मोकामा और गोपालगंज उपचुनाव किसके लिए ख़तरे की घंटी, यूपी में सपा क्यों हुई फेल

बिहार उपचुनाव

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इमेज कैप्शन, गोपालगंज सीट पर मुन्नी देवी की जीत पर बीजेपी नेता को मिठाई खिलाते बिहार विपक्ष के नेता विजय सिन्हा
    • Author, चंदन कुमार जजवाड़े & अनंत झणाणे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

देश के छह राज्यों की सात सीटों पर हुए उपचुनाव में चार सीटों पर बीजेपी प्रत्याशी को जीत हासिल हुई है. इनमें बिहार और यूपी की दो सीटें भी शामिल हैं.

इनमें से एक सीट गोपालगंज का भी है जहां बीजेपी की जीत को इसलिए अहम माना जा रहा है कि अब बिहार में उसका सत्तारूढ़ जनता दल (यूनाइटेड) के साथ गठबंधन नहीं है.

हालांकि मोकामा सीट पर बीजेपी को आरजेडी प्रत्याशी के हाथों हार का सामना करना पड़ा है.

उधर यूपी में लखीमपुर खीरी के गोला गोकर्णनाथ विधानसभा उपचुनाव में बीजेपी ने एक बार फिर बाज़ी मारी है. यहां समाजवादी पार्टी पूरा जोर लगा कर भी बीजेपी को शिकस्त नहीं दे सकी.

जबकि दक्षिण भारत में कर्नाटक से इतर बीजेपी के पांव पसारने की कोशिश को तेलंगाना की मुनुगोडे सीट पर टीआरएस ने हार के बाद फिर झटका लगा है. टीआरएस के उम्मीदवार ने दस हज़ार वोटों से ये चुनाव जीता है.

इन चुनावों के नतीजों में बिहार में महागठबंधन, बीजेपी और अनंत सिंह हर किसी के लिए संदेश है. क़रीब तीन महीने पहले नीतीश कुमार के बीजेपी से नाता तोड़ने और बिहार में महागठबंधन की सरकार बनने के बाद यह पहला उपचुनाव था.

वहीं यूपी में समाजवादी पार्टी को बीजेपी की चुनाव जीतने की रणनीति से बहुत कुछ सीखना होगा.

बिहार में इन चुनावों को इस तरह भी देखा जा रहा था कि नीतीश के आरजेडी से एक बार फिर से जुड़ने को जनता किस तरह से देख रही है.

मोकामा के चुनाव मैदान में भले ही दो महिला उम्मीदवार आमने-सामने थीं लेकिन यहां मुक़ाबला दो बाहुबली नेताओं के बीच था.

मोकामा सीट ने अनंत सिंह को क्या संदेश दिया?

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मोकामा सीट पर राष्ट्रीय जनता दल के बाहुबली नेता अनंत सिंह के एके-47 मामले में सज़ा होने के बाद 3 नवंबर को उपचुनाव हुआ था. यहां महागठबंधन की तरफ से आरजेडी ने उनकी पत्नी नीलम देवी को टिकट दिया था.

दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी ने हाल फ़िलहाल तक जनता दल यूनाइटेड में रहे स्थानीय बाहुबली नेता ललन सिंह की पत्नी सोनम देवी को चुनाव मैदान में उतारा था.

यहां से पूर्व विधायक अनंत सिंह की पत्नी नीलम देवी क़रीब 17000 वोट से जीती हैं. हालांकि मोकामा के उपचुनाव को अनंत सिंह का ही चुनाव माना जा रहा था.

पिछले चुनाव के मुक़ाबले इस बार जीत का अंतर क़रीब आधा रह गया है. माना जा रहा है कि अनंत सिंह अपने बूते मोकामा से जीतते हैं और उनकी पत्नी की जीत में वोट कम होना अनंत सिंह के लिए भी ख़तरे की घंटी है.

पटना के एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट के पूर्व निदेशक और राजनीतिक मामलों के जानकार प्रोफ़ेसर डीएम दिवाकर का मानना है कि अनंत सिंह अपनी रॉबिनहुड वाली छवि की वजह से मोकामा से जीतते रहे हैं.

डीएम दिवाकर का मानना है, "वैसे तो छोटे से उपचुनाव में कोई बड़ा संदेश नहीं होता है और अनंत सिंह को बिहार में कोई निर्देश नहीं देता है बल्कि वो दूसरों को चलाते हैं. इस लिहाज से चुनावी नतीजों में अनंत सिंह के लिए एक संदेश छिपा है कि वो वोटरों को हल्के में नहीं ले सकते. अगर वोटर उन्हें वोट देते हैं तो उनसे दूर भी जा सकते हैं."

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इमेज कैप्शन, नीलम देवी का चुनाव प्रचार

गोपालगंज: सीधे मुकाबले में बीजेपी की कुसुम देवी की जीत

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वहीं गोपालगंज उपचुनाव के नतीजे ज़्यादा बड़े संकेत दे रहे हैं. इस सीट पर भी बीजेपी और आरजेडी के बीच सीधा मुक़ाबला था.

गोपालगंज विधानसभा की सीट से भाजपा ने अपने दिवंगत विधायक सुभाष सिंह की पत्नी कुसुम देवी को उम्मीदवार बनाया था.

यहां से कुसुम देवी क़रीब 1800 वोट से जीती है. बीजेपी को यहां कुल 70032 वोट मिले हैं और उसकी जीत काफ़ी छोटी रही है.

जबकि गोपालगंज में आरजेडी के मोहन प्रसाद गुप्ता को 68243 वोट मिले हैं. कुसुम देवी की जीत का जो अंतर है उससे क़रीब 5 गुना ज़्यादा वोट बीएसपी की इंदिरा यादव को मिला है.

इंदिरा यादव बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव की मामी हैं. यानी लालू प्रसाद यादव के साले साधु यादव की पत्नी. इंदिरा यादव को कुल 8854 वोट मिले हैं.

कुसुम देवी

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सबसे बड़ी चुनौती ओवैसी

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लेकिन महागठबंधन या ग़ैर बीजेपी दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती एआईएमआईएम है. असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ने गोपालगंज से अब्दुल सलमान को खड़ा किया था. उन्हें 12000 से ज़्यादा वोट मिले हैं. यह सीधा संकेत है कि बीजेपी विराधी पार्टियां अगर एक साथ नहीं रहीं तो इसका सीधा फायदा बीजेपी को मिलेगा.

दूसरी तरफ गोपालगंज सीट मुस्लिम यादव समीकरण से बाहर था. ऐसे में बाक़ी वोटरों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए महागठबंधन में जो एकता दिखनी थी वह इन चुनावों में नहीं दिखी.

डीएम दिवाकर मानते हैं कि नीतीश कुमार अगर यहां एक बार भी चुनाव प्रचार के लिए गए होते तो यहां चुनाव के नतीजे अलग होते.

बीजेपी की तरफ से दावा किया जा रहा है कि तेजस्वी यादव अपने ही घर गोपालगंज में हार गए हैं और यह उनके लिए एक बड़ा झटका है. लेकिन चुनाव परिणाम को देखें तो यह महागठबंधन के भविष्य के लिए एक इशारा है.

डीएम दिवाकर मानते हैं कि नीतीश कुमार 2025 को काफ़ी दूर मानकर इन चुनावों को गंभीरता से नहीं ले रहे थे लेकिन महागठबंधन में खींचतान बनी रही और उसकी एकता जनता को नहीं दिखी तो यह गठबंधन के भविष्य के लिए ख़तरा होगा.

असदुद्दीन ओवैसी

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इमेज कैप्शन, असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ने गोपालगंज से अब्दुल सलमान को खड़ा किया था.

यूपी: गोला गोकर्णनाथ से भाजपा की जीत और सपा की हार के मायने

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लखीमपुर खीरी के गोला गोकर्णनाथ के विधान सभा उपचुनाव में बीजेपी के पूर्व विधायक, दिवंगत अरविंद गिरी के पुत्र अमन गिरी को भारी मतों से जीत हासिल हुई है.

गोला गोकर्णनाथ के नतीजों ने एक बार फिर साबित कर दिया की भाजपा पूरे दम-ख़म और लाव-लश्कर के साथ चुनाव लड़ती है.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, दोनों उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक ने अमन गिरी के लिए वोट मांगने के लिए बड़ी जनसभाएं कीं, और कुल मिलाकर पार्टी ने 40 स्टार प्रचारकों को गोला गोकर्णनाथ में अलग अलग बिरादरियों को जोड़ने के लिए मैदान में उतरा.

भाजपा की तैयारी के बारे में लखीमपुर के निवासी और कानपुर स्थित सेंटर फॉर स्टडी ऑफ़ सोसाइटी एंड पॉलिटिक्स (सीएसएसपी) के राष्ट्रीय संयोजक डॉ संजय कुमार का कहना है, "सभी पार्टियों को भाजपा से राजनीति सीखनी चाहिए. स्थानीय पार्टियां राजनीति को सीज़नल तरीके से नहीं ले सकती हैं. भाजपा जैसी पार्टी हो तो जबड़े से जीत छीन के निकाल ले जाना बहुत मुश्किल होता है."

हिंदुस्तान अखबार के लखीमपुर खीरी के ब्यूरो चीफ मयंक बाजपेयी कहते हैं, "किसान गन्ना भुगतान के मुद्दे को लेकर आक्रोशित तो था लेकिन वोट तो उन्होंने भाजपा को ही दिया. भाजपा ने पराली वाली कार्रवाई सिर्फ गोला विधानसभा में नहीं की और बाकी विधान सभा में करती रही.''

वो कहते हैं,'' एक रणनीति के तहत यह काम कर गया. पराली जलाने के लिए जुर्माना लगता है, लेकिन गोला क्षेत्र में सबसे कम लगा. किसान हत्याकांड के बाद सपा से जो सिख जुड़ा था तो वो भी इस बार थोड़ा कम हुआ है. भाजपा के मंत्री बलदेव सिंह औलख ने सिखों के घरों में रुक कर घर-घर प्रचार किया."

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इमेज कैप्शन, गोला गोकर्णनाथ में बीजेपी उम्मीदवार अमन गिरी ने बड़ी जीत हासिल की है

इस बार सपा ने घर-घर जाकर मांगे थे वोट

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गोला गोकर्णनाथ में कुल 3 लाख 91 हज़ार मतदाता हैं.

स्थानीय पत्रकार प्रशांत पांडेय बताते हैं कि इसमें से 50 से 55 हज़ार मतदाता मुसलमान है, 60 हज़ार दलित, 50 से 60 हज़ार ब्राह्मण, 20 से 25 हज़ार सिख और पिछड़ों में कुर्मी बिरादरी की संख्या ज़्यादा है. सपा के पूर्व संसद रवि प्रकाश वर्मा कुर्मी बिरादरी के बड़े नेता हैं और पार्टी ने उन्हीं को चुनाव जीतने की कमान सौंपी थी.

फ़रवरी में हुए विधानसभा चुनावों में अरविंद गिरी को 126,534 वोट मिले थे, सपा के विनय तिवारी को 97240 वोट और कांग्रेस को 3513 और बसपा को 26970 वोट मिले थे.

और इस बार अरविंद गिरी के बेटे अमन गिरी को 124180, सपा प्रत्याशी विनय तिवारी जो इस बार फिर मैदान में थे उन्हें 90512 वोट मिले, और बसपा और कांग्रेस इस बार मैदान में नहीं उतरीं.

बसपा के चुनाव न लड़ने से नतीजों पर असर के बारे में लखीमपुर से बीबीसी के सहयोगी पत्रकार प्रशांत पांडेय कहते हैं, "बसपा के वोटरों पर बीजेपी की नज़र थी. अगर बसपा लड़ती तो भाजपा को ही नुकसान होता."

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इमेज कैप्शन, अखिलेश की सधी हुई रणनीति के बावजूद गोला गोकर्णनाथ में समाजवादी पार्टी हारी

क्या थी समाजवादी पार्टी की रणनीति?

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सपा की रणनीति को समझाते हए प्रशांत पांडेय कहते हैं, "सपा के राष्ट्रीय सचिव रवि प्रकाश वर्मा ने इस चुनाव के कमान संभाली थी. वो पूर्व सांसद रह चुके हैं और कुर्मी बिरादरी का पार्टी का प्रभावशाली चेहरा हैं. सपा के अधिकतर कार्यकर्ताओं नेताओं ने प्रचार की तस्वीरें सोशल मीडिया पर भी नहीं डालीं. शुरुआत में उन्होंने डालीं तो सपा को डर यह था कि जहाँ का प्रचार करेंगे तो भाजपा अपने लोगों को वहां भेज देगी और दबाव बनाने की कोशिशें करेगी."

प्रशांत पांडेय बताते हैं कि "पार्टी के कद्दावर नेता स्वामी प्रसाद मौर्य भी प्रचार करने आए तो वो भी छप्पर में रहे और न ही सपा ने उनसे कोई प्रेस कांफ्रेंस कराई, न ही अख़बारों में उसका कोई ख़ास कवरेज हुआ."

इसके बावजूद सपा के वोट इस चुनाव में चंद हज़ार वोटों से कम हुए हैं. मयंक बाजपेयी कहते हैं, "सहानुभूति फैक्टर की वजह से शुरुआत में लग रहा था कि सपा ने चुनाव लड़ने का फ़ैसला करके ग़लत कदम उठा लिया है. लेकिन बाद में सपा ने अपनी स्थिति मज़बूत की. वरना इस चुनाव में तो सपा को वोट ही नहीं मिलने चाहिए थे. लेकिन उसे वोट मिले."

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इमेज कैप्शन, स्वामी प्रसाद मौर्य का चुनाव प्रचार फीका रहा

अखिलेश यादव क्यों रहे फिर नदारद?

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डॉ. संजय कुमार कहते हैं, "समाजवादी पार्टी भी लगातार परदे के पीछे लगी रही, उसने बहुत काम किया, लोगों से मिली, लेकिन अखिलेश यादव नहीं आये तो उसका एक नकारात्मक असर हुआ है. अगर योगी जी आ सकते हैं तो अखिलेश जी क्यों नहीं आए? कहने को हो सकता है कि क्योंकि मुलायम सिंह जी की हाल ही में मृत्यु हुई है तो इसलिए नहीं आए."

अखिलेश यादव के प्रचार न करने के बारे में सहयोगी पत्रकार प्रशांत पांडेय कहते हैं, "अगर अखिलेश यादव आते तो भाजपा उसे दूसरे तरीक़े से प्रचारित करती."

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इमेज कैप्शन, योगी ने गन्ना किसानों को वक्त पर भुगतान करने का वादा किया है

मुद्दे और वादे

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डॉक्टर संजय कुमार कहते हैं, "यह गन्ना बेल्ट है जो एक नकदी फ़सल है. लोगों की आमदनी इसका सबसे बड़ा हिस्सा यहीं से आता है. पूरे ज़िले में नौ बड़ी चीनी मिलें हैं. पिछले पांच छह सालों से भुगतान की समस्या बहुत आई है. इस बार भी आई.

वो कहते हैं, "केवल बजाज चीनी मिल में लगभग 4000 करोड़ का किसानों का बकाया है. मुख्यमंत्री जी ने भी कहा है कि 15 दिनों के अंदर भुगतान हो जाना चाहिए. मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री को देखना होगा, क्योंकि यह समस्या नासूर भी बन सकती हैं. आवारा पशुओं का मुद्दा भी अभी गंभीर मुद्दा है."

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