बिहार की सियासत के छोटे खिलाड़ी क्या बड़े खेल की तैयारी में हैं?

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- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- ........से, पटना, बिहार
विपक्ष के ‘इंडिया’ गठबंधन में रहते हुए नीतीश कुमार बार-बार सीटों की साझेदारी पर जल्द फ़ैसला करने की मांग कर रहे थे. लेकिन एनडीए में वापस आने के बाद से नीतीश या उनकी पार्टी के अन्य नेता ऐसी मांग करते नहीं दिख रहे हैं.
नीतीश कुमार ने बिहार में महागठबंधन और राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ से अलग होने के पीछे सीटों के बंटवारे में देरी को एक वजह बताया था.
इस बीच बुधवार को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दिल्ली पहुंचे. दिल्ली में जब वो बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं से मिलेंगे तो बिहार में लोकसभा चुनावों की साझेदारी पर बात हो सकती है.
नीतीश कुमार के जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) की वापसी के बाद बिहार में एनडीए में छह दल हो गए हैं. इन दलों के बीच बिहार की 40 लोकसभा सीटों की साझेदारी होनी है.
बिहार में एनडीए में बीजेपी और जेडीयू के अलावा चिराग पासवान, उपेंद्र कुशवाहा, जीतन राम मांझी और पशुपति कुमार पारस की पार्टी भी शामिल है.
ये माना जाता है कि सीटों की साझेदारी पर बातचीत शुरू होते ही एनडीए में खींचतान हो शुरू हो सकती है.
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राज्य में एनडीए की सरकार बनने के साथ ही यह टकराव नज़र भी आने लगा है. इसकी शुरुआत बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) के नेता जीतन राम मांझी ने कर दी है.
मांझी ने अपने दल के लिए राज्य मंत्रिमंडल में एक और सीट की मांग की है. फिलहाल उनके बेटे संतोष सुमन को राज्य सरकार में मंत्री बनाया गया है.
जीतन राम मांझी को इसमें एलजेपी (आर) के सांसद चिराग पासवान का समर्थन भी मिल गया है.
चिराग पासवान ने पत्रकारों से कहा, “मुझे नहीं पता उनकी गठबंधन के भीतर क्या बातचीत हुई है. यक़ीनन उनके विधायकों की संख्या कम है लेकिन मौजूदा परिस्थिति में उनका महत्व काफ़ी है. वो हमारे प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हैं और उन्हें उचित सम्मान मिलना चाहिए.”

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जीतन राम मांझी: बग़ावत के संकेत?
बिहार की नई सरकार में चार विधायक और एक विधान परिषद सदस्य वाले मांझी के ‘हम’ को नीतीश मंत्रिमंडल में एक सीट दी गई है, लेकिन मांझी ने सार्वजनिक तौर दो मंत्री पद पर दावा किया है.
यही नहीं उन्होंने अपने कोटे के विभाग को लेकर भी उनकी अपनी मांग रखी है.
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जीतन राम मांझी के कहा है, “क्या हमारी पार्टी के लिए केवल अनुसूचित जाति जनजाति कल्याण विभाग ही है? क्या सड़क, पुल-पुलिया, हैंडपंप लगाने और घर बनाने का विभाग हमें नहीं मिल सकता. इसका हमें दुःख है.”
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जीतन राम मांझी की नाराज़गी की ख़बरों इतनी बड़ी हो गईं कि उनके बेटे संतोष सुमन के मंत्री पद से इस्तीफ़े की अफ़वाह भी फैल गई. यह अफ़वाह इतनी मज़बूत थी कि संतोष सुमन को ट्वीट कर बताना पड़ा कि उन्होंने इस्तीफ़ा नहीं दिया है.
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वहीं जीतन राम मांझी का दावा है कि उनको आरजेडी की तरफ से 'मुख्यमंत्री बनने का ऑफ़र भी आ चुका है.'
यानी मांझी दबाव की राजनीति के हर पैंतरे का सहारा लेते हुए दिख रहे हैं. इस बीच कांग्रेस ने भी उनको मुख्यमंत्री बनाने का ऑफ़र दे दिया है.
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गया लोकसभा सीट पर मांझी की नज़र?
वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेलारी कहते हैं, “जीतन राम मांझी असल में दबाव बनाकर रखना चाहते हैं. उन्हें गया की लोकसभा सीट भी चाहिए जिसपर फ़िलहाल जेडीयू का कब्ज़ा है. जेडीयू यह सीट छोड़ेगी कि नहीं यह भी बता पाना मुश्किल है.”
इससे पहले जीतन राम मांझी चिराग पासवान की जमुई सीट पर भी अपना दावा पेश कर चुके हैं.
वरिष्ठ पत्रकार नचिकेता नारायण कहते हैं, “मांझी की एक और समस्या है कि उनके बेटे संतोष सुमन का विधान परिषद सदस्य का कार्यकाल इसी साल मई में ख़त्म हो रहा है. मांझी अपने दम पर उन्हें फिर से एमएलसी नहीं बना सकते, इसलिए दबाव की राजनीति का सहारा ले रहे हैं.”
बिहार विधानसभा में 12 फ़रवरी को नीतीश सरकार को अपना बहुमत साबित करना है. इस बीच राज्य की सियासत में इस बात की चर्चा भी खूब हो रही है कि फ़्लोर टेस्ट में कुछ ‘खेला’ भी हो सकता है.

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बिहार में हो सकता है ‘खेला’?
नीतीश कुमार के महागठबंधन का साथ छोड़ते वक़्त आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने दावा किया था कि बिहार में ‘खेला’ अभी बाक़ी है.
तेजस्वी के बयान के बाद लगातार इस बात को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं कि यह ‘खेला’ कौन कर सकता है.
नीतीश के एनडीए में शामिल होते ही सियासी गलियारों में इसकी भी खूब चर्चा में रही हैं कि राज्य में कुछ विधायक दल बदल कर सकते हैं. हालाँकि दल बदल विरोधी क़ानून की वजह से बीजेपी और आरजेडी जैसे बड़े दलों के विधायकों को तोड़ना किसी के लिए आसान नहीं होगा.
लेकिन राज्य में 19 विधायकों वाली कांग्रेस पार्टी को यह डर सता रहा है कि उसके कुछ विधायकों को तोड़ा जा सकता है. इसी टूट के डर से कांग्रेस ने अपने क़रीब 12 विधायकों को हैदराबाद भेज दिया है.
बिहार कांग्रेस के प्रवक्ता असित नाथ तिवारी दावा करते हैं, “तोड़फोड़ की राजनीति कांग्रेस का संस्कार नहीं है. हमें जनता ने जितनी सीटें दी हैं, हम उसका सम्मान करते हैं. नीतीश हर बार कुछ चेहरों को मंत्री बना देते हैं इसलिए उनके कुछ विधायक नाराज़ हैं. वो हमारे दरवाज़े पर आएंगे तो हम दरवाज़ा बंद नहीं कर देंगे.”
बिहार की 243 सीटों की विधानसभा में फ़िलहाल बीजेपी के पास 78 और जेडीयू के पास 45 विधायक हैं. इसके अलावा ‘हम’ के पास भी चार विधायक हैं. यानी नीतीश सरकार के पास फ़िलहाल बहुमत के आंकड़े यानी 122 से ज़्यादा विधायकों का समर्थन दिखता है.
कन्हैया भेलारी के मुताबिक़ नीतीश कुमार हर बार अपने मंत्रिमंडल में कुछ चुनिंदा चेहरों को रखते हैं. इसलिए उनकी पार्टी के कई विधायक नाराज़ हैं जो दबाव बना रहे हैं. ये विधायक 3-4 बार विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करने के बाद भी मंत्री नहीं बन पाए हैं.
कन्हैया भेलारी कहते हैं, “मुझे फ़्लोर टेस्ट में कोई ख़तरा नहीं दिखता है. लेकिन नीतीश का राजनीतिक जीवन अब ख़त्म होने वाला है और कई विधायकों को लगता है कि इस बार मंत्री नहीं बने तो कभी नहीं बन पाएंगे.”

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सियासी उठापटक
ऐसी आशंका है कि बिहार में जेडीयू के कुछ विधायक नाराज़ हो कर अन्य दल में जा सकते हैं. ऐसी स्थिति में बिहार में सरकार बचाने के लिए एनडीए को दूसरे विधायकों की ज़रूरत पड़ सकती है.
बिहार में सियासी उठापटक की एक तस्वीर मंगलवार को सामने आई है जब आरजेडी के विधान परिषद सदस्य रामबली सिंह चंद्रवंशी की सदस्यता ख़त्म कर दी गई. उन पर पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का आरोप था.
चंद्रवंशी ने लालू यादव के अलावा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के ख़िलाफ़ भी बयान दिए थे. उनके ख़िलाफ़ आरजेडी ने ख़ुद विधान परिषद के सभापति से इसकी शिकायत की थी. हालाँकि यह मामला उस वक़्त का था जब नीतीश कुमार महागठबंधन में थे.
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एनडीए के सामने चुनौती
बिहार का सियासत में यह उठापटक न केवल राज्य सरकार के लिए है, बल्कि आने वाले लोकसभा चुनावों में भी एनडीए के सामने चुनौती कम नहीं है.
बिहार में एनडीए के कुनबे में फ़िलहाल छह दल शामिल हैं. नीतीश कुमार के जेडीयू के एनडीए में शामिल होने से पहले बीजेपी, उपेंद्र कुशवाहा की आरएलजेडी, एलजेपी के दो धड़े और जीतन राम मांझी की पार्टी ‘हम’ के बीच यहां की 40 लोकसभा सीटों का बंटवारा होना था.
साल 2019 में हुए पिछले लोकसभा चुनाव में एनडीए ने बिहार की 40 में 39 सीटें जीती थीं. इनमें बीजेपी ने 17, जडीयू ने 16 और एलजेपी ने 6 सीटों पर जीत दर्ज की थी. लेकिन रामविलास पासवान के निधन के बाद उनकी पार्टी दो धड़ों में टूट चुकी है.
एलजेपी (आर) यानी चिराग पासवान और राष्ट्रीय लोक जन शक्ति पार्टी यानी पशुपति कुमार पारस में रामविलास पासवान की राजनीतिक विरासत पर दावे का झगड़ा भी है.
चिराग पासवान की पार्टी राज्य की उन सभी छह सीटों पर अपना दावा पेश करती रही है, जिसपर एलजेपी ने पिछली बार जीत हासिल की थी. वह रामविलास पासवान की पहचान रही हाजीपुर सीट भी चाहती है, जहाँ से फ़िलहाल रामविलास पासवान के भाई पशुपति पारस सांसद हैं.

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चिराग पासवान का क्या होगा रुख?
बिहार में एनडीए के लिए असली मुश्किल यहीं नज़र आ सकती है. इस पार्टी के पास बिहार में क़रीब छह फ़ीसदी वोट माना जाता है. ज़ाहिर है एनडीए के सभी दलों को लोकसभा चुनाव में टिकट देने के लिए इनमें से कुछ दलों को अपनी जीती हुई सीट भी छोड़नी पड़ सकती है.
साल 2020 के विधानसभा चुनावों के बाद चिराग पासवान और नीतीश कुमार बीच संबंधों में बड़ी दरार आ गई थी. बाद में जेडीयू ने चिराग पासवान पर आरोप लगाया था कि चुनावों में जेडीयू के उम्मीदवार को हराने के लिए एनडीए में होते हुए भी उन्होंने अपने उम्मीदवार खड़े किए थे.
उन चुनावों में जेडीयू तीसरे नंबर की पार्टी बन गई थी. जेडीयू ने उस चुनाव को ‘चिराग मॉडल’ का नाम दिया था.
हालाँकि एक हफ़्ते पहले चिराग पासवान बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा के साथ नीतीश के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुए थे. माना जाता है कि शपथ ग्रहण समारोह में चिराग पासवान की मौजूदगी एनडीए में सबकुछ ठीक दिखाने की कोशिश हो सकती है.
नचिकेता नारायण कहते हैं, “एनडीए में जो छोटे दल हैं उनकी राजनीति नीतीश के ख़िलाफ़ रही है, चाहे वो चिराग पासवान हों या जीतन राम मांझी हों. हालांकि ऐसे दल अचानक किसी गठबंधन को छोड़ नहीं सकते, लेकिन इनके लिए ज़्यादा फ़ायदे वाले किसी भी गठबंधन में जाना आसान होता है.”

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'ज़्यादा हिस्सा हासिल करने की कोशिश'
उनका मानना है कि एनडीए के दलों का महागठबंधन में जाना आसान नहीं दिखता है. वो पैंतरेबाज़ी और दबाव की राजनीति कर रहे हैं, ताकि साझेदारी में ज़्यादा से ज़्यादा हासिल किया जा सके.
इसी सिलसिले में एक और नेता का नाम अहम है, वो हैं उपेंद्र कुशवाहा. अगस्त 2022 में राज्य में महागठबंन सरकार बनने के कुछ महीनों बाद उपेंद्र कुशवाहा ने जेडीयू से इस्तीफ़ा दे दिया था और नई पार्टी आरएलजेडी बना ली थी.
नीतीश कुमार पर जमकर हमला करने वाले उपेंद्र कुशवाहा फ़िलहाल बिहार के सियासी समीकरण को लेकर खामोश हैं.
साल 2014 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने गठबंधन में उनको तीन सीटें दी थीं. इन तीनों सीटों पर कुशवाहा की उस वक़्त की पार्टी ‘आरएलएसपी’ ने जीत दर्ज की थी. कुशवाहा उस वक़्त केंद्र में मंत्री भी बनाए गए थे.
कुशवाहा के साथ एक संकट है कि बिहार में बीजेपी में सम्राट चौधरी का क़द जिस तेज़ी से बढ़ा है वह उपेंद्र कुशवाहा की ताक़त को कम कर सकता है. दोनों ही नेता एक ही बिरादरी से आते हैं और इसमें कुशवाहा को अपने सियासी भविष्य के लिए ख़तरा दिख सकता है.
यही ख़ामोशी फ़िलहाल चिराग पासवान के चाचा पशुपति कुमार पारस में नज़र आ रही है. एलजेपी में टूट के बाद पार्टी के छह में से पाँच सांसद उनके साथ हैं.
बिहार में सीटों की साझेदारी को लेकर उनका दावा भी एनडीए और चिराग पासवान के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकता है.
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