नीतीश कुमार हथियार डाल चुके हैं या नए हथियार की तलाश में हैं?

नीतीश कुमार

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    • Author, चंदन कुमार जजवाड़े
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना

पिछले क़रीब 20 सालों से बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार नाभिक की तरह रहे हैं.

ख़ुद को समाजवादी विचारधारा से जुड़ा बताने वाले नीतीश कुमार नरेंद्र मोदी के उभार से पहले तक एक हद तक अपनी वैचारिक लाइन स्पष्ट रखते थे.

वह एनडीए में रहकर भी जो लाइन लेते थे, उसमें बीजेपी की नाराज़गी की फ़िक्र नहीं करते थे. लेकिन 2013 के बाद स्थितियां पूरी तरह से बदल चुकी हैं.

2013 के बाद के नीतीश कुमार किसी तरह मुख्यमंत्री की कुर्सी बचाने के लिए हर समझौते को स्वीकार करते नज़र आते हैं. कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार के लिए अब लड़ाई निर्णायक मोड़ पर पहुँच गई है.

कई विश्लेषकों का मानना है कि नीतीश कुमार के लिए वह पोजिशन भी बरकरार रखना आसान नहीं होगा कि कभी एनडीए तो कभी आरजेडी से हाथ मिला लो और मुख्यमंत्री की कुर्सी हासिल कर लो.

2020 के विधानसभा चुनाव में एक बिहार के पूर्णिया ज़िले में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए नीतीश कुमार ने कहा था कि यह उनका आख़िरी चुनाव है और अंत भला तो सब भला.

नीतीश कुमार ने कहा था, ''और ये जान लीजिए कि यह मेरा आख़िरी चुनाव है. अंत भला तो सब भला.'' लेकिन नीतीश अभी आख़िरी चुनाव के मूड में लग नहीं रहे हैं.

नीतीश कुमार 72 साल के हो गए हैं. नीतीश के बाद जेडीयू का क्या होगा? जब नीतीश कुमार ने आरसीपी सिंह को जेडीयू की कमान सौंपी थी तब कहा जा रहा था कि उन्होंने अपना उत्तराधिकार चुन लिया है. लेकिन आरसीपी सिंह पार्टी से बाहर चुके हैं.

ललन सिंह से भी जेडीयू की कमान वापस ले ली गई है. कई लोग कहते हैं कि नीतीश कुमार की पार्टी बीजेपी और आरजेडी में समा जाएगी क्योंकि जेडीयू में मंडल और कमंडल का खेमा है.

बिहार में बीजेपी और आरजेडी चाहते भी हैं कि लड़ाई दोतरफ़ा हो. ऐसे में आरजेडी और बीजेपी दोनों नीतीश कुमार के कमज़ोर होने को अपने हक़ में देखते हैं.

नीतीश के लिए आख़िरी मौक़ा?

नीतीश के लिए एनडीए के साथ नई पारी बहुत आसान नहीं मानी जाती है.

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नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल यूनाइटेड के पास फ़िलहाल 243 सीटों की बिहार विधानसभा में महज़ 45 विधायक हैं.

कहा जाता है कि नीतीश का सबसे बड़ा दर्द इन्हीं आँकड़ों में छिपा है. नीतीश के महागठबंधन से हालिया मोहभंग के पीछे एक बड़ी वजह यही भी मानी जाती है कि वह विधानसभा भंग कर लोकसभा के साथ ही विधानसभा का चुनाव कराना चाहते थे.

इससे नीतीश को विधानसभा में अपनी ताक़त बढ़ाने का मौक़ा मिल सकता था, लेकिन आरजेडी इसके लिए तैयार नहीं थी. अब बीजेपी के साथ भी नीतीश के सामने कुछ ऐसे ही हालात बनते दिख रहे हैं.

ऐसे वक़्त में नीतीश कुमार के लिए भविष्य में क्या रास्ता बचा है? क्या नीतीश के सियासी सफर में ‘करो या मरो’ के हालात हैं?

पटना के एएन सिंहा इस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल स्टडीज़ के पूर्व निदेशक डीएम दिवाकर कहते हैं, “राजनीति में हर मौक़ा अंतिम मौक़ा होता है. यह सरकारी नौकरी की तरह नहीं है कि तीस साल तक नौकरी में रहेंगे. चुनावों में हर बार आपके पास केवल पाँच साल का समय होता है.”

डीएम दिवाकर का मानना है कि बीजेपी ने पिछले विधानसभा चुनाव में चिराग पासवान का इस्तेमाल कर नीतीश को कमज़ोर किया था और इस बार भी वो नीतीश को कमज़ोर करेगी.

इसकी भी संभावना है कि लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी बड़े सहयोगी यानी अपना मुख्यमंत्री बनाने की मांग कर दे.

साल 2020 के विधानसभा चुनावों में जनता दल यूनाइटेड के महज़ 42 सीटों पर जीत मिली थी.

नीतीश कुमार और जेडीयू के कई नेताओं ने बाद में बीजेपी पर भी आरोप लगाया था कि ‘चिराग मॉडल’ की वजह से जेडीयू के कई उम्मीदवारों की हार हुई थी.

दरअसल, चिराग पासवान की पार्टी एलजेपी ने उन सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए थे, जहाँ से जेडीयू के उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे थे जबकि उस वक़्त एलजेपी और जेडीयू दोनों ही एनडीए में शामिल थी.

नीतीश के सामने रास्ता

बीते दिनों नीतीश और लालू के बीच हुई मुलाक़ात ने बिहार में नई सियासी अटकलों के जन्म दे दिया.

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नीतीश कुमार के सामने सबसे बड़ी चुनौती बिहार विधानसभा में अपनी दल की स्थिति को मज़बूत करना है, ताकि उनका राजनीतिक महत्व बरक़रार रह सके. लेकिन क्या यह नीतीश कुमार के लिए इतना आसान होगा?

वरीष्ठ पत्रकार कन्हैया भेलारी कहते हैं, “नीतीश अब राजनीति में पूरी तरह अप्रासंगिक हो चुके हैं. उनकी लोकप्रियता भी बुरी तरह गिरी है. उनके वोट में भी भारी कमी आ चुकी है. लोग कुछ भी कहें लेकिन मुझे लगता है कि अब जेडीयू के पास 7-8 फ़ीसदी से ज़्यादा वोट भी नहीं है.”

कन्हैया भेलारी के मुताबिक़ यह नीतीश कुमार के लिए अंतिम मौक़ा है. वो राजनीति से विदाई के लिए एक सुरक्षित और सम्मानजनक रास्ता तलाश रहे हैं.

माना जाता है कि नीतीश कुमार अपने इसी रास्ते की तलाश में ही विपक्षी एकता की कोशिश में लगे हुए थे. विपक्षी नेताओं की पहली बैठक बिहार की राजधानी पटना में ही हुई थी.

भले नीतीश कुमार किसी भी पद की लालसा से इनकार कर रहे थे, फिर भी माना जाता है नीतीश कुमार के मन में विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ का संयोजक बनने की इच्छा रही होगी.

कहा जाता है कि तेजस्वी यादव के भविष्य के लिए लालू और आरजेडी की भी यही इच्छा थी कि नीतीश केंद्र की राजनीति में सक्रिय हो जाएं.

नीतीश कुमार और बीजेपी का संबंध

माना जाता है कि नीतीश कुमार 'इंडिया' गठबंधन के सभी सहयोगियों का भरोसा नहीं जीत पाए थे.

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डीएम दिवाकर कहते हैं, “नीतीश अगर विपक्षी गठबंधन में होते तो उनके लिए भविष्य का रास्ता थोड़ा आसान और सम्मानजनक होता. लेकिन कांग्रेस को भरोसा नहीं था, इसलिए उनको संयोजक नहीं बनाया. हालाँकि अब भी नीतीश ‘बिहार की बेहतरी’ की बात करके कभी भी पाला बदल सकते हैं.”

माना जाता है कि इसी संभावना को देखकर आरजेडी के लालू प्रसाद यादव ने कहा है कि नीतीश के लिए हमारा दरवाज़ा हमेशा खुला ही रहता है. इसके अलवा तेजस्वी यादव ने भी नीतीश को लेकर ज़्यादा तल्ख़ बयान नहीं दिए हैं.

अब बीजेपी से हाथ मिलाने के बाद भी नीतीश के लिए हालात आसान नहीं दिखते हैं हैं, बीजेपी ने बिहार में अपने दम पर सरकार बनाने का अपना मक़सद ज़ाहिर कर दिया है.

बिहार में बीजेपी के कोटे से सम्राट चौधरी और विजय कुमार सिन्हा दो उपमुख्यमंत्री बनाए गए हैं. इन दोनों नेताओं को नीतीश के धुर विरोधी नेता के तौर पर देखा जाता है.

इसे एनडीए में वापसी के बाद नीतीश के लिए मुश्किल रास्ते की शुरुआत मानी जाती है.

डीएम दिवाकर कहते हैं, “नीतीश कुमार राजनीति के माहिर खिलाड़ी हैं, इसलिए हो सकता है कि वो राज्यसभा चले जाएं. राजनीति में हर कोई अपने बारे में सोचता है. कोई भी अपने दल या दल के बाक़ी नेताओं के बारे में नहीं सोचता है.”

नीतीश कुमार के लिए अनुमान लगाना मुश्किल

नरेंद्र मोदी के नाम पर ही नीतीश कुमार पहली बार एनडीए छोड़कर गए थे.

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वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद का मानना है, “जनता दल यूनाइटेड अब अपने अस्तित्व के संकट का सामना कर रहा है. एक बात पर बीजेपी और आरजेडी दोनों एक मत है कि जेडीयू के दिन कम हैं. सम्राट चौधरी ने भी अपने भाषण में कहा कि हम अपने सरकार बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं.”

सुरूर अहमद के मुताबिक़ बीजेपी का इशारा यही है कि नीतीश अब जाने वाले हैं और यही आरजेडी समझती है. दरअसल इसके पीछे बड़ी वजह जेडीयू में दूसरे नंबर के नेता का अभाव है

जेडीयू में नीतीश के सामने उनकी पार्टी में किसी एक नेता को दूसरे नंबर के नेता के तौर पर पहचान नहीं मिल पाई है

इनमें सबसे ताज़ा मामला जेडीयू के अध्यक्ष पद रहे राजीव रंजन सिंह उर्फ़ ललन सिंह का है. ललन सिंह को लंबे समय से नीतीश कुमार के काफ़ी क़रीबी नेता के तौर पर देखा जाता था, लेकिन अब जेडीयू में उनकी स्थिति कमज़ोर मानी जाती है.

बीजेपी तो यह आरोप भी लगा चुकी है कि ललन सिंह को लालू प्रसाद यादव के क़रीब होने की वजह से पार्टी अध्यक्ष पद से हटाया गया है.

इससे पहले उपेंद्र कुशवाहा, नौकरशाही से राजनीति में आए आरसीपी सिंह और चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर को भी जेडीयू में बड़ा कद दिया गया, लेकिन इनमें से कोई भी अब नीतीश के साथ नहीं है.

जनता दल यूनाइडेट का भविष्य

हाल के समय में नीतीश ने न केवल कई बार गठबंधन बदला है बल्कि उनकी पार्टी से भी कई नेताओं की विदाई हुई है.

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साल 2014 के लोकसभा चुनावों में जेडीयू के बुरे प्रदर्शन के नीतीश कुमार ने सीएम का कुर्सी छोड़ दी थी और जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बना दिया था. जीतन राम मांझी उस वक़्त जनता दल यूनाइटेड में ही थे.

लेकिन नीतीश कुमार ने क़रीब छह महीने बाद ही जीतनराम मांझी को हटा दिया और फिर से ख़ुद मुख्यमंत्री बन गए. मांझी को जेडीयू में एकमात्र ऐसे चेहरे के तौर पर देखा जा सकता था जो बिहार के सीएम तक बनाए गए, लेकिन अब वो भी जेडीयू को छोड़ चुके हैं.

डीएम दिवाकर का मानना है कि कैडर पर आधारित वाम दलों को छोड़कर बाक़ी हर दल के नेता अपने बारे में सोचते हैं. चाहे मुलायम सिंह यादव हों, चाहे मायावती या अन्य कई नेता. इसमें केवल लालू यादव एक मायने में अलग हैं कि वो बीजेपी के सामने झुके नहीं, भले ही उन्हें जेल जाना पड़ा.

वहीं हाल के समय में नीतीश कुमार ऐसे नेता के तौर पर भी उभरे हैं जो बीजेपी और आरजेडी यानी दो विपरीत विचारधारा वाले दलों के साथ बहुत आसानी से तालमेल बैठा लेते हैं.

यही नीतीश की ताक़त भी मानी जाती है और यही उनके दल की कमज़ोरी भी बन सकती है.

बीजेपी के पुराने साझेदार रहे नीतीश कुमार साल 2014 के लोकसभा चुनाव के पहले एनडीए से अलग हो गए थे.

उस वक़्त बीजेपी ने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने दल की तरफ से प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाया था.

क्या करेंगे जनता दल यूनाइटेड के नेता?

नीतीश कुमार को ऐसे नेता के तौर पर देखा जाता है जिनके बारे में कोई भी अनुमान लगाना आसान नहीं है.

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साल 2015 में नीतीश ने आरजेडी, कांग्रेस और अन्य दलों से साथ मिलकर बिहार में पहली बार ‘महागठबंधन’ बनाया था. यह बिहार का ऐसा गठबंधन था जिसे चुनावों में हरा पाना किसी भी पार्टी या गठबंधन के लिए काफ़ी मुश्किल था.

लेकिन नीतीश ने साल 2017 में महागठबंधन का साथ छोड़ दिया और एनडीए में आ गए. फ़िर साल 2022 में एनडीए को छोड़कर महागठबंधन में आ गए और अब पिछले ही महीने वो वापस एनडीए में शामिल हो गए हैं.

नीतीश की इस अस्थिर नीति का जेडीयू के वोटों पर भी असर पड़ने संभावना जताई जाती है.

माना जाता है कि नीतीश के बीजेपी के साथ आने से बिहार में मुस्लिम और सेक्युलर वोटों का विभाजन नहीं होगा, इससे जेडीयू के कई नेताओं के चुनावों पर भी असर पड़ सकता है.

कन्हैया भेलारी कहते हैं, “हो सकता है कि जेडीयू के आधे नेता आरजेडी और आधे बीजेपी में चले जाएं. जिसे जहाँ अपना बेहतर भविष्य दिखेगा वो वहाँ चला जाएगा और नीतीश कुमार राज्यसभा में जाकर बैठ जाएंगे. हालाँकि नीतीश क्या करेंगे यह कोई नहीं बता सकता.”

नीतीश के महागठबंधन का साथ छोड़ने के बाद आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने भी दावा किया था कि जेडीयू साल 2025 में ख़त्म हो जाएगी. ऐसी भविष्यवाणी जेडीयू छोड़कर अपनी पार्टी बनाने वाले उपेंद्र कुशवाहा भी कर चुके हैं.

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