अयोध्या: मस्जिद के लिए 5 साल पहले मिली ज़मीन पर कहां तक पहुंचा निर्माण का काम?- ग्राउंड रिपोर्ट

धन्नीपुर मस्जिद
    • Author, विष्णु स्वरूप
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, तमिल सेवा

उत्तर प्रदेश के अयोध्या से क़रीब 25 किलोमीटर दूर धन्नीपुर नाम का गांव एक शांत इलाक़ा है, जहां छोटे-छोटे घरों के साथ एक मस्जिद और एक मदरसा दिखते हैं.

गांव में प्रवेश करते ही आपको एक खाली पड़ी ज़मीन दिखती है, जहां कुछ बच्चे क्रिकेट खेल रहे हैं. बकरियां चराने वाला एक लड़का भी अपनी बकरियां लेकर मैदान में पहुंचा है.

लगभग शांत दिखने वाले इस गांव का विवादों का अपना अलग इतिहास और इसे लेकर कोर्ट का एक फ़ैसला भी आया है.

साल 2019 में राम मंदिर-बाबरी मस्जिद मामले में सुप्रीम कोर्ट के एक फ़ैसले के बाद नई मस्जिद के निर्माण के लिए पांच एकड़ की जो ज़मीन दी गई थी, वो इसी गांव में है.

ये ज़मीन अब तक ऐसी ही अनछुई पड़ी है. ऐसे में यहां मस्जिद के निर्माण में होने वाली देरी को लेकर सवाल खड़े किए जा रहे हैं.

जहां से ये ज़मीन शुरू होती है वहां पर एक बोर्ड दिखाई देता है जिस पर लिखा है, 'इंडो इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन'. ये उस ट्रस्ट का नाम है जिसे मस्जिद बनाने के लिए वक़्फ़ बोर्ड ने बनाया था.

मस्जिद के लिए ज़मीन का आवंटन

धन्नीपुर मस्जिद

अयोध्या मामले में सुनवाई के बाद 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि बाबरी मस्जिद की विवादित ज़मीन को एक ट्रस्ट को सौंप दिया जाए जो वहां पर एक मंदिर का निर्माण कराए.

इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश सेंट्रल सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड को मस्जिद के निर्माण के लिए पांच एकड़ की ज़मीन आवंटित की जाए. इंडो इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन ट्रस्ट बनाकर मस्जिद के निर्माण के लिए उसे ज़िम्मेदारी दी गई.

एक तरफ जहां राम मंदिर बनाने के लिए 'राम जम्नभूमि तीर्थ क्षेत्र फाउंडेशन' का काम आगे बढ़ता रहा, वहीं धन्नीपुर में मस्जिद बनाने कि लिए दी गई ज़मीन पर कोई काम शुरू नहीं हो सका.

इस ज़मीन पर पहले से ही एक दरगाह बनी हुई है, बीते सालों में इसकी मरम्मत का काम किया गया है.

इसकी दीवार पर एक पोस्टर लगाया गया है जिसमें इस ज़मीन पर भविष्य में बनने वाली मस्जिद की एक तस्वीर छपी है, जिसका नाम "मोहम्मद-बिन-अब्दुल्लाह मस्जिद" होगा.

यहां रहने वालों का क्या कहना है?

धन्नीपुर मस्जिद

बीबीसी की टीम धन्नीपुर गांव पहुंची और मस्जिद के बारे में स्थानीय लोगों से बात करने की कोशिश की तो लोगों ने इस मुद्दे पर बात करने से इनकार कर दिया.

संवेदनशील मुद्दा होने या फिर आशंकित होने के कारण लोग इस मुद्दे पर बात करने से बचते दिखे.

बाबरी मस्जिद ज़मीन विवाद मामले में पक्षकार रहे इक़बाल अंसारी मस्जिद का काम आगे न बढ़ने को लेकर नाराज़ हैं. वो अयोध्या में उस जगह के नज़दीक रहते हैं जहां राम मंदिर बन रहा है.

वो कहते हैं कि मस्जिद बनाने के लिए वक़्फ़ बोर्ड को ज़मीन मिल चुकी है, ऐसे में अब तक काम ही शुरू नहीं हुआ है, और इस पर कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है.

वो कहते हैं, "वक़्फ़ बोर्ड ने ज़मीन का कब्ज़ा ले लिया है. अब ये उनकी ज़िम्मेदारी है कि मस्जिद का काम पूरा हो. जब तक मस्जिद अयोध्या में थी हम लोग उसकी देखरेख का काम करते थे, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में फ़ैसला दे दिया है और पूरे देश के मुसलमानों ने इसका सम्मान भी किया है."

इक़बाल अंसारी
इमेज कैप्शन, इक़बाल अंसारी

इक़बाल अंसारी मस्जिद बनाने में मुसलमान समुदाय की कम दिलचस्पी होने की बात करते हैं और कहते हैं कि देशभर के मुसलमान इसे लेकर सवाल नहीं कर रहे हैं.

वो कहते हैं, "न तो इसे लेकर कहीं कोई प्रदर्शन हुए हैं और न ही तनाव हुआ है. वक़्फ़ बोर्ड के पास ज़मीन है. अब ये उनके ऊपर है कि वो मस्जिद बनाएं. इस देश के मुसलमान उनसे कभी सवाल नहीं करते भले ही वो मस्जिद बनाएं या न बनाएं."

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वहीं इस्लामिक मामलों से जुड़ी ऑल इंडिया मिली काउंसिल के एक सदस्य ख़ालिक अहमद ख़ान शुरुआती वक्त से इस पूरे मामले पर नज़र बनाए हुए हैं. एक नई मस्जिद बनाने को लेकर इस्लाम में क्या कहा गया है, वो इस पर जानकारी देते हैं.

वो कहते हैं कि शरिया क़ानून और वक़्फ़ बोर्ड के नियमों के अनुसार एक मस्जिद को न तो उसकी जगह से हटाया जा सकता है, न तो उसकी जगह कुछ और या किसी नई मस्जिद का ही निर्माण कराया जा सकता है.

वो कहते हैं, "सवाल ये है कि मुसलमानों की इसमें क्या भूमिका है? कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा कि मुसलमानों को किसी और जगह पर मस्जिद के लिए ज़मीन देनी चाहिए! ये हमारे धर्म के दो नियमों के ख़िलाफ़ था. पहले, ये वक़्फ़ के नियम का उल्लंघन था और दूसरा, ये क़ुरान पर आधारित शरिया के नियम का उल्लंघन था."

"क्योंकि वक़्फ़ के नियम के अनुसार मस्जिद और कब्रिस्तान जैसी वक़्फ़ की संपत्तियों को न तो बेचा जा सकता है, न उन्हें गिरवी रखा जा सकता है और न ही उपहार स्वरूप दिया जा सकता है. न तो इसका इस्तेमाल बदला जा सकता है और न ही इसे किसी दूसरी जगह पर बनाया जा सकता है."

हालांकि वो कहते हैं कि वो नई मस्जिद के निर्माण के ख़िलाफ़ नहीं हैं.

मस्जिद निर्माण को लेकर चुनौतियां

ख़ालिक अहमद ख़ान
इमेज कैप्शन, ख़ालिक अहमद ख़ान

इंडो इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन के सचिव अतहर हुसैन मस्जिद बनाने का काम शुरू न हो सकने के पीछे प्राथमिक कारण पैसों की कमी बताते हैं.

वो कहते हैं कि ट्रस्ट इस ज़मीन पर निर्माण को लेकर व्यापक योजना बना रहा है. इस योजना के अनुसार यहां मस्जिद के अलवा एक फ्री अत्याधुनिक कैंसर अस्पताल, एक सामुदायिक कैन्टीन और 1857 की स्वतंत्रता की पहली लड़ाई की यादों को संजोने के लिए एक म्यूज़ियम बनाया जाएगा.

हुसैन कहते हैं कि जितनी उम्मीद थी उससे कम पैसा जमा हो पाया है, इसलिए काम में देरी हो रही है. हालांकि वो ये भी कहते हैं कि काम में तेज़ी लाने के लिए वो पैसे जमा करने के लिए रणनीति बदल रहे हैं.

वो कहते हैं, "इस दिशा में एक बड़ा काम हो गया है, मस्जिद बनाने के लिए जो समिति ज़िम्मेदार है उसने मस्जिद का पहले का डिज़ाइन बदलने का फ़ैसला किया है. उम्मीद है कि इसमें एक सुपर स्पेशलिटी कैंसर अस्पताल और सामुदायिक किचन होगा."

वो कहते हैं, "हमें उम्मीद है कि मस्जिद का जो नया डिज़ाइन बनाया जा रहा है उसके आधार पर प्रोजेक्ट जल्द शुरू होगा. बहुत जल्दी दो-तीन महीनों के भीतर हम इसके लिए एक रोड मैप और टाइम शेड्यूल तैयार कर देंगे."

मस्जिद को लेकर चिंताएं

अतहर हुसैन
इमेज कैप्शन, अतहर हुसैन

धन्नीपुर में बनने वाली नई मस्जिद को लेकर कुछ हलकों में चिंता जताई जा रही थी कि क्या इसे बाबरी मस्जिद की जगह पर बनने वाली मस्जिद माना जाएगा.

इन सवालों के उत्तर में हुसैन स्पष्ट करते हैं कि नई मस्जिद एक रिप्लेसमेन्ट के तौर पर नहीं बनाई जाएगी.

वो इस्लाम के न्यायशास्त्र फ़िक़्ह की अलग-अलग व्याख्याओं को स्वीकार करते हैं और इस बात पर ज़ोर देते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद के विकल्प के तौर पर जो पांच एकड़ की ज़मीन देने की बात की है, उसमें ऐसे कोई स्पष्ट निर्देश नहीं है.

वो इस बात से भी इनकार करते हैं कि मुसलमानों में मस्जिद को लेकर कम दिलचस्पी है. वो कहते हैं कि शुरुआती वक्त में थोड़ा विरोध था लेकिन अब धीरे-धीरे लोग इसे स्वीकार कर रहे हैं और नई मस्जिद और उससे जुड़े दूसरे प्रोजेक्ट को लेकर उनमें उत्साह भी है.

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