तमिलनाडु में एआईएडीएमके ने बीजेपी से गठबंधन क्यों तोड़ा, क्या होगा इसका असर?

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तमिलनाडु में ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम यानी एआईएडीएमके ने बीजेपी से अपना गठबंधन तोड़ दिया है.
दिल्ली से छपने वाले ज़्यादातर अख़बारों ने इसे पहले पन्ने पर जगह दी है. आज प्रेस रिव्यू में इसी ख़बर को विस्तार से पढ़िए.
द इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के मुताबिक़, एआईएडीएमके ने सोमवार को गठबंधन तोड़ने का एलान करते हुए कहा कि 2024 लोकसभा चुनावों में वो अपनी जैसी सोच वाली पार्टियों के साथ गठबंधन करेगी.
बीते शुक्रवार को एआईडीएमके का एक प्रतिनिधिमंडल बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व से मिला था. अख़बार लिखता है कि ये बातचीत अच्छी नहीं रही थी.
एआईएडीएमके नेतृत्व राज्य में बीजेपी नेताओं की ओर से की जा रही टिप्पणियों से नाराज़ था. इसमें बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष के अन्नामलाई की टिप्पणी भी शामिल है.
इन नेताओं को रोकने को लेकर बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व की ओर से कोशिश नहीं दिखी. इससे एआईएडीएमके में नाराज़गी थी.
ये गठबंधन तोड़ने का एलान ऐसे वक़्त में हुआ था, जब राज्य में पार्टी की पकड़ ढीली होती जा रही है. बीते दो चुनावों में पार्टी ने अल्पसंख्यक वोट बैंक को खोया है.

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पार्टी बैठक में मौजूद नेता ने क्या बताया?
एआईएडीएमके के उप महासचिव केपी मुनुसामी ने चेन्नई में कहा, ''बीते साल से बीजेपी और उसके नेताओं की ओर से लगातार जैसे हमले हो रहे हैं, गठबंधन तोड़ना इसी का जवाब है.''
पार्टी की ओर से तमिल भाषा का एक हैशटैग #Nandri_meendumvaraatheergal इस्तेमाल किया गया. इस हैशटैग का मतलब होता है- शुक्रिया, दोबारा मत आना.
पार्टी के बयान में कहा गया- एआईएडीएमके महासचिव इदापड्डी पलानीस्वामी के नेतृत्व में पार्टी के दो करोड़ समर्थकों की भावनाओं और सोच को व्यक्त करते हुए नेताओं ने ये तय किया कि एनडीए से हम आज से ही अलग हो जाएंगे.
द इंडियन एक्सप्रेस अख़बार ने इस बैठक में मौजूद रहे एआईएडीएमके के वरिष्ठ नेता से का बात की.
नेता कहते हैं, ''बीजेपी के राष्ट्रीय नेतृत्व से मिले असहयोग, अन्नामलाई के लगातार किए जा रहे हमलों के चलते पार्टी मुश्किल स्थिति में आ गई. पार्टी नेतृत्व और कार्यकर्ताओं को अपमान महसूस हुआ, जिसके चलते गठबंधन से अलग होने का फ़ैसला किया गया.''

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एनडीए: बिछड़े 'सभी' बारी-बारी?
साल 2019 चुनाव के बाद से एनडीए का साथ कई पार्टी छोड़ चुकी हैं. एआईएडीएमके एनडीए का साथ छोड़ने वाली चौथी पार्टी है.
- 23 नवंबर 2019
शिवसेना: बीजेपी की पुरानी मित्र पार्टी. महाराष्ट्र में सरकार के गठन को लेकर शिवसेना ने एनडीए का साथ छोड़ा. बारी-बारी से मुख्यमंत्री पद पर रहने को लेकर दोनों दलों में दरार आई. इसके बाद उद्धव ठाकरे की शिवसेना ने एनसीपी और कांग्रेस का हाथ पकड़ा और महा विकास अघाड़ी का गठन हुआ. एक जुलाई 2022 को एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे का साथ छोड़ा और अपने विधायकों के साथ बीजेपी से जा मिले और मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. तब देवेंद्र फडणवीस ने डिप्टी सीएम पद की शपथ ली.
- 26 सितंबर 2020
शिरोमणि अकाली दल: एनडीए की संस्थापक पार्टियों में से एक अकाली दल ने 2020 में एनडीए का साथ छोड़ा. अकाली दल ने संसद में तीन कृषि क़ानूनों को पास करवाए जाने का विरोध किया. दिल्ली के आस-पास बॉर्डर इलाकों में पंजाब, हरियाणा समेत अलग-अलग हिस्सों से आए किसानों ने लंबा विरोध प्रदर्शन किया था. लंबे आंदोलन के बाद पीएम मोदी को कृषि क़ानूनों को वापस लेना पड़ा था.
- 9 अगस्त 2022
जनता दल (यूनाइटेड): जेडीयू नेता और बिहार सीएम नीतीश कुमार एक बार फिर महागठबंधन में लौटे. वो बोले थे कि वो एनडीए में सहज नहीं हैं. एनडीए में नीतीश की पार्टी की भूमिका कम होती जा रही थी. 2020 विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने 74 सीटें जीती थीं. वहीं जेडीयू ने 43 सीटें जीती थीं.

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तमिलनाडु की राजनीति पर क्या असर?
द इंडियन एक्सप्रेस अखबार में लिखा है कि एआईएडीएमके का फ़ैसला बताता है कि पार्टी के अंदर ही कितनी निराशा की स्थिति है.
मुनुस्वामी ने कहा कि बीजेपी न सिर्फ़ पार्टी के आदर्शों बल्कि जयललिता और अन्नादुराई जैसे नेताओं पर भी हमला कर रही थी.
मदुरै में दो हफ़्ते पहले अन्नामलाई ने राज्य के पहले सीएम अन्नादुराई को लेकर टिप्पणी की थी, तब दोनों दलों के बीच विवाद खुलकर सामने आया था.
इसके अलावा बीते हफ़्ते पार्टी के प्रवक्ता डी जयकुमार ने कहा था कि दोनों दलों के बीच गठबंधन का अस्तित्व ख़त्म हो गया है.
ये बात तब और ज़्यादा बिगड़ गई जब अन्नामलाई ने जयकुमार को जवाब देते हुए कहा- मैं अन्नादुरई की विरासत का सम्मान करता हूं मगर तमिलनाडु में इदापड्डी पलानीस्वामी को एनडीए का नेता स्वीकार नहीं करूंगा.
द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक़, एआईडीएमके का फ़ैसला तमिलनाडु की राजनीति में असर डालने वाला रहेगा. पार्टी अब अपने वोटबैंक से फिर से जुड़ने की कोशिश करेगी. इसमें अल्पसंख्यक भी शामिल रहेंगे, जिनसे पार्टी ने 2019 लोकसभा और 2021 विधानसभा चुनावों में दूरी बनाई थी.
हालांकि एआईएडीएमके के फ़ैसले को कुछ जोखिम भी हैं.
पार्टी के दो नेताओं ने अख़बार से रविवार को कहा कि कम से कम दो दर्जन पार्टी के पूर्व मंत्री और वरिष्ठ नेताओं पर भ्रष्टाचार के मामले में अलग-अलग एजेंसियों की ओर से जांच चल रही है. इसमें केंद्रीय एजेंसियां भी शामिल हैं.
एआईएडीएमके और बीजेपी का साथ छूटना एमके स्टालिन की डीएमके के लिए अच्छी ख़बर है. डीएमके राज्य की सत्ता में है और इंडिया गठबंधन का हिस्सा भी है. ऐसे में एंटी- डीएमके वोट एआईएडीएमके और बीजेपी में बँट जाएगा.

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अन्नामलाई से संबंध
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक़, अन्नामलाई से एआईएडीएमके के संबंध एक साल से ज़्यादा वक़्त से ख़राब चल रहे हैं.
अन्नादुरई पर की टिप्पणी से विवाद और गहरा हो गया.
फरवरी 2022 के स्थानीय निकाय चुनावों में बीजेपी और एआईडीएमके अलग-अलग चुनाव में लड़ी थीं.
सोमवार को जब एआईएडीएमके ने बीजेपी का साथ छोड़ने का फ़ैसला किया तो पार्टी कार्यकर्ताओं ने पटाखे फोड़कर इस कदम का स्वागत किया.
एक नेता ने द हिंदू अख़बार से कहा- हम इस बारे में पार्टी नेतृत्व के संकेत का इंतज़ार कर रहे थे.
तमिलनाडु में बीजेपी अध्यक्ष अन्नामलाई ने कहा- पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व सही वक़्त आने पर इस बारे में टिप्पणी करेगा.
पार्टी के एक नेता ने कहा, ''अगर हम चुनावों में बीजेपी के साथ जाते तो बीजेपी के ख़िलाफ़ जो वोट है, वो डीएमके को चला जाता. अब हम जब अलग होकर लड़ेंगे तो केंद्र में बीजेपी और राज्य में डीएमके के ख़िलाफ़ जो सत्ता विरोधी वोट हैं, वो हमारे खाते में आ सकते हैं.''

बीजेपी में क्या चल रहा है?
द टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक़, बीजेपी से अलग होने का जब एआईएडीएमके ने फ़ैसला किया तो पार्टी के वरिष्ठ नेता सक्रिय हुए हैं.
रिपोर्ट में कहा गया है कि बीजेपी ने तमिलनाडु समेत अपने नेताओं से इस मामले में टिप्पणी ना करने को कहा है.
पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने अखबार से कहा- एआईएडीएमके बीजेपी की अहम सहयोगी पार्टी रही है. पार्टी के वरिष्ठ नेता तमिलनाडु के राजनीतिक फेरबदल पर नज़र बनाए हुए हैं.
दोनों दलों के बीच विवाद की जड़ में अन्नामलाई का अन्नादुरई को लेकर दिया बयान बताया जा रहा है.
अन्नामलाई ने कहा था- साल 1956 में अन्नादुरई ने हिंदू धर्म का अपमान किया था और फिर बाद में जब विरोध हुआ तो उन्हें माफ़ी मांगनी पड़ी और मदुरै से भागना पड़ा था.
तमिलनाडु में बीजेपी अध्यक्ष अन्नामलाई अपने बयानों की वजह से आए दिन चर्चा में रहते हैं.

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2024 चुनाव: तमिलनाडु में क्या होगा?
द हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक़, एआईएडीएमके के ताज़ा फ़ैसले से राज्य में अब 2024 की लड़ाई तीन तरफा होगी.
इंडिया गठबंधन का हिस्सा डीएमके, एआईएडीएमके और बीजेपी.
एआईएडीएमके ने एनडीए से अलग होने का जब फ़ैसला किया और जो प्रस्ताव पेश किया, उसमें किसी का नाम नहीं लिखा था. पर ये अन्नामलाई को लेकर ही है.
अख़बार लिखता है कि साल 2021 में बीजेपी अध्यक्ष बनने के बाद से ही अन्नामलाई एक के बाद एक विवाद में फँसते रहे हैं.
बीजेपी के एक नेता ने कहा- इस फ़ैसले से डीएमके को फ़ायदा होगा. अब देखना ये है कि केंद्रीय नेतृत्व क्या फ़ैसला करेगा.
डीएमके के नेतृत्व में हुए गठबंधन ने 2019 चुनावों में राज्य की 39 में से 38 सीटें जीती थीं और विधानसभा चुनाव भी जीता था. लेकिन जानकारों का कहना था कि 2024 चुनावों में एआईडीएमके को फ़ायदा हो सकता है.
जानकारों का कहना है कि चुनाव के बाद अगर एआईएडीएमके किसी के साथ गठबंधन करना चाहेगी तो वो बीजेपी की ओर बढ़ेगी.

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इदापड्डी पलानीस्वामी के नेतृत्व में एआईडीएमके
पलानीस्वामी ने एआईएडीएमके सुप्रीमो और कद्दावर नेता जे जयललिता के निधन के बाद मुख्यमंत्री का पद संभाला था. सत्ता में आने के साथ ही पलानिस्वामी का जयललिता की क़रीबी रहीं शशिकला और उनके भतीजे टीटीवी दिनाकरण से संघर्ष शुरू हो गया था.
पलानीस्वामी क़रीब दो साल तो इसी सियासी लड़ाई में उलझे रहे थे. उसके बाद, 2019 में कहीं जाकर पलानिस्वामी, मुख्यमंत्री के तौर पर सही तरीक़े से काम शुरू कर पाए थे.
2021 चुनावों में पार्टी की हार के पीछे भी जानकारों ने बीजेपी को वजह बताया था.
2021 में राजनीतिक विश्लेषक एस मुरारी ने बीबीसी हिंदी से कहा था, "ये साफ़ है कि बीजेपी ने एआईएडीएमके को नुक़सान पहुंचाया. एआईएडीएमके सरकार के ख़िलाफ़ जनता में कोई ख़ास नाराज़गी नहीं दिख रही थी. लेकिन लोगों के बीच बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ नाराज़गी साफ़ नज़र आ रही थी."
राजनीतिक विश्लेषक डी सुरेश कुमार ने बीबीसी हिंदी से कहा था, "अगर एआईएडीएमके ने बीजेपी के आगे घुटने नहीं टेके होते, तो विधानसभा चुनाव में उसका प्रदर्शन निश्चित रूप से और बेहतर होता. एआईएडीएमके ने बीजेपी को 20 सीटें दी थीं, लेकिन बीजेपी की जीत का स्ट्राइक रेट 20 प्रतिशत ही दिख रहा है.''
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