बिहार में कांग्रेस के लिए लालू और नीतीश की रणनीति क्या हो सकती है

राहुल गांधी के साथ लालू और नीतीश

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    • Author, चंदन कुमार जजवाड़े
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधानसभा चुनावों में हार के बाद विपक्ष के इंडिया गठबंधन पर इसका बड़ा असर देखने को मिल सकता है. इन चुनावों में बीजेपी का कांग्रेस के साथ सीधा मुक़ाबला था.

चुनावों में तेलंगाना में भले ही कांग्रेस को जीत मिली हो, लेकिन बीजेपी ने उससे राजस्थान और छत्तीसगढ़ राज्य छीन लिए हैं. इसके अलावा बीजेपी मध्य प्रदेश की अपनी सरकार बचा पाने में भी क़ामयाब रही है.

हालांकि चुनावों में कांग्रेस इससे बेहतर परिणाम की उम्मीद कर रही थी, लेकिन नतीजे उसके ख़िलाफ़ रहे हैं. ख़ास बात यह भी है कि विपक्ष का ‘इंडिया’ गठबंधन बनने के बाद यह बड़ा चुनाव था, जिसमें एक साथ पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे थे.

चुनावों में हार के बाद कांग्रेस ने इस गठबंधन की बैठक बुलाई है. यह बैठक 6 दिसंबर को राजधानी दिल्ली में होगी. रविवार को ही कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस बैठक का एलान किया था.

तीनों राज्यों में कांग्रेस की हार के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव की तरफ से फ़िलहाल कोई बयान नहीं आया है, लेकिन माना जा रहा है कि इससे अब वो कांग्रेस पर दबाव बना सकते हैं.

इससे पहले कांग्रेस लगातार विपक्षी गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर बाक़ी दलों पर दबाव बनाने की कोशिश में दिखती रही है.

गठबंधन से दूरी का आरोप

इंडिया गठबंधन

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इमेज कैप्शन, इंडिया गठबंधन की बैठक 6 दिसंबर को दिल्ली में होने जा रही है.

पिछले ही महीने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पटना में भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी की एक रैली में शामिल हुए थे. वहां नीतीश ने कहा था कि कांग्रेस इंडिया गठबंधन में दिलचस्पी नहीं दिखा रही है.

उस दौरान सीपीआई नेता डी. राजा ने भी कहा था कि इंडिया गठबंधन के दलों को साथ लेने के लिए कांग्रेस का रवैया और बेहतर होना चाहिए.

कांग्रेस ने मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में अकेले चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया था. इन चुनावों के दौरान भोपाल में इंडिया गठबंधन की एक रैली भी होनी थी, लेकिन कांग्रेस नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने बताया था कि यह रैली रद्द कर दी गई है.

इसे कांग्रेस के अति आत्मविश्वास के तौर पर भी देखा गया था. इसके अलावा कांग्रेस ने मध्य प्रदेश में समाजवादी पार्टी से भी गठबंधन नहीं किया. कांग्रेस नेता विधानसभा चुनावों को लोकसभा चुनावों से अलग बता रहे थे.

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वहीं, आरजेडी के राज्यसभा सांसद मनोज झा ने कहा है कि कांग्रेस को भी अपना दिल थोड़ा बड़ा करना होगा और इंडिया गठबंधन की सामूहिकता के प्रति संवेदनशील होना होगा.

हालांकि, उन्होंने यह भी कहा है कि हर मुद्दे पर एक जैसा सोचते तो ‘इंडिया’ गठबंधन नहीं, एक पार्टी होती.

कांग्रेस का दावा होगा कमज़ोर?

जश्न मनाते कांग्रेस कार्यकर्ता

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इमेज कैप्शन, इसी साल कर्नाटक विधानसभा चुनाव में जीत के बाद कांग्रेस आक्रामक नज़र आ रही थी.

क़रीब छह महीने पहले हुए कर्नाटक विधानसभा चुनावों में बड़ी जीत के बाद कांग्रेस के नेता अलग तेवर में दिख रहे थे और देश की सबसे प्रमुख विपक्षी पार्टी होने के नाम पर कांग्रेस ज़्यादा सीटों पर लोकसभा चुनाव लड़ने की इच्छा दिखाती रही है.

कांग्रेस बिहार की 40 लोकसभा सीटों में नौ से दस सीटों पर चुनाव लड़ने की मांग करती रही है. लेकिन अब इस हार के बाद क्या इंडिया गठबंधन में उसकी स्थिति कमज़ोर होगी और क्या इससे उसकी मांग कमज़ोर पड़ सकती है?

इस पर वरिष्ठ पत्रकार श्रीकांत कहते हैं, “कांग्रेस की इस हार से ‘इंडिया’ गठबंधन के सभी नेताओं को हताशा हुई होगी. हालांकि इस हार से कांग्रेस की स्थिति थोड़ी कमज़ोर ज़रूर होगी और अपने सहयोगियों पर दबाव बनाने की उसकी ताक़त कम होगी.”

श्रीकांत

उनका मानना है कि इस हार के बाद भी बीजेपी के ख़िलाफ़ कांग्रेस ही सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी है. जबकि अभी लोकसभा चुनावों में क़रीब छह महीने का समय बाक़ी है और तब तक राजनीति में बहुत कुछ आगे बढ़ चुका होगा.

श्रीकांत के मुताबिक़, “यह कहना भी काल्पनिक होगा कि जो नतीजे इन तीनों राज्यों में रहे हैं, वैसे ही बिहार में भी रहेंगे. बिहार में जब नीतीश कुमार की पार्टी लालू की पार्टी के साथ गठबंधन में होती है तो इसका क्या असर होता है, यह पहले भी दिख चुका है.”

साल 2015 के विधानसभा चुनावों के दौरान एनडीए से अलग होने के बाद नीतीश कुमार ने पहली बार महागठबंधन बनाया गया था. इसमें लालू प्रसाद यादव की आरजेडी और नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली जेडीयू ने 101-101 सीटों पर चुनाव लड़ा था.

हालांकि, बिहार कांग्रेस के प्रवक्ता असित नाथ तिवारी ने बीबीसी से कहा है कि उनकी पार्टी बिहार में दस से कम लोकसभा सीटों पर चुनाव नहीं लड़ेगी और हमारी दस सीटों की मांग बरक़रार है.

उनका दावा है कि इसपर बिहार में किसी भी सहयोगी दल को कोई आपत्ति नहीं है.

कांग्रेस पर दबाव

बिहार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अखिलेश सिंह के साथ लालू प्रसाद यादव

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इमेज कैप्शन, बिहार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अखिलेश सिंह के साथ लालू प्रसाद यादव

2015 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने 41 और भाजपा ने 157 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे. आरजेडी 80 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. इसके बाद जेडीयू को 71 सीटें और भाजपा को 53 सीटें मिली थीं. उन चुनावों में कांग्रेस को 27 सीटें मिली थीं.

वरिष्ठ पत्रकार नचिकेता नारायण मानते हैं कि लोकसभा चुनावों में ज़्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने का कांग्रेस का दावा हिन्दी पट्टी के तीन राज्यों में हार के बाद थोड़ा कमज़ोर होगा.

नचिकेता नारायण कहते हैं, “बिहार में इंडिया के सहयोगी दल यानी लालू और नीतीश यह कह सकते हैं कि जहां कांग्रेस मज़बूत हैं, वहां तो वो सीटें निकाल नहीं पाती है, फिर बिहार में तो वह काफ़ी कमज़ोर हालत में है.”

नचिकेता

इससे पहले साल 2020 के विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस के प्रदर्शन पर बिहार में उसके सहयोगी दलों ने सवाल खड़े किए थे. उन चुनावों में कांग्रेस को गठबंधन के तहत 70 सीटों पर चुनाव लड़ने का मौक़ा मिला था, जबकि वो महज़ 19 सीटें जीत पाई थी.

दूसरी तरफ साल 2020 के चुनावों में सीपीआईएमएल 19 सीटों पर चुनाव लड़कर 12 सीटें जीतने में सफल रही थी. ऐसी स्थिति में तीन राज्यों में हार और पुराने प्रदर्शन को देखते हुए कांग्रेस के पास ज़्यादा सीटों की मांग का आधार नहीं दिखता है.

कांग्रेस की इस राजनीति पर बिहार में उसके सहयोगी दलों ने दबाव बनाना शुरू कर दिया है. लालू प्रसाद यादव की पार्टी आरजेडी ने कहा है कि मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में इंडिया गठबंधन की नहीं, बल्कि कांग्रेस की हार हुई है.

हार के लिए कांग्रेस कितनी ज़िम्मेदार?

सोनिया गांधी

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बिहार सरकार में मंत्री और नीतीश कुमार के क़रीबी माने जाने वाले विजय चौधरी ने पत्रकारों से बातचीत में इस हार के लिए कांग्रेस को ज़िम्मेवार ठहराया है.

नीतीश कुमार की पहल पर ही विपक्ष का गठबंधन बना था और इसकी शुरुआत बिहार से हुई थी.

विजय चौधरी ने कहा, “हम उम्मीद करते हैं कि कांग्रेस आगे बढ़कर सभी क्षेत्रीय दलों को भी उचित सम्मान, उचित जगह, उचित महत्व देकर ऐसी समझदारी बनाएगी, जिससे बीजेपी को दिख जाए कि विपक्ष में कितना दम है. साफ़ दिख रहा है कि इंडिया के अलग-अलग घटक दलों को ज़्यादा समझदारी से काम करना होगा. इन चुनावों में सारे घटक दल एक होकर चुनाव नहीं लड़े थे.”

अब छह दिसंबर को दिल्ली में होने वाली बैठक में कांग्रेस के रुख़ पर इंडिया गठबंधन की आगे की तस्वीर सपष्ट हो सकती है. फिलहाल कांग्रेस के सामने बिहार के अलावा पश्चिम बंगाल, पंजाब, उत्तर प्रदेश और दिल्ली जैसे राज्य हैं, जहां उसे अपने सहयोगियों से सीटों की साझेदारी करनी है.

जबकि बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में कांग्रेस पार्टी की स्थिति काफ़ी कमज़ोर दिखती है, ऐसे में ताज़ा हार के बाद इंडिया गठबंधन की आगे की रणनीति पर दिल्ली की बैठक में क्या फ़ैसला होगा, इस पर सबकी नज़र होगी.

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