पीएम मोदी और नीतीश कुमार का ये समीकरण शख़्सियत की लड़ाई है या कुछ और?

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- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना से
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ शुक्रवार को चुनावी मंच पर देखे गए हैं.
दोनों नेता मुंगेर सीट से चुनाव लड़ रहे जेडीयू के ललन सिंह के लिए प्रचार करने पहुँचे थे.
हालाँकि शुक्रवार को ही अररिया में हुई पीएम मोदी की सभा में नीतीश कुमार मौजूद नहीं रहे.
अररिया से बीजेपी उम्मीदवार प्रदीप सिंह मैदान में हैं.
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सोशल मीडिया ‘एक्स’ पर लिखा है कि क्या नीतीश कुमार एक बार फिर पलटी मारने की तैयारी कर रहे हैं या प्रधानमंत्री ख़ुद को बिहार की जातिगत गणना से दूर रख रहे हैं.
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दरअसल नीतीश कुमार को लेकर ऐसी चर्चा बिहार में प्रधानमंत्री मोदी की नवादा रैली के बाद शुरू हुई.
7 अप्रैल को नवादा में मोदी और नीतीश एक साथ चुनावी मंच पर देखे गए थे. लेकिन नवादा के बाद बिहार में नरेंद्र मोदी की कुछ सभाओं में नीतीश कुमार मौजूद नहीं थे. उसके बाद से ही नीतीश कुमार के बीजेपी के साथ समीकरण पर कई तरह के सवाल सवाल किए जा रहे हैं.
बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री और आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने कहा, ''हमारे लिए नीतीश जी का पूरा सम्मान है जो आगे भी रहेगा, मुझे तो सूचना मिली है कि बीजेपी के लोगों ने ही नीतीश कुमार को मना किया है कि प्रधानमंत्री के साथ मंच पर न बैठें.”
हालाँकि इस मुद्दे पर कहा ये भी जा रहा है कि ख़ुद प्रधानमंत्री मोदी ने एनडीए के सभी नेताओं को अलग-अलग चुनाव प्रचार करने को कहा है.
वरिष्ठ पत्रकार नचिकेता नारायण कहते हैं, “बीजेपी के मन में यह डर भी हो सकता है कि उसे नीतीश के साथ से उनके एंटी इनकंबेंसी (सत्ता विरोधी रुझान) को भी साझा करना पड़ सकता है, क्योंकि नीतीश कुमार क़रीब दो दशक से बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर मौजूद हैं.''
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को विपक्षी एकता का जनक भी माना जाता है. विपक्षी गठबंधन इंडिया में भले ही नीतीश के पास कोई पद नहीं था, लेकिन वो राष्ट्रीय राजनीति में चर्चा के केंद्र में थे. विपक्ष की बैठकों में भी उनकी भूमिका काफ़ी अहम थी.
नीतीश इसी साल जनवरी के आख़िर में विपक्ष का साथ छोड़कर एनडीए में शामिल हो गए थे.
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पीएम मोदी के मंच से गायब नीतीश
इसी महीने नवादा में चुनाव प्रचार के दौरान नीतीश कुमार ने पीएम की मौजूदगी में अपने भाषण में कई बार ग़लतियाँ की थीं.
नीतीश ने यहाँ तक कह दिया था कि लोग वोट देकर प्रधानमंत्री मोदी को ‘चार हज़ार लोकसभा’ सीटें देंगे.
अपने भाषण के बाद नीतीश कुमार प्रधानमंत्री मोदी के पाँव (घुटने) पकड़ते भी नज़र आए थे. बिहार के सियासी गलियारों में यह तस्वीर चर्चा का एक विषय बन गई, जिसे बिहार में विपक्ष ने नीतीश के सम्मान के साथ भी जोड़ा था.
इसके बाद 16 अप्रैल को प्रधानमंत्री मोदी की गया और पूर्णिया में हुई चुनावी सभाओं में नीतीश कुमार मौजूद नहीं थे. जबकि आमतौर पर अपनी या अपने गठबंधन की सरकार वाले राज्य में प्रधानमंत्री की सभा में मुख्यमंत्री मौजूद होते हैं.
यहीं से नीतीश कुमार की एनडीए में स्थिति को लेकर चर्चा होने लगी.
नचिकेता नारायण कहते हैं “ललन सिंह और चिराग पासवान ने नवादा रैली के बाद कहा था कि पीएम ने एनडीए के सभी नेताओं को अलग-अलग रैली और सभाएँ करने को कहा है. यह लीपा पोती लग रही है. अगर ऐसा है तो कटिहार में नीतीश और अमित शाह एक साथ कैसे थे.”

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21 अप्रैल को बीजेपी नेता अमित शाह की बिहार के कटिहार में चुनावी रैली हुई थी. उस रैली में नीतीश कुमार भी अमित शाह के साथ मौजूद थे.
हालाँकि शुक्रवार 26 अप्रैल को नरेंद्र मोदी की बिहार में दो चुनावी सभा हुई. यहाँ अररिया की सभा में एलजेपीआर के चिराग पासवान और एनडीए के कई नेता मोदी के साथ देखे गए, जबकि नीतीश कुमार इसमें मौजूद नहीं थे.
वहीं मुंगेर की सभा में नीतीश मोदी के साथ मंच पर मौजूद थे.
वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेलारी दावा करते हैं, “नीतीश कुमार, मोदी जी से बड़े नेता रहे हैं, लेकिन वो जब बोलने लगते हैं तो काफ़ी लंभा भाषण हो जाता है. अब उनका भाषण जनता को अपील नहीं करता है. नीतीश कब क्या बोल देंगे यह भी पता नहीं चलता, इसलिए उनको मोदी के साथ मंच साझा करने से रोक दिया गया था.”
माना जाता है कि नीतीश और मोदी की चुनावी मंचों पर दूरी बनी रहने से वोटरों के मन में बीजेपी-जेडीयू के संबंधों को लेकर सवाल खड़े हो सकते हैं. पहले भी इन दोनों के बीच संबंधों में कई बार उतार चढ़ाव देखा गया है.

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नीतीश और मोदी के रिश्ते
नीतीश कुमार पहली बार साल 1985 में बिहार विधानसभा चुनाव जीतकर विधायक बने थे. नीतीश ने पहली बार साल 1989 में लोकसभा चुनाव जीता था और साल 1990 में वो पहली बार केंद्र सरकार में मंत्री भी बनाए गए थे.
नीतीशने साल 2000 में पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, हालाँकि बहुमत ना होने से वह सरकार एक हफ़्ते भी नहीं चल पाई थी.
नीतीश बाद में केंद्र सरकार में कई विभागों के मंत्री रहे. कुछ वक्त को निकाल दिया जाए तो साल 2005 से बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नीतीश का ही कब्ज़ा है.
नरेंद्र मोदी साल 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री बनाए गए थे. उसके बाद वो पहली बार विधानसभा के लिए चुने गए थे. यानी मोदी के मुक़ाबले चुनावी राजनीति में नीतीश कुमार ज़्यादा अनुभवी हैं.
साल 2002 नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे. उस समय राज्य के गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन में आग लगाई गई और उसके बाद गुजरात में सांप्रदायिक दंगे हुए थे. उस समय नीतीश कुमार केंद्र सरकार में रेल मंत्री थे.
वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद याद करते हैं, “नीतीश और मोदी के बीच पहली तल्ख़ी साल 2010 में आई थी. नीतीश ने पटना में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए भोज का आयोजन किया था, लेकिन अख़बार में छपी एक तस्वीर से नीतीश इतने नाराज़ हुए थे कि उन्होंने भोज रद्द कर दिया.”
जून 2010 में पटना में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हो रही थी, जिसमें नरेंद्र मोदी भी शामिल हुए थे.
उस वक़्त अख़बार में दिए गए एक विज्ञापन की तस्वीर में नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए दिखाया गया था.
कहा जाता है कि इस तस्वीर से नीतीश कुमार इतने नाराज़ हुए थे कि उन्होंने साल 2008 में कोसी बाढ़ राहत के तौर पर गुजरात सरकार से मिले 5 करोड़ रुपए भी लौटा दिए थे.

नीतीश कभी ‘एनडीए’ तो कभी ‘इंडिया’ में
साल 2009 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी देशभर में महज़ 116 सीटें जीत पाई थी. उस साल बिहार में एनडीए को 32 सीटों पर जीत मिली थी. इसमें जेडीयू ने 20 जबकि बीजेपी ने 12 सीटों पर जीत हासिल की थी.
साल 2010 के बिहार विधानसभा चुनावों में नीतीश जेडीयू को बिहार विधानसभा की 115 सीटों पर जीत दिलाने में सफल रहे थे. जबकि बीजेपी को भी 91 सीटों पर जीत मिली थी.
नीतीश कुमार के नाम पर इस तरह की चुनावी सफलता के रिकॉर्ड को देखते हुए साल 2013 में बीजेपी के नेता सुशील मोदी तक ने नीतीश कुमार को पीएम मैटेरियल बताया था.
लेकिन साल 2014 लोकसभा चुनावों के पहले नीतीश और मोदी के संबंधों में सबसे बड़ी दरार देखी गई थी. उस वक़्त बीजेपी ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाया था. उसके बाद नीतीश कुमार एनडीए से बाहर हो गए थे.
नीतीश ने साल 2015 में कांग्रेस, आरजेडी और अन्य दलों के साथ बिहार में महागठबंधन बनाया था, लेकिन साल 2017 में महागठबंधन छोड़कर वापस एनडीए में चले गए.
नीतीश एक बार फिर साल 2022 में महागठबंधन में शामिल हुए और राष्ट्रीय स्तर पर मोदी के ख़िलाफ़ विपक्षी एकता की मुहिम में लग गए. नीतीश की कोशिश के बाद ही साल 2023 के मध्य में विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ बन पाया था.
हालाँकि उसके कुछ महीने बाद ही जनवरी 2024 में नीतीश कुमार विपक्षी गठबंधन को छोड़कर वापस एनडीए में शामिल हो गए थे.
सुरूर अहमद मानते हैं, “दरअसल मोदी और नीतीश कुमार के बीच शख़्सियत की लड़ाई है. पीएम होने के कारण मोदी को सबसे अंत में बोलना होता है. नीतीश बहुत लंबा भाषण देते हैं, लेकिन समझदारी वाली बात नहीं कर रहे. मोदी जी लंबा भाषण सुनना नहीं चाहते हैं.”

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ज़मीन पर असर
नीतीश कुमार ने एनडीए में ताज़ा वापसी के बाद लगातार दावा किया है कि वो अब बीजेपी का साथ कभी नहीं छोड़ेंगे. हालाँकि साल 2022 में जब नीतीश बीजेपी से दूर हुए थे तब भी उनका दावा था वो मरना पसंद करेंगे लेकिन बीजेपी के साथ जाना पसंद नहीं करेंगे.
उस दौरान बीजेपी के कई नेता भी दावा कर रहे थे कि अब नीतीश कुमार के लिए एनडीए के दरवाज़े हमेशा के लिए बंद हैं.
आँकड़ों के लिहाज से देखें तो नीतीश की एनडीए में वापसी से एनडीए स्थिति मज़बूत हो सकती है, लेकिन कई ऐसे मुद्दे हैं जो हालात को पूरी तरह पलट भी सकते हैं.
नचिकेता नारायण मानते हैं कि साल 2014 को मोदी युग की शुरुआत के तौर पर देख सकते हैं जिसमें एनडीए की जीत ज़्यादा पक्की नज़र आती थी. साल 2019 में भी पुलवामा जैसी घटना की वजह से एक मोदी की लहर दिख रही थी, जबकि इस बार ऐसा कुछ नहीं दिखता है.

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नचिकेता नारायण कहते हैं, “मैं यह नहीं कह रहा कि इस बार एनडीए चुनाव हार ही रही है. लेकिन उसके प्रचार में फ़ोकस नज़र नहीं आता, इसलिए मंगलसूत्र की बात की जा रही है. इधर नीतीश की चमक भी फ़ीकी पड़ी है. यह स्थिति तेजस्वी के लिए भी वरदान साबित हो सकती है. उनको जनता की हमदर्दी भी मिल सकती है और वो नीतीश के ख़िलाफ़ एंटी इनकंबेंसी से भी बच गए.”
शुक्रवार को मुंगेर की सभा में नीतीश कुमार भले ही मोदी के साथ मंच पर मौजूद थे, लेकिन माना जाता है कि मंच पर उनका उत्साह और अंदाज़ बदला हुआ नज़र आ रहा था.
बिहार में लोकसभा की 40 सीटें हैं, इनमें 39 सीटों पर साल 2019 के चुनावों में एनडीए ने जीत हासिल की थी.
बिहार में अब तक हुए दो चरण की वोटिंग में पिछले चुनावों के मुक़ाबले कम मतदान देखने को मिला है.
इसका क्या असर होगा? यह 4 जून को मतगणना के बाद स्पष्ट हो पाएगा.
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