मध्य प्रदेश: सीएम पद पर सस्पेंस के बीच शिवराज सिंह चौहान के इस बयान के क्या मायने

शिवराज और मोदी

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    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, भोपाल से

“मामा और भैया से बड़ा कोई पद नहीं है. मेरे भांजे-भांजियों, मुझे लगता है हर एक को कैसे मैं सीने से लगाऊं. माथा चूमूं. उनको प्यार करूँ और उनकी ज़िंदगी कैसे बेहतर बना पाऊं. 24 घंटे केवल एक ही सोच दिमाग़ में रहती है. ये अपना परिवार है. मामा और भैया का जो पद है, वो दुनिया में किसी भी पद से बड़ा पद है, इससे बड़ा पद कोई नहीं है.”

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने शुक्रवार को ये बयान राघोगढ़ की एक सभा में दिया.

उनका बयान ऐसे समय में आया जब मध्य प्रदेश के अगले मुख्यमंत्री को लेकर अटकलों का दौर जारी है. हालांकि सोमवार तक ये तय हो जाने की संभावना है कि मध्य प्रदेश का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा.

इस 'सस्पेंस' से पर्दा सोमवार की शाम तक उठने की संभावना व्यक्त की जा रही है क्योंकि उसी दिन भारतीय जनता पार्टी विधायक दल की बैठक बुलाई गई है.

पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने मध्य प्रदेश के लिए अपने पर्यवेक्षक भी नियुक्त कर दिए हैं जो सोमवार को भोपाल पहुंचेंगे. इनमे हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर खट्टर, भाजपा के ओबीसी मोर्चे के अध्यक्ष आर लक्ष्मण और अनीता लकड़ा शामिल हैं.

दिसंबर की तीन तारीख को घोषित चुनाव परिणाम में भारतीय जनता पार्टी ने 163 सीटों के साथ बड़ा बहुमत हासिल किया. लेकिन मुख्यमंत्री का चेहरा तय करने में पार्टी ने कई दिन लगा दिए हैं. राजनीतिक गलियारे में राघोगढ़ की जनसभा में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के बयान की व्याख्या अलग-अलग ढंग से की जा रही है.

कुछ समीक्षक इसे एक चुनौती के रूप में देख रहे हैं तो कुछ उनके बयान को ‘फेयरवेल स्पीच’ कह रहे हैं. भोपाल के '74 बंगले’ के इलाके में एक बंगला है जिस पर लिखा है – ‘शिवराज सिंह चौहान, मुख्य मंत्री, मध्य प्रदेश’. ये मुख्यमंत्री आवास नहीं है. मुख्यमंत्री का आधिकारिक आवास ‘श्यामला हिल्स’ पर है.

शिवराज सिंह चौहान

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बंगले को लेकर अटकलें...

इस बंगले से लगा हुआ है एक और बंगला जो किसी विधायक को आवंटित है. कुछ दिनों से ये बंगले हरी चादर से ढके हुए थे. ऐसा लग रहा था कि इन दोनों बंगलों में निर्माण का कार्य चल रहा था. लेकिन जिस दिन चुनाव परिणाम आए, यानी 3 दिसंबर को, उस दिन बंगले को ढकने वाली हरी चादर हट गयी.

तब पता चला कि दोनों बंगलों को मिलाकर एक बंगला बन गया है. बाहर बोर्ड पर ‘शिवराज सिंह चौहान, मुख्यमंत्री, मध्य प्रदेश’ ही लिखा हुआ है.

इससे अटकलें बढ़ गईं. सवाल उठ रहे हैं कि क्या शिवराज सिंह चौहान का अब ये नया घर होने वाला है ? अब क्या वो यहाँ शिफ्ट करेंगे ? लेकिन सोमवार तक इस रहस्य पर पर्दा ही रहेगा क्योंकि सोमवार को ही शाम सात बजे भारतीय जनता पार्टी के विधायक दल की बैठक में दल के नेता की औपचारिक घोषणा की जायेगी.

इस बात से भी कोई इनकार नहीं कर रहा है कि शिवराज सिंह चौहान मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के सबसे क़द्दावर नेता हैं जिन्होंने अपने कार्यकाल में आम लोगों के बीच अपना ख़ासा प्रभाव बना लिया है.

मध्य प्रदेश

जानकार कहते हैं कि प्रदेश में पार्टी के दूसरे क़द्दावर नेता भी हैं लेकिन उनका ज़्यादा प्रभाव अपने अपने क्षेत्रों में ही सीमित है. लेकिन अब पार्टी को फ़ैसला करना है कि इनमें से कौन ऐसा नेता होगा जो आने वाले लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की नाव को पार लगा सके.

हालांकि पिछले लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने ज़्यादातर सीटें जीत लीं थीं. सिर्फ़ छिंदवाड़ा ही ऐसी सीट है जहां से कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ के पुत्र नकुलनाथ सांसद हैं. यानी पिछले लोकसभा के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी का सबसे बेहतर प्रदर्शन रहा है.

भाजपा को विधानसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत मिला है और उसने इस बार 163 सीटें जीतीं हैं जबकि कांग्रेस के हाथ 66 सीटें ही आयीं हैं.

शिवराज सिंह चौहान

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मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए मची होड़ के बीच शिवराज सिंह चौहान दिल्ली जाने और ‘लॉबिंग’ करने की बजाय उन सीटों का दौरा कर रहे हैं जहां इस बार विधानसभा में भारतीय जनता पार्टी को हार का सामना करना पड़ा है.

इनमें छिंदवाड़ा ऐसा जिला है जहां की सात की सात सीटों पर भारतीय जनता पार्टी को हार का सामना करना पड़ा है. ये प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ का अभेद्य गढ़ है. मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए बढ़ी हुई सरगर्मियों के बीच शिवराज सिंह चौहान ने दिल्ली में नेताओं के चक्कर लगाने की बजाय उन सीटों का दौरा शुरू कर दिया जहां हार का सामना करना पड़ा है.

श्योपुर और राघोगढ़ भी इनमे से ऐसी सीटें हैं जहां जीत हासिल करना भारतीय जनता पार्टी के लिए चुनौती है. राघोगढ़ कांग्रेस के क़द्दावर नेता दिग्विजय सिंह का गढ़ है और ये सीट पिछले कई दशकों से इनके परिवार के पास ही रही है. इस बार भी उनके (दिग्विजय सिंह) के पुत्र जयवर्धन सिंह ने इस सीट पर अपनी जीत बरक़रार रखी है.

वरिष्ठ पत्रकार देव श्रीमाली कहते हैं कि शिवराज सिंह चौहान को दरकिनार करना आसान नहीं है.

ख़ासकर तब जब महिलाओं को केंद्रित कर लागू की गयी उनकी योजनाओं ने ‘गेम चेंजर’ का काम किया हो. यही वजह है कि चुनाव से पहले ही उन्हें दरकिनार करने के फ़ैसले पर पार्टी को पुनर्विचार करना पड़ा.

हालांकि श्रीमाली मानते हैं कि भारतीय जनता पार्टी ने मुख्यमंत्री का नाम तय कर लिया है.

वो कहते हैं, “भारतीय जनता पार्टी की कार्यशैली अगर आप देखें तो ये जो कुछ हो रहा है, मुझे लगता है कि ये औपचारिकता मात्र है. भारतीय जनता पार्टी इस मामले में बहुत सुलझी हुई है. उसमे बग़ावत जैसी चीज़ नहीं है. सबको फ़ैसलों को स्वीकार करना पड़ता है. चाहते हुए भी और ना चाहते हुए भी.”

कई नामों की चर्चा हो रही है. कई चेहरे सामने आ रहे हैं. लेकिन कई ऐसे नाम भी हैं जिनके बारे में कोई चर्चा नहीं हो रही है.

शिवराज सिंह चौहान मध्य प्रदेश के चार बार के मुख्यमंत्री हैं. यानी सबसे लंबे कार्यकाल वाले. ये एक रिकार्ड है. 1972 में संघ से शुरू हुआ उनका राजनीतिक ‘करियर’ काफ़ी लंबा रहा है जिसके दौरान वो पांच बार सांसद भी रहे हैं और पांच बार विधायक भी.

शिवराज सिंह चौहान

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शिवराज चौहान का राजनीतिक सफ़र

बुधनी शिवराज सिंह चौहान का गृह क्षेत्र है. अब ये ज़िला है. यहीं से उन्होंने वर्ष 1990 में अपना पहला चुनाव लड़ा था. वर्ष 1991 में अटल बिहारी वाजपेयी ने लोकसभा का चुनाव लखनऊ और मध्य प्रदेश के विदिशा से लड़ा था. चुनाव जीतने के बाद उन्होंने विदिशा की सीट छोड़ दी थी जहां से शिवराज सिंह चौहान को उम्मीदवार बनाया गया था. वो वर्ष 2004 तक सांसद रहे.

वर्ष 2005 के 29 नवंबर को वो क्षण आया जब भारतीय जनता पार्टी बाबूलाल गौर की जगह दूसरा मुख्यमंत्री बनाना चाहती थी. उस समय शिवराज सिंह चौहान का नाम दूर दूर तक कहीं नहीं था. उनके नाम का प्रस्ताव अचानक प्रमोद महाजन ने किया और सबको चौंका दिया.

उसके बाद से सिर्फ़ 2018 में पहली बार ऐसा हुआ जब भारतीय जनता पार्टी को मध्य प्रदेश विधानसभा के चुनावों में हार का सामना करना पड़ा था और कमलनाथ प्रदेश के मुख्यमंत्री बने.

जब कांग्रेस की सरकार गिर गयी तब वर्ष 2020 में शिवराज सिंह चौहान फिर से प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए.

मध्य प्रदेश

इसी बीच वर्ष 2019 में उन्हें भारतीय जनता पार्टी के सदस्यता अभियान के प्रमुख के रूप में कमान सौंपी गयी और उन्होंने इस में भी बाज़ी मार ली. इस अभियान में पार्टी के सदस्यों की संख्या साढ़े 18 करोड़ के आसपास पहुँच गयी.

सवाल उठ रहे रहें कि अगर शिवराज सिंह मुख्यमंत्री नहीं रहे तो उनके लिए आगे का रास्ता क्या है ?

देव श्रीमाली कहते हैं कि जब तक औपचारिक घोषणा नहीं होती है तब तक ये सिर्फ़ अटकलबाज़ी ही होगी. वो कहते हैं कि शिवराज सिंह चौहान ने ‘सत्ता विरोधी लहर’ की काट अपनी योजनाओं से की. उनकी लोकप्रियता भी बढ़ी.

उनका कहना है, “अगर चेहरा बदला भी जाता है तो ये तय है कि शिवराज सिंह चौहान दरकिनार नहीं किये जायेंगे. ये संभावना भी है कि उन्हें राज्य से केंद्र की राजनीति में शिफ्ट कर दिया जाए. जैसा भारतीय जनता पार्टी ने केंद्रीय मंत्रियों को राज्य की राजनीति में शिफ्ट किया है. शिवराज संगठन भी कुशलता से चलाने का अनुभव रखते हैं इस लिए उनके लिए कई विकल्प हैं.”

शिवराज सिंह चौहान

'सब मानते हैं हाईकमान का फ़ैसला'

शिवराज सिंह चौहान भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रह चुके हैं और वर्ष 2005 तक वे पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव भी रह चुके हैं. इसके अलावा उन्होंने भारतीय जनता युवा मोर्चा और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का भी नेतृत्व किया है.

वरिष्ठ पत्रकार संजय सक्सेना कहते हैं कि मध्य प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन के संकेत भारतीय जनता पार्टी ने पहले ही दे दिए थे. इसलिए ये तय माना जा रहा है कि अब राज्य में मुख्यमंत्री का चेहरा बदला जाएगा. जिस तरह से पर्यवेक्षकों की नियुक्ति की गयी है उससे संकेत भी मिल रहे हैं कि अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी से ही अगला मुख्यमंत्री हो सकता है.

इस दौड़ में प्रह्लाद पटेल भी शामिल हैं जो दो दिनों पहले तक सांसद और केंद्रीय मंत्री रहे हैं. उन्होंने तीस साल के अपने राजनीतिक करियर में पहली बार विधान सभा का चुनाव लड़ा है. शुक्रवार को उन्होंने विधानसभा में अपने कागज़ जमा किये और फिर शिवराज सिंह चौहान से मिलने मुख्यमंत्री आवास पहुंचे.

इस वजह से उनके नाम को लेकर सबसे ज़्यादा चर्चा हो रही है जबकि पूर्व कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर की उम्मीदवारी को हल्के रूप में नहीं देखा जा रहा है. इस दौड़ में ग्वालियर राज घराने के ‘महाराज’ यानी ज्योतिरादित्य सिंधिया की भी चर्चा ज़ोर शोर से हो रही है.

सिंधिया स्कूल में दो महीने पहले हुए वार्षिक कार्यक्रम में शिरकत करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें ‘गुजरात का दामाद’ कहा था क्योंकि सिंधिया बड़ौदा राज घराने के दामाद हैं.

हाल ही में उनकी पीएम मोदी और अमित शाह से बढ़ती हुए नज़दीकी की वजह से उनके नाम को भी मज़बूत दावेदार के रूप में देखा जा रहा है. इसके अलावा आठ बार के विधायक गोपाल भार्गव और कैलाश विजयवर्गीय के नाम भी चल रहे हैं क्योंकि राजनीतिक विश्लेषक किसी संभावना से इनकार नहीं कर रहे हैं.

देव श्रीमाली के अनुसार, "भारतीय जनता पार्टी कुछ भी कर सकती है और कोई विरोध भी नहीं कर सकता है. पार्टी का निर्णय सबको मानना पड़ेगा. वो कहते हैं, “बाबूलाल गौर की जगह शिवराज सिंह चौहान को मुख्यमंत्री बनाया गया और किसी ने चूं भी नहीं की. उत्तराखंड में पुष्कर सिंह धामी हों या हरियाणा के मनोहर लाल खट्टर. पार्टी के नेताओं को आला कमान का फ़ैसला मानना ही पड़ा.”

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