भूपेश बघेल का कांग्रेस में क्या होगा राजनीतिक भविष्य?

भूपेश बघेल और राहुल गांधी

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    • Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, रायपुर से

दो दिन पहले भूपेश बघेल ने कहा था कि मतदान के बाद के सर्वे कांग्रेस के लिए जो 57 सीटें दिखा रहे हैं, वो मतगणना के बाद 75 में तब्दील हो जाएँगी.

लेकिन रविवार को मतपेटी खुलने के कुछ समय बाद तक तो कांग्रेस आगे दिख रही थी, लेकिन फिर पिछड़ी तो संभल नहीं पाई.

पार्टी की सीटों का आँकड़ा 35 पर रुक गया.

भूपेश बघेल ने देर शाम राज्यपाल से मिलकर उन्हें अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया.

राजनीतिक विश्लेषक सुनील कुमार कहते हैं कि कांग्रेस से बढ़कर ये हार ओपिनियन पोल और एग्ज़िट पोल करने वालों की है, जो चंद दिनों पहले तक भूपेश बघेल सरकार की वापसी की बात कर रहे थे.

मतदान प्रतिशत

लेकिन तेज़-तर्रार राजनीतिज्ञ भूपेश बघेल जनता की नब्ज़ को आख़िर क्यों नहीं पढ़ पाए?

क्यों नहीं समझ पाए वो उस नाराज़गी को, जो बस्तर के ईसाई आदिवासियों के बीच उबल रही थी.

या वे उन आदिवासियों की खीज वो क्यों नहीं पढ़ पाए, जो अपने लोगों को ईसाई बनते और पुराने रीति-रिवाजों को छोड़ता देख नाख़ुश थे?

क्यों कवर्धा और पास के इलाक़ों को गिरफ़्त में लेती हिंदुत्व पॉलिटिक्स उनकी पैनी नज़रों में नहीं आ सकी?

या उन्होंने जान-बूझकर इसे अनदेखा किया?

भूपेश बघेल

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पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह के गृह ज़िला कवर्धा में सांप्रदायिक उबाल के बाद, जब इसके तार पड़ोसी बेमेतरा तक पहुँचे, जहाँ दो मुसलमानों और एक हिंदू युवक की सांप्रदायिक हिंसा में मौत हो गई, तो सरकार का कोई मंत्री उन लोगों से मिलने तक नहीं गया.

मारे गए हिंदू युवक सूबे में मज़बूत साहू समुदाय से ताल्लुक़ रखते थे. राज्य के गृह मंत्री ताम्रध्वज साहू थे, जो ख़ुद उसी जाति से हैं.

मुख्यमंत्री ने मारे गए हिंदू युवक के परिवार को 10 लाख रुपए मुआवज़ा और परिवार के एक व्यक्ति को सरकारी नौकरी देने का वादा ज़रूर किया.

जबकि मुस्लिम परिवार को मुआवज़े का मामला लेकर हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाना पड़ा.

भारतीय जनता पार्टी ने हिंदू युवक के पिता ईश्वर साहू को टिकट दिया, जिन्होंने क्षेत्र के क़द्दावर कांग्रेस नेता और भूपेश बघेल सरकार के कैबिनेट मंत्री रवींद्र चौबे को हरा दिया.

पिछले चुनाव में सूबे में सबसे अधिक मतों से जीतने वाले राज्य के एकमात्र मुस्लिम विधायक मोहम्मद अकबर को भी हार का मुँह देखना पड़ा.

'छत्तीसगढ़' अख़बार के डिप्टी संपादक शशांक तिवारी कहते हैं कि साहू समाज कांग्रेस के ख़िलाफ़ लामबंद हो गया.

दूसरी तरफ़, पहली बार आदिवासियों की राजनीतिक पार्टी सर्व आदिवासी दल तैयार कर 11 सीटों पर उम्मीदवार उतारने वाले अरुण पन्नालाल ने बीबीसी से कहा, "कांग्रेस हमें पिटता देखती रहे और हमारा वोट भी मांगे, ये नहीं चलेगा."

उन्होंने कहा, "भूपेश बघेल हमारे लोगों को बस्तर में पिटता देखते रहे ताकि उनके हिंदू वोट बढ़ सके. ऐसा नहीं चलेगा कि हमारे लोगों के शवों को गाँव में अपनी ज़मीन में भी दफ़नाने न दिया जाए और पुलिस प्रशासन मूकदर्शक बना रहे.''

बस्तर संभाग जहाँ 12 में से 12 सीटें पिछली दफ़ा (2018) कांग्रेस के पाले में थी, वहाँ इस बार वो चार सीटें ही ला पाई.

उसी तरह सरगुजा क्षेत्र की कुल 14 सीटों पर जीत हासिल करनेवाली कांग्रेस को इस बार यहां दो सीटों से संतोष करना पड़ा है.

हिंदुत्व का साथ

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भूपेश बघेल कांग्रेस के उस धड़े से आते हैं, जिसकी सोच है कि हिंदुत्व का मुद्दा पार्टी को बीजेपी के लिए नहीं छोड़ना चाहिए.

मध्य प्रदेश के इस विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री का चेहरा रहे कमलनाथ भी यही सोच रखते हैं.

कमलनाथ ने तो इस चुनाव में भी हिंदू धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल किया, लेकिन इससे वह कुछ हासिल नहीं कर सके.

कांग्रेस पार्टी में हिंदुत्व के मुद्दे को लेकर 2022 के उदयपुर बैठक से ही रस्साकशी जारी है.

एक बातचीत के दौरान जब हमने भूपेश बघेल से पूछा था कि उन पर सॉफ़्ट हिंदुत्व करने का आरोप है, तो उनका जवाब था कि छत्तीसगढ़ में जिस राम गमन पथ या कौशल्या माता के मंदिर का वो निर्माण कर रहे हैं, वो छत्तीसगढ़ की संस्कृति को बढ़ाने का उनका प्रयास है.

चुनाव प्रचार के दौरान हुए इस बातचीत के दौरान उन्होंने कहा था, "आपने देखा होगा कि हमने इसका ज़िक्र प्रचार के दौरान नहीं किया, जैसा बीजेपी करती है."

बघेल ने छत्तीसगढ़िया पहचान को भी अलग तरह से पेश करने की कोशिश की, जिसमें छत्तीसगढ़ महतारी (मां) की प्रतिमा राज्य भर में लगाने से लेकर, राज्य का अपना गीत तक चुना गया.

अहंकारी होने का आरोप

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सुनील कुमार भूपेश बघेल शासन पर भष्टाचार, अहंकार और घमंडी होने का आरोप लगाते हैं.

वे कहते हैं, “इसकी सज़ा जनता ने उन्हें दी. देखिए, मज़बूत समझे जानेवाले ज़्यादातर मंत्री हार गए.”

छत्तीसगढ़ राज्य बनने से अब तक, 23 साल के अल्पकाल में भूपेश बघेल दूसरे मुख्यमंत्री होंगे, जिन पर अहंकार का आरोप लगा है.

इन आरोपों को झेलने वाले पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी भी इत्तेफ़ाक़ से कांग्रेस के ही थे.

मुक्तिबोध

दैनिक भास्कर के पूर्व संपादक दिवाकर मुक्तिबोध मानते हैं कि पूर्व मुख्यमंत्री बघेल के दो चेहरे थे, जिन्हें वो अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग तरह से इस्तेमाल करते थे.

मतगणना के ठीक एक दिन पहले उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ख़त लिखकर ये मांग रखी कि सोशल मीडिया बेस्ड सट्टा ऐप्स पर प्रतिबंध लगाया जाए.

चुनाव के दौरान ईडी ने दो लोगों को गिरफ़्तार करने के बाद दावा किया था कि भूपेश बघेल को ऑनलाइन सट्टा कंपनी महादेव से 500 करोड़ रुपये से अधिक मिले हैं. हालाँकि, ईडी ने इसमें और अधिक जाँच की बात भी कही थी.

भूपेश बघेल ने पहले कहा था कि ईडी और इनकम टैक्स के छापों को लेकर जनता में उनके प्रति सहानुभूति जगी है, लेकिन शायद ऐसा हुआ नहीं.

युवाओं के एक वर्ग में राज्य भर्ती बोर्ड में घोटाले को लेकर खटास देखने को मिली जो शायद सरकार के ख़िलाफ़ गई.

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माना जा रहा है कि सरकार से हटने के बाद उन पर केंद्रीय जाँच एजेंसियों का दबाव और बढ़ सकता है और उनके कई क़रीबी लोग भी केंद्रीय एजेंसियों के रडार पर हैं.

शशांक तिवारी कहते हैं उम्र के लिहाज़ से भूपेश बघेल के पास समय है और वो आंदोलन से नहीं भागते और न ही जेल जाने से डरते हैं.

आंदोलन और मेहनत की उनकी क्षमता की बात सूबे के बहुत सारे लोग करते हैं.

किसान परिवार से आनेवाले भूपेश बघेल ने पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते किसानों के मुद्दों, जैसे ख़रीद और बढ़ती आत्महत्या के मामलों को लेकर धरना-प्रदर्शन किया था.

और जब कुछ सालों में चुनाव का समय आया तो कांग्रेस ने धान और किसान क़र्ज़ माफ़ी को मुद्दा बनाया और 2018 का चुनाव जीता.

भारी मतों से पार्टी को सत्ता में लानेवाले भूपेश बघेल की रणनीति की कांग्रेस हाई कमान इस क़दर कद्रदान थी कि उत्तर प्रदेश से लेकर, असम और हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव तक की कमान उन्हें सौंपी गई.

कुछ लोग हिमाचल में कांग्रेस की जीत का सेहरा उनके सिर पर भी बांधते हैं लेकिन ये कहने से गुरेज़ करते हैं कि उत्तर प्रदेश और असम दोनों जगह कांग्रेस के हाथ कुछ ख़ास नहीं लगा.

क्या है भविष्य

भूपेश बघेल

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जब सूबे में मुख्यमंत्री पद के पाँच साल के कार्यकाल को दो लोगों के बीच ढाई-ढाई साल में बाँटने की बात हुई, तो भूपेश बघेल का प्रभाव पार्टी में इस क़दर था कि लाख कोशिशों के बावजूद टीएस सिंहदेव पद हासिल न कर सके.

तय ये हुआ था कि ढाई साल भूपेश बघेल मुख्यमंत्री रहेंगे और ढाई साल टीएस सिंहदेव. बाद में सिंहदेव को चुनाव के कुछ माह पहले डिप्टी सीएम के पद से संतोष करना पड़ा.

सुनील कुमार का मानना है कि 'भूपेश बघेल को लेकर एक तरह की इमेज तैयार की गई है जो रियल नहीं थी और वो ख़ुद और उनके आसपास के लोग इस इमेद में इस क़दर फँस गए कि ज़मीन पर क्या हो रहा है, ये समझ ही नहीं पाए.'

वे कहते हैं कि एक समय अगर आप रायपुर में एक सेल्फ़ी लेना चाहते थे, तो पूरे शहर में शायद ही कोई ऐसी जगह थी, जहाँ आप सेल्फ़ी लें और उसमें भूपेश बघेल का चेहरा मौजूद न हो.

भूपेश बघेल और टीएस सिंहदेव

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1990 के दशक में यूथ कांग्रेस से शुरुआत करके विधायक, अविभाजित मध्य प्रदेश में मंत्री और फिर छत्तीसगढ़ प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री की कमान संभालने वाले भूपेश बघेल के भविष्य को लेकर कई तरह की बातें की जा रही हैं.

विश्लेषक कहते हैं कि राजनीति के इस दौर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी ख़ुद को पिछड़ी जाति से संबंध रखनेवाला बताना पड़ता है.

शशांक तिवारी के अनुसार भूपेश बघेल भी इसी ओबीसी समुदाय से हैं और कांग्रेस जिस समय ऐसी कई संभावनाओं की तलाश में है, तो भूपेश बघेल के लिए पार्टी में ढेरों काम हैं, ख़ासतौर पर तब, जब कांग्रेस में बदलाव की ज़रूरत की बात भी हो रही है.

सुनील कुमार कहते हैं कि उन्हें विपक्ष के नेता का पद स्वीकार नहीं करना चाहिए.

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