाषी राज्यों (राजस्थान और छत्तीसगढ़) में बीजेपी और कांग्रेस के बीच वोट शेयर में फर्क कम है, जिसे कोशिश की जाए तो भरा जा सकता है.

पी. चिदंबरम मानते हैं कि फिलहाल हवा बीजेपी के पक्ष में है, लेकिन कुछ महीनों बाद होने वाले लोकसभा चुनावों तक इस फर्क को पाट पाना मुश्किल नहीं है.

हालांकि वो कहते हैं कि इसके लिए ये समझना होगा कि अब चुनाव की प्रकृति बदल चुकी है और इसके लिए वक्त, ताकत और संसाधन झोंकने की ज़रूरत है.

यानी विधानसभा चुनावों का पैटर्न अगर लोकसभा चुनावों में भी दोहराया गया और तब कांग्रेस ने इसमें सुधार की कोशिश की तो हो सकता है कि अगले आम चुनावों में उसकी स्थिति बेहतर हो.

लेकिन सवाल ये है कि बीते चुनावों में देखा गया था कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों में मुद्दे और वोटिंग पैटर्न अलग होते हैं.

ऐसे में क्या वाकई कांग्रेस लोकसभा चुनावों में बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती बन कर उभर पाएगी?

ख़ासकर तब जब बीते चुनावों में ऐसा नहीं देखा गया. और क्या वाकई दो से तीन महीनों के भीतर कांग्रेस के लिए इस फर्क को पाट पाना आसान है?

छत्तीसगढ़, राजस्थान में क्या हालात रहे?

अशोक गहलोत

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पी चिदंबरम ने मध्य प्रदेश में बीजेपी की जीत के कारण गिनाए हैं और कहा है कि ये हिंदुत्व की प्रयोगशाला है और यहां बीजेपी की पैठ गहरी है.

यहां बीजेपी को हराने के लिए कांग्रेस को संगठन के स्तर पर काफी मशक्कत करनी थी जो हो नहीं पाया और बीजेपी ने यहां केंद्रीय मंत्रियों और सांसदों को उतारकर बड़ा दांव खेला. बीजेपी को अपने निवेश का नतीजा भी मिला.

उन्होंने छत्तीसगढ़ के बारे में लिखा कि यहां के नतीजोंं ने उन्हें भी चौंका दिया. यहां कांग्रेस का वोट शेयर घटा और उसने आदिवासी बहुल सीटें खो दीं, जो बीजेपी के पक्ष में गया.

वहीं राजस्थान में एंटी इनकम्बेंसी ने काम किया और राजस्थान के लोगों ने एक बार फिर ‘केवल पांच साल के लिए सरकार‘ वाला पैटर्न दोहराया.

विधानसभा और लोकसभा चुनावों में मत प्रतिशत

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चुनाव आयोग के मुताबिक़ छत्तीसगढ़ में कुल 90 विधानसभा सीटों में बीजेपी को 54 और कांग्रेस को 35 सीटों पर जीत मिली. बीते चुनावों के मुक़ाबले बीजेपी का प्रदर्शन यहां बेहतर रहा क्योंकि उसके वोट शेयर में भी 33.0 फ़ीसदी से 46.27 फ़ीसदी तक की बढ़ोतरी हुई.

वहीं यहां कांग्रेस का वोट शेयर थोड़ा घटा. जहां 2018 में उसका वोट प्रतिशत 43.0 फ़ीसदी था, 2023 में 42.23 फ़ीसदी तक आ गया.

राजस्थान में बीजेपी को 199 में से 115 सीटें मिलीं. कांग्रेस, जो बीते चुनावों में 100 सीटें ला सकी थी, उसे 69 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा.

यहां भी बीजेपी के वोट शेयर में अच्छी बढ़त देखी जा सकती है (2018 में 38.77 फ़ीसदी से इस साल 41.69 फ़ीसदी), लेकिन कांग्रेस की बात करें तो ये बढ़त मामूली दिखती है (2018 में 39.30 फ़ीसदी से 2023 में 39.53 फ़ीसदी).

मध्य प्रदेश की स्थिति भी राजस्थान जैसी दिखती है. वोट शेयर के मामले में बीजेपी 2018 में 41.02 फ़ीसदी से बढ़कर 2023 में 48.55 फ़ीसदी तक पहुंची, वहीं कांग्रेस के वोट शेयर में मामूली गिरावट (2018 में 40.89 फ़ीसदी से 2023 में 40.40 फ़ीसदी) देखने को मिली.

रही बात तेलंगाना की तो, वहां तेलंगाना राष्ट्र समिति से भारत राष्ट्र समिति बनी के. चंद्रशेखर राव की पार्टी, जो बीते चुनावों में कुल 119 में से 88 सीटों पर काबिज़ थी, मात्र 39 पर सिमट गई.

वोट शेयर

लेकिन अगर लोकसभा चुनावों की बात करें तो छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश की अधिकतर सीटों पर बीते दो बार से बीजेपी ही काबिज़ रही है.

मध्य प्रदेश के हिन्दुत्व का गढ़ होने और वहां आरएसएस का अधिक प्रभाव रहने की बात समझी जा सकती है, लेकिन 11 लोकसभा सीटों वाले छत्तीसगढ़ और 25 लोकसभा सीटों वाले राजस्थान में भी बीते दो बार से बीजेपी का ही बोलबाला रहा है.

क्या कहते हैं जानकार?

समाजशास्त्री और स्वराज इंडिया पार्टी के नेता योगेन्द्र यादव पी चिदम्बरम की दलील से सहमत दिखते हैं.

वो लिखते हैं कि कुल 12.29 करोड़ वोटों में से 4.82 करोड़ वोट बीजेपी के खाते में पड़े और 4.92 करोड़ कांग्रेस के खाते में गए (इंडिया गठबंधन के मत प्रतिशत को देखें को 5.06 करोड़). मध्य प्रदेश को छोड़ दें तो दोनों पार्टियों में वोट मार्जिन अधिक नहीं है.

उनका आकलन है कि आगामी लोकसभा चुनावों में अगर ये आंकड़े इसी तरह रहे तो बात अलग हो सकती है.

हालांकि उनका ये भी कहना है कि चार राज्यों में तीन-एक की जीत को इस तरह पेश किया जा रहा है जैसे कांग्रेस के लिए ये बड़ा धक्का है, ये एक प्रोपेगैंडा है.

बीजेपी तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों में जीत को एक हैट्रिक की तरह पेश कर रही है और जताने की कोशिश कर रही है कि लोकसभा चुनावों में भी इन राज्यों में वो फिर हैट्रिक मनाएगी.

हालांकि वरिष्ठ पत्रकारशिवसुंदर ने 'द वायर' में लिखे एक लेख में योगेन्द्र यादव की इस दलील का खंडन किया है. उनका कहना है कि आंकड़ों की गणना के अनुसार ये सही हो सकता है लेकिन राजनीतिक तौर पर ये ग़लत है.

वो कहते हैं कि बीते चुनावों में बीजेपी को इन तीन हिंदी भाषी राज्यों में 3.41 करोड़ वोट मिले, वहीं कांग्रेस को 3.57 करोड़ वोट मिले. लेकिन अगर ये देखें कि किसका मत प्रतिशत कितना बढ़ा तो हम पाएंगे कि जहां बीजेपी ने एक करोड़ और मत जोड़े, वहीं कांग्रेस ने केवल 47 लाख वोट जोड़े.

वो राजस्थान का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि 2018 विधानसभा चुनावों में राजस्थान में कांग्रेस को अधिक सीटें मिलीं, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनावों में एक भी सीट कांग्रेस नहीं जीत पाई.

वहीं छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को 2018 के विधानसभा चुनावों में 10 फ़ीसदी अधिक वोट मिले थे, लेकिन लोकसभा चुनावों में वो केवल दो सीटें ही अपने नाम कर पाई.

लोकसभा चुनाव

वहीं वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा लोकसभा चुनावों में बीजेपी का वोट शेयर लगातार बढ़ता रहा है (2009 में 18.8 फ़ीसदी, 2014 में 31 फ़ीसदी और 2019 में 37.70 फ़ीसदी).

वहीं कांग्रेस का वोट शेयर कम हुआ है (2009 में 28.5 फ़ीसदी, 2014 में 19.3 फ़ीसदी और 2019 में 19.07 फ़ीसदी). और अब लगभग 19 फ़ीसदी पर रुक गया है.

वो लिखते हैं कि "2019 के लोकसभा चुनावों में 17 राज्यों में कांग्रेस को कोई सीट नहीं मिली, कमल खिल रहा है और पंजा धूमिल पड़ रहा है."

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जन सुराज पार्टी के प्रमुख प्रशांत किशोर जो चुनाव रणनीतिकार भी रहे हैं, कहते हैं कि भाजपा को वोट मिलने के चार कारण हैं.

एक टेलीविज़न चैनल से बात करते हुए उन्होंने इसके बारे में विस्तार से समझाया. उन्होंने कहा, "पहला तो ये कि एक बड़ा वर्ग भाजपा वाले हिंदुत्व की विचारधारा में यकीन करता है; दूसरा नव राष्ट्रवाद की जिस भावना को बीजेपी बढ़ावा देती है उसे कई लोग पसंद करते हैं; तीसरा, पार्टी दावा करती है कि लाभार्थी को उसकी सरकार से सीधे फायदा मिलता है, और चौथा ये कि, उसके पास संगठन की अपनी ताक़त है जो वो अपने उम्मीदवारों के पीछे लगाती है."

उनका कहना था "इनमें से कम से कम तीन मामलों में अगर बेहतर कोशिश नहीं होगी तो, किसी पार्टी के लिए भाजपा से टक्कर लेना मुश्किल होगा."

'फर्क छोटा ज़रूर दिखता है, लेकिन...'

मोदी मास्क

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चुनाव विश्लेषक और सीएसडीएस के निदेशक प्रोफ़ेसर संजय कुमार कहते हैं माना जाता है कि विधानसभा और लोकसभा चुनावों में वोटिंग पैटर्न एक जैसा नहीं होता, लेकिन इसमें एक और पैटर्न है जिसकी कम बात होती है.

वो कहते हैं, "विधानसभा चुनावों के मुक़ाबले बीजेपी को लोकसभा चुनावों अधिक वोट मिलते रहे हैं. दो बार से यही देखा जा रहा है. यानी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का वोट शेयर अधिक रहा तो साल भर बाद लोकसभा चुनावों में बीजेपी का वोट शेयर अधिक रहा."

2014 में आम चुनावों में बीजेपी का 31.0 फ़ीसदी, कांग्रेस का 19.31 फ़ीसदी वोट शेयर था. वहीं 2019 में बीजेपी का वोट शेयर 37.30 फ़ीसदी और कांग्रेस का 19.46 फ़ीसदी रहा.

वो कहते हैं,"मुझे नहीं लगता कि इन राज्यों में विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का जिस तरह का प्रदर्शन रहा है वही वो दोहरा पाएगी. इसकी संभावना अधिक है बीजेपी का इन राज्यों में अभी जो प्रदर्शन रहा है, लोकसभा चुनावों में वो उससे बेहतर करेगी."

वहीं चुनाव विश्लेषक और सीएनएक्स के प्रबंध निदेशक भावेश झा कहते हैं, "विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनावों के मुद्दे और चेहरे अलग-अलग होते हैं. यहां चेहरा महत्वपूर्ण होता है. आप कह सकते हैं कि राजस्थान में वोट शेयर में दो फीसदी तक का फर्क है और यहां मुक़ाबला बेहद करीबी था."

वो कहते हैं कि विधानसभा में कांग्रेस लगभग जीतते-जीतते रह गई, लेकिन इसे लोकसभा के साथ तुलना करना सही नहीं होगा.

2018 के विधानसभा चुनावों में राजस्थान में कांग्रेस जीती थी, लेकिन 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव वो बुरी तरह हार गई थी.

वो कहते हैं "राजस्थान में वोट शेयर का फर्क भले ही कम दिखता हो, लेकिन कांग्रेस के लिए उसे भरना मुश्किल होगा."

प्रोफ़ेसर संजय कुमार कहते हैं "राजस्थान में मार्जिन छोटा लग रहा है लेकिन अभी का वोटिंग पैटर्न फिर से दोहराया जाएगा इसकी उम्मीद करना सही नहीं है. छत्तीसगढ़ में चार फ़ीसदी का फर्क है, जो छोटा नहीं है. रही बात मध्य प्रदेश की तो यहां बीजेपी और कांग्रेस के बीच वोट शेयर का फर्क 8 फीसदी का है, जो काफी बड़ा है."

राहुल गांधी

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’रिकवरी करना टेढ़ी खीर’

छत्तीसगढ़ के बारे में भावेश झा कहते हैं, "यहां का सामाजिक इक्वेशन कांग्रेस के साथ था. यहां दलित, आदिवासी और ओबीसी वोट कांग्रेस के साथ जा रहा था. लेकिन यहां उसकी हार का कारण बीजेपी की दो घोषणाएं हैं. धान पर न्यूनतम समर्थन मूल्य और महतारी बंधन योजना लाने की उसकी घोषणा जिसने यहां के लोगों को जोड़ने का काम किया. "

वो कहते हैं यहां कांग्रेस से रिकवरी की कुछ उम्मीद की जा सकती है

वो कहते हैं, "मध्य प्रदेश में संघ और बीजेपी के संगठन की जड़ें मजबूत है और यहां बुरी से बुरी स्थिति में बीजेपी का वोट शेयर 40 फीसदी के आसपास रहता है. यहां कांग्रेस के लिए लोकसभा चुनाव में वापसी करना टेढ़ी खीर हो सकता है. "

वो समझाते हैं, "इसकी एक वजह ये भी है कि यहां विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का अभियान जाति से इर्दगिर्द था, वो ओबीसी को फोकस करने की कोशिश कर रही थी. लेकिन उसे ये जानना चाहिए था कि बीजेपी की राजनीति ओबीसी नेतृत्व वाली रही है. यहां संगठन के मामले में तो कांग्रेस पीछे है ही, यहां के सामाजिक इक्वेशन में कांग्रेस बीजेपी से काफी पीछे है. "

वहीं प्रोफ़ेसर संजय कुमार कहते हैं कि कुछ महीनों बाद चुनाव हैं और कांग्रेस के पास अब वक्त कम है और चुनाव से पहले कांग्रेस के लिए वोट शेयर के फर्क को कम कर पाना बेहद मुश्किल है.

वो कहते हैं, "लोकसभा में लोग चेहरा देख कर वोट करते हैं, और वो चेहरा एक बार फिर मोदी का रहेगा. तीन महीने तो क्या तीन साल भी इस फर्क को पाट पाने के लिए कम हैं."

वो कहते हैं,"विधानसभा चुनाव होते के बात और होती, लेकिन लोकसभा चुनावों को देखते हुए ये मुश्किल लग रहा है. "

वहीं भावेश झा कहते हैं कि चुनाव जीतने के लिए आपको ज़मीन और हवा दोनों ही अपने पक्ष में चाहिए.

वो कहते हैं,"राजस्थान में वोट शेयर में क़रीब दो फ़ीसदी का फर्क है, कहा जा सकता है कि यहां ज़मीन दोनों के ही पास है. लेकिन जहां तक हवा की बात है इस बार के विधानसभा चुनावों के बाद हवा बीजेपी के पक्ष में दिखती है. "

वो कहते हैं, "कांग्रेस और इंडिया गठबंधन की कोशिश हवा के इस रुख़ को थोड़ा धीमा करने की है. "

लेकिन इसमें वो कामयाब होगी या नहीं, ये कुछ महीनों बाद पता चल ही जाना है.

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