'इंडिया' बनाम 'एनडीए': क्या कहते हैं उपचुनावों के नतीजे

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- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
उत्तर प्रदेश के मऊ ज़िले की घोसी विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में समाजवादी पार्टी (एसपी) ने जीत दर्ज की है.
यहां एसपी के सुधाकर सिंह ने बीजेपी के दारा सिंह चौहान को चालीस हज़ार से ज़्यादा वोटों से हरा दिया है.
घोसी सीट दारा सिंह चौहान के एसपी छोड़ने के बाद खाली हुई थी. साल 2022 के विधानसभा चुनाव में दारा सिंह चौहान इस सीट से एसपी के टिकट पर जीते थे.
घोसी विधानसभा सीट को सीधे तौर पर विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ और केंद्र और उत्तर प्रदेश में सरकार चला रही बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए के बीच मुक़ाबला माना जा रहा था. यहां एसपी प्रत्याशी के समर्थन में कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और लेफ़्ट ने अपने उम्मीदवार नहीं उतारे थे.
समाजवादी पार्टी प्रमुख और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने घोसी सीट जितने के बाद दावा किया है कि यह ‘इंडिया’ गठबंधन की जीत है और आगे आने वाले चुनावों का परिणाम भी ऐसा ही होगा.
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घोसी की जीत कितनी बड़ी
घोसी विधानसभा उपचुनाव जीतने के लिए बीजेपी और एसपी दोनों ने अपनी पूरी ताक़त लगाई थी. लेकिन क्या घोसी उपचुनाव ‘एनडीए’ और ‘इंडिया’ के बीच मुक़ाबला था या इसमें अन्य मुद्दे हावी थे?
पूर्वांचल की राजनीति पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार अजय सिंह कहते हैं, “यह ‘इंडिया’ गठबंधन की जीत नहीं है, लेकिन इसमें ‘इंडिया’ के लिए कुछ अच्छी ख़बर ज़रूर है. ख़ासकर मुस्लिम वोट का लगभग पूरी तरह समाजवादी पार्टी के पक्ष में आ जाना. यही झारखंड की ‘डुमरी’ विधानसभा सीट पर हुआ जहां असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी को नहीं, बल्कि जेएमएम को मुस्लिमों का वोट मिला.”
अजय सिंह मानते हैं कि घोसी में मुख़्तार अंसारी का असर रहा है लेकिन उनके एसपी में न होने के बाद भी इलाक़े के मुसलमानों ने इस पार्टी को वोट दिया, जो बताता है कि अल्पसंख्यक समुदाय ‘इंडिया’ पर भरोसा कर रहा है.
वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी भी मानते हैं कि ऐसा दिखता है कि जो लोग दल बदल कर आते हैं, उनपर लोग भरोसा नहीं करते हैं.
प्रमोद जोशी के मुताबिक़, “दल बदल करने वाले नेताओं पर पार्टी के लोग भी भरोसा नहीं करते हैं. इससे पार्टी में पहले से मौजूद कार्यकर्ता भी नाराज़ होते हैं और दल बदलने वाले नेताओं की विश्वसनीयता भी कम होती है.”
अजय सिंह के मुताबिक़ घोसी सीट पर मूल रूप से तीन मुद्दे थे. पहला मुद्दा था दारा सिंह चौहान का बार-बार पार्टी बदलना, जिससे वोटर नाराज़ थे. यहां दूसरा मुद्दा बाहरी बनाम स्थानीय का था. दारा सिंह को लोगों ने बाहरी माना जबकि एसपी के सुधाकर सिंह को लोग स्थानीय मानते हैं.
सुधाकर सिंह साल 2022 के विधानसभा चुनाव में निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरे थे. इसके बाद भी वो तीसरे नंबर पर रहे थे.

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घोसी में क्या रहा सबसे बड़ा मुद्दा
घोसी सीट मूल रूप से मुस्लिम और पिछड़े वोटरों की सीट है. यहां मुस्लिम, दलित, राजभर और चौहान वोटर काफ़ी बड़ी तादाद में है.
अजय सिंह का मानना है कि घोसी की हार मूल रूप से ओम प्रकाश राजभर की हार है, क्योंकि यह उन्हीं का इलाक़ा है और राजभर को अपने साथ जोड़ने के बाद बीजेपी को लग रहा था कि वो इस सीट पर जीत हासिल कर लेगी.
वरिष्ठ पत्रकार संजय शर्मा कहते हैं, “उपचुनाव का साफ संकेत है कि ऊंची जाति के लोगों का भी महंगाई और बेरोज़गारी के कारण मोह भंग हो रहा है. अब तक यह माना जा रहा था कि ऊंची जातियां बीजेपी के साथ हैं. लेकिन इस चुनाव ने साफ कर दिया है कि महंगाई और बेरोज़गारी सबसे बड़ा मुद्दा है.”
संजय शर्मा के मुताबिक़ स्वामी प्रसाद मौर्य के एक बयान को लेकर यूपी में धर्म को मुद्दा बनाने की कोशिश हो रही थी, लेकिन चुनाव में जातीय संतुलन, महंगाई और बेरोज़गारी का मुद्दा सबसे बड़ा साबित हुआ. पिछले दिनों सपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने हिन्दू धर्म पर एक बयान दिया था जिसपर काफ़ी विवाद हुआ था.
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बीजेपी को क्या मिला

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झारखंड में गिरीडीह की डुमरी विधानसभा सीट पर ‘इंडिया’ के घटक दल झारखंड मुक्ति मोर्चा की बेबी देवी ने जीत हासिल की है. उन्होंने एनडीए के सहयोगी दल ‘आजसू’ पार्टी की यशोदा देवी को सत्रह हज़ार से ज़्यादा वोटों से पराजित किया है.
यह सीट बेबी देवी के पति और झारखंड सरकार में मंत्री रहे जगरनाथ महतो के निधन के बाद खाली हुई थी. बेबी देवी भी फ़िलहाल झारखंड सरकार में मंत्री हैं. इस सीट पर असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने भी अपना उम्मीदवार उतारा था.
ओवैसी ने डुमरी सीट पर चुनाव प्रचार भी किया था, लेकिन उनके उम्मीदवार को यहां साढ़े तीन हज़ार से भी कम वोट मिले. हालांकि एआईएमआईएम के अब्दुल मोबिन रिज़वी तीसरे नंबर पर रहे हैं.
बीजेपी ने उत्तराखंड की बागेश्वर सीट पर जीत हासिल की. पहले भी इस सीट पर बीजेपी का ही कब्ज़ा था. यह सीट बीजेपी विधायक चंदन राम दास के निधन के बाद खाली हुई थी. हालांकि इस सीट पर बीजेपी की पार्वती दास कांग्रेस के बसंत कुमार को महज़ 2405 वोट से हरा पाई हैं.
वहीं त्रिपुरा की धनपुर और बॉक्सानगर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनावों में बीजेपी ने जीत दर्ज की है.
धनपुर सीट पर बीजेपी के बिंदु देबनाथ ने 18 हज़ार से ज़्यादा वोटों के साथ जीत दर्ज की है. यहां सीपीआई (एम) के कौशिक चंद्रा दूसरे नंबर परे रहे. यहां से बीजेपी विधायक प्रतिमा भौमिक को केंद्र में मंत्री बनाने के बाद यह सीट खाली हुई थी.
बीजेपी ने त्रिपुरा की बॉक्सानगर सीट भी अपने नाम कर ली है. यह सीट सीपीआई(एम) विधायक सम्सुल हक़ के निधन के बाद खाली हुई थी. यहां बीजेपी के तफज्जुल हुसैन ने सीपीआई(एम) के मिजान हुसैन को 30 हज़ार से ज़्यादा वोटों के अंतर से हराया है.
वहीं बीजेपी को पश्चिम बंगाल की अपनी धुपगुड़ी सीट गंवानी पड़ी है. धुपगुड़ी सीट पर त्रृणमूल कांग्रेस के निर्मल चंद्र रॉय ने क़रीब चाढ़े चार हज़ार वोटों से जीत दर्ज की है. यह सीट बीजेपी विधायक विष्णु पद राय के निधन के बाद खाली हुई थी.
बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने टीएमसी की इस जीत पर ट्वीट कर दावा किया है कि साल 2024 के लोकसभा चुनाव के ठीक पहले टीएमसी की मामूली अंतर से जीत आने वाले समय का संकेत दे रही है.
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कहां किसके पक्ष में गए नतीज़े
बीजेपी को उपचुनावों में आंकड़ों के हिसाब से न तो फ़ायदा हुआ है और न ही नुक़सान.
‘इंडिया’ बनाम ‘एनडीए’
शुक्रवार को आए नतीजे में ‘इंडिया’ के पक्ष में चार जबकि ‘एनडीए’ के पक्ष में तीन सीटें गई हैं और यह आंकड़ा पहले भी ऐसा ही था.
विधानसभा उपचुनाव
इंडिया-4 , एनडीए (बीजेपी)- 3
घोसी (उत्तर प्रदेश) – समाजवादी पार्टी
डुमरी (झारखंड)- जेएमएम
धुपगुड़ी (प. बंगाल) – टीएमसी
पुथुपल्ली (केरल)- कांग्रेस
बागेश्वर (उत्तराखंड)- बीजेपी
बॉक्सानगर (त्रिपुरा) बीजेपी
धनपुर (त्रिपुरा)- बीजेपी
वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी मानते हैं कि घोसी सीट को छोड़ दें तो फ़िलहाल इन चुनावों का कोई दीर्घकालिक प्रभाव नहीं दिखता है और इससे आने वाले लोकसभा चुनाव पर कोई असर नहीं पड़ने वाला है.
इन उपचुनावों में कांग्रेस के पास उत्तराखंड की बागेश्वर सीट को जितने का मौक़ा ज़रूर था, लेकिन कांग्रेस इसमें कामयाब नहीं हो पाई है. कांग्रेस के के लिए केरल की पुथुपल्ली विधानसभा सीट ही एक मात्र उपलब्धि रही है.
यहां कांग्रेस के चांडी ओमन ने क़रीब 37 हज़ार से ज़्यादा वोट से जीत दर्ज की है. यह सीट उनके पिताजी और केरल के पूर्व मुख्यमंत्री ओमन चांडी के निधन के बाद खाली हुई थी.
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