चुनाव से ठीक पहले सीएए लागू करके बंगाल और असम में बीजेपी को क्या लाभ होगा?

सीएए लागू होने पर जश्न मनाते दिल्ली बीजेपी के नेता

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    • Author, प्रभाकर मणि तिवारी और दिलीप कुमार शर्मा
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, कोलकाता और गुवाहाटी से

नागरिकता संशोधन क़ानून लागू करने के केंद्र सरकार के फ़ैसले पर पूरे देश से मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आ रही हैं. लेकिन सबसे तीखी प्रतिक्रिया पश्चिम बंगाल और असम से आई.

जब 2019 में ये क़ानून बना था उस वक़्त भी दोनों ही राज्यों में इसके ख़िलाफ़ प्रदर्शन हुए थे.

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि सीएए बंगाल के दोबारा विभाजन और देश से बंगालियों को खदेड़ने का खेल है.

तृणमूल कांग्रेस के अलावा वामपंथी दलों ने भी इसे चुनावी लॉलीपॉप करार दिया है.

पश्चिम बंगाल के मतुआ समुदाय में ख़ुशी की लहर है

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ममता बनर्जी ने कहा है कि “अगर नागरिकता क़ानून के ज़रिए किसी की नागरिकता जाती है तो मैं इसका कड़ा विरोध करूंगी. सरकार किसी भी कीमत पर ऐसा नहीं होने देगी.”

सोमवार शाम को इस क़ानून की अधिसूचना जारी होने के बाद ममता ने जल्दबाज़ी में बुलाई गई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, "यह बच्चों का खेल नहीं है."

ममता का सवाल था कि यह कानून साल 2020 में पारित किया गया था. तो अब सरकार ने चार साल बाद लोकसभा चुनाव के ऐन पहले इसे लागू करने का फैसला क्यों किया? वह कहती हैं, "अगर यहां सीएए और नेशनल रजिस्टर आफ सिटीजंस (एनआरसी) के ज़रिए किसी की नागरिकता छीनी गई तो हम चुप नहीं बैठेंगे. यह कानून दरअसल एक धोखा है."

पश्चिम बंगाल में ख़ुशी का भी माहौल

मतुआ समुदाय

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वहीं उत्तर 24-परगना समेत दूसरे ज़िलों में फैले मतुआ समुदाय ने इस पर खुशियां जताई है और उत्सव मनाया है. मतुआ समुदाय के लोग लंबे समय से इसकी मांग कर रहे थे.

केंद्रीय नेताओं ने साल 2019 के चुनाव में भी इसे लागू करने का वादा किया था. लेकिन वह वादा पूरा नहीं होने के कारण इस तबके में भारी नाराज़गी थी.

यहां इस बात का ज़िक्र प्रासंगिक है कि ममता बनर्जी राज्य में सीएए और एनआरसी लागू होने का पहले से ही विरोध करती रही हैं. वो इसके खिलाफ सड़कों पर भी उतर चुकी हैं.

उनकी दलील है कि मतुआ समुदाय के लोग पहले से ही भारतीय नागरिक हैं. अगर नहीं, तो उन्होंने अब तक चुनाव में बीजेपी को वोट कैसे दिया था? ऐसे में उनको दोबारा नागरिकता कैसे दी जा सकती है?

हरिचंद ठाकुर ने साल 1812 में ओराकांदी (अब बांग्लादेश) में इस समुदाय की स्थापना की थी. मतुआ महासंघ के नेता और बनगांव के बीजेपी सांसद और केंद्रीय मंत्री शांतनु ठाकुर कहते हैं, "सीएए से सिर्फ मतुआ ही नहीं बल्कि राज्य में रहने वाले तमाम शरणार्थियों की नागरिकता का रास्ता खुल जाएगा."

वह कहते हैं कि यह क़ानूनी नागरिकता छीनने नहीं बल्कि देने के लिए बनाया गया है.

टाइमिंग पर सवाल

ममता बनर्जी

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प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर चौधरी ने भी इस क़ानून को लागू करने की टाइमिंग पर सवाल उठाते हुए कहा है कि आख़िर इसे चुनाव से पहले क्यों लागू किया गया है? साफ़ है कि इसका मक़सद चुनावी फ़ायदा उठाना है.

दूसरी ओर, प्रदेश सीपीएम सचिव मोहम्मद सलीम ने इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच की मिलीभगत का नतीजा बताया है.

दिल्ली में पत्रकारों से बातचीत में उनका दावा था कि ममता महज़ दिखावे के लिए इस कानून का विरोध कर रही हैं. सलीम का कहना था कि केंद्र ने धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण के लिए चुनाव से पहले इस कानून को लागू करने का फैसला किया है.

वह कहते हैं कि पश्चिम बंगाल में वामपंथियों की बढ़ती ताकत को ध्यान में रखते हुए धार्मिक ध्रुवीकरण के ज़रिए बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस के बीच वोटों के बंटवारे के लिए ही यह कदम उठाया गया है.

प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष सुकांत मजूमदार कहते हैं कि केंद्र सरकार ने हमेशा अपने वादे पूरे किए हैं. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा चुनाव से पहले सीएए लागू करने का भरोसा दिया था. अब यह वादा पूरा हो गया है. इस कानून से आतंकित होने की ज़रूरत नहीं है.

इस बीच, इस कानून की अधिसूचना जारी होने की खबर सामने आने के बाद उत्तर 24-परगना और नदिया जिले के मतुआ बहुल इलाकों में ढाक-ढोल बजा कर इसका स्वागत किया गया और मिठाइयां बांटी गई.

बनगांव के मतुआ सांसद शांतनु ठकुर कहते हैं कि मतुआ समाज की बहुत पुरानी मांग पूरी हो गई है. इससे इस समुदाय में खुशी स्वाभाविक है.

पश्चिम बंगाल में बीजेपी को क्या होगा फ़ायदा

ममता बनर्जी

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मतुआ समुदाय के लोग उत्तर और दक्षिण 24-परगना जिले के अलावा नदिया जिले में भी भारी तादाद में रहते हैं. करीब तीन करोड़ की आबादी वाला यह समुदाय राज्य विधानसभा की कम से कम 50 सीट पर निर्णायक स्थिति में हैं.

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सीएए लागू होने से नागरिकता और दूसरे मौलिक अधिकारों को लेकर इस समुदाय में पसरी आशंका खत्म हो जाएगी. इसके साथ ही आगामी चुनाव में इसकी वजह से राजनीतिक परिदृश्य भी बदल सकता है. मतुआ समुदाय को बीजेपी का समर्थक माना जाता है. यह समुदाय लंबे अरसे से नागरिकता कानून की मांग कर रहा था.

यहां इस बात का जिक्र प्रासंगिक है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2021 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले 17 मार्च, 2021 को बांग्लादेश में ओरकांदी स्थिति मतुआ ठाकुरबाड़ी का दौरा किया था. तब इसे चुनावी दौरा करार देते हुए माना गया था कि मतुआ तबके को पार्टी की ओर आकर्षित करने के लिए ही वो इस दौरे पर गए थे.

इस तबके लोग देश की आजादी के बाद वहीं से आकर राज्य के विभिन्न हिस्सों में बसे थे.

मतुआ समुदाय के एक अन्य नेता कहते हैं, "इस कानून के जरिए मतुआ समुदाय को असली आजादी मिली है. हम लंबे समय से राजनीतिक खेल का शिकार रहे हैं. अब कम से कम हमारी भावी पीढ़ियां यहां बेफ्रिक होकर रह सकती हैं."

लेकिन तृणमूल कांग्रेस की राज्यसभा सदस्य और मतुआ समुदाय की नेता ममता बाला ठाकुर कहती हैं, "हम तो पहले से ही इस देश के नागरिक हैं. सीएए के तहत फार्म भरते ही लोगों का मौजूदा दर्जा खत्म हो जाएगा. इस मामले में काफी सावधानी से कदम बढ़ाना जरूरी है."

असम में कैसी है प्रतिक्रिया

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नागरिकता संशोधन कानून अर्थात सीएए को लागू करने के बाद असम तथा पूर्वोत्तर के कई राज्यों में जनजातीय संगठनों ने आंदोलन करने की हुंकार भरी है.

असम के सबसे प्रभावी छात्र संगठन ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) ने सीएए के नियमों की अधिसूचना जारी होने के बाद सोमवार शाम को इसकी प्रतिलिपियों को जलाकर अपना विरोध जताया.

सीएए के खिलाफ आसू के इस विरोध आंदोलन में 30 जनजातीय संगठन भी शामिल है.

असम में कांग्रेस के नेतृत्व में बने 16 राजनीतिक दलों के संयुक्त विपक्षी मंच ने भी सीएए के खिलाफ समूचे प्रदेश में आंदोलन करने की घोषणा की है.

दरअसल इसी महीने भारत में लोकसभा चुनावों की घोषणा होने वाली है और इसके ठीक कुछ दिन पहले सीएए को लागू करने से राजनीतिक माहौल काफी गरमा गया है.

असम की राजनीति को समझने वाले जानकारों का कहना है कि सीएए के खिलाफ इस बार भी आंदोलन 2019 की तरह बड़े पैमाने पर हुआ तो बीजेपी को नुकसान हो सकता है.

असम की 14 लोकसभा सीटों में इस बार बीजेपी 11 सीटों पर चुनाव लड़ रही है जबकि पिछले चुनाव में पार्टी ने 9 सीटें जीती थी.

‘अभी क्यों किया गया लागू’

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लेकिन इन सब के बीच ये सवाल उठ रहे हैं कि जब सीएए कानून दिसंबर 2019 में बन गया था तो बीजेपी को इसे लागू करने में 4 साल से ज्यादा का वक्त क्यों लगा? इस कानून के नियमों की अधिसूचना लोकसभा चुनाव की घोषणा के ठीक पहले क्यों जारी की गई?

असम की राजनीति को कई दशकों से कवर करते आ रहे वरिष्ठ पत्रकार बैकुंठ नाथ गोस्वामी की माने तो बीजेपी के चुनावी गणित में सीएए को लागू करने का यह सही समय था.

पत्रकार गोस्वामी चुनावी गणित को समझाते हुए कहते है,"400 सीटों का आंकड़ा पार करने की बात कहने वाली बीजेपी दक्षिण भारत से लेकर ओडिशा के बीजू जनता दल तक सबको साथ लाने में लगी थी. इससे साफ पता चलता है कि बीजेपी एक भी सीट का नुकसान नहीं चाहती. लिहाजा बंगाल के खासकर मतुआ समुदाय और असम में हिंदू बंगाली वोट दोनों को सीएए के जरिए साधने की कोशिश हुई है. एनआरसी में लाखों हिंदू बंगाली लोगों का नाम नहीं है. फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल की कार्रवाई का सामना कर रहें ये लोग बीजेपी से नाराज थे. अब चुनाव में सीएए के जरिए इन लोगों को नागरिकता देने की बात पर भाषण दिए जाएंगे."

2011 की जनगणना के अनुसार असम की 3 करोड़ 12 लाख आबादी में 70 लाख से ज्यादा हिंदू बंगाली है. राज्य में असमिया हिंदुओं के बाद बंगाली हिंदू दूसरा सबसे बड़ा हिंदू समुदाय है.

असम विधानसभा में कांग्रेस पार्टी के विपक्ष के नेता देवव्रत सैकिया कहते कि बीजेपी ने केवल अपने राजनीतिक फायदे को साधने के लिए असमिया लोगों पर सीएए थोप दिया है.

कांग्रेस नेता कहते हैं, "बीजेपी ने सीएए को लागू कर असमिया लोगों की भूमि, भाषा और संस्कृति की रक्षा करने के वादों को तोड़ दिया है. महज़ कुछ वोट हासिल करने के लिए बीजेपी ने 2014 तक यहां आए विदेशियों को असम में रहने और यहां ज़मीन का अधिकार हासिल करने का मौका दे दिया है."

बीजेपी का कहना है कि उनकी पार्टी को लोगों का जनादेश है और सारे निर्णय उसी के अनुसार लिए जा रहे हैं. असम प्रदेश बीजेपी के वरिष्ठ नेता विजय कुमार गुप्ता कहते हैं, "सीएए को लेकर एक-दो संगठन विरोध कर रहे हैं जबकि असम की जनता बीजेपी के समर्थन में है. 2019 में आंदोलन हुआ लेकिन 2021 के विधानसभा चुनाव में असम की जनता ने बीजेपी को ही शासन में बैठाया. "

करीब 6 साल तक लंबे चले असम आंदोलन के बाद 1985 में भारत सरकार के साथ जो समझौता हुआ था उसके आधार पर एनआरसी बनी और 24 मार्च 1971 के बाद राज्य में आने वाले लोगों को विदेशी माना गया. लेकिन सीएए लागू होने से अब 2014 तक राज्य में आने वाले ऐसे विदेशी नागरिकों को भारत की नागरिकता मिल जाएगी.

सीएए के तहत 31 दिसंबर 2014 से पहले पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से भारत आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय को नागरिकता दी जाएगी.

असम में कैसे मिलेगा बीजेपी को लाभ

प्रदर्शन

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ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन के महासचिव शंकर ज्योति बरुआ ने बीबीसी से कहा, "केंद्र सरकार ने सीएए के नियमों की अधिसूचना जारी कर असमिया जाति को संकट में डाल दिया है. सीएए असम के सांस्कृतिक और जनसांख्यिकीय ताने-बाने के लिए खतरा है. असमिया लोग सीएए को कभी स्वीकार नहीं करेंगे हम इसके खिलाफ लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण ढंग से लगातार विरोध-प्रदर्शन करेंगे.साथ ही इस कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करेंगे."

लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र राज्य में आंदोलन के माहौल को देखते हुए पुलिस प्रशासन ने कई जिलों में आंदोलनकारियों को रोकने के लिए बैरिकेडिंग तैयार की है.

असम पुलिस के एक अधिकारी ने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर बताया कि सीएए के खिलाफ प्रदेश में कुछ संगठनों ने आंदोलन करने की जो घोषणा की है उसे देखते हुए स्थानीय थानों में खाली पड़े परिसरों को अस्थाई जेल के तौर पर तैयार किया गया है.

2019 के आंदोलन के मुकाबले इस बार यहां के मूल लोगों को एकजुट करने के सवाल का जवाब देते हुए आसू महासचिव कहते है, "असम के मूल निवासी सीएए को लेकर बेहद नाराज़ हैं. पिछली दफा जो आंदोलन हुआ था उसमें लोग खुद सड़कों पर निकल कर आए थे. लिहाजा लोग चुप नहीं बैठेंगे. 30 जनजातियों के संगठनों ने सीएए का विरोध करने सड़कों पर उतरेगी. हमें पूरी उम्मीद है कि लोग अपने अस्तित्व की लड़ाई के लिए जरूर आवाज उठाएंगे."

पिछले दो दशकों से असम तथा पूर्वोत्तर राज्यों की राजनीति को कवर कर रहे वरिष्ठ पत्रकार समीर कर पुरकायस्थ मानते हैं कि "अगर बीजेपी सीएए को अभी लागू नहीं करती तो असम और पश्चिम बंगाल में खासकर हिंदू बंगाली वोटरों में पार्टी को नुकसान होता. हालांकि सीएए असमिया लोगों के लिए बेहद संवेदनशील मुद्दा है. वो कहते है,"असम में एनआरसी को अब तक मान्यता इसलिए नहीं दी गई क्योंकि हिंदू बंगाली लोगों की नागरिकता दांव पर थी. अगर इस बार बीजेपी सीएए को लागू नहीं करती तो हिंदू बंगाली मतदाता उनके खिलाफ हो जाते."

वरिष्ठ पत्रकार बैकुंठ नाथ कहते है कि असम में सीएए लागू करने से बीजेपी को असमिया वोटों में ज्यादा कुछ नुकसान नहीं होगा.

वो कहते है, "सीएए को लेकर ऊपरी और मध्य असम की करीब 8 सीटों पर असमिया सेंटिमेंट का प्रभाव है. लेकिन 2019 में जिस व्यापक स्तर पर आंदोलन हुआ जिसमें रेलवे स्टेशन जलाए गए तथा लोगों की जान गई उस तरह का आंदोलन इस बार मुश्किल है."

"जब तक सीएए के खिलाफ जन जागरण नहीं होता तब तक संगठनों के आंदोलन से वो माहौल तैयार नहीं होगा. बीजेपी ने इस नुकसान से बचने के लिए हाल के दिनों में खासकर महिला वोटरों को जिस कदर अलग-अलग कई योजनाओं का लाभ दिया है उससे चुनाव में पार्टी को फायदा मिलेगा."

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