जेडीयू का अध्यक्ष बनने के पीछे क्या हो सकती है नीतीश कुमार की रणनीति

नीतीश कुमार के साथ ललन सिंह

इमेज स्रोत, ANI

    • Author, चंदन कुमार जजवाड़े
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना से

बिहार में सत्ता पर बैठी जनता दल यूनाइटेड में बड़ा बदलाव हो गया है. पार्टी के सबसे बड़े नेता और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ख़ुद पार्टी के अध्यक्ष बन गए हैं. साल 2024 के लोकसभा चुनाव के पहले हुए इस बदलाव को नीतीश कुमार का बड़ा कदम माना जा रहा है.

राजीव रंजन सिंह उर्फ़ ललन सिंह ने आख़िरकार शुक्रवार को जेडीयू के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया. इसके साथ ही उन सारे कयासों पर विराम लग चुका है जो ललन सिंह के राजनीतिक भविष्य को लेकर लगाए जा रहे थे. अब इसका बिहार और विपक्षी दलों की सियासत पर क्या असर पड़ सकता है?

नीतीश कुमार ने राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद स्वीकार करने के बाद मीडिया के सामने ललन सिंह से कंधे पर हाथ भी रखा. नीतीश कुमार ने यह भी दिखाने की कोशिश की है कि पार्टी में सब कुछ सामान्य है.

बीजेपी यह दावा कर रही थी कि लालू प्रसाद यादव से ज़्यादा क़रीब हो जाने की वजह से ललन सिंह को हटाया जा सकता है. हलाँकि जेडीयू ने आधिकारिक तौर पर बताया है कि ललन सिंह 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए अपनी लोकसभा सीट पर ज़्यादा ध्यान देना चाहते थे.

ललन सिंह बिहार के मुंगेर से सांसद हैं. इस सीट पर भूमिहारों का बड़ा प्रभाव माना जाता है. कहा जाता है कि बीजेपी इस सीट से ललन सिंह को हराने के लिए अपनी पूरी ताक़त लगा सकती है. चर्चा यह भी होती है कि बीजेपी यहां से केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह को लोकसभा चुनाव में उतार सकती है.

जेडीयू के इस फैसले की असल वजह क्या?

दिल्ली में जेडीयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक

इमेज स्रोत, ANI

राजनीतिक विश्लेषक और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस के पूर्व प्रोफ़ेसर पुष्पेंद्र कुमार कहते हैं, "यह बात बहुत हज़म नहीं होती है कि मुंगेर पर ध्यान देने के लिए ललन सिंह ने पार्टी अध्यक्ष का पद छोड़ा होगा. इसके पीछे नीतीश के मन में असुरक्षा की एक भावना हो सकती है. राजनीति में बहुत सी बातें छिपी होती हैं, जो धीरे-धीरे कर बाहर निकलेंगी."

ललन सिंह 2019 के लोकसभा चुनाव में मुंगेर सीट से जीते थे, लेकिन उस वक़्त बीजेपी और जेडीयू एक साथ थी. इससे पहले 2014 के चुनाव में जब जेडीयू बीजेपी से अलग हो गई थी तब ललन सिंह इस सीट पर सूरजभान सिंह की पत्नी वीणा देवी से हार गए थे.

बीजेपी नेता सुशील कुमार मोदी ने दावा किया था कि लालू प्रसाद यादव के क़रीबी हो जाने से ललन सिंह को पार्टी अध्यक्ष के पद से हटाया जा सकता है. माना जाता है कि 2022 में जब नीतीश ने बीजेपी का साथ छोड़ा था, तब लालू की पार्टी आरजेडी के साथ गठबंधन में ललन सिंह की अहम भूमिका थी.

महागठबंधन की तरफ से मुख्यमंत्री का चेहरा

छोड़िए X पोस्ट
X सामग्री की इजाज़त?

इस लेख में X से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले X cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.

चेतावनी: बीबीसी दूसरी वेबसाइट्स की सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है.

पोस्ट X समाप्त

हालाँकि कई लोग सुशील कुमार मोदी के इस दावे से सहमत नहीं दिखते हैं. दरअसल लालू प्रसाद यादव अगर इस तरह का कोई कदम उठाते हैं जिससे नीतीश कुमार की नाराज़गी झेलनी पड़े तो यह बहुत व्यवहारिक नहीं दिखता है.

जबकि नीतीश कुमार ख़ुद कह चुके हैं 2025 के विधानसभा चुनाव में लालू के बेटे तेजस्वी यादव ही महागठबंधन की तरफ से मुख्यमंत्री का चेहरा होंगे. ऐसे में लालू थोड़े समय लिए इस तरह का कोई कदम उठाएंगे, ऐसा नहीं लगता है.

वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद कहते हैं, "मुंगेर लोकसभा सीट का जातीय समीकरण बताता है कि ललन सिंह को अपनी सीट बचाने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी. बीजेपी के साथ नहीं होने से उनको जीतने के लिए आरजेडी के कैडर वोट की ज़्यादा ज़रूरत पड़ेगी. संभव है इसलिए वो लालू के क़रीब दिखते हैं."

असुरक्षा की भावना

पटना में जश्न मनाते जेडीयू के कार्यकर्ता
छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

पुष्पेंद्र कुमार के मुताबिक़ हो सकता है कि पार्टी के अंदर कुछ लोग ललन सिंह को नापसंद करते हों और वो ललन सिंह के ख़िलाफ़ अंदर ही अंदर षड्यंत्र कर रहे हों.

वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेलारी भी इस बात से सहमत दिखते हैं कि ललन सिंह के तुनुकमिजाज होने की वजह से कई लोग उनको पसंद नहीं करते थे. इसकी शिकायत नीतीश कुमार से भी की गई थी.

शुक्रवार को ललन सिंह के पार्टी अध्यक्ष पद से हटने के बाद जेडीयू के कुछ कार्यकर्ताओं ने पार्टी दफ़्तर के अंदर होली भी खेली है, हालाँकि यह कोई चुनावी जीत नहीं थी, बल्कि दिल्ली में चल रही राष्ट्रीय कार्यकारिणी में पार्टी का लिया गया अपना फ़ैसला था.

पटना में जेडीयू कार्यालय में मौजूद एक कार्यकर्ता उपेंद्र सिंह कहते हैं, "पार्टी में यह बदलाव परिस्थितियों के कारण हुआ है. यह समय की मांग थी की नीतीश कुमार ख़ुद पार्टी अध्यक्ष का पद ग्रहण करें ताकि नयापन लाया जा सके."

हाल के दिनों में नीतीश कुमार को कई बार गुस्से में भी देखा गया है. कई बार अपने बयानों की वजह से भी वो विवादों में रहे हैं. ख़ासकर बिहार विधानसभा में क़रीब दो महीने पहले नीतीश ने जनसंख्या रोकने के तरीके पर जो बयान दिया था उसपर काफ़ी विवाद हुआ था.

सुरूर अहमद कहते हैं, "ऐसा नीतीश की बढ़ती उम्र की वजह से हो सकता है कि वो आजकल बहुत जल्दी गुस्से में आ जाते हैं. हालाँकि इसके पीछे अन्य वजह भी हो सकती है."

नीतीश कुमार ने दिल्ली से क्या संदेश दिया?

बीजेपी कार्यकर्ता नीतीश का पार्टी अध्यक्ष बनना समय की मांग बताते हैं.

नीतीश कुमार 72 साल के हो चुके हैं और पिछले क़रीब 18 साल से वो बिहार के मुख्यमंत्री के पद पर बैठे हैं. हालाँकि साल 2014 में ख़ुद उन्होंने कुछ महीनों के लिए जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया था.

बिहार की राजनीति में बीते दो दशक से नीतीश की राजनीतिक हैसियत का अंदाज़ा इस बात से भी लगता है कि दो बार बीजेपी और दो बार आरजेडी भी नीतीश के साथ नीतीश की ही शर्त पर गठबंधन कर चुके हैं. नीतीश कुमार पूरी तरह से दो विरोधी विचारधारा वाले गठबंधन का नेतृत्व कर चुके हैं.

यानी दोनों के साथ गठबंधन में नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री रहे हैं. चाहे नीतीश की पार्टी के पास विधानसभा में सहयोगी दल से कम सीट रही हो.

लेकिन पुष्पेंद्र कुमार के मुताबिक़ आजकल पार्टी को लेकर जिस तरह की ख़बरें आ रही थीं, उससे नीतीश के अंदर असुरक्षा की भी एक भावना आ गई होगी.

पुष्पेंद्र कुमार कहते हैं, "बिहार की राजनीति में हाल फ़िलहाल यह अवधारणा बनाने की कोशिश हो रही है कि नीतीश कुमार पर उम्र का असर होने लगा है. उनके हालिया बयानों को इसी से जोड़ा जाता है. इसलिए नीतीश को किसी मुद्दे पर कैसी प्रतिक्रिया देनी चाहिए इसपर वह संयम या संतुलन खो रहे हैं."

पुष्पेंद्र कुमार के मुताबिक़ यह बात सही भी हो सकती है और हो सकता है कि किसी राजनीतिक षडयंत्र के तहत ऐसी बातें फैलाई जा रही हो. हो. लेकिन नीतीश ने पार्टी अध्यक्ष बनकर एक तरह का संदेश भी दे दिया है कि उनकी पार्टी पर आज भी उनका नियंत्रण है.

क्या कांग्रेस को कोई संदेश दिया

ललन सिंह साल 2021 में जेडीयू के अध्यक्ष बनाए गए थे.

इमेज स्रोत, ANI

बीजेपी यह दावा करती रही है कि नीतीश कुमार विपक्षी गठबंधन का संयोजक और प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनना चाहते हैं. जेडीयू के कई नेता और कार्यकर्ता भी अक्सर नीतीश कुमार को प्रधानमंत्री पद का चेहरा बताते हैं.

हालाँकि विपक्षी गठबंधन की जून से अब तक हुई चार बैठकों में इसपर कोई फैसला नहीं हुआ है. तो क्या पार्टी के अंदर बदलाव कर नीतीश कांग्रेस या 'इंडिया' के बाक़ी सहयोगी दलों को भी कोई संदेश देना चाहते हैं?

नचिकेता नारायण कहते हैं, "ऐसा हो भी सकता है क्योंकि विपक्ष का गठबंधन बन तो गया है लेकिन इसमें किसी बात को लेकर बहुत स्पष्टता नहीं है. नीतीश ने एक ठोस कदम उठाकर यह संदेश देने की कोशिश भी की है कि अब कांग्रेस भी कुछ सोचे और इस दिशा में कदम उठाए."

पुष्पेंद्र कुमार कहते हैं, "नीतीश कुमार ने पार्टी पर अपना दावा मज़बूत करके दिखा दिया है कि उनकी अनदेखी नहीं की जा सकती है. फिर महाराष्ट्र में जिस तरह से शिव सेना में टूट हुई है उसने सबको डरा दिया है. नीतीश ने यह दिखाया है कि हमारी पार्टी को नहीं तोड़ पाओगे."

बिहार में फ़िलहाल अगस्त, 2022 से महागठबंधन की सरकार चल रही है. इस सरकार में जेडीयू, आरजेडी, कांग्रेस और वाम दल शामिल हैं. माना जाता है कि यही 'महागठबंधन' केंद्र के स्तर पर विपक्षी दलों के गठबंधन 'इंडिया' का आधार है. यहीं से विपक्षी एकता की बुनियाद है.

क्या हो सकता है नीतीश के अध्यक्ष बनने का असर?

माना जाता है कि नीतीश कुमार ने पार्टी अध्यक्ष बनकर कांग्रेस को भी संदेश देने की कोशिश की है.

इमेज स्रोत, ANI

विपक्षी दलों की एकजुटता के लिए नीतीश कुमार ने ही पहल की थी. इसके लिए विपक्षी दलों की पहली बैठक भी बिहार की राजधानी पटना में हुई थी. इसलिए अगर बिहार में 'इंडिया' गठबंधन या इसका कोई दल प्रभावित होता है तो यह पूरे देश में असर डाल सकता है.

वरिष्ठ पत्रकार कन्हैया भेलारी मानते हैं कि अपनी ताक़त दिखाकर नीतीश की कांग्रेस पर दबाव बनाने की कोशिश भी हो सकती है, ताकि उन्हें विपक्षी गठबंधन का संयोजक बनाया जा सके.

पुष्पेंद्र कुमार कहते हैं, "अगर ललन सिंह तुरंत ही किसी तरह की बयानबाज़ी या बेचैनी नहीं दिखाते हैं तो इसका जेडीयू पर कोई असर नहीं पड़ेगा. बाक़ी जो सवर्ण नेता जेडीयू में हैं उनको जितना जेडीयू में मिला है बीजेपी उससे ज़्यादा दे नहीं सकती है. इसलिए वो बग़ावत करेंगे ऐसा नहीं लगता है."

पुष्पेंद्र कुमार के मुताबिक़, नीतीश की उम्र और उनके अंदर असुरक्षा की भावना को लेकर जो बातें फैलाई जा रही हैं उसे दबाना ज़्यादा ज़रूरी है. अगर यह जनता तक पहुँच जाएगा तो इससे ज़्यादा नुक़सान होगा और इससे बीजेपी या आरजेडी में भी हलचल बढ़ सकती है.

हालांकि माना जाता है कि जेडीयू के अंदर बड़ी संख्या मंडल की राजनीति के समर्थक नेताओं की है. ऐसे नेताओं के लिए बीजेपी से बेहतर विकल्प आरजेडी को माना जाता है. यानी नीतीश की पार्टी के ज़्यादातर नेताओं के लिए आरजेडी पहली पसंद बन सकता है.

नीतीश के अध्यक्ष बनने से जेडीयू को फायदा या नुकसान?

पार्टी के अंदर अपनी ताक़त दिखाकर नीतीश ने एक तीर से कई निशाने साधने की कोशिश की है.

इमेज स्रोत, ANI

बिहार में इसी साल 2 अक्टूबर को जातिगत गणना के आँकड़े जारी किए गए थे. उसके बाद से बीजेपी विरोधी गठबंधन 'इंडिया' के दल लगातार केंद्र सरकार पर पूरे देश में जातिगत जनगणना कराने की मांग कर रहे हैं.

जातिगत सर्वे के मुताबिक़ बिहार की कुल आबादी क़रीब 13 करोड़ है. इसमें अति पिछड़ा वर्ग 27.12 प्रतिशत, अत्यंत पिछड़ा वर्ग 36.01 प्रतिशत, अनुसूचित जाति 19.65 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति 1.68 प्रतिशत और अनारक्षित यानी सवर्ण केवल 15.52 प्रतिशत हैं.

नचिकेता नारायण कहते हैं, "मेरा मानना है कि नीतीश कुमार के पार्टी अध्यक्ष बनने से जेडीयू को फ़ायदा ही होगा. वह बेहतर तालमेल के साथ 'इंडिया' से सहयोगी दलों के साथ अगले लोकसभा चुनावों में जा सकते हैं."

नीतीश कुमार और 'इंडिया' के सहयोगी दल जातिगत जनगणना को अगले लोकसभा चुनाव के लिए बड़ा मुद्दा बनाने में लगे हैं. उनका दावा है कि इससे पिछड़े, अति पिछड़े, दलित और अन्य पिछड़ी जातीयों को न्याय और सरकारी योजनाओं का लाभ मिल सकेगा.

माना जाता है कि जातिगत जनगणना के मुद्दे पर राजनीति करने के लिए भी नीतीश का ख़ुद पार्टी अध्यक्ष बनने का फ़ैसला हो सकता है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)