नीतीश कुमार विपक्ष की प्रेस कांफ़्रेंस से पहले क्यों लौटे पटना, क्या वो नाराज़ हैं?

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- Author, चंदन जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना से
बेंगलुरु में मंगलवार को हुई विपक्षी दलों की बैठक के दौरान विपक्षी गठबंधन का नाम तय हो गया.
इसकी अगली बैठक को लेकर भी फ़ैसला हुआ है. इसमें एक अन्य मुद्दे की चर्चा भी खूब हो रही है.
बीजेपी का दावा है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस बैठक के दौरान नाराज़ हो गए और इसलिए बैठक के बाद प्रेस कांफ्रेंस में मौजूद नहीं थे.
इससे पहले पटना में हुई मीटिंग के बाद पत्रकारों से बातचीत के दौरान आम आदमी पार्टी के नेता मौजूद नहीं थे. मीटिंग के बाद अरविंद केजरीवाल की पार्टी ने दिल्ली पर केंद्र सरकार के अध्यादेश को लेकर कांग्रेस के ख़िलाफ़ नाराज़गी जताई थी.
विपक्षी गठबंधन की पटना में हुई बैठक में 15 दलों ने भाग लिया था. बेंगलुरु में इन पार्टियों की संख्या 26 हो गई थी.
एक तरफ एकजुट हो रहे विपक्ष का कुनबा बड़ा हो रहा है दूसरी तरफ नेताओं की कथित नाराज़गी की ख़बरें भी सुर्खियां बटोर रही हैं.
नीतीश कुमार के साथ ख़ास बात यह भी है कि वही विपक्षी दलों को एकजुट करने की कोशिश में लंबे समय से लगे हुए थे.
पटना में पिछले महीने 23 जून को हुई विपक्ष की बैठक भी नीतीश कुमार ने आयोजित की थी.

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बेंगलुरु से क्यों लौट आए नीतीश?
नीतीश कुमार की ग़ैर-मौजूदगी क्या वास्तव में किसी नाराज़गी का संकेत है?
इस पर नीतीश कुमार ने बुधवार को सफ़ाई दी. उन्होंने कहा, “हम किस लिए नाराज़ होंगे? और इस मीटिंग से बीजेपी का क्या लेना देना है? लोग तरह तरह की बात करते हैं, इसमें कोई ख़ास बात नहीं है. हमने मीटिंग में बोल दिया था कि हम लोगों को निकलने दीजिए.”
उन्होंने कहा कि बैठक में सब तरह की बात हुई, हर एक ने अपना सुझाव दिया और उसके बाद ही घोषणा की गई.
नीतीश कुमार ने ये भी कहा कि जब सही वक़्त आएगा तब अन्य पार्टियां भी विपक्षी एकजुटता में शामिल होंगी.
18 जुलाई को दिल्ली में एनडीए की बैठक पर नीतीश कुमार ने कहा, “अटल बिहारी वाजपेयी के ज़माने में एनडीए की मीटिंग होती थी, सारी पार्टियों को बुलाया जाता था लेकिन उसके बाद इन्होंने एनडीए की कोई बैठक नहीं बुलाई.”
ललन सिंह ने क्या कहा?
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उन्होंने कहा, "पिछले पांच साल में जब हम इनके साथ गए थे तो कहां कोई एनडीए की बैठक हुई? जब हमने एक मीटिंग की तो इन्हें लगा कि एक मीटिंग करा दी जाए."
नीतीश की पार्टी जनता दल यूनाइटेड के अध्यक्ष राजीव रंजन उर्फ़ ललन सिंह ने इसे पूरी तरह से दुष्प्रचार बताया है.
ललन सिंह ने कहा है, “पिछले कई दिनों में कई तरह के दुष्प्रचार हुए हैं. कभी कहा गया कि जेडीयू और आरजेडी का विलय होगा तो कभी दोनों पार्टियों के बीच तनाव की ख़बर चलाई गई. अब कह रहे हैं नीतीश कुमार नाराज़ हैं. नीतीश कुमार विपक्षी एकता के सूत्रधार हैं और सूत्रधार कभी नाराज़ नहीं होता है. ”
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ललन सिंह ने आरोप लगाया है कि बीजेपी नेता सुशील कुमार मोदी को छपास रोग है. यानी ललन सिंह का दावा है कि सुशील कुमार मोदी बयानों के ज़रिए सुर्खियों में रहना चाहते हैं
दरअसल समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़ सुशील मोदी ने दावा किया है कि विपक्षी गठबंधन का संयोजक नहीं बनाए जाने से नीतीश कुमार नाराज़ होकर पहले ही मीटिंग छोड़कर निकल गए.
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हालांकि बेंगलुरु में यह भी फ़ैसला हुआ है कि विपक्ष की अगली बैठक में ग्यारह सदस्यों की एक समन्वय समिति बनाई जाएगी.
उसी बैठक में विपक्षी गठबंधन के संयोजक का नाम तय किया जाएगा.

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बीजेपी के तंज़ की वजह?
वरिष्ठ पत्रकार नचिकेता नरायण के मुताबिक़ नीतीश की नाराज़गी के जो दावे सुशील मोदी कर रहे हैं उसमें सच्चाई कम और नीतीश को चिढ़ाने की बात ज़्यादा दिखती है.
नचिकेता नारायण कहते हैं, “एक तो संयोजक कोई ऐसा बड़ा पद नहीं है, दूसरा किसी और को अभी संयोजक बनाया नहीं गया है, इसलिए नीतीश कुमार का नाराज़ होना संभव नहीं दिखता. अगर आप बैठक की तस्वीरों को देखें तो नीतीश को बीच में जगह दी गई थी और उन्हें इस एकता का केंद्रीय नेता माना ही गया है.”
बेंगलुरू की मीटिंग में हुआ क्या था?
नीतीश कुमार की कथित नाराज़गी के पीछे की सच्चाई जानने के लिए हमने विपक्ष की बेंगलुरु बैठक में मौजूद सीपीआई एमएल के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य से बात की.
दीपांकर भट्टाचार्य ने बीबीसी को बताया, “पटना की बैठक में केजरीवाल जल्दी निकल गए थे, उस समय वो थोड़े नाराज़ ज़रूर थे. लेकिन नीतीश कुमार के साथ ऐसा नहीं है. केवल नीतीश ही नहीं बल्कि लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी भी जल्दी निकल गए थे, क्योंकि उनकी वापसी की फ़्लाइट थी.”
दीपांकर भट्टाचार्य के मुताबिक़ नीतीश कुमार शुरू में केवल ‘इंडिया’ नाम को लेकर थोड़े असहज हो रहे थे, उन्हें लग रहा था कि यह ग़ैर पारंपरिक नाम है, इससे लोगों से जुड़ने में परेशानी हो सकती है. उन्हें ये भी लगा था कि ये एनडीए से मिलता-जुलता नाम भी है. लेकिन यह कोई बहुत बड़ा मुद्दा नहीं था.
दीपांकर भट्टाचार्य ने दावा किया है कि नीतीश कुमार नाराज़ हों, ऐसा कभी नहीं दिखा.
इस बीच जेडीयू ने बीजेपी को लेकर दावा किया कि विपक्ष के डर से उन्होंने हताशा और घबराहट में एनडीए की बैठक की.

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‘घबराहट का असर’
नचिकेता नारायण कहते हैं कि बेंगलुरु में नीतीश के ख़िलाफ़ पोस्टर भी लगा दिए गए थे और कहा गया कि ये कांग्रेस ने लगवाए हैं, जबकि कांग्रेस के नेताओं ने मुझसे कहा है कि वो बिहार में नीतीश की साझेदार है, पोस्टर लगाने का काम बीजेपी वालों का ही होगा.
दूसरी तरफ जेडीयू का दावा है कि दरअसल बीजेपी विपक्षी एकता से डरी हुई है इसलिए वो अब एनडीए की बैठक भी बुला रही है, जो कई साल से नहीं हो रही थी.
जदयू के ललन सिंह का कहना है, “हम भी एनडीए के साथ रहे हैं, बीते पांच साल में एनडीए की कभी बैठक नहीं हुई. पूरे पूर्वोत्तर राज्यों को मिलाकर लोकसभा में 23 सीटें हैं और अब वहां से 15 दलों को एनडीए की बैठक में बुलाया गया है. उनको बुलाने दीजिए बैठक.”
ज़ाहिर है लंबे समय तक एक-दूसरे के साथ रही बीजेपी और जेडीयू अब एक दूसरे के ख़िलाफ़ खड़ी हैं. ऐसे में दोनों ही दल बिहार से लेकर दिल्ली तक के मुद्दे पर अपने-अपने दावे कर रहे हैं.
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