डीएमके नेता दयानिधि मारन के यूपी-बिहार पर बयान को लेकर आक्रामक बीजेपी, इंडिया गठबंधन को होगा नुक़सान?

डीएमके सांसद दयानिधि मारन

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    • Author, चंदन कुमार जजवाड़े
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना से

उत्तर भारत और दक्षिण भारत को लेकर इस साल हुए कई विवादों की लिस्ट में एक और नाम जुड़ गया है. इस बार डीएमके नेता दयानिधि मारन के बयान से राजनीतिक पारा चढ़ रहा है. इसके केंद्र में भी बिहार है.

इस बयान को लेकर केंद्र में सरकार चला रही बीजेपी ने विपक्ष के ‘इंडिया’ गठबंधन पर हमला बोला है. बीजेपी ने मारन के बयान पर कांग्रेस और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से जवाब मांगा है.

डीएमके सांसद दयानिधि मारन के जिस बयान पर राजनीति हो रही है, वो क़रीब पांच साल पुराना है. डीएमके नेताओं का यही दावा है.

यानी यह बयान उस वक़्त का है, जब न ‘इंडिया’ गठबंधन बना था और न ही नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू और बीजेपी अलग हुए थे.

बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने सोशल मीडिया ‘एक्स’ पर दयानिधि मारन का एक वीडियो शेयर किया है. 24 सेकेंड के इस वीडियो पर अमित मालवीय ने लिखा, “डीएमके सांसद दयानिधि मारन ने कहा है कि बिहार और उत्तर प्रदेश के हिन्दी भाषी लोग तमिलनाडु आकर यहाँ टॉयलेट साफ़ करते हैं.”

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'बीजेपी को फ़ायदा पहुंचाने वाला बयान'

हालाँकि अमित मालवीय ने यह नहीं लिखा है कि मारन का ये वीडियो किस साल का है. लेकिन इस वीडियो पर बीजेपी के कई नेताओं ने प्रतिक्रिया दी है.

बीजेपी सांसद सुशील कुमार मोदी ने इस पर लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार के बयान की मांग कर दी. जबकि पूर्व केंद्रीय मंत्री और बीजेपी सांसद रविशंकर प्रसाद ने आरोप लगाया है कि नीतीश सरकार में राज्य की ऐसी हालत हो गई है कि लोगों को तमिलनाडु जाना पड़ता है.

बीजेपी नेताओं के लगातार बयान के बाद बिहार की सत्ताधारी पार्टी जनता दल यूनाइटेड ने भी मारन के इस बयान की आलोचना की है. जेडीयू नेता केसी त्यागी ने इसे बीजेपी को फ़ायदा पहुँचाने वाला बयान बताया है.

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तेजस्वी यादव ने दयानिधि मारन के बयान का विरोध किया है.

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तेजस्वी ने क्या कहा?

इससे पहले बिहार सरकार की तरफ से उपमुख्यमंत्री और राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव ने भी दयानिधि मारन के बयान का विरोध किया था.

तेजस्वी यादव ने पत्रकारों से बातचीत में कहा, “डीएमके सामाजिक न्याय में यकीन रखने वाली पार्टी है, लेकिन उनके नेता के बयान की हम निंदा करते हैं. अगर बिहार, यूपी के लोग न जाएं तो दूसरे राज्यों के लोगों की ज़िंदगी ठप हो जाएगी. इस तरह के बयान से दूसरे राज्यों के नेताओं को बचना चाहिए और सबका सम्मान करना चाहिए.”

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मारन ने कब और क्या कहा था?

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दयानिधि मारन के जिस बयान पर ताज़ा विवाद शुरू हुआ है वह 3 जून 2019 का है. उस दिन डीएमके नेता और तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एम करुणानिधि का 96वां जन्मदिन मनाया जा रहा था. इसके ठीक एक साल पहले यानी साल 2018 में ही करुणानिधि का निधन हुआ था.

मारन मई 2019 में लोकसभा चुनाव जीतकर तीसरी बार सांसद बने थे. इस बयान के ठीक तीन दिन पहले यानी 31 मई को के कस्तूरीरंगन कमेटी ने ‘नई शिक्षा नीति’ का ड्राफ़्ट मानव संसाधन विकास मंत्रालय को सौंपा था. इस ड्राफ़्ट में स्कूलों में ‘थ्री लैंग्वेज फार्मूला’ जारी रखने की बात कही गई थी.

चेन्नई में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार ईटीबी सिवप्रियन कहते हैं, “ड्राफ़्ट में तीसरी भाषा वाली बात को तमिलनाडु के सभी राजनीतिक दलों ने हिन्दी से जोड़ा था. उनको लगता था कि इसके बहाने उन पर हिन्दी थोपी जाएगी. इसपर तमिलनाडु में खूब बयानबाज़ी हुई थी और दयानिधि मारन का बयान भी उसी संदर्भ में था.”

सिवप्रियन का कहना है कि मारन का उदाहरण पूरी तरह से ग़लत था लेकिन उस दिन मारन ने यह भी कहा था, "केवल हिन्दी पढ़ने से क्या होता है, आपको अंग्रेज़ी भी जाननी चाहिए. अंग्रेज़ी जानने वाले आईटी सेक्टर में नौकरी करते हैं."

के कस्तूरीरंगन कमेटी ने 31 मई 2019 को नई शिक्षा नीति पर अपना ड्राफ़्ट सौंपा था. उसी समय दयानिधि मारन ने हिन्दी पर अपना बयान दिया था.

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बयान से होगा नुक़सान?

दयानिधि मारन के इस बयान पर बीजेपी के नेता इंडिया गठबंधन पर निशाना साध रहे हैं और सवाल उठा रहे हैं.

इनमें केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, नित्यानंद राय, कैलाश विजयवर्गीय, मनोज तिवारी, शहनवाज़ हुसैन और बीजेपी के बिहार प्रदेश अध्यक्ष सम्राट चौधरी भी शामिल हैं.

सिवप्रियन हैरानी जताते हैं, “उस दिन दयानिधि मारन 10 मिनट तक बोले थे. उसमें कई तरह की बात की गईं थी कि अंग्रेज़ी से क्या फायदा हो सकता है. लेकिन केवल 24 सेकेंड के एक हिस्से को काटकर दिखाया जा रहा है और कोई मीडिया इसका समय नहीं बता रहा है कि यह साल 2019 का है.”

सिवप्रियन के मुताबिक़ इसपर जो भी राजनीति हो रही है वह उत्तर भारत में हो रही है, दक्षिण भारत में इसका कोई असर नहीं है.

वरिष्ठ पत्रकार नचिकेता नारायण मानते हैं कि विपक्ष के इंडिया गठबंधन में भारत के संघीय ढांचे का एक चित्र दिखता है. इसमें उत्तर और दक्षिण के भारत के क्षेत्रीय राजनीतिक दल हैं और यह बीजेपी के सामने एक चुनावी चुनौती बना हुआ है.

नचिकेता नारायण कहते हैं, “दयानिधि के बयान से बीजेपी के कोर वोटर भले ही उत्तेजित हो सकते हैं, लेकिन आम लोगों पर इसका कोई असर नहीं दिखता है. हाँ इस तरह के बयान से अगर इंडिया गठबंधन के दलों में कोई मतभेद होता है तो इसका फायदा बीजेपी को मिल सकता है.”

इसी साल बिहार सरकार के अधिकारियों की एक टीम प्रवासी बिहारी मज़दूरों के साथ कथित हिंसा की जांच करने तमिलनाडु गई थी.

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डीएमके की रणनीति

हमने इस मुद्दे पर तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में बीते क़रीब 50 साल से मौजूद बिहार एसोसिएशन के भी बात की है.

एसोसिएशन के सचिव मुकेश कुमार ठाकुर का कहना है, “यह अभी का बयान नहीं है. यह कोई सार्वजनिक मंच भी नहीं था, इनका अपना कोई कार्यक्रम था. उस वक़्त भी इस बयान का हम पर कोई असर नहीं था और आज भी कोई असर नहीं दिखता है.”

वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर मानते हैं कि यह हिन्दी को लेकर डीएमकी की पुरानी राजनीति है, इससे उनको राज्य की राजनीति में फ़ायदा होता है.

उनका कहना है, “अगर ऐसे बयानों का समय बता दिया जाए तो पूरा मुद्दा ही बेअसर हो जाएगा. बीजेपी को इस तरह की बात को हवा देने में अपना यह फ़ायदा दिखता है कि वह विपक्ष की जाति की राजनीति को काट सके और जाति का मुद्दा मज़बूत न हो सके. ऐसे मुद्दों की वजह से बुनियादी सवालों से भी बचा जा सकता है और यह पार्टी के लिए फायदेमंद है.”

इससे पहले बिहार के शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर ने भी कई बार रामचरितमानस को लेकर बयान दिए थे और इससे विवाद खड़ा हुआ था.

मणिकांत ठाकुर कहते हैं, “ऐसे बयानों में इंडिया गठबंधन को भी अपना फ़ायदा नज़र आता है. उसे यह डर है कि सनातन और हिन्दू के नाम पर लोग एकजुट रहें तो इसका फ़ायदा बीजेपी को होगा और नुक़सान इंडिया गठबंधन के दलों को.”

बीजेपी के सामने पहली बार एक संगठित विपक्ष की चुनौती है.

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प्रवासियों को लेकर मारन का दावा कितना सही?

केंद्र सरकार ने साल 2011 के सर्वे के आधार पर देश की जनसंख्या से जुड़े अलग-अलग आंकड़े जारी किए थे. इसके मुताबिक़ उत्तर भारतीय राज्यों में तमिल, मलयालम, कन्नड़ और तेलुगू बोलने वालों की संख्या साल 2001 की जनगणना के मुक़ाबले कम हुई है, जबकि दक्षिण भारत में हिंदी भाषियों की संख्या बढ़ी है.

चेन्नई के बिहार एसोसिएशन के मुताबिक़ बीते कुछ साल से प्रवासियों के तमिलनाडु आने में तेज़ी आई है. प्रवासी कामगारों में बिहार के अलावा झारखंड, पश्चिम बंगाल और भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों के लोग भी हैं.

तमिलनाडु के कपड़ा उद्योग, मछली उद्योग, कंस्ट्रक्शन, होटल व्यवसाय, पूजा-पाठ, सिलाई और बैग बनाने के काम के अलावा बड़ी संख्या में बिहार के प्रवासी स्ट्रीट फ़ूड के स्टॉल भी लगाते हैं.

सिवप्रियन के मुताबिक़ हिन्दी और उत्तर भारतीयों पर दयानिधि मारन ने जिस तरह से बयान दिया था वह पूरी तरह ग़लत था. बिहार या उत्तर प्रदेश के लोग तमिलनाडु के हर सेक्टर में काम करते हैं.

बिहार के लोग सिविल सर्विसेस में भी हैं और आईटी सेक्टर में भी. वहीं तमिलनाडु के लोग भी राज्य में हर तरह के काम करते हैं.

लगातार हो रही विवादित बयानबाज़ी से विपक्ष को नुक़सान हो सकता है.

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उत्तर बनाम दक्षिण भारत

ऐसा पहली बार नहीं है कि दक्षिण भारत के किसी नेता के बयान को लेकर उत्तर भारत में तीखी प्रतिक्रिया हुई है.

विपक्षी दलों के गठबंधन ‘इंडिया’ के सहयोगी दल डीएमके के सांसद सेंथिलकुमार ने संसद में चुनाव के नतीजों पर एक टिप्पणी के लिए बाद में माफ़ी भी मांगी थी.

इसी महीने लोकसभा में जम्मू-कश्मीर से जुड़े दो विधेयकों पर चर्चा के दौरान सेंथिलकुमार ने कहा, “इस देश के लोगों को सोचना चाहिए कि बीजेपी की ताक़त बस इतनी है कि यह मुख्य तौर पर हिंदी पट्टी, जिसे हम आमतौर पर गोमूत्र राज्य कहते हैं, वहीं जीत सकती है.”

उदयनिधि स्टालिन

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विवाद में रहे बयान

हाल ही में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के बेटे और राज्य सरकार में मंत्री उदयनिधि स्टालिन की 'सनातन धर्म' पर टिप्पणी पर भी बड़ा विवाद हुआ था. उन्होंने एक कार्यक्रम में सनातन धर्म को कई 'सामाजिक बुराइयों के लिए ज़िम्मेदार ठहराते हुए इसे समाज से ख़त्म करने की बात कही थी.

तेलंगाना में कांग्रेस की जीत के बाद वहां मुख्यमंत्री बनाए गए रेवंत रेड्डी के एक पुराने बयान को लेकर भी बीजेपी ने कांग्रेस पर सवाल उठाए थे. आरोपों के मुताबिक़ इस बयान में रेवंत रेड्डी ने बिहार और तेलंगाना के डीएनए की तुलना की थी.

यही नहीं तमिलनाडु में बिहार के मज़दूरों के साथ हिंसा की भ्रामक ख़बरें भी इस साल की शुरुआत में सोशल मीडिया पर प्रसारित की गई थीं. हालांकि तमिलनाडु पुलिस लगातार इस तरह की ख़बरों को ग़लत बता रही थी. लेकिन इस मुद्दे को बीजेपी के नेताओं ने बिहार विधान सभा से लेकर सड़कों पर भी खूब उछाला था.

बाद में बिहार के एक यू-ट्यूबर मनीष कश्यप पर तमिलनाडु में बिहारी मज़दूरों के साथ मारपीट का फ़ेक वीडियो बनवाने और उसे सोशल मीडिया पर प्रसारित करने का आरोप लगा था और उसे गिरफ़्तार किया गया था. मनीष कश्यप को पिछले हफ़्ते ही सभी मुक़दमों में ज़मानत मिली है और क़रीब नौ महीने बाद उसकी जेल से रिहाई हुई है.

नचिकेता नारायण कहते हैं, “बिहार मज़दूरों पर तमिलनाडु में अत्याचार के मुद्दे पर एक फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग टीम भी पटना से तमिलनाडु गई थी और उन्हें वहाँ कुछ भी नहीं मिला था. अब एक बार फिर बीजेपी चार-पाँच साल पुराने मुद्दे को उठा रही है.”

इधर विपक्ष के इंडिया गठबंधन के बनने के बाद इसके नेताओं के बीच आमतौर पर सामंजस्य दिख रहा है. लेकिन लगातार जारी बयानबाज़ी से अगर विपक्ष दलों के बीच भदभेद उभरकर सामने आने लगे और आपसी बयानबाज़ी शुरू हो गई तो ज़ाहिर है विपक्ष को इसका नुक़सान होगा.

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