नीतीश के बीजेपी के साथ आने से क्या बिगड़ गया है विपक्ष का गणित

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- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना
"दरवाज़े खुले रखो, वे लौट सकते हैं... दरवाज़ों का खुला होना ख़ुद एक उम्मीद है."
भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के खुले दरवाज़े और इंडिया गठबंधन की नीव डालने वाले नीतीश कुमार के उसी खुले दरवाज़े के रास्ते एनडीए में एक बार फिर वापसी की कहानी पर केदारनाथ सिंह की ये पंक्तियां सटीक बैठती हैं.
इस वापसी के साथ ही बिहार में 2024 के लोकसभा चुनाव का सियासी पारा चढ़ना शुरू हो गया है.
बीजेपी की मोदी की गांरटी वाले नारे के बरअक्स विपक्ष का ‘संविधान ख़तरे में है’ का नारा तेज़ी पकड़ रहा है.
रविवार (तीन मार्च) को पटना में विपक्षी इंडिया गठबंधन की पहली संयुक्त रैली में राहुल गांधी, तेजस्वी यादव, अखिलेश यादव, दीपांकर भट्टाचार्य, सीताराम येचुरी, डी राजा, मल्लिकार्जुन खड़गे जैसे नेता शामिल हुए.
ये साफ़ है कि कोई भी बिहार से नज़र नहीं हटाना चाहता है. यहाँ की 40 लोकसभा सीटें सरकार बनाने के लिए हमेशा अहम रहती हैं. 2019 में एनडीए को यहाँ 39 सीटें मिली थीं. इस बार क्या होगा इन सीटों का?
इंडिया अलांयस हो या एनडीए – गुंजाइश दोनों नहीं छोड़ना चाहते हैं.
क्या एनडीए के लिए बिहार की ज़मीन पर फिर से 2019 जैसी जीत दर्ज करना मुश्किल होगा? और अगर होगा तो कितना?
ये सवाल इसलिए और भी ज़रूरी हो जाता है क्योंकि हिंदी भाषी राज्यों में बिहार इकलौता प्रदेश है, जहाँ बीजेपी को कभी मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं मिल पाई है.
आख़िर क्यों – इस पर एक लंबी राजनीतिक सामाजिक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की चर्चा हो सकती है लेकिन फ़िलहाल हम गांधी मैदान की तरफ़ लौटते हैं.
इसमे कोई शक नहीं कि रविवार को समर्थकों से भरे विशाल गांधी मैदान की तस्वीर बिहार में एकतरफ़ा मुक़ाबला की बात तो नहीं कह रही थी.
नीतीश के आने-जाने से बदलता चुनावी गणित

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इंडिया टुडे के हाल के सर्वेक्षण में जब लोगों से पूछा गया कि नीतीश कुमार के बार-बार पाला बदलने से क्या उनकी छवि को स्थायी तौर पर नुक़सान पहुंचा है?
71 प्रतिशत लोगों ने इसका हाँ में जवाब दिया. क्या नीतीश कुमार के इंडिया अलायंस से बाहर जाने से एनडीए को 400 पार जाने में मदद मिलेगी? 48 प्रतिशत लोगों ने इस सवाल का 'ना' में जवाब दिया.
2019 के लोकसभा चुनाव में जब नीतीश एनडीए में थे तब इस गठबंधन को 40 में से 39 सीटें मिली थीं. आरजेडी अपना खाता भी नहीं खोल पाई थी. फिर नीतीश ने एनडीए छोड़कर राजद और कांग्रेस के साथ महागठबंधन का हाथ थामा था.
बिहार को ऐसे राज्य के तौर पर देखा गया जहाँ बीजेपी को विपक्षी गठबंधन से कड़ी चुनौती मिल सकती थी, बावजूद इसके कि ओपिनियन पोल भाजपा की जीत की भविष्यवाणी कर रहे हैं. नीतीश का इंडिया ब्लॉक में होना उसे मज़बूती दे रहा था.
सामाजिक जोड़-तोड़ की राजनीति में माहिर नीतीश कुमार के जाति जनगणना के नतीजे घोषित करने को एक मास्टरस्ट्रोक बताया जा रहा था, जिससे उनकी चर्चा राष्ट्रीय तौर पर हुई.
ओबीसी वोट बैंक का एक बड़े हिस्से को अपनी ओर खींचने वाली भाजपा ऐसा लगा कि बैकफ़ुट पर दिखी.
पश्चिम और उत्तर भारत के हिंदी भाषी राज्यों जैसे हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश आदि में एनडीए पहले ही सियासी रूप से शीर्ष पर है जबकि दक्षिण में अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद लिए बीजेपी के लिए बिहार में अच्छे प्रदर्शन का दोहराना ज़रूरी था.
फिर नीतीश कुमार ने विपक्ष को छोड़कर एक बार फिर से बीजेपी का दामन थाम लिया. प्रधानमंत्री मोदी के साथ एक रैली (02 मार्च, औरंगाबाद) में ठहाकों के बीच नीतीश कुमार ने कहा, "हम आपको आश्वस्त करते हैं कि अब इधर-उधर होने वाले नहीं हैं. हम रहेंगे आप ही के साथ."

नीतीश के चले जाने को विपक्ष के लिए झटके के तौर पर देखा गया.
लेखक और इंडियन एक्सप्रेस में सीनियर असिस्टेंट एडिटर संतोष सिंह कहते हैं, "नीतीश को इंडिया अलायंस से जाने देना कांग्रेस की कूटनीतिक नाकामी थी. अगर नीतीश इंडिया गठबंधन में होते तो बिहार मे विपक्ष को 25 से ज़्यादा सीटें मिल सकती थीं. इससे विपक्ष को राष्ट्रीय स्तर पर फ़ायदा होता."
ईबीसी, महादलित, महिलाओं आदि के हिस्सों को जोड़ लें तो माना जाता है कि नीतीश कुमार के पक्ष में 12-13 प्रतिशत वोट हैं.

नीतीश के जाने से गठबंधन के अलावा भाजपा की भी चुनौतियां बढ़ीं. अब वहाँ सीट मांगने वालों की भरमार है.
एनडीए में भाजपा के अलावा चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी रामविलास (एलजेपीआर), पशुपति पारस की राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी (आरएलजेपी), उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा के अलावा पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी भी हैं.

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वरिष्ठ भाजपा नेता संजय पासवान कहते हैं, "हम लोग 100 प्रतिशत भाजपा की सीट जीतेंगे. थोड़ा संदेह मुझे लगता है जदयू वाली सीटों पर है. भाजपा कार्यकर्ता और बिहार के बाक़ी के लोग उन्हें हमारी क्षमता पर भरोसा है.''
''हमारे नेता और उम्मीदवार सभी सीटों पर तैयारी कर रहे थे. नीतीश जी के आने से बाद से निश्चित तौर से उनका दावा बनेगा. (लेकिन) सपोर्ट बेस में उत्साह कम हो गया है. कहीं न कहीं जदयू के प्रति जो आकर्षण होना चाहिए था, जो आक्रामक आकर्षण हम लोगों के प्रति है, वो उनके प्रति थोड़ा कम है."
एक सोच है कि नीतीश कुमार की धूमिल छवि का असर एनडीए के कुल वोट प्रतिशत पर भी पड़ सकता है, ऐसे वक़्त में जब नौकरी के वायदे पर आरेजेडी का वोटर बेस उत्साहित है.
सहरसा के गांव देहद में हमें नीतीश कुमार को वोट देते रहे महादलित समुदाय के लोगों ने बताया कि वो इस बार उन्हें वोट नहीं देंगे. उनका कहना था कि उनके गांव में विकास की रफ़्तार रुक सी गई है. हालांकि उन्होंने ये नहीं बताया कि वो अपना वोट किसको देंगे.
एनडीए के समक्ष जाति जनगणना की चुनौती

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बिहार में जाति जनगणना के आंकड़े जारी होने के बाद कई राज्यों में ऐसी ही गिनती की बातें शुरू हो गईं हैं. बिहार सरकार ने कहा कि इससे सरकारी योजनाएं बनाने में मदद मिलेगी.
कांग्रेस ने कहा कि वो पार्टी-शासित राज्यों में भी जनगणना करवाएगी. उनके अनुसार, लोगों को संख्या के आधार पर हिस्सेदारी मिलनी चाहिए.
जाति जनगणना ने विपक्ष को बीजेपी के ख़िलाफ़ महत्वपूर्ण मुद्दा दे दिया था, और कहा गया कि विपक्ष बीजेपी के धर्म की राजनीति का मुक़ाबला जाति से करना चाहती है.
ओबीसी के एक बड़े तबक़े के भाजपा के पक्ष में वोट करने के कारण वो न इसका खुलकर विरोध कर पा रही थी, न इसका समर्थन. कई लोग कहने लगे कि इस जनगणना से भाजपा के परंपरागत हिंदू वोट के बिखरने का ख़तरा है.
इंडिया टुडे मैगज़ीन में छपे सर्वेक्षण के मुताबिक़ 49 प्रतिशत लोगों का मानना है कि नीतीश के इंडिया ब्लॉक के बाहर जाने के बाद जाति जनगणना का मुद्दे पीछे नहीं छूटेगा.
राहुल गांधी अपनी रैलियों में जाति जनगणना पर बीजेपी की तीखी आलोचना करते रहे हैं. क्या एनडीए को इससे बिहार में नुक़सान होगा?

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बीबीसी से बातचीत में जन सुराज के संयोजक प्रशांत किशोर ने कहा, “जो लोग जाति जनगणना के नाम पर इतना ढिंढोरा पीटे वही नीतीश कुमार सबसे पहले इंडिया गठबंधन को छोड़कर भाग गए. और उस मुद्दे को राहुल गांधी को चिपका दिया.''
''राहुल गांधी उसे लेकर घूमे जा रहे हैं पूरे देश में और उसका नुक़सान हो रहा है. अब छवि क्या बन रही है - मोदी बात कर रहे हैं पांच ट्रिलियन अर्थव्यवस्था की, देश को आगे बढ़ाने की, प्रोग्रेसिव सोच की, बड़े निर्णयों की और राहुल गांधी क्या बात कर रहे हैं? जाति की.. सही और ग़लत, वो (मोदी) भविष्य की ओर देखने वाले नज़र आ रहे हैं, आप (राहुल) पीछे देखने वाले.”
प्रशांत किशोर कहते हैं, "यूपीए सरकार को कास्ट सर्वे करवाने से किसने रोका था? उन्होंने करवाया तो छापा क्यों नहीं? कास्ट सर्वे हो. कोई दिक़्क़त नहीं है लेकिन क्या यह मुद्दा इतने बड़े चुनाव के केंद्र में हो सकता है? मुझे नहीं लगता."
इंडियन एक्सप्रेस के संतोष सिंह को भी नहीं लगता कि जाति जनगणना का मुद्दा बीजेपी के लिए बड़ी परेशानी खड़ी करेगा.
उनके मुताबिक़, "कांग्रेस ने नीतीश कुमार के नैरेटिव को अपना बना लिया है क्योंकि उनको कोई क्लैरिटी नहीं है. कांग्रेस को कोई मुद्दा नहीं मिल रहा है. उनको लगता है कि बीजेपी धर्म की बात करेगी तो हम जाति की बात करेंगे. लेकिन गवर्नेंस में आप इनसे क्या बेहतर ऑफ़र करेंगे, वो नहीं बोल पा रहे हैं. बीजेपी की ग़लतियां गिना रहे हैं लेकिन ख़ुद क्या ऑफ़र करेंगे ये नहीं बता रहे हैं."
बेरोज़गारी का नुक़सान भाजपा को?

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प्रशांत किशोर अपने भाषणों में कह रहे हैं कि पिछली राज्य सरकारों और 10 साल केंद्र में रही बीजेपी सरकार के बावजूद बिहार पिछड़ा क्यों है?
साल 2020 के विधानसभा चुनाव में तेजस्वी यादव ने बेरोज़गारी को बड़ा मुद्दा बनाया था और सत्ता में आने पर 10 लाख नौकरियां देने का वायदा किया था.
जानकार बताते हैं कि ये पहली बार था कि बिहार में किसी नेता ने इस तरह नौकरियों को चुनाव के केंद्र में रखा था.
हालांकि इसे लेकर एक तर्क ये भी दिया जा रहा है कि जब वोटरों को पता है कि राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय जनता दल इसे लेकर अभी कुछ ख़ास नहीं कर सकती तो लोग लोकसभा चुनाव में अपना वोट क्यों बर्बाद करेंगे.
सुपौल में तेजस्वी यादव की जन विश्वास रैली में हिस्सा लेने आए 23 साल के आक़िब अनवर मिले, जिनके पिता किसान हैं. वो बीटेक कर रहे हैं. वो देखने आए थे कि तेजस्वी यादव अपनी रैली में क्या बात करते हैं.
उन्हें चुनाव में इंडिया अलायंस के दलों से बहुत उम्मीदें थीं. उन्होंने बताया कि नौकरी नहीं मिलने से युवाओं में ग़ुस्सा है.
राष्ट्रीय जनता दल के झंडों और समर्थकों के शोर के बीच उन्होंने बताया, "आरजेडी रोज़गार की बात कर रही है. बेरोज़गारी बहुत बढ़ गई है और युवाओं को नौकरी चाहिए. युवा केंद्र में सरकार बदलना चाहते हैं. कोई परीक्षा अच्छे से होती है तो पेपर लीक हो जाते हैं. उनकी तैयारी बेकार चली जाती है. माहौल बता रहा है कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनेंगे."
बिहार के लिए बेरोज़गारी और पलायन बड़ी चुनौतियाँ रही हैं. बिहार से पलायन के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं लेकिन एक आंकड़े के मुताबिक़ दक्षिणी बिहार की तुलना में उत्तर बिहार से ज़्यादा पलायन होता है.
जाने-माने दिवंगत समाजशास्त्री शैबल गुप्ता ने बिहार के पिछड़ेपन के लिए कई कारण बताए थे, जिनमें अंग्रेज़ों के ज़माने से जुड़ी वजहें भी हैं, जैसे ज़मींदारी प्रथा.
ब्रिटिश शासन के दौरान संसाधनों के अन्यायपूर्ण वितरण को भी ज़िम्मेदार बताया गया है. एक सोच ये भी है कि जब 1990 के आर्थिक सुधारों के बाद देश के कई हिस्सों में आईटी और बीपीओ सेक्टर हालात बदल रहे थे, बिहार बदलते वक़्त का फ़ायदा नहीं उठा पाया और वो कृषि के वर्चस्व वाले गुज़रे वक़्त के पैदावार के तरीक़ों से नहीं निकल पाया.
ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि बिहार में बेरोज़गारी दर देश में सबसे ज़्यादा है.

जन विश्वास यात्रा के दौरान तेजस्वी यादव ने बीबीसी से कहा कि उन्होंने 17 महीनों के कार्यकाल में पांच लाख लोगों को रोज़गार दिया और असल दुश्मन बेरोज़गारी है.
सुपौल से गुज़र रहे तेजस्वी के क़ाफ़िले के पीछे हमने नौजवानों की भीड़ को तेजस्वी के पीछे भागते, उनकी ओर हाथ हिलाते, उनकी तस्वीरें खींचते देखा. उधर "रोज़गार मतलब नीतीश कुमार" के पोस्टर भी पटना में दिख रहे हैं.
बिहार की राजनीति में तेजस्वी के बढ़ते क़द को नज़दीक से देखने वाले संतोष सिंह के मुताबिक़ 2017 में तेजस्वी के विपक्षी नेता के तौर पर भाषण उनकी पहली बड़ी दस्तक थी और 10 लाख नौकरी के वायदे का हिट हो जाना उनकी दूसरी बड़ी दस्तक थी.

हालांकि थिंक टैंक एशियन डिवेलपमेंट रिसर्च इंस्टिट्यूट की अस्मिता गुप्ता के मुताबिक़ बिहार में बेरोज़गारी की समस्या सरकारी नौकरियों से नहीं सुलझ सकती और जब तक बिहार में बड़े पैमाने पर उद्योग नहीं आएंगे, कंपनियां नहीं निवेश करेंगी, सर्विस सेक्टर नौकरियों में बढ़ोतरी नहीं होगी, तब तक स्थिति बेहतर नहीं होगी.
बीजेपी के सामने समाजवाद की चुनौती?

जानकारों के मुताबिक़ ये बिहार में समाजवाद का लंबा इतिहास है, जिसने बीजेपी को अपने बल पर सत्ता से अभी तक दूर कर रखा है.
जेपी आंदोलन से निकले बिहार के नेताओं का पिछले तीन दशकों से बिहार की राजनीति में बोलबाला रहा है.
समाजवादी नेताओं की लंबी सूची में लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार का नाम भी जुड़ा.
हालांकि लालू यादव की जीवनी लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार नलिन वर्मा के मुताबिक़,"नीतीश को समाजवाद के क्लासिक फ़्रेम में रखना ही ग़लत है. ये1994 में ख़त्म हो गया था. नीतीश सत्ता की राजनीति करते हैं. उनका बैकग्राउंड समाजवाद का है और इसलिए बहुत सी बातें आपकी आदत बन जाती हैं और जब आपकी ट्रेनिंग जयप्रकाश नारायण और कर्पूरी ठाकुर के यहां से हुई हो, तो आप ज़हरीले सांप्रदायिक नहीं हो सकते हैं."
चुनाव के पहले का विपक्ष और भाजपा

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नीतीश कुमार और लालू यादव के साथ काम कर चुके प्रेम कुमार मणि विपक्ष की तैयारियों से ख़ुश नहीं हैं. वह कहते हैं कि "विपक्ष की राजनीति की विचारधारा दुरुस्त नहीं है."
वो कहते हैं, "गांधी, नेहरू की एक विचारधारा थी. वहाँ तो स्थिर रहें. जैसे ही आप दूसरे के नारों को चुराइएगा तो फिर आप उससे लड़ नहीं पाइएगा. नरम हिंदुत्व क्या होता है?"
आरएसएस और भाजपा पर हमले कर रही कांग्रेस पर नरम हिंदुत्व के रास्ते पर चलने के आरोप लगते रहे हैं.
प्रेम कुमार मणि कहते हैं, "राहुल जी ने पिछला भारत जोड़ो आंदोलन किया. हमने प्रशंसा की. अब चुनाव होने वाला है, आपको ये नई यात्रा शुरू करनी चाहिए थी? नोट्स लिखने का समय परीक्षा के एक दिन पहले का नहीं होता है.''
''अभी वक़्त है लिखे नोट्स को दोहराने, तिहराने का. चुनाव की घंटी बजने वाली है और आप यात्रा पर हैं. फिर शायद विदेश चले गए हैं. राजनीति को आप खिलवाड़ नहीं समझ सकते. ये 24 घंटों की नौकरी है. यहां तेजस्वी ने यात्रा शुरू की और प्रधानमंत्री बिहार आ गए. फिर अमित शाह आ रहे हैं. कौन गंभीर है राजनीति के प्रति?"
राहुल गांधी की यात्रा की टाइमिंग की आलोचना नई नहीं और कांग्रेस ऐसी आलोचनाओं को नकारती रही है. साथ ही ये भी सवाल उठे हैं कि विपक्ष की पार्टियां अलग-अलग यात्रा करने की बजाय संयुक्त यात्रा क्यों नहीं कर रही हैं.
कांग्रेस नेता डॉक्टर शकील अहमद ख़ान कहते हैं, "ऐसा नहीं है कि हम चीज़ों को सीरियसली नहीं लेते. लेते हैं, लेकिन माहौल ऐसा बनाया जाता है कि हम नॉन-सीरियस हैं."
उधर प्रेम कुमार मणि सोशल इंजीनियरिंग की बिसात बिछाने के लिए भाजपा की कोशिशों को श्रेय देते हैं.
प्रेम कुमार मणि कहते हैं, "जब नीतीश कुमार ने शपथ ग्रहण किया, तो उनके चार मंत्रियों ने शपथ ली. दो ख़ुद वो और श्रवण कुमार उनकी जाति से, दो अगड़ी जाति और एक यादव. ये (अगडी और यादव जातियां) नीतीश कुमार का वोट बैंक नहीं हैं. आप क्या राजनीति कर रहे हैं? भाजपा ने अपना तीन मंत्री बनाया. एक ओबीसी, एक ईबीसी, एक अगड़ी जाति. बीजेपी राजनीति कर रही है या आप राजनीति कर रहे हैं?"

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राज्यसभा में जहाँ बीजेपी ने भीम सिंह (ईबीसी) और धर्मशीला गुप्ता (ओबीसी) को भेजा, आरजेडी ने मनोज झा और संजय यादव का चयन किया. कांग्रेस ने अखिलेश प्रसाद सिंह को जबकि जदयू ने नीतीश कुमार के निकट सहयोगी संजय झा को राज्यसभा भेजा.
आरजेडी के एक नेता ने बातचीत में राज्यसभा के लिए चुने गए नामों पर घोर असहमति जताई.
लालू यादव के "जंगलराज" की विरासत को तेजस्वी के लिए बोझ बताने वाले प्रेम कुमार मणि कहते हैं, "राजद, कांग्रेस, जदयू कौन सी राजनीति कर रही है? भाजपा सबको समेटने के चक्कर में है. लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार भी केंद्र में मंत्री रहे. कभी (उन्होंने) कैबिनेट में आवाज़ नहीं उठाई कि कर्पूरी ठाकुर जी को (भारत रत्न) दिया जाए."
वो कहते हैं, "उनकी (भाजपा की) राजनीति को आप फ़ासिस्ट कह लीजिए, दक्षिणपंथी कह लीजिए, जो कहना है वो कहिए लेकिन जो सोशल इंजीनियरिंग वो कर रहे हैं, आप नहीं कर रहे हैं, जबकि नारा आपका था. उन्होंने राष्ट्रपति के दो उम्मीदवार बनाए. एक दलित तो दूसरा आदिवासी. राजस्थान में ब्राह्मण (मुख्यमंत्री) है, गुजरात में कुर्मी है, मध्य प्रदेश में यादव है, छत्तीसगढ़ में एक आदिवासी."
लेखक और पत्रकार नलिन वर्मा लालू यादव की विरासत को बोझ बताने से सहमत नहीं और कहते हैं कि तेजस्वी मनोज झा और संजय यादव को राज्यसभा में भेजकर एक नई टीम बना रहे हैं.

आंदोलनों की ज़मीन रहा बिहार राजनीति की तासीर को हमेशा गर्म ही रखता है. ज़मीन पर हो रही आम लोगों की हलचल राजनेताओं को अपने तरकश के हर तीर को आज़माने को मजबूर कर ही देगी. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि निशाना फिर भी सधेगा या नहीं?
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