दारा सिंह चौहान की वजह से घोसी उप चुनाव बीजेपी के लिए कितनी बड़ी चुनौती

घोसी का चुनाव प्रचार.

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इमेज कैप्शन, घोसी उपचुनाव में प्रचार करते मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ.
    • Author, अनंत झणाणें
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

2022 के विधानसभा चुनाव के ठीक पहले उत्तर प्रदेश में कैबिनेट मंत्री रहे दारा सिंह चौहान ने भाजपा छोड़ समाजवादी पार्टी की सदस्यता ली थी. सपा के टिकट पर वो अपनी सीट से चुनाव भी जीते.

अब 15 महीने बाद दारा सिंह चौहान गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात के बाद एक बार फिर भाजपा में लौट आए और कमल चुनाव चिन्ह से मऊ ज़िले की घोसी सीट से उपचुनाव में ताल ठोक रहे हैं, उनका यहां समाजवादी पार्टी के सुधाकर सिंह से सीधा मुक़ाबला है.

लेकिन क्या इस बार दारा सिंह चौहान के लिए चुनौती आसान है? कांग्रेस से सपा, सपा से बसपा, बसपा से भाजपा, भाजपा से दूसरी बार सपा और अब एक बार फिर भाजपा में वापस लौटने के बाद दारा सिंह चौहान पर दल-बदल की राजनीति का आरोप घोसी से उनकी विधानसभा उप-चुनाव में उम्मीदवारी के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बनती दिख रही है.

तो क्या इस वजह से घोसी में भाजपा चुनाव हार सकती है, या प्रदेश में भाजपा का दबदबा दारा सिंह चौहान को एक बार फिर जीत दिलाने में कामयाब रहेगा?

दारा सिंह चौहान और अखिलेश यादव

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इमेज कैप्शन, साल 2022 में हुए यूपी के विधानसभा चुनाव से पहले दारा सिंह चौहान बीजेपी छोड़ सपा में शामिल हो गए थे.

दल बदलना बना मुसीबत?

सपा छोड़ जब दारा सिंह चौहान भाजपा में शामिल होने के बाद घोसी पहुंचे तो एक प्रेस कांफ्रेंस में उन्हें पत्रकारों के तीखे सवालों का सामना करना पड़ा.

पत्रकारों ने पूछा कि क्या अब वो भाजपा में ही रहेंगे और फिर कोई दल बदल नहीं करेंगे, क्या उन्हें घुटन महसूस नहीं होगी?

इन सवालों में ये भी पूछा गया कि पिछड़ा समाज के लिए योगी सरकार ने ऐसा क्या किया है कि पिछले डेढ़ साल में यह घुटन ख़त्म हो गई, घोसी की जनता को वो कैसे समझाएंगे.

एक पत्रकार ने पूछा कि लोग कह रहे हैं कि जिस तरह दारा सिंह चौहान पार्टी बदलते हैं, हम लोग भी पार्टी के प्रति वफ़ादार नहीं रहेंगे?

इस प्रेस कांफ्रेंस का एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें दारा सिंह चौहान अपनी सफ़ाई में सिर्फ़ इतना कह पाए कि, "यह सब गारंटी तुम (पत्रकार) क्यों लेते हो. मैं पार्टी में हूँ, और मैं जब तक हूँ पार्टी में ही रहूंगा. हमारी पार्टी बहुत बड़ी है. मोदी सरकार में कोई भेदभाव नहीं है. योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में केंद्र की योजनाएं दरवाज़े-दरवाज़े पर पहुँच रही हैं."

लेकिन पत्रकारों ने उनसे पूछा कि एक साल पहले जब दारा सिंह योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री थे तो "क्या लोगों को योजनाओं का लाभ नहीं मिल रहा था?"

दारा सिंह चौहान कहते हैं, "तब भी मिल रहा था, अब भी मिल रहा है. घोसी की जनता नाराज़ नहीं है और सभी कार्यकर्ता खुश हैं. पूरी पार्टी के लोग खुश हैं. आम जनता खुश है."

अमित शाह और दारा सिंह चौहान.

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इमेज कैप्शन, बीजेपी में दोबारा शामिल होने से पहले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मिलते दारा सिंह चौहान.

समाजवादी पार्टी की क्या है स्थिति?

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लेकिन प्रेस कांफ्रेंस के सवाल जवाब में दारा सिंह चौहान के बैकफुट पर दिखने को विपक्ष ने चुनावी मुद्दे के तौर पर पकड़ लिया.

अखिलेश यादव ने चुनावी प्रचार के दौरान कहा, "घोसी के मतदाताओं ने मन बना लिया है, जो पलायन करने वाले हैं, जिन्होंने पलायन किया है, जिन्होंने लोकतंत्र में मत का विश्वास तोड़ा है, इस बार घोसी की जनता उन्हें सबक सिखाने जा रही है."

सपा के प्रत्याशी सुधाकर सिंह और दारा सिंह चौहान, दोनों का राजनीतिक करियर लगभग 40- 40 साल पुराना है.

फ़र्क़ सिर्फ़ इतना ही है कि दारा सिंह चौहान ने मौके देख कर बार-बार पार्टी बदली और सपा के सुधाकर सिंह हमेशा पार्टी के प्रति वफ़ादार रहे.

मऊ के वरिष्ठ पत्रकार आनंद गुप्ता कहते हैं, "दल बदल कर 15 महीने में चुनाव में आने से पब्लिक के अंदर गुस्सा है. और जिससे पब्लिक गुस्सा है वो भाजपा के लिए वोट करती है लेकिन दलगत राजनीति का हिस्सा नहीं है. सपा में जाने के कारण भाजपा का वोटर इनसे पहले से ही गुस्सा था. यही भाजपा के वोटर समझते हैं कि दारा सिंह चौहान ने एक बार फिर दल बदलकर उन्होंने घोसी की जनता को चुनाव में झोंका है."

लेकिन क्या भाजपा की इलेक्शन मशीनरी इस गुस्से को मैनेज नहीं कर सकती है?

आनंद गुप्ता कहते हैं, "इस बार मैनेज नहीं हो रहा है. जो लोग योगी-योगी, मोदी-मोदी करते हैं वो लोग खुल करके सोशल मीडिया पर दारा सिंह चौहान का विरोध भी कर रहे हैं. तो जो भी हिसाब कर रहे हैं वो भाजपा के वोटर कर रहे हैं, सपा के वोटर सपा के साथ हैं."

सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के कार्यकर्ता.

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इमेज कैप्शन, घोसी उपचुनाव में हुई योगी आदित्यनाथ की रैली में आए सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के कार्यकर्ता.

घोसी 'इंडिया' गठबंधन का पहला चुनाव?

चुनाव प्रचार में सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने घोसी के चुनाव को ‘इंडिया’ गठबंधन का पहला चुनाव बताते हुए कहा, "घोसी विधानसभा का संदेश केवल उत्तर प्रदेश में नहीं है, घोसी विधानसभा के एक-एक वोट का संदेश पूरे देश में जाने वाला है. जब से समाजवादी और देश के दल एक हो गए, जब से इंडिया गठबंधन बना है, लोग घबराए हुए हैं कि इंडिया गठबंधन कैसे बन गया."

घोसी के चुनाव में कांग्रेस के नवनिर्वाचित प्रदेश अध्यक्ष अजय राय ने भी सपा को समर्थन देने का ऐलान किया है. हालांकि 2022 के विधानसभा चुनाव में घोसी में कांग्रेस के प्रत्याशी को महज़ 2000 वोट मिले थे.

तो वाक़ई में इसे इंडिया गठबंधन का पहला चुनाव माना जाए?

वरिष्ठ पत्रकार सुमन गुप्ता कहती हैं, "घोसी में 'इंडिया' तो बस नाम का है. घोसी में कांग्रेस का इतना तो वोट ही नहीं है. समर्थन करने का सिर्फ़ इतना मतलब है कि अब आमने सामने दो लोगों की लड़ाई होगी, भाजपा और सपा की लड़ाई है. 'इंडिया' गठबंधन की कांग्रेस चाहे या न चाहे, वो जानते हैं कि घोसी में वो दूसरे नंबर पर भी नहीं आ सकते हैं. तो बेहतर है कि सपा को समर्थन दे दो."

उत्तर प्रदेश के उपमुख्य़मंत्री केशव प्रसाद मौर्य.

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इमेज कैप्शन, घोसी के उपचुनाव में प्रचार करते उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य.

दलित, मुस्लिम, राजभर और चौहान वोट की राजनीति

मऊ के पत्रकार रजनीकांत पांडेय घोसी विधानसभा के जातीय समीकरण बताते हैं.

उनके अनुसार, इस विधानसभा क्षेत्र में मुस्लिम मतदाता करीब 1 लाख (सबसे ज़्यादा अंसारी बुनकर) , लगभग 90 हज़ार से अधिक दलित मतदाता, 50 हज़ार राजभर (जिसमें नुनिया (कुर्मी) भी शामिल हैं), 50 हज़ार चौहान (पिछड़े) जो दारा सिंह चौहन की बिरादरी के हैं, 20 हज़ार निषाद, 15 हज़ार ठाकुर, 15 हज़ार भूमिहार, 8 हज़ार ब्राह्मण और 30 हज़ार वैश्य वोटर हैं.

रजनीकांत पांडेय के मुताबिक़ दारा सिंह अपनी चौहान बिरादरी का अधिकतर वोट, कम से कम आधे दलित बिरादरी के वोट और अधिकतर भूमिहार, राजभर और ठाकुर बिरादरी के वोटों को जोड़ कर घोसी का चुनाव जीतने की कोशिश करेंगे.

भाजपा ने ऐसा करने के लिए इन बिरादरियों के कई मंत्रियों की ड्यूटी भी लगाई है जिसमें हाल ही में भाजपा के साथ आए सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के ओम प्रकाश राजभर भी हैं.

पत्रकार सुमन गुप्ता कहती हैं, "मंत्रियों के जाने से ज़्यादा फ़र्क़ पड़ता नहीं. असली ताक़त वहां के कार्यकर्ताओं की होती है और देखा जाता है कि कार्यकर्ता संतुष्ट है कि असंतुष्ट. दारा सिंह चौहान की "कभी यहाँ कभी वहां" की छवि है और ऐसा लग रहा है कि भाजपा के लोकल कार्यकर्ता पसोपेश में हैं."

बसपा प्रमुख मायावती

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इमेज कैप्शन, बसपा प्रमुख मायावती.

इस चुनाव में बसपा की भूमिका

मायावती की बसपा ने इस बार यहां से कोई अपना उम्मीदवार नहीं उतारा है. इसलिए दारा सिंह चौहान को उम्मीद है कि लगभग एक लाख दलित वोटों में से उन्हें कम से कम 50 प्रतिशत वोट मिलेंगे.

मायावती के विरोधी अक्सर उन पर भाजपा को फ़ायदा पहुँचाने वाली राजनीति करने का आरोप लगाते हैं. तो क्या इस चुनाव में दलित बिरादरी दारा सिंह चौहान का खुलकर समर्थन कर सकती है?

मऊ से वरिष्ठ पत्रकार आनंद गुप्ता कहते हैं, "मायावती ने दारा सिंह चौहान को बहुत सम्मान दिया, चुनाव लड़ाया, लोक सभा में बसपा का नेता सदन बनाया. लेकिन दारा सिंह दूसरी पार्टी में चले गए. तो जिस तरह अखिलेश यादव को दारा सिंह चौहान से पार्टी छोड़ने का हिसाब चुकाना है उसी तरह मायावती को भी पुराना हिसाब चुकाना है. और आप जानते हैं कि मायावती राजनीतिक बदला अच्छे से चुकाना जानती हैं."

आनंद गुप्ता पूछते हैं, "वो भले ही भाजपा के समर्थन में हो सकती हैं, लेकिन दारा सिंह चौहान के समर्थन में कैसे हो सकती हैं?"

सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के प्रमुख ओपी राजभर.

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इमेज कैप्शन, घोसी उपचुनाव में प्रचार करते सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के प्रमुख ओपी राजभर.

क्या घोसी के राजभर भी नाराज़ है?

घोसी में लगभग 50 हज़ार राजभर वोटर भी हैं. पिछले चुनाव में उन्होंने दारा सिंह चौहान के लिए इसलिए वोट दिया था क्योंकि वो सपा के उम्मीदवार थे.

और सुहेलदेव भारतीय समाज समाज पार्टी के ओम प्रकाश राजभर भी सपा गठबंधन के साथ थे. लेकिन अब दोनों भाजपा के साथ हो गए हैं.

लेकिन जिस तेज़ी से नेताओं ने पार्टी बदली है क्या वोटर भी उनके साथ अपना पक्ष बदल पाएंगे?

पत्रकार आनंद गुप्ता को ऐसा होते नज़र नहीं आ रहा है. वो कहते हैं, "ओम प्रकाश राजभर के यादवों के ख़िलाफ़ विवादित बयान और 2022 में सपा के साथ रहते हुए दिए गए उनके योगी और मोदी विरोधी बयानों को लोगों ने अभी भी दिल में बिठाया हुआ है. तो यह भी जनता में डबल नाराज़गी दिख रही है."

ओम प्रकाश राजभर के पार्टी के उपाध्यक्ष महेंद्र राजभर ने भी सितम्बर 2022 में पार्टी छोड़ दी और सुहेलदेव स्वाभिमान पार्टी बनाई.

मऊ की राजभर बिरादरी में महेंद्र राजभर का बड़ा क़द है और माना जाता है कि आम जनता में उनकी पैठ है. उन्होंने अपनी पार्टी के प्रत्याशी का नामांकन रद्द होने के बाद सपा के सुधाकर सिंह को समर्थन देने का ऐलान किया है.

योगी आदित्यनाथ

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इमेज कैप्शन, घोसी के उपचुनाव में शनिवार को चुनाव प्रचार करते योगी आदित्यनाथ.

ऐन वक्त पर योगी का प्रचार

प्रचार 3 सितम्बर को ख़त्म होने जा रहा है और ठीक उसके एक दिन पहले प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ दारा सिंह चौहान के लिए प्रचार करने घोसी पहुंचे.

उन्होंने घोसी के उपचुनाव को महत्वपूर्ण बताते हुए दारा सिंह चौहान के बार-बार दल बदलने के बारे में सिर्फ़ इतना कहा कि, "सुबह का भूला अगर शाम को घर वापस आ जाए तो भूला नहीं होता है. दारा सिंह चौहान अपने घर में वापस आए हैं. दारा सिंह कभी भारत के रेसलिंग के बहुत मज़बूत स्तम्भ माने जाते थे. और आज इस राजनीति की दुनिया में दारा सिंह फिर से जनता जनार्दन की अदालत में खड़े हैं."

उन्होंने समाजवादी पार्टी के कार्यकाल में हुए मऊ दंगों का ज़िक्र किया जिसमें बाहुबली नेता मुख़्तार अंसारी पर हिंसा भड़काने का आरोप था.

योगी ने 2005 में समाजवादी पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार में हुए मऊ के दंगे की याद दिलाते हुए कहा, “जो माफ़िया असलहा लहराते थे वो आज व्हीलचेयर पर अपनी जान की भीख मांगते हुए दिखाई देते हैं."

मऊ से मुख़्तार अंसारी पांच बार विधायक रह चुके हैं और अब उनके पुत्र सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी से मौजूदा विधायक हैं.

योगी आदित्यनाथ ने दलित वोटरों को लुभाने के लिए सपा के कार्यकाल में गेस्ट हाउस काण्ड और अंबेडकर और कांशीराम के नाम पर बने हुए संस्थानों के नाम बदलने की कोशिशों की भी याद दिलाई.

लेकिन योगी के इस चुनावी प्रचार के बाद क्या दारा सिंह की स्थिति कुछ मज़बूत होगी?

पत्रकार आनंद गुप्ता कहते हैं, "जो अन्दरूनी चर्चा है कि योगी दारा सिंह चौहान और ओम प्रकाश राजभर दोनों को पसंद नहीं करते. लेकिन वो पार्टी के उसूलों से बंधे हुए हैं तो वो भी क्या कर सकते हैं. वो आएंगे, लेकिन ठाकुरों को एक नहीं कर पाएंगे."

वरिष्ठ पत्रकार सुमन गुप्ता कहती हैं, "योगी पसंद करें या ना करें, लेकिन जब सरकार पर बात आती है तो वो दूसरी मजबूरी है."

पांच सितम्बर को घोसी में मतदान है और नतीजे आठ सितम्बर को आने वाले हैं. देखना होगा कि दारा सिंह चौहान क्या वोटरों में अपनी पैठ को साबित कर पाते हैं.

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