राजस्थान में जीते बीजेपी विधायकों की ये धुकधुकी क्या बताती है?- नज़रिया

जयपुर में बीजेपी की जीत के बाद पार्टी समर्थक

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इमेज कैप्शन, विधानसभा चुनावों में बीजेपी की जीत के बाद जयपुर में पार्टी समर्थक
    • Author, त्रिभुवन
    • पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

राजस्थान में सत्तासीन होने जा रही भारतीय जनता पार्टी की सियासत का आलम एक अलग ही दौर से गुज़र रहा है.

तीन दिन पहले तक अधिकतर विधायक 13 सिविल लाइंस की ओर बेताबी से बढ़ते नज़र आ रहे थे; लेकिन अब जाने ऐसा क्या हो गया है कि वे जहाँ कहीं भी बैठे हैं, कुछ नामों और अनजान नंबरों वाली फ़ोन कॉल्स को उठाने तक से बच रहे हैं.

भाजपा विधायक अब प्रदेश कार्यालय तो आ-जा रहे ही हैं, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रदेश मुख्यालय भारती भवन में भी उनका निरंतर आना-जाना लगा हुआ है.

ऐसे बहुत से नवनिर्वाचित विधायक हैं, जो मानते हैं कि उन्हें संघ के आशीर्वाद से ही इस बार टिकट मिला है. वे संघ में प्रमुख दायित्व निभा रहे प्रकाशचंद्र और निंबाराम से भी बड़ी तादाद में मिल रहे हैं.

पार्टी विधायकों का अब प्रमुख केंद्र तो भाजपा का प्रदेश कार्यालय ही है, जहाँ वे प्रदेश अध्यक्ष सीपी जोशी से तो मिल ही रहे हैं, वे प्रदेश प्रभारी अरुण सिंह से भी हालात को समझने की कोशिश कर रहे हैं. प्रदेश महामंत्री संगठन चंद्रशेखर से मिलने वाले विधायकों की भी भीड़ लगी हुई है.

ऐसे भी विधायक हैं, जो पिछली विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष रहे राजेंद्र सिंह राठौड़ से मिल रहे हैं; क्योंकि उनके साथ मौजूदा दौर के नाज़़ुक हालात को समझना थोड़ा आसान है और उनकी विधायकों के साथ काफ़ी सहजता है. हालांकि इस बार राठौड़ तारानगर से अपना चुनाव हार गए हैं.

कुछ पुराने और फिर से निर्वाचित विधायक भी हैं, जो सियासत की मजबूरियों के चलते अपने गॉडफ़ादर या गॉडमदर से दूर रह कर भी अपनी निष्ठा को बरकरार रखते हुए नज़दीक रहने का भरोसा दिला रहे हैं.

विधायक नाम नहीं बताते मगर...

वसुंधरा राजे सिंधिया

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कुछ विधायक ऐसे हैं, जो तुम्हारा राज़ तुम्हीं से छुपा रहा हूँ वाली अदा में नेताओं से मिल रहे हैं; लेकिन साफ़ नज़र आ रहा है कि उनकी आँखों के ख़्वाब कितने और किसके लिए वाचाल हैं.

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कहने को तो कहा जा रहा है कि भाजपा में पहली बार मुख्यमंत्री पद के चयन को लेकर इतना समय लग रहा है; लेकिन 2003 में पहले ही वसुंधरा राजे को मुख्यमंत्री घोषित कर दिया गया था, जबकि इसके बाद 2008, 2013 और 2018 के चुनाव उनके ही चेहरे पर लड़े गए थे. लिहाजा, चुनाव परिणाम घोषित होते ही 2013 में उनके शपथ समारोह की ही घोषणा होनी बाक़ी थी.

भाजपा 2008 और 2018 के चुनावों में तो हार ही गई थी तो मुख्यमंत्री पद के लिए कोई कश्मकश होनी ही कहाँ थी.

इस बार पहले से कुछ तय नहीं होने और लोकसभा के चुनावों के नज़दीक होने और उससे जुड़ी जातियों की सोशल इंजीनियरिंग के चलते बहुत से नाम हवा में तैर रहे हैं; लेकिन वे हाईकमान के होंठों के कंपन में सुनाई नहीं पड़ते.

उनके होंठों का यह पॉज़ जाने कितने दिलों की धड़कन बढ़ाता है और जाने कितने ही चेहरों का खून सुखा देता है.

प्रदेश में आने वाले एक दो दिन में सब कुछ भले साफ़ हो जाए; लेकिन ये घड़ियां ऐसी हैं कि कोई भी असावधान विधायक कल के मुख्यमंत्री के लिहाज से सियासी मुजरिम हो सकता है. यही सोचकर हर विधायक अपने दामन बचाने में लगा है और वह संघ और संगठन में गवाहों के साए में खड़े रहना मुनासिब समझ रहा है.

कई विधायक नाम तो नहीं बताते; लेकिन कहते हैं कि उन्हें हराने की बहुत कोशिशें हुईं. विरोधियों ने बहुत सफ़ाई से आँधियाँ चलाईं. उनके इरादे अच्छे न थे, लेकिन कुछ दीये जलते हुए रह गए.

सत्ता में चीज़ें कैसे बदलती हैं?

पीएम मोदी के साथ राजेंद्र सिंह राठौड़ और वसुंधरा राजे

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इस लिहाज से नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र सिंह राठौड़ और उप नेता प्रतिपक्ष सतीश पूनिया की हार के पीछे भी कई कहानियाँ यहाँ सियासी गलियारों में तैर रही हैं.

एक विधायक के फ़ोन पर बार-बार एक सांसद का कॉल आ रहा है; लेकिन वे उठा नहीं रहे हैं. वजह ये कि सांसद उन्हें किसी ख़ास जगह बुलाना चाह रहे हैं और वे नहीं चाहते कि बेवजह विवादों में आएं.

इन दिनों जो कुछ राजस्थान की राजधानी गुलाबी नगर में घट रहा है, वह बता रहा है कि सत्ता में चीज़ें कैसे बदलती हैं और लुढ़कती हैं. वे जहाँ कुछ चहेरों को आँख भर के देखते थे और घंटों उनके परिसर में ठहरने के लिए कसक पाले रहते थे, वही अब उस गली से भी इसलिए गुज़रने से बचते हैं कि कहीं किसी वीडियो फुटेज़ में न आ जाएं.

इस समय वसुंधरा राजे के समर्थन में सबसे प्रमुख तौर पर मुखर रहे अंता विधायक कंवरलाल ने खुलकर कहा- मुख्यमंत्री तो वसुंधरा राजे को ही बनना चाहिए; क्योंकि वे दो बार पहले मुख्यमंत्री रही हैं और उनकी कार्यशैली लोगों के हित में है. लेकिन साथ ही उनका यह भी कहना कि पार्टी संगठन जो भी तय करेगा, वे उनके साथ हैं; यह बताता है कि अब नेता के प्रति निष्ठा जैसा कुछ नहीं बचा है और लोग संगठन के साथ है.

कंवरलाल के बयान के इस आख़िरी टुकड़े पर एक विधायक हैरानी जताते हैं और कहते हैं कि ऐसा कैसे हो सकता है तो एक दूसरा विधायक कहता है, मोदी हैं तो मुमकिन है!

बीजेपी के सामने कोई दिक़्क़त है?

पीएम मोदी

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इस तरह विधायकों के रुख को देखने के बाद हालात को समझने की कोशिश करें तो भाजपा हाईकमान के सामने किसी तरह की दिक़्क़त नहीं दिखाई देती.

प्रदेश की सियासत में इस समय जिन हालात से काँग्रेस जूझ रही है, वैसी स्थिति भाजपा में अब दूर-दूर तक नहीं है. भले उनके यहाँ मुख्यमंत्री पद के दावेदार आठ से दस ही क्यों न हों. यहाँ किसी की हिम्मत नहीं कि कोई लॉबिंग की कोशिश करे.

ख़राब-हालों से रब्त रखकर अपने आप को बरबाद करके आनंद लेने की जैसी रवायत हाल के वर्षों में काँग्रेस में रही है, भाजपा के लोग उससे बहुत दूर हैं.

ऐसा नहीं कि भाजपा बहुत अनुशासित हो गई है और उसके विधायक किसी दूसरे लोक से आए हैं, यह कमाल पूरी तरह भाजपा हाईकमान के मज़बूत होने की वजह से है.

राजस्थान भाजपा के पुराने दिनों को याद करें तो काँग्रेस की तरह यहाँ भी हालात बहुत अलग नहीं और वे जान बूझकर ऐसी गलियों से गुज़रती रही हैं, जहाँ दर्द बाँहों में आ लिपटते हैं.

लेकिन अब हाईकमान का ख़ौफ़ ऐसा छाया हुआ है कि इस तरह के हुनरमंद अब अनुशासितों से भी अधिक अनुशासित दिखने की कोशिश करते हैं और वे दिन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के एक्स (पहले ट्विटर) पर किए गए पोस्ट को रीपोस्ट करते रहते हैं. मोदी और शाह के हॉर्डिंग लगाते रहते हैं.

आप इस बदलाव की वजह जानने की कोशिश नहीं करेंगे?

वसुंधरा राजे सिंधिया और जेपी नड्डा

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भाजपा के कुछ नए विधायकों के साथ बैठे एक पुराने पार्टी नेता चुटकी लेते हैं और एक दहाड़ने वाले सांड को लेकर राजस्थानी कहावत सुनाते हैं : दड़ूंको क्यूं हो? सूर्य पुत्र हूँ! तो छेरा क्यूँ नाखो हो? गऊ रा जाया हाँ!!!

यानी एक सांड दहाड़ रहा था. उसे पूछा कि आप क्यों दहाड़ रहे हैं? तो सांड ने जवाब दिया, 'मैं सूर्य पुत्र हूँ और दहाड़ना मेरा स्वभाव है. सांड से रूबरू व्यक्ति ने साथ ही देखा कि वह तेजी से बार-बार पतला गोबर भी कर रहा है, जो उसके डरे होने की तरफ़ संकेत कर रहा है. इस पर पूछा गया कि आप सूर्य पुत्र हो तो डरकर बार-बार गोबर क्यों कर रहे हो? सांड ने इस पर लजाते हुए कहा, 'भाई मैं गऊ का जाया निरीह प्राणी भी तो हूँ!'

लिहाजा, राजस्थान में अतीत के जितने भी विद्रोही तेवर वाले सियासी क्षत्रप हैं, वे सबके सब इस सांड वाली परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं.

नए विधायक अब या तो भाजपा प्रदेश कार्यालय के आसपास ही होटलों में रुके हुए हैं या फिर अपने-अपने रिश्तेदारों के घरों या सर्किट हाउस में. वे चाहते हैं कि पार्टी के प्रदेश कार्यालय से कोई फ़ोन आए तो तत्काल चले जाएं.

इस बार भाजपा के 115 विधायकों में 45 चेहरे एकदम नए हैं, और ये सबके सब अपने भविष्य को लेकर भी कम चिंतित नहीं हैं.

वे मानते हैं कि अगर पार्टी नेतृत्व और संघ की निगाहों में रहे तो उनकी सब उम्मीदें ज़ीना-ज़ीना उतर ही आएंगी और अगर कुछ गड़बड़ा हुआ तो फिर सही नहीं रहेगा.

नए विधायकों से बातचीत करके यह भी हैरानी होती है कि उन्हें टिकट कैसे-कैसे मिले और उन्हें इसके लिए क्या-क्या पापड़ नहीं बेलने पड़े. इसके बाद जीतना भी एक पहाड़ था और ख़ासकर ऐसे समय जब पार्टी में भीतर ही भीतर काफ़ी कुछ ऐसा वैसा भी चल रहा था.

पार्टी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी समझाते हैं कि नए विधायक अभी भले बहुत मासूम दिखने की कोशिशें करें; लेकिन यह सच है कि इसकी भी वजह है. वे भी नए मंत्रिमंडल में अपनी भागीदारी देखते हैं.

एक निर्दलीय विधायक ऐसे हैं, जो पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष के ख़िलाफ़ शुरू से रहे हैं और टिकट कटा तो जीत गए. वे अब पार्टी के राष्ट्रीय नेताओं से मुलाकातें कर रहे हैं.

कुछ और निर्दलीय विधायक भी अपने आपको भाजपा खेमे में शामिल करने की कोशिश कर रहे हैं और पार्टी के प्रमुख नेताओं के संपर्क में हैं.

नए विधायक क्या कहते हैं?

बीजेपी

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नए विधायकों से बातचीत करने और उन्हें टटोलने के दौरान यह भी जानकारी आती है कि विधायक ही सब कुछ नहीं.

इस समय वे लोग भी अपने आपको बहुत अजूबे हाल में पा रहे हैं, जो भाजपा की केंद्रीय सत्ता के बहुत क़रीब रहे थे और अब सत्ता के उस केंद्रीय कक्ष के दरवाज़े से भी दूर रह जाने की आशंका के चलते कुछ का कुछ करने की कोशिशों में जुटे हैं.

अब उनके मयख़ानों की रौनक चले जाने का पूरा अंदेशा है तो ख़ानक़हों में वीरानियों के पदचाप भी सुनाई देने लगे हैं.

एक पुराने नेता बताते हैं, यहाँ चाय से सदा ही केतलियां ज़्यादा गरम रही हैं और लोग कोशिश कर रहे हैं कि वे केतली से हाथ और गरम चाय से लब न जला बैठें!

एक पुराने विधायक बताते हैं, पिछले दिनों जिस रिज़ॉर्ट प्रकरण की कहानी सामने आई, वह ऐसे ही लोगों की कोशिश थी. उसमें कथित ज़िम्मेदारों की भूमिका दूर-दूर तक नहीं थी; क्योंकि वे इस तरह की कोशिशों का नतीजा जानते थे और इतने अज्ञानी नहीं थे कि जानते बूझते ऐसा करें.

अगर यह कोशिश नहीं भी थी और यह संयोग से ही हो गया तो भी उस शिविर के नेता बहुत सजग हैं और छाछ को भी फूंक फूंककर पी रहे हैं.

विधायक भले नए हों या पुराने, वे अपने-अपने हिसाब से गणित भी बिठा रहे हैं. वे सिर्फ़ मुख्यमंत्री के चेहरे का ही इंतज़ार नहीं कर रहे, वे मंत्रिमंडल के गठन के लिहाज से भी काफ़ी सक्रिय हैं और नेताओं से संपर्क साध रहे हैं.

कौन किस जाति को संबल देगा और कौन किस इलाक़े का ख़याल रखेगा, इस लिहाज भी विधायक सक्रिय हैं. हालात नाज़ुक हैं और कौन हीरे से पत्थर बन जाए और कौन क्या से क्या हो जाए, यह भी आने वाले दिनों में होना ही है.

लिहाजा, सबके सब मंज़िलों का रुख़ किए हैं और कोशिशें हैं कि अगर मंज़िलें न बन पाएं तो मंज़िलों तक का रास्ता ही हो जाएँ.

भाजपा की सियासत में आने वाले कुछ घंटे वाक़ई बहुत क़माल के हैं और बड़े नसीबों को भी तय करने वाले हैं. देखते हैं, कौन ख़ाक होता है और कौन कीमिया! अब नए विधायकों ने बंदगी के लिए कुछ नई राहें चुन ली हैं, जो उन्हें कीमिया बना दें!

कीमिया यानी वो प्राचीन प्रक्रिया, जिसमें लोहे और तांबे जैसी धातुओं को सोने में बदलने वाले तत्व की खोज की जाती.

उन्हें अब इस बात से क्या लेना देना कि छूटने जा रहे रास्तों वाले जहाँ कैसे हैं, शाख़-ए-गुल कैसी है और ख़ुश्बू के मकाँ कैसे हैं! आख़िर उन्हें भी तो अपने जहाँ को महकाना है.

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