पश्चिम बंगाल: ममता बनर्जी के क़िले को क्या इस बार भी भेद पाएगी पीएम मोदी की बीजेपी

नरेंद्र मोदी और ममता बनर्जी

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    • Author, विनीत खरे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, कोलकाता

संदेशखाली, भ्रष्टाचार, टीएमसी नेताओं और अफ़सरों के ख़िलाफ़ जांच और आरोप, बेरोज़गारी, नेताओं का पार्टियां बदलना, सीएए क़ानून, देश के भीतर घुसपैठ... पश्चिम बंगाल में राजनीतिक भिड़ंत के लिए विषयों की कमी नहीं, लेकिन आपको लोग कहते नज़र आएंगे कि किसी भी लोकसभा सीट पर उम्मीदवार चाहे जो भी हो, ये चुनाव मोदी बनाम ममता बनर्जी है. पश्चिम बंगाल दीदी का प्रदेश है. कहीं भी देखिए, यहां हर जगह वही नज़र आती हैं.

साल 2011 में 34 साल राज करने वाली वामपंथी सरकार के ख़िलाफ़ ऐतिहासिक जीत दर्ज करने वाली ममता बनर्जी 2014 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल की 42 में से 34 सीटें और फिर 2016 का विधानसभा चुनाव जीत कर राज्य में अपना सिक्का जमा चुकी थीं.

लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 18 सीटें जीतकर सबको चौंका दिया. 2024 के चुनाव में एनडीए के लिए 400 पार का लक्ष्य रखने वाली भाजपा क्या पश्चिम बंगाल में इस बार भी 2019 जैसी जीत हासिल कर पाएगी? ख़ासकर ऐसे में जब वहां संदेशखाली, भ्रष्टाचार और बेरोज़गारी जैसे बड़े मुद्दे हैं.

एक ओपिनियन पोल ने भाजपा को इस बार 25 सीटें दी हैं, एक दूसरे ने 19 जबकि एक अन्य ने 20 सीटें. बीबीसी से बातचीत में चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने कहा कि बंगाल में भाजपा को बेहतर परिणाम मिल सकते हैं, जबकि टीएमसी नेता कुणाल घोष ने बातचीत में तृणमूल को 30-35 सीटें मिलने का दावा किया है.

भाजपा प्रवक्ता शामिक भट्टाचार्य ने जहां पार्टी का टार्गेट 35 बताया, सेंटर फ़ॉर स्टडीज़ इन सोशल साइंसेज़ से जुड़े राजनीतिक विश्लेषक मैदुल इस्लाम को नहीं लगता कि "भाजपा अपनी स्थिति मज़बूत करेगी."

इंडिया गठबंधन से अलग होकर सभी 42 सीटों से चुनाव लड़ने वाली टीएमसी के लिए आलोचकों को ये दिखाने की चुनौती है कि वो प्रधानमंत्री मोदी को अकेले रोक सकती हैं.

अगर ऐसा हुआ तो देश के विपक्षी नेताओं में ममता बनर्जी का क़द बढ़ेगा लेकिन अगर ऐसा नहीं हो पाया तो पार्टी से और नेताओं के टूटने और अगले विधानसभा चुनाव में पार्टी के संभावित प्रदर्शन पर सवाल उठने के डर की बात की जा रही है.

ऐसे वक़्त में जब सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे हैं और अनुब्रत मंडल और पार्थ चटर्जी जैसे नेता जेल में हैं.

आख़िर क्या होगा, बताना मुश्किल है, लेकिन भाजपा ने बंगाल में जीत के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगा दिया है - पश्चिम बंगाल में प्रधानमंत्री मोदी, अमित शाह की लगातार होती सभाएं, वरिष्ठ टीएमसी नेताओं का भाजपा में आना, भाजपा का प्रचार-प्रसार और बहुत कुछ.

उत्तर भारत में अपने राजनीतिक चरम में पहुंच चुकी भाजपा को पता है कि उसके लिए पश्चिम बंगाल कितना महत्वपूर्ण है, इसलिए ज़रूरी है कि वो यहां अच्छा प्रदर्शन करें. लेकिन भाजपा के लिए चुनौतियां भी कम नहीं हैं.

क्या भाजपा अपना प्रदर्शन दोहरा सकती है?

विश्लेषक मैदुल इस्लाम
इमेज कैप्शन, विश्लेषक मैदुल इस्लाम

15 मार्च की शाम कोलकाता में भाजपा नेता शामिक भट्टाचार्य के घर के गेट पर कैमरे लिए पत्रकारों की भीड़ थी. सामने लकड़ी की ऊंची मेज़ पर माइक का ढेर था.

अंदर कमरे में एक दीवार पर लगे टीवी पर दिल्ली भाजपा से एक पत्रकार सम्मेलन का सीधा प्रसारण आ रहा था.

स्क्रीन पर टीएमसी नेता अर्जुन सिंह और दिब्येंदु अधिकारी थे जिन्होंने पार्टी छोड़कर भाजपा का हाथ थामा था. राज्य में पार्टी बदलने वाले नेताओं की लंबी फ़ेहरिस्त है.

पत्रकारवार्ता समाप्त होने के बाद 40 साल से संगठन के साथ जुड़े शामिक भट्टाचार्य ने कहा, "अमित शाह जी ने 35 सीटों की बात की है. हम उसे साकार करने के लिए जुटे हैं. तृणमूल को लोग नकार चुके हैं."

राजनीतिक विश्लेषक, मैदुल इस्लाम
BBC
बंगाल में बीजेपी के पास कोई जननेता नहीं है. शुभेंदु अधिकारी टीएमसी नेताओं पर निजी हमले कर रहे हैं जो कि बंगाल के राजनीतिक रूप से जागरुक मतदाताओं को पसंद नहीं हैं.
मैदुल इस्लाम
राजनीतिक विश्लेषक

माना जाता है कि 2019 लोकसभा नतीजों की एक वजह टीएमसी-विरोधी वोट का भाजपा के पक्ष में संगठित होना था.

विश्लेषक मैदुल इस्लाम के अनुसार, 2019 मे बहुत सारा वामपंथी वोट भाजपा की ओर चला गया था, और उसकी एक बड़ी वजह थी 2018 के पंचायत चुनाव में टीएमसी पर घपले के आरोप थे जिससे लोग बेहद नाराज़ थे. भाजपा के पक्ष में वोट करने की एक और वजह थी बंगाल के राजनीतिक चक्रव्यूह में कार्यकर्ताओं में सुरक्षा की दरकार क्योंकि वामपंथी दलों और कांग्रेस का गठजोड़ न होने के कारण लोगों के पास विकल्प सीमित थे, और उन्हें भाजपा में बेहतर विकल्प नज़र आया.

उनके मुताबिक़ वामपंथी पार्टियों का वोट अब उनके पास वापस आ रहा है जिससे उन्हें नहीं लगता कि भाजपा अपनी सीटों में सुधार कर पाएगी.

वरिष्ठ पत्रकार शिखा मुखर्जी के हिसाब से किसी ने नहीं सोचा था कि वामपंथी वोट भाजपा को इस तादाद में जाएगा.

माकपा नेता मोहम्मद सलीम
इमेज कैप्शन, माकपा नेता मोहम्मद सलीम का दावा है कि पार्टी का वोट अब उसके पास वापस आ रहा है
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पूर्व वाम नेताओं की तस्वीरों से पटे पड़े सीपीएम दफ़्तर में चाय के बीच मोहम्मद सलीम ने बताया कि पिछले दो सालों में उनसे छिटका वोटरों का एक हिस्सा वापस आया है, और सुबूत के तौर पर वो 2023 के पंचायत चुनाव और 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद हुए उपचुनाव का हवाला देते हैं जहां वामपंथी वोटों में इज़ाफ़ा हुआ.

वो वोट में इज़ाफ़े की वजह पार्टी में नई पीढ़ी के नेताओं, जिनमें मीनाक्षी मुखर्जी का नाम लिया जाता है, उनका उभरना बताते हैं. हाल ही में वाम संगठन डेमोक्रेटिक यूथ फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया का इंसाफ़ यात्रा निकालना और कोलकाता के ब्रिगेड ग्राउंड में एक बड़ी रैली करना, इसे वामपंथियों के जनाधार को वापस खींचने की कोशिश के तौर पर देखा गया है.

लेकिन पत्रकार शिखा मुखर्जी नहीं मानतीं कि लोकसभा चुनाव में लेफ़्ट वोट वापस आएगा, और उनके अनुसार भीड़ को वोट से जोड़ना ठीक नहीं है.

उधर, राजनीतिक रणनीतिज्ञ प्रशांत किशोर कहते रहे हैं कि सत्ता के हर स्तर पर, यानी पंचायत, विधानसभा और लोकसभा में, तृणमूल का हावी होना उनके लिए सिरदर्दी भी पैदा कर सकता है, और संदेशखाली जैसे मद्दों का नुक़सान सत्ताधारी पार्टी को होता है.

भाजपा समर्थकों को उम्मीद है कि सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप, बेरोज़गारी, सीएए जैसे मुद्दों का उन्हें फ़ायदा होगा और उनके वोटों और सीटों में वृद्धि होगी क्योंकि चाहे सीएए हो, या धारा 370 को हटाना हो या राम मंदिर का निर्माण, वो अपने वोटरों से कह सकते हैं कि उन्होंने जो वायदे किए थे, उन्हें पूरा किया.

भाजपा के लिए चुनौतियां

ममता बनर्जी का पोस्टर

बंगाल में भाजपा की चुनौतियों के बारे में बात करें तो ये बात बार-बार सुनने के लिए मिलता है कि बंगाल में दीदी को टक्कर देने के लिए भाजपा के पास मज़बूत संगठन, कोई बड़ा चेहरा (मास लीडर) नहीं है और उनके कई नेता टीएमसी से आयातित हैं. लोग बताते हैं कि टीएमसी के मज़बूत ज़मीनी संगठन के सामने भाजपा का उभरना आसान नहीं है.

पश्चिम बंगाल में शुभेंदु अधिकारी बीजेपी का चेहरा हैं. ममता बनर्जी के नज़दीक माने जाने वाले शुभेंदु साल 2020 में कई टीएमसी नेताओं के साथ भाजपा में शामिल हुए थे. अब उनके भाई दिब्येंदु अधिकारी, अर्जुन सिंह और तपस रॉय भी भाजपा में आ गए हैं.

मैदुल इस्लाम कहते हैं, "भाजपा का बंगाल में कोई मास लीडर (या बड़ा नेता) नहीं है. (टीएमसी से भाजपा में आए) शुभेंदु अधिकारी तृणमूल नेताओं पर निजी हमले कर रहे हैं. (लेकिन) बंगाल के वोटर राजनीतिक तौर पर जागरूक हैं. उन्हें निजी हमले पसंद नहीं."

उनका तर्क है कि जब शुभेंदु अधिकारी ने तृणमूल छोड़ा तो उनका जनाधार पूरी तरह भाजपा में नहीं गया. इसकी वजह है आम लोगों की मदद के लिए बंगाल सरकार पर उनकी निर्भरता. उन्हें लगता है कि अगर पद पर नए लोग आएंगे तो उन्हें उनसे नए तरह के रिश्ते बनाने पड़ेंगे.

मैदुल इस्लाम कहते हैं, "पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार ये तीन राज्य हैं जहां लेबर ज़्यादा हैं. वो राज्यों पर मदद के लिए बहुत निर्भर होते हैं. यहां राजनीतिक हिंसा भी ज़्यादा होती है क्योंकि बहुत लोग नेताओं पर निर्भर होते हैं. उन्हें लगता है कि अगर नेता चला गया या बदल गया तो हमें मदद कैसे मिलेगी."

शिखा मुखर्जी के मुताबिक़ भाजपा का बंगाल में किसी आंदोलन से न जुड़ना, राममंदिर आंदोलन का बंगाल में असर न होना आदि भाजपा के लिए चुनौतियां हैं.

वो कहती हैं, "वो इस राज्य को जानते ही नहीं. वो विपक्ष में इसलिए हैं क्योंकि यहां वामपंथी दल और कांग्रेस कमज़ोर हैं."

BBC
समाज से आपको लोग लेने पड़ेंगे. अगर कोई हमारे राष्ट्रवाद, संस्कृति, एजेंडों को मानकर आए तो हम लेते हैं. इसका ये मतलब नहीं है कि भाजपा बाहरवालों से चलती है.
शामिक भट्टाचार्य
भाजपा नेता

उधर, टीवी पर टीएमसी नेताओं अर्जुन सिंह और दिब्येंदु अधिकारी को भाजपा में शामिल होते देखने के कुछ मिनट बाद भाजपा नेता शामिक भट्टाचार्य ने कहा, "समाज से आपको लोग लेने पड़ेंगे. अगर कोई हमारे राष्ट्रवाद, संस्कृति, एजेंडों को मानकर आए तो हम लेते हैं. इसका ये मतलब नहीं है कि भाजपा बाहरवालों से चलती है."

ज़मीन पर टीएमसी और वाम दलों के मुक़ाबले भाजपा की संगठन की कमज़ोरी पर शामिक भट्टाचार्य कहते हैं, "संगठन की स्थिति क्या है, ये हम किसी पत्रकार को नहीं बताएंगे लेकिन इस चुनाव में हर बूथ पर हमारा एजेंट रहेगा."

भाजपा के लिए एक और चुनौती है राज्य के क़रीब 30 प्रतिशत मुसलमान वोटरों में से बड़ी संख्या की पार्टी से दूरी. कहना ग़लत नहीं होगा कि सीएए क़ानून ने इस दूरी को कम नहीं किया है.

कोलकाता शहर से आगे आईटी सहित दूसरी कंपनियों से भरे न्यूटाउन के बाद गाड़ियों से भरी सड़कों, संकरी सड़कों और काफ़ी भीड़भाड़ से होते हुए हम हादीपुर गांव पहुंचे जहां मोहम्मद क़मरुज़्ज़मां एक शैक्षिक संस्थान की इमारत में मिले.

ऑल बंगाल माइनॉरिटी यूथ फ़ेडरेशन के महासचिव क़मरुज़्ज़मां
इमेज कैप्शन, ऑल बंगाल माइनॉरिटी यूथ फ़ेडरेशन के महासचिव क़मरुज़्ज़मां

क़मरुज़्ज़मां ऑल बंगाल माइनॉरिटी यूथ फ़ेडरेशन के महासचिव हैं. इस संगठन के बंगाल में 40-50 हज़ार सदस्य हैं. उनके मुताबिक़ "मुसलमान समझते हैं कि भाजपा मुसलमानों के ख़िलाफ़ है" और "मुसलमान टीएमसी के भी ख़िलाफ़ हैं" लेकिन मुसलमानों के पास टीएमसी को वोट देने के अलावा विकल्प नहीं है.

बंगाल में मुसलमानों से बात करें तो वो शिक्षा और बेरोज़गारी को बड़ी चुनौती बताते हैं लेकिन क़मरुज़्ज़मां के मुताबिक़, जहां अयोध्या में प्रधानमंत्री मोदी राम मंदिर का उद्घाटन कर रहे हैं, ममता बनर्जी दीघा में मंदिर बनवा रही हैं.

वो कहते हैं, "सरकार का काम धर्म का काम करना नहीं है, बल्कि सभी की भलाई का काम करना है. मोदी जिस तरफ़ जा रहे हैं, ममता भी उसी तरफ़ जा रही हैं... मुसलमान वोट मजबूरी में सॉफ़्ट हिंदुत्व के साथ है."

BBC
सरकार का काम धर्म का काम करना नहीं है, बल्कि सभी की भलाई का काम करना है. मोदी जिस तरफ़ जा रहे हैं, ममता भी उसी तरफ़ जा रही हैं...मुसलमान वोट मजबूरी में सॉफ़्ट हिंदुत्व के साथ है.
मोहम्मद क़मरुज़्ज़मां
ऑल इंडिया बांगला माइनॉरिटी यूथ फ़ेडरेशन

मुसलमानों में उच्च शिक्षा और बेरोज़गारी की समस्या के अलावा क़मरुज़्ज़मां ममता बनर्जी से इसलिए भी नाराज़ हैं कि उन्होंने गठबंधन के साथ चुनाव लड़ने के बजाय अकेले लड़ने का फ़ैसला किया.

उनके मुताबिक़, इससे कांग्रेस-वाम दलों और तृणमूल का वोट बंटेगा. एक सोच ये भी है कि इस त्रिकोणीय मुक़ाबले से तृणमूल को फ़ायदा होगा.

वो कहते हैं, "वोट के दो-चार दिन पहले हम घोषणा करेंगे कि हर चुनाव क्षेत्र में किसको वोट दिया जाए ताकि भाजपा को हराने के लिए (पता चले) किसको वोट देना है."

शिखा मुखर्जी के मुताबिक़ ममता अधीर रंजन चौधरी या वाम दलों से समझौता नहीं करना चाहतीं, इसलिए उनके पास विकल्प ही नहीं बचे थे.

भाजपा का पलटवार

संदेशखाली बाजार में लगे भाजपा के झंडे
इमेज कैप्शन, संदेशखाली बाजार में लगे भाजपा के झंडे

भाजपा वोटरों को स्थिर सरकार देने का भरोसा दिला रही है और संदेशखाली ने भाजपा को राज्य सरकार पर हमला करने का एक बड़ा मुद्दा दिया है. भाजपा ने महिला सम्मान और धूमिल हुई टीएमसी की छवि को बड़ा मुद्दा बनाया है.

बशीरहाट लोकसभा क्षेत्र में पड़ने वाले संदेशखाली की महिलाओं ने टीएमसी के स्थानीय नेताओं पर यौन उत्पीड़न और खेती की ज़मीन पर क़ब्ज़े का आरोप लगाया है.

कोलकाता से साढ़े तीन घंटे की ड्राइव और फिर एक छोटी सी नाव से नदी पार कर संदेशखाली द्वीप पहुंचा जाता है. रास्ते में सड़क के दोनों तरफ़ लहलहाती फ़सलों की जगह बाड़ से घेरी हुई पानी से भरी ज़मीनें दिखती हैं जहां मछली पालन होता है. संदेशखाली की सड़कों के किनारे, दुकानों, घरों पर भाजपा, लेफ़्ट और टीएमसी के झंडों के अलावा पुलिसकर्मी दिखे लेकिन बेहद ग़रीबी में रह रहीं यहां की महिलाएं और पुरुष डरे हुए हैं.

टीएमसी से निकाल दिए गए शाहजहां शेख़ के अलावा कुछ और लोग पुलिस की गिरफ़्त में हैं, लेकिन यहां लोग बहुत सोच-समझ कर शब्दों का चुनाव करते हैं. आगे कभी पुलिस का कथित संदिग्धों को छोड़ देने का डर इसकी मुख्य वजह है. एक ने कहा, दीदी ख़राब नहीं हैं. कुछ लोग हिरासत या गिरफ़्तारी के डर से भी पुलिस की पूछताछ के ख़ौफ़ में हैं.

मतुआ संघ का दफ्तर
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बेहद संभल कर बात कर रही महिलाओं ने कहा कि वो टीएमसी को ही वोट देंगी, हालांकि उनके चेहरे के भाव से लगा कि वो ये बात बहुत उत्साह से नहीं कह रहीं थीं. क्या इसकी वजह कोई दबाव है, या फिर ये महिलाएं बातें छिपा रहीं थीं, ये साफ़ नहीं था. एक ने कहा कि ज़मीन पर भाजपा के पास उस तरह के कार्यकर्ता और संगठन नहीं हैं, जो टीएमसी के पास हैं.

शाहजहां के घर के नज़दीक सड़क के किनारे एक दुकान के बाहर कुछ लोग मिले जिनका दावा था कि यौन उत्पीड़न की बात झूठ है, मीडिया बिकी हुई है, भाजपा राजनीति कर रही है और शाहजहां की गिरफ़्तारी से क्या होता है, जीतेगी तो टीएमसी ही.

नज़दीक ही कपड़े, मछली आदि की छोटी-छोटी दुकानों से भरे शाहजहां बाज़ार में मोहम्मद उस्मान अंसारी का दावा था कि इन आरोपों से टीएमसी वोट पर कोई असर नहीं पड़ेगा.

एक अन्य व्यक्ति ने कहा कि राजनीति से संबंध होने के कारण लोग शाहजहां से डरते थे, कई लोग टीएमसी को वोट नहीं देंगे और इस मुद्दे से "माहौल भाजपा के लिए बना है."

मैदुल इस्लाम मानते हैं कि शाहजहां शेख़ की गिरफ़्तारी के बाद संदेशखाली का मामला ख़त्म हो गया है और इसका चुनाव पर कोई असर नहीं पड़ेगा, हालांकि उनके मुताबिक़ गिरफ़्तारी में देरी हुई. यानी संदेशखाली के राजनीतिक असर पर मत बंटा हुआ है.

टीएमसी नेता कुणाल घोष के मुताबिक़ सरकार ने गिरफ़्तारी आदि के अलावा कई क़दम उठाए हैं. वो पलटकर भाजपा को उन्नाव, हाथरस, मणिपुर आदि की याद दिलाते हैं.

टीएमसी पर भाजपा का भ्रष्टाचार को लेकर हमला

शिक्षक भर्ती घोटाले के विरोध में धरने पर बैठीं संगीता नाग
इमेज कैप्शन, शिक्षक भर्ती घोटाले के विरोध में धरने पर बैठीं संगीता नाग

जानकार बताते हैं कि पश्चिम बंगाल में तृणमूल के आने के बाद पहली बार भ्रष्टाचार एक मुद्दा बना है. पीडीएस स्कैम, कैटल स्मगलिंग स्कैम, टीचर रिक्रूटमेंट स्कैम, मंत्रियों, नौकरशाहों की गिरफ़्तारी आदि ने सरकार की छवि प्रभावित की है. शिखा मुखर्जी भी भ्रष्टाचार के मुद्दे को तृणमूल को नुक़सान पहुंचाने वाला मानती हैं.

जहां टीएमसी भ्रष्टाचार के आरोपों और जांच एजेंसियों की कार्रवाई को राजनीति से प्रेरित बता रही है, वहीं एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने कहा, "हर राज्य में भ्रष्टाचार होता है लेकिन सरकार के भीतर कम भ्रष्टाचार होता है लेकिन यहां तो सारी सरकार भ्रष्ट है."

भाजपा ने भी इसे मुद्दा बनाया है.

कोलकाता के प्रेस क्लब के नज़दीक चौराहे पर बनी महात्मा गांधी की मूर्ति के निकट मुझे फुटपाथ पर बैठीं 31 साल की संगीता नाग मिलीं. उनके जैसे दर्जनों छात्र महीनों से कक्षा नौ से 12 की सरकारी शिक्षकों की भर्ती में कथित घोटाले के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे हैं.

उन्होंने 2016 में पदों के लिए सरकारी परीक्षा दी थी. उस समय उनकी उम्र 23 साल थी. उनके मुताबिक़ उन्हें लगा कि नौकरी मिल जाएगी, लेकिन फिर कथित भ्रष्टाचार की बात अदालत तक पहुंच गई. सीबीआई मामले की जांच कर रही है.

पहले ये प्रदर्शन 2019 में भूख हड़ताल से शुरू हुआ, दूसरे चरण में सॉल्ट लेक इलाक़े में प्रदर्शन हुए और अब गांधी मूर्ति के नज़दीक अनगनित गाड़ियों से भरी सड़क के किनारे 16-17 अन्य छात्रों की मौजूदगी में ये प्रदर्शन चल रहे हैं.

हालात से निराश संगीता बताती हैं कि महीनों के प्रदर्शन के बावजूद छात्रों की कोई सुनने वाला नहीं है. राज्य में पढ़े-लिखे युवाओं को नौकरी नहीं मिल रही है जिससे युवाओं में सरकार के ख़िलाफ़ नाराज़गी है. उनके पास बैठे 37 साल के स्वरूप बिश्वास को समझ नहीं आ रहा है कि इस उम्र में वो क्या करें.

सीएए क़ानून की घोषणा

ऑल इंडिया मतुआ महासंघ प्रमुख और टीएमसी राज्यसभा सांसद ममता ठाकुर
इमेज कैप्शन, ऑल इंडिया मतुआ महासंघ प्रमुख और टीएमसी राज्यसभा सांसद ममता ठाकुर

भाजपा पर आरोप लग रहे हैं कि सीएए क़ानून लाने की टाइमिंग राजनीति से प्रेरित है, लेकिन वो इसे जनता को किया गया वादा बता रही है.

लेकिन सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि इसका लोकसभा चुनाव पर क्या असर होगा?

ऑल इंडिया बांग्ला माइनॉरिटी यूथ फ़ेडरेशन के मोहम्मद क़मरुज़्ज़मां ने सीएए का स्वागत किया और कहा कि सीएए को लेकर प्रदर्शन 'इज़्ज़त' के सवाल को लेकर हुए थे. उधर, मैदुल इस्लाम के मुताबिक़ इस घोषणा का असर एक या दो सीटों पर पड़ेगा.

ख़बर आईं कि नागरिकता की मान्यता मिलने से मतुआ समुदाय उत्साहित है. यही जानने हम कोलकाता से 62 किलोमीटर दूर बांग्लादेश से लगे गांव ठाकुरनगर पहुंचे.

ये वही गांव है, जहां बांग्लादेश से मतुआ समुदाय के लोग दशकों से अपनी सुरक्षा के डर से आते रहे हैं. 1971 की लड़ाई के दौरान ये जगह शरणार्थियों से भरी थी. आज पास में एक रेल लाइन है, खुला मैदान है जहां उत्सव की तैयारी चल रही थी, पूरे गियर के साथ क्रिकेट की प्रैक्टिस करते बच्चे हैं.

यहां हमें साल 1943 में बने ऑल इंडिया मतुआ महासंघ प्रमुख और टीएमसी राज्यसभा सांसद ममता ठाकुर मिलीं. उन्होंने बताया कि जहां भारत में मतुआ समाज की बड़ी आबादी रहती है, पश्चिम बंगाल में उनकी जनसंख्या दो से ढाई करोड़ है. उनका प्रभाव 65 विधानसभा की सीटों और बनगांव, राणाघाट, बर्धमान, मालदा उत्तर, उत्तर दिनाजपुर जैसी लोकसभा सीटों पर है.

रेफ़्युजी कैंप में रहने का दर्द देख चुकीं ममता ठाकुर के मुताबिक़, 99 प्रतिशत लोगों के पास काग़ज़ात नहीं हैं जिसकी मदद से वो इस क़ानून के अंतर्गत नागरिकता के लिए दरख़्वास्त कर सकें.

हां, इस क़ानून का विरोध कर रही टीएमसी और भाजपा के बीच ठनी हुई है, यहां कई स्थानीय लोगों ने बताया कि उन्हें इस क़ानून के बारे में या फिर काग़ज़ात को लेकर कोई जानकारी नहीं है. एक स्थानीय व्यक्ति ने कहा कि नागरिकता पाने के लिए किसी भी काग़ज़ात का प्रावधान ख़त्म होना चाहिए. एक अन्य ने कहा कि भाजपा को क़ानून का फ़ायदा मिल सकता है, हालांकि हमें जितने लोग मिले, सबने कहा कि वो टीएमसी को वोट देते रहे हैं.

सिविल इंजीनियर हिमाद्री मंडल ने बताया कि उनके पास पैन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस और पासपोर्ट के अलावा सीमा पार करते वक़्त उनके पिता को दी गई बॉर्डर स्लिप भी है, और क़ानून आने के बाद आजकल उस स्लिप को ही ढूंढ रहे हैं.

इंडिया अलायंस क्या करेगा?

शाहजहां बाजार संदेशखाली
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जानकारों के मुताबिक़ ममता बनर्जी सरकार भाजपा की चुनौती से निपटने के लिए जनता की मदद के लिए चलाई जा रही सरकारी स्कीमों पर ज़ोर दे रही है.

इनमें राज्य की लक्ष्मी भंडार स्कीम और स्वास्थ्य साथी जैसी स्कीमें हैं. आर्थिक रूप से कमज़ोर महिलाओं को मदद करने वाली लक्ष्मी भंडार स्कीम में सरकार ने वृद्धि की है. लक्ष्मी भंडार स्कीम के तहत अब एससी/एसटी कैटेगरी की महिलाओं को हर महीने 1,200 रुपये और जनरल कैटेगरी की महिलाओं को 1000 रुपये प्रतिमाह दिए जाएंगे.

स्वास्थ्य साथी स्कीम का मक़सद लोगों को इलाज के लिए बीमा से मदद पहुंचाना है.

टीएमसी लगातार आरोप लगाती रही है कि केंद्र से जो उसे संसाधन मिलने चाहिए थे वो नहीं मिल रहे हैं.

मैदुल इस्लाम कहते हैं, "तृणमूल का मुद्दा है कि केंद्र सरकार हमारे साथ अन्याय कर रही है. ये कि 1905 से लेकर हमारे साथ बंगाल में अन्याय हुआ. बंगाल को तोड़ा गया, हमारे नेताओं को उठने नहीं दिया, सुभाष बोस के साथ ग़लत हुआ, यहां से राजधानी चली गई, फ़ेडरिलज़्म (संघवाद) का मुद्दा दोबारा आ गया है. राज्यों को पैसा नहीं मिल रहा है. एक लाख साठ हज़ार करोड़ लटका हुआ है. ये भी कि बाहर के नेता बंगाल को नहीं चला सकते."

कांग्रेस, वाम दल और टीएमसी अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन साथ ही वो ये भी कह रहे हैं कि उनका मक़सद भाजपा को हराना है और वो लोकसभा चुनाव के बाद तालमेल की बात कर सकते हैं. उसकी ज़रूरत पड़ेगी या नहीं, ये तो चार जून को ही पता चलेगा.

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