स्टालिन के सनातन वाले बयान के बारे में धर्म और इतिहास के जानकारों की क्या राय है?

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- Author, दीपक मंडल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के बेटे और राज्य सरकार में मंत्री उदयनिधि स्टालिन की 'सनातन धर्म' पर टिप्पणी पर विवाद लगातार जारी है.
डीएमके नेता उदयनिधि स्टालिन ने दो सितंबर को तमिलनाडु में आयोजित एक कार्यक्रम में सनातन धर्म को कई 'सामाजिक बुराइयों के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए इसे समाज से खत्म करने की बात कही थी.
उन्होंने कहा था, "सनातन धर्म लोगों को जाति और धर्म के नाम पर बांटने वाला विचार है, इसे खत्म करना मानवता और समानता को बढ़ावा देना है."
उन्होंने ये भी कहा था,''जिस तरह हम मच्छर,डेंगू, मलेरिया और कोरोना को खत्म करते हैं उसी तरह सिर्फ सनातन धर्म का विरोध करना ही काफी नहीं है. इसे समाज से पूरी तरह खत्म कर देना चाहिए.''
इस बयान पर आरएसएस, बीजेपी और दक्षिणपंथी ख़ेमे से काफ़ी तीख़ी प्रतिक्रिया आई है.
बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा, ''ये हमारे धर्म पर हमला है.''
वहीं बीजेपी के आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (ट्विटर) पर लिखा,''उदयनिधि ने सनातन धर्म को मलेरिया और डेंगू से जोड़ा. उनका मानना है कि न सिर्फ इसका विरोध किया जाए बल्कि इसे खत्म कर दिया जाए. संक्षेप में कहें तो ये भारत के 80 फीसदी लोगोंं के कत्ल का आह्वान है क्योंकि वे सनातन धर्म का पालन करते हैं.''
लेकिन उदयनिधि ने कहा कि उन्होंने समाज के सताए हुए और हाशिये पर डाल दिए गए लोगों की आवाज़ उठाई है,जो सनातन धर्म की वजह से तकलीफ झेल रहे हैं.
उन्होंने कहा, ''हम अपनी बात पर कायम हैं और किसी भी कानूनी चुनौती का सामना करने के लिए तैयार हैं. हम द्रविड़ भूमि से सनातन धर्म को हटाने के लिए प्रतिबद्ध हैं और इससे एक इंच भी पीछे नहीं हटने वाले.''

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संघ नेताओं की सनातन धर्म की व्याख्या
लोग ये भी सवाल उठा रहे हैं कि उदयनिधि ने सनातन धर्म को कई सामाजिक बुराइयों का जिम्मेदार क्यों ठहराया?
क्या सनातन धर्म से उनका मतलब हिंदू धर्म से था?
क्या हिंदू धर्म की तरह सनातन धर्म भी वर्णाश्रम यानि जाति व्यवस्था और पितृसत्ता का समर्थन करता है?
क्या हिंदू धर्म 'ब्राह्मणवाद'का पर्याय है?
उदयनिधि के इस बयान के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कुछ नेताओं ने अखबारों से बातचीत में कहा है कि सनातन धर्म दर्शन से जुड़ा पहलू है.ये भारतीय सभ्यता के मूल्यों से जुड़ी शाश्वत जीवनशैली है.
साथ ही, संघ ने सनातन को कई बार इसे हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र की अवधारणा से जोड़ा है.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेताओं का कहना है कि सनातन धर्म शाश्वत है और चिरकाल से चला आ रहा है.
जिसे हिंदू धर्म कहा जाता है वह इसका एक रूप है. जो लोग इसे ब्राह्मणवाद से जोड़ रहे हैं उन्हें इसके बारे में जानकारी नहीं है.
अंग्रेजी अख़बार ‘इंडियन एक्सप्रेस’ से बात करते हुए संघ से जुड़े एक नेता ने कहा कि ‘ब्राह्रणवाद’ भी अपने आप में एक काल्पनिक अवधारणा है. जो लोग इसे ब्राह्मणवाद से जोड़ कर देख रहे हैं वो अपनी अज्ञानता और स्वार्थ में ऐसा कर रहे हैं.
संघ नेताओं का कहना है कि भारत में जन्म लेने वाले धर्मों और और उनकी पंरपराएं लोगों के बीच समानता और सह-अस्तित्व की बात करती है जबकि बाहर से आने वाले धर्म भेदभाव और अलगाव की बात करते हैं.
संघ से जुड़े नेताओं का कहना है कि सनातन धर्म में भेदभाव की कोई बात नहीं है.
जबकि उदयनिधि स्टालिन ने अपने भाषण में इस भेदभाव का जिक्र किया है. इसी वजह से वो सनातन धर्म को खत्म किए जाने की बात कर रहे हैं.
हालांकि उन्होंने इस विवाद के बाद अपना रुख नरम करते हुए कहा,''मैं ये साफ कर दूं कि मैंने हिंदुत्व और हिंदुओं के ख़िलाफ़ कुछ नहीं कहा. मैं उन बुरी प्रथाओं और गैरबराबरी की निंदा करता हूं,जिन्हें सनातन धर्म बढ़ावा देता है.अगर ये शैतानी ताकतें मुझे अपने ख़िलाफ़ न बोलने की धमकी देती हैं तो ये नहीं होने वाला.मैं सनातन धर्म पर बार-बार बोलता रहूंगा.''

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विशेषज्ञों की राय में सनातन धर्म
फिलहाल इस विवाद को समझने के लिए ये जानना जरूरी है कि सनातन धर्म क्या है? क्या इसमें भेदभाव जैसी बुराइयां हैं?
पौराणिक कथाओं के विश्लेषक और लेखक देवदत्त पटनायक ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पहले ट्विटर) पर एक वीडियो जारी कर इसका अर्थ समझाया है.
पटनायक कहते हैं,''19वीं सदी में समाज सभी जातियों और महिलाओं में शिक्षा के प्रसार में लगा था.लेकिन खुद को सनातनी हिंदू कहने वाले रुढ़िवादियों ने इसका विरोध किया. ये वो लोग थे जो उन प्राचीन परंपराओं का पालन कर रहे थे जो जाति व्यवस्था और पितृसत्ता को बढ़ावा दे रही थीं.''
वो बताते हैं,''सनातन धर्म का पहला उल्लेख श्रीमदभगवत गीता में मिलता है. इसका मतलब आत्मा के ज्ञान से है,जो शाश्वत है. ये पुनर्जन्म की भी बात करता है और इसे शाश्वत कहता है. सनातन शब्द का इस्तेमाल जैन और बौद्ध धर्म में भी होता है, क्योंकि ये धर्म पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं. जबकि इस्लाम, यहूदी और ईसाई धर्मों के अर्थ में सनातन का जिक्र नहीं होता है क्योंकि ये पुनर्जन्म में विश्वास नहीं करते. ये याद रखा जाना चाहिए कि सनातन शब्द वेदों से नहीं आया है.’’
बीबीसी हिंदी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापकों में से एक केशव बलिराम हेडगेवार के जीवनीकार और राज्यसभा सांसद राकेश सिन्हा से पूछा कि उदयनिधि स्टालिन ने सनातन धर्म को जाति व्यवस्था समेत कई सामाजिक बुराइयों का जिम्मेदार ठहराया है, इस पर आपकी क्या राय है?
उन्होंने कहा,’’सनातन प्रगतिशील प्रक्रिया का नाम है. समानता, समरसता और विविधता सनातन धर्म के मूल आयाम हैं. अगर विविधता आयाम नहीं होती तो फिर उपनिषदों में ‘नेति-नेति’ यानी ‘ये भी नहीं, वो भी नहीं’ की बात ही नहीं आती. अगर सनातन धर्म में समानता की प्रवृति नहीं होती तो व्यवस्था से प्रतिकार की बात ही नहीं आती. ‘नेति-नेति’ का सवाल ही नहीं उठता.''
वो कहते हैं,’’समाज में संप्रदायों, जीवन पद्धतियों और विविधताओं का निरंतर प्रवाह चलता रहता है और इसे कोई असहज रूप से नहीं देखता इसलिए सनातन और हिंदू धर्म के बीच भेद करना भी गलत है. क्योंकि हिंदू धर्म की जो मूल आत्मा है वो सनातन धर्म ही है.’’
राकेश सिन्हा कहते हैं, "गांधी और सनातन धर्म के बीच कोई भेद नहीं थे, गांधी हरिजनों के बीच काम करते थे, हरिजन नाम की पत्रिका निकालते थे, और उनके इन कामों को हिंदू समाज की व्यापक चेतना का समर्थन हासिल था."

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क्या सनातन धर्म भेद-भाव करता है?
राकेश सिन्हा कहते हैं, "सनातन धर्म को मलेरिया, डेंगू कहने वाले उदयनिधि स्टालिन को ये पता ही नहीं है सनातन धर्म ही तमिल संस्कृति और भाषा का आधार है."
वो कहते हैं,’’स्थापित आध्यात्मिक मान्यता है कि तमिल भाषा भगवान शंकर ने अगस्त्य मुनि को सिखाई थी. और ये अगस्त्य मुनि ही थे जिन्होंने तमिल संस्कृति और भाषा के प्रचार के साथ उत्तर और दक्षिण भारत की एकता के लिए काम किया. उदयनिधि जैसे लोग तमिल संस्कृति और भाषा का आधार नहीं जानते. इसलिए इसका विरोध करके भारतीय आत्मा के मूल पर प्रहार कर रहे हैं.’’
लेकिन इतिहासकार अशोक कुमार पांडेय कहते हैं कि सनातन मतलब आदिकाल से चले आने वाला है. बौद्ध और जैन धर्म भी खुद को सनातन कहते हैं. वेदों में सनातन शब्द नहीं है.
वो कहते हैं,''असल में 19वीं और 20वीं सदी में जब हिंदू धर्म के भीतर सुधारवादी आंदोलन चले. इस पर उच्च जातियों, विशेषकर ब्राह्मणों के समूह ने खुद को ‘सनातनी हिंदू’ कहना शुरू किया. ध्यान दीजिए, यहाँ सनातनी हिंदू का पर्यायवाची नहीं है बल्कि हिन्दू धर्म के भीतर एक समूह है.''
अशोक कुमार पांडेय कहते हैं,’’ खुद को सनातनी हिंदू कहने वाले ये लोग सबसे पहले जाति प्रथा का समर्थन करने वाले थे. जब महर्षि दयानंद ने वेदों की ओर लौटो का नारा देकर अंधविश्वासों और कुछ हद तक जातिवाद का विरोध किया तो सनातनी लोगों ने उनका तीखा विरोध किया.''
वो कहते हैं,''जब महात्मा गांधी ने छुआछूत विरोधी अभियान चलाया तो उन पर पहले हमले सनातनी लोगों ने किए,जबकि हिंदू समाज का बड़ा हिस्सा इस अमानवीय प्रथा के खिलाफ़ खड़ा हुआ था.''
वो कहते हैं ''सनातनियों ने कई जगहों पर छुआछूत विरोधी आंदोलन का विरोध किया और इस अभियान को चला रहे लोगों पर हमला किया. ध्यान रखिए, महात्मा गांधी के साथ अभियान चला रहे सभी लोग हिंदू थे. हाँ, वे जातिगत भेदभाव का विरोध करने वाले हिंदू थे इसलिए सनातनी उनसे नाराज़ थे.''
आरएसएस और सनातनी
अशोक कुमार पांडेय कहते हैं, ''संघ ऐसे ही सनातनी विचारधारा का संगठन रहा है, जिसके उच्च पदों पर लगातार परिवर्तन और सुधारवाद विरोधी ब्राह्मण आसीन रहे, यही वजह रही कि संघ ने संविधान की जगह मनुस्मृति लागू करने की मांग की थी. हिन्दू कोड बिल का विरोध किया था और आरक्षण की वजह से डॉ. अंबेडकर के खिलाफ़ भी अभियान चलाया था.''

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सनातनी विचारों पर द्रविड़ों-दलितों की राय
दलित मामलों के विशेषज्ञ और द्रविड़ आंदोलन के जानकार चंद्रभान प्रसाद कहते हैं कि सनातन धर्म के बारे में उदयनिधि स्टालिन ने जो कहा है कि वो सौ फीसदी सही है.
बीबीसी हिंदी से बातचीत में उन्होंने कहा,'' भगवत गीता में धर्म की व्याख्या जाति अनुक्रम के आधार पर की गई है, हर जाति के धर्म की बात की गई है. इसमें कहा गया कि सभी जातियों को अपने लिए निर्धारित धर्म का पालन करना चाहिए. श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं कि उन्हें युद्ध इसलिए नहीं लड़ना चाहिए कि ये युद्ध है. उन्हें युद्ध इसलिए लड़ना चाहिए कि क्योंकि वो क्षत्रिय हैं.''
चंद्रभान प्रसाद कहते हैं, ’’1909 में पहली बार प्रकाशित श्रीमद भगवत गीता के परिचय में स्वामी स्वरूपानंद लिखते हैं कि गीता का सार यही है कि अपने-अपने स्वधर्म या कर्तव्य का पालन करते हुए मुक्ति प्राप्त करना चाहिए. रामकृष्ण मिशन इसी भगवत गीता का प्रचार करता है. इसमें श्रीकृष्ण ने स्वधर्म की जो बात की है उसे ही आधुनिक हिंदू सनातन धर्म कहते हैं. यानी जाति के आधार पर जो काम बता दिए गए हैं उन्हें ही निभाते हुए मोक्ष प्राप्त किया जाए.’’
चंद्रभान प्रसाद कहते हैं,’’गीता में वर्णाश्रम व्यवस्था में शामिल सभी वर्णों की बात की गई है. उनकी विशेषता बताई गई है लेकिन शूद्रों के बारे में अपमानजनक लहजे में बात की गई है.’’

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क्या उदयनिधि ने सनातनियों के नरसंहार की बात कही?
अब तक उदयनिधि के ख़िलाफ़ देश के कई हिस्सों में शिकायत दर्ज कराई जा चुकी है. दूसरी ओर, उन्होंंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक बार फिर साफ किया है कि उन्होंने कभी भी सनातनियों के नरसंहार की बात नहीं की. उन्होंने "सिर्फ ये कहा कि सनातन धर्म एक ऐसा विचार है जो लोगों को जाति और धर्म के नाम पर बांटता है. सनातन धर्म को खत्म करने का मतलब मानवता और लोगों के बीच बराबरी का समर्थन करना है.''
सनातन पर उदयनिधि स्टालिन के बयान के बाद दक्षिणपंथी राजनीति से जुड़े लोगों को इस विवाद से राजनीतिक बढ़त बनाने का मौका दिख रहा है. लिहाजा स्टालिन के इस बयान पर सरगर्मियां जारी हैं. माना जा रहा है कि बीजेपी इस मुद्दे को अभी जल्दी ठंडा नहीं होने देगी.

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बीजेपी और आरएसएस सनातन धर्म के ख़िलाफ़ दिए गए बयान को अपने हक में कैसे इस्तेमाल करती है, इसका उदाहरण दिया विदुथलई चिरुथईगल कच्चि (वीसीके) के संस्थापक थोल थिरुमावलवन ने. वीसीके यानी लिबरेशन पैंथर पार्टी पहले दलित पैंथर्स ऑफ इंडिया के नाम से जानी जाती थी.
'द हिंदू' में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक उन्होंने कहा कि वो पिछले 30 साल से सनातन धर्म के ख़िलाफ़ बोलते रहे हैं.
चेन्नई में उन्होंने कहा,''हिंदुत्व और संघ परिवार की राजनीति पर हमले करते वक्त उन्होंने जानबूझ कर सनातन धर्म का इस्तेमाल किया, ताकि संघ परिवार उन्हें हिंदू विरोधी कह कर राजनीतिक फायदा न ले सके.''
उन्होंने कहा,’’ हिंदुत्व, हिंदूवाद और सनातन धर्म के अलग-अलग मायने हैं. सनातन धर्म आर्यों के धर्म (आज के संदर्भ में हिंदू धर्म) का मूल है और गैर-बराबरी इसका आधार है. इसमें भेदभाव है और इसमें सामाजिक स्थिति इस बात से तय होती है कि आप किस वर्ण या जाति में पैदा हुए हैं.’’
बहरहाल, अब यह पूरी तरह से राजनीतिक मुद्दा बन गया है जिसका इस्तेमाल बीजेपी इंडिया गठबंधन को घेरने के लिए कर रही है.
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