बिहार में ज़मीनी स्तर पर नीतीश के बिना तेजस्वी कितने ताक़तवर दिखते हैं- ग्राउंड रिपोर्ट

- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, शिवहर (बिहार) से
किसी नेता या राजनीतिक दल की जनसभा में आमतौर पर उनके समर्थक ही नज़र आते हैं. ऐसी सभाओं में लगने वाली भीड़ से यह भी दिखता है कि इलाक़े में किस दल को कितना बड़ा समर्थन हासिल है.
समर्थकों का उत्साह और नेता के चेहरे का भाव यह बताता है कि उसके दावे और ज़मीनी हक़ीकत में कितना बड़ा फ़ासला है.
बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव बिहार में अपनी सभाओं के दौरान अच्छी भीड़ जुटाते नज़र आ रहे हैं. तेजस्वी के साथ बड़ी संख्या में बिहार के युवा दिख रहे हैं और उनको अपने पिता लालू प्रसाद यादव के बनाए बोट बैंक का लाभ भी मिल रहा है.
इस साल जनवरी में नीतीश कुमार के एनडीए में जाने के बाद से तेजस्वी यादव पहली बार जनता के बीच पहुंचे हैं.
20 फ़रवरी से वो राज्य अलग-अलग इलाक़ों के दौरे पर हैं. उनका मक़सद बिहार में हाल ही ख़त्म हो चुकी ‘महागठबंधन’ सरकार की उपलब्धियाँ गिनाना है.
तेजस्वी यादव का दावा है राज्य में 17 महीने की ‘महागठबंधन’ सरकार, नीतीश कुमार के 17 साल की सरकार पर भारी रही है.
तेजस्वी का यह भी दावा है कि उनके सरकार में रहते जो काम हुआ उसका श्रेय आरजेडी को जाता है. वो इसी दावे के साथ राज्यभर में ‘जन विश्वास यात्रा’ कर रहे हैं.
इस यात्रा में वो नीतीश कुमार पर भी निशाना साध रहे हैं और केंद्र सरकार पर भी हमलावर हैं. तेजस्वी राज्य सरकार में रहते हुए जातिगत गणना और चार लाख लोगों को नौकरी देने के अपने दावे को दोहरा रहे हैं.
उनका यह भी दावा है कि इससे देशभर में नौकरी और रोज़गार बड़ा चुनावी मुद्दा बन गया है.
नौकरी सबसे बड़ा मुद्दा- तेजस्वी

मंगलवार को बिहार के शिवहर ज़िले की तेजस्वी की सभा में युवाओं की भीड़ बताती है कि वो अपने मक़सद में कामयाब हो रहे हैं. दरअसल बिहार में सरकारी नौकरी एक बड़ा मुद्दा है.
राज्य में रोज़गार के अन्य साधनों की कमी में युवाओं की पहली पसंद सरकारी नौकरी ही होती है.
तेजस्वी यादव का कहना है, “नरेंद्र मोदी हर साल दो करोड़ रोज़गार देने की बात करते थे. लेकिन लोग देख रहे हैं कि सेना में नौकरी का क्या हाल कर दिया. रेलवे की वैंकेंसी की क्या हालत है.”
साल 2020 के विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान तेजस्वी यादव अपनी सरकार बनने पर बिहार में दस लाख सरकारी नौकरी देने का वादा कर रहे थे.
हालाँकि उस दौरान नीतीश कुमार एनडीए में थे और तेजस्वी यादव के मुताबिक़ नीतीश कुमार दस लाख़ नौकरी को असंभव बता रहे थे.
तेजस्वी यादव का आरोप है कि "नीतीश कुमार कहते थे कि इसके लिए पैसे कहाँ से आएंगे."
बिहार में रोज़गार एक ऐसा मुद्दा है जिसको जनता के बीच ले जाने में तेजस्वी यादव सफल नज़र आते हैं.
शिवहर के अरुण कुमार चौधरी कहते हैं, “हम लोग तेजस्वी यादव के साथ हैं. वो काम कर रहे हैं, नौजवान हैं. इतनी नौकरी बिहार में किसने दी?”

शिवहर के ही सत्यरंजन सिंह का दावा है, “बिहार के लोग अपने दुःख और ग़रीबी से परेशान हैं. विकास हर जगह होना चाहिए. शिवहर ही नहीं पूरे बिहार का यही हाल है कि लोग आधा पेट खाकर सोते हैं. यहाँ जनता के नेताओं का शासन होना चाहिए, जो जनता के लिए काम करे.”
बिहार में फ़िलहाल तेजस्वी यादव जहाँ से गुज़र रहे हैं वहाँ उनके और बीजेपी के बीच मुक़ाबले की बात हो रही है.
अगर नीतीश कहीं चर्चा में आ रहे हैं तो बार-बार गठबंधन बदलने की वजह से ही आ रहे हैं.
हालाँकि प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता अब भी बहुत से लोगों के बीच बरक़रार है.
शिवहर के दिनेश ठाकुर कहते हैं, “शिवहर में तो बीजेपी का माहौल दिखता है. प्रधानमंत्री का काम और उनकी शैली लोगों को पसंद आ रही है.”
अनदेखी का आरोप

बिहार में लोग सरकार पर ग़रीबों की अनदेखी करने का आरोप भी लगाते हुए दिखते हैं.
तेजस्वी यादव की सभा में ही मौजूद राधिका देवी, लालू प्रसाद यादव की समर्थक नज़र आती हैं.
वो राजनीति दलों और नेताओं को लेकर आवेश में हैं. उनके हाथ में कांग्रेस का झंडा भी है.
राधिका देवी कहती हैं, “यह झंडा तो बाहर बंट रहा था इसलिए मैंने भी ले लिया.”
वे कहती हैं, "वोट लेते समय सब आते हैं और उसके बाद भूल जाते हैं. सब अमीरों को पूछते हैं. ग़रीबों को कोई नहीं पूछता है. क्या कहूँ?”
अकेले तेजस्वी में कितना दम

तेजस्वी यादव की सभा में एक बात जो स्पष्ट नज़र आती है वो ये है कि चाहे आरजेडी के कट्टर समर्थक ही क्यों न हों, उनके मन में तेजस्वी को लेकर बिहार का विधानसभा चुनाव है.
लेकिन बिहार विधानसभा चुनाव अभी क़रीब डेढ़ साल दूर है और उससे पहले अभी लोकसभा चुनाव होने हैं.
लोकसभा में फ़िलहाल बिहार की 40 में से 39 सीटों पर एनडीए का कब्जा है.
हालाँकि साल 2019 में हुए पिछले लोकसभा चुनावों के बाद राज्य में साल 2020 में विधानसभा चुनाव हुए थे और विधानसभा में तेजस्वी यादव की पार्टी सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी.
उन चुनावों में महज़ कुछ सीटों के फ़ासले से महागठबंधन को बहुमत नहीं मिल पाया था और तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री नहीं बन पाए थे.
‘माय’ के बाद ‘बाप’ को साधने की कोशिश

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तेजस्वी यादव ने पिछले चुनावों में भी रोज़गार को बड़ा मुद्दा बनाया था और इस बार भी उनके प्रमुख चुनावी मुद्दे में यही है. लेकिन पिछली बार की कमी को दूर करने के लिए उन्होंने आरजेडी को ‘एमवाई’ के साथ ही ‘बाप’ का दल बताना शुरू कर दिया है.
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को और बिहार में राष्ट्रीय जनता दल को ‘एमवाई’ यानी मुस्लिम यादव समीकरण को साधकर चलने वाल दल माना जाता है.
तेजस्वी यादव ने अब अपने दल को बीएएपी (बाप) यानी बहुजन, अगड़े, आधी आबादी (यानी महिलाएँ) और पुअर यानी ग़रीबों की पार्टी बता रहे हैं.
तेजस्वी यादव अपने नारों और दावों के दम पर जनता को रिझाने की कोशिश में लगे हुए हैं. लेकिन बिहार के सियासी मैदान में वो सत्ता पक्ष का मुक़ाबला करने में अकेले भी नज़र आते हैं.

हालाँकि नीतीश के एनडीए में शामिल होने के बाद बड़ी संख्या में मुस्लिम और सेक्युलर वोट तेजस्वी और विपक्ष के खेमे में नज़र आ रहे हैं. तो अगर बिहार में सेक्युलर वोटों का बंटवारा नहीं हुआ तो इसका फ़ायदा भी विपक्ष को मिलेगा.
तेजस्वी को कुछ अन्य मुद्दों पर भी फ़ायदा मिल सकता है.
उनका मुक़ाबला ‘ओल्ड हॉर्स’ यानी पुराने नेताओं से दिखता है. इस मामले में वो अपने विरोधियों पर कुछ भारी पड़ सकते हैं.
लोकसभा चुनावों के दौरान तेजस्वी यादव को एनडीए से मुक़ाबला करना है, जो लगातार दो बार चुनाव जीतकर केंद्र की सत्ता पर काबिज़ है.
ज़ाहिर है अगर जनता के बीच सत्ता विरोधी कोई भी रुझान होगा तो इसका फ़ायदा तेजस्वी यादव और महागठबंधन को मिलेगा.
नीतीश कुमार भी क़रीब दो दशक से राज्य की सत्ता पर काबिज़ हैं लिहाजा उनके ख़िलाफ़ भी अगर एंटी इन्कमबेंसी फ़ैक्टर काम करता है तो इसका सीधा नुक़सान बीजेपी को उठाना पड़ सकता है और ऐसा लोकसभा के साथ साथ विधानसभा चुनावों में हो सकता है.
पर तेजस्वी के लिए राह आसान नहीं...

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कुछ जानकारों का ये भी मानना है कि नीतीश कुमार अपनी सियासी लोकप्रियता के निचले पायदान की तरफ़ हैं.
हालांकि वर्तमान राजनीतिक समीकरण इशारा करते हैं कि तेजस्वी यादव के लिए चुनाव की राह आसान तो नहीं होगी.
कांग्रेस का हाथ और वाम दलों का साथ तेजस्वी के लिए भले ही मौजूद है पर नीतीश के साथ चिराग पासवान, उपेंद्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी के अलावा बीजेपी का वोट है, जिसे मात दे पाना तेजस्वी यादव के लिए आसान नहीं है.
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