बिहार में नीतीश-तेजस्वी का गठबंधन क्या 2024 में वाक़ई बीजेपी पर भारी पड़ेगा?

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- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना से
नीतीश कुमार के बीजेपी छोड़ने के बाद बिहार में एनडीए अब न के बराबर बचा है.
पशुपति कुमार पारस के धड़े वाले लोक जनशक्ति पार्टी को छोड़ दें तो बिहार में बीजेपी के साथ अब कोई पार्टी नहीं बची है.
जेडीयू के सीनियर नेताओं का कहना है कि पशुपति कुमार पारस के धड़े वाले तीन लोकसभा सांसद कैसर अली, वीणा सिंह और चंदन सिंह भी जेडीयू में शामिल हो सकते हैं.
चिराग पासवान के धड़े के एकलौते विधायक राजकुमार सिंह पिछले साल ही जेडीयू में शामिल हो गए थे. इसके अलावा उपेंद्र कुशवाहा भी अपनी पार्टी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी का जेडीयू में विलय कर चुके हैं.
बिहार के सीमांचल इलाक़े में मुस्लिम आबादी अच्छी-ख़ासी है और यहाँ से हैदराबाद के लोकसभा सांसद असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के पाँच विधायक जीते थे. इनमें से चार विधायक आरजेडी का दामन थाम चुके हैं.
बिहार में विपक्ष का कुनबा काफ़ी बड़ा हो गया है. यह कुनबा सामाजिक समीकरण के लिहाज से भी काफ़ी बड़ा हो गया है. इस बार के महागठबंधन में आरजेडी, जेडीयू, कांग्रेस, वामपंथी पार्टियाँ, जीतन राम मांझी और वामपंथी पार्टियां शामिल हैं.
नीतीश-लालू के साथ आने का मतलब
बिहार की दो सबसे ज़्यादा प्रभुत्व वाली ओबीसी जातियां यादव और कुर्मी के दोनों नेता साथ हैं. इसके अलावा इन दोनों के साथ होने से मुसलमानों के वोट बँटने की आशंका भी ख़त्म हो गई है. वामपंथी पार्टियों का भोजपुर और मगध में दलितों के बीच आज भी प्रभाव है.
जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में आपातकाल विरोधी आंदोलन के दौरान बिहार की पिछड़ी जातियां एकजुट हुईं. इसी के बाद से बिहार में पिछड़ी जातियों के प्रभुत्व वाली राजनीति का उभार हुआ. लालू यादव और नीतीश कुमार इन जातियों का नेतृत्व कर रहे थे.
इस राजनीति के उभार के बाद बिहार में सवर्ण जातियां अहम खिलाड़ी नहीं रहीं. जब ऊंची जातियां बिहार के राजनीतिक मैदान से बाहर हो गईं तो जेपी और राममनोहर लोहिया को अपना गुरु मानने वाले लालू यादव और नीतीश कुमार के बीच ही प्रतिद्वंद्विता शुरू हुई. दोनों नेताओं ने जातियों के अलग-अलग समूहों का गठन किया.
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जातियों के इस नए गठबंधन में छोटे जाति समूहों की वफ़ादारी बदलती रही. इस राजनीति में बीजेपी हिन्दुत्व की राजनीति के साथ आई और सभी जातियों को प्रतिनिधित्व देने को भी तैयार दिखी. पिछड़ी जातियों के प्रभुत्व वाली राजनीति में बीजेपी ने अप्रासंगिक हो चुकी ऊंची जातियों को आकर्षित करते हुए पहचान की नई राजनीति को उभारना शुरू किया. राजनीति के इस नए खेल में कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों की ज़मीन खिसकती गई.
कहा जा रहा है कि बिहार की अभी की राजनीति ओबीसी पॉलिटिक्स का एक्सटेंशन है और इसमें अति पिछड़ी जातियों की पहचान की राजनीति के उभार का दौर है. अति पिछड़ी जातियाँ यानी एमबीसी बिहार में टुकड़ों में फैली हुई हैं.
अब इन जातियों में भी पहचान की राजनीति ज़ोर पकड़ रही है. बिहार में बीजेपी ने इसी को ध्यान में रखते हुए नोनिया जाति की रेणु देवी को उपमुख्यमंत्री बनाया था. इन जातियों में भी एक किस्म का भाव है कि प्रभुत्व वाली ओबीसी जातियों ने उन्हें वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया और उनका हिस्सा नहीं दिया.

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बीजेपी के लिए कितनी बड़ी चुनौती
बिहार की राजनीति में जो बदलाव और उठापटक का दौर चल रहा है, उसमें इन जातियों को अपनी तरफ़ लाने की होड़ के तौर पर भी देखा जा रहा है.
बीजेपी ने बिहार में ओबीसी से ताल्लुक रखने वाले तारकेश्वर प्रसाद को भी उपमुख्यमंत्री बनाया था. तारकेश्वर प्रसाद ग़ैर-यादव और ग़ैर-कुर्मी ओबीसी में कलवार जाति से हैं.
तारकेश्वर प्रसाद ने बीबीसी से कहा कि बीजेपी एमबीसी और ग़ैर-यादव, ग़ैर-कुर्मी ओबीसी जातियों को हक़ दिलाने की कोशिश कर रही है. उन्होंने कहा कि यह काम न तो आरजेडी कर पाई और न ही नीतीश कुमार ने किया.
जातियों में बँटे बिहार की राजनीति में बीजेपी के लिए जगह बनाना आसान नहीं है. बीजेपी को पता है कि उसके लिए जेडीयू के साथ गठबंधन का होना कितना ज़रूरी है.
इस तथ्य से भी समझा जा सकता है कि बीजेपी ने 2020 के विधानसभा चुनाव में 74 सीटें जीतने के बावजूद 43 सीटों वाले नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बनाया. यह बीजेपी की मजबूरी को ही दर्शाता है.
पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद पूछा कि बीजेपी इतना मजबूर क्यों हैं? रविशंकर प्रसाद कहते हैं, ''नीतीश कुमार को बीजेपी ने अपने कंधों पर बैठाकर नेता बनाया है. हमने लालू यादव के भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के लिए नीतीश कुमार को इतनी तवज्जो दी थी. हमने उनकी हर बात मानी. नीतीश कुमार ने नरेंद्र मोदी को चुनाव प्रचार करने से रोका, इसे भी मान लिया लेकिन उन्होंने हमें आख़िरकार धोखा दिया.''

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बीजेपीपर सवर्णों के पलायन का असर
बीजेपी के हिन्दुत्व की राजनीति जिस तरह से उत्तर प्रदेश में चलती है, वो बिहार को नहीं भाती है. कई लोगों का मानना है कि ऊंची जातियों को हिन्दू राष्ट्र का एजेंडा आकर्षित करता है लेकिन यह ओबीसी और दलितों में लोकप्रिय नहीं हो पाता है.
दिल्ली यूनिवर्सिटी में सोशल साइंस के प्रोफ़ेसर सतीश देशपांडे कहते हैं कि बिहार की राजनीति में अपर कास्ट अब प्रवासी हो चुके हैं. वह कहते हैं कि बिहार से अपर कास्ट का पलायन बहुत तेज़ है, इसलिए बीजेपी वैसे मुद्दों से चुनाव नहीं जीत सकती, जो केवल ऊंची जातियों को आकर्षित करते हैं.
यूपी की तरह बिहार में हिन्दुत्व की राजनीति क्यों नहीं चल पाती है?
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इस सवाल के जवाब में बिहार के वामपंथी चिंतक प्रसन्न चौधरी कहते हैं, ''बिहार में आज़ादी के पहले से ही वामपंथी और किसान आंदोलन का ज़ोर रहा. बाद में समाजवादी आंदोलन भी यहाँ ज़ोर पकड़ा. बिहार की जनसांख्यिकी भी यूपी से अलग तरह की है. यूपी में अपर कास्ट की आबादी लगभग 20 फ़ीसदी है जबकि बिहार में यह 13 फ़ीसदी के आसपास है. एक ज़माने में बिहार में कम्युनिस्ट पार्टी मुख्य विपक्षी पार्टी थी.''
बिहार में वामपंथी पार्टियों की 70 के दशक में मज़बूत ज़मीन रही है. बिहार विधानसभा में सीपीआई 1972 से 77 तक मुख्य विपक्षी पार्टी रही. लेकिन 1977 में कर्पूरी ठाकुर ने बिहार में पिछड़ी जातियों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने का फ़ैसला किया तब से जातीय पहचान और जाति के आधार पर उत्पीड़न की बहस राजनीति के केंद्र में आई और वामपंथी पार्टियों का जनाधार खिसकता गया. बाद में मंडल कमिशन लागू हुआ और वामपंथी पार्टियों के वर्ग संघर्ष की बहस जातीय पहचान की राजनीति के सामने नहीं टिक पाई.

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प्रसन्न चौधरी कहते हैं, ''अविभाजित बिहार में भी ओबीसी, दलित, आदिवासी और मुसलमानों की तादाद सबसे ज़्यादा थी. हिन्दुत्व की राजनीति नहीं चलने की वजह इस तरह की जनसांख्यिकी बड़ी वजह रही है. राम मंदिर से जुड़े आडवाणी के रथ को भी बिहार में ही रोका गया था. ऐतिहासिक रूप से मगध पुराने ज़माने से ही ब्राह्मण संस्कृति का विरोधी रहा. बुद्ध के ज़माने से ही बिहार में ग़ैर ब्राह्मण और ग़ैर वैदिक आंदोलन की ज़मीन रही है. बिहारी में सामाजिक परिवर्तन के आंदोलनों की उर्वर भूमि रही. आज़ादी की लड़ाई के दौरान भी त्रिवेणी संघ का आंदोलन चला.''
प्रसन्न चौधरी कहते हैं कि बिहार में बीजेपी के पास मुस्लिम विरोधी आक्रामक हिन्दू गोलबंदी के आलावा कोई हथियार नहीं है.
वह कहते हैं, ''महागठबंधन में भी कई तरह के विरोधाभास हैं और उसे एकजुट रखना भी आसान नहीं है. बीजेपी के पास पैसे और ताक़त हैं, ऐसे में वह महागठबंधन को तोड़ने की पूरी कोशिश करेगी. महागठबंधन के कई नेता बहुत लोभी हैं और यही उसकी कमज़ोरी है.''
2019 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में बीजेपी के ख़िलाफ़ बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने गठबंधन किया था. लेकिन यह गठबंधन बीजेपी के सामने टिक नहीं पाया था.
बीजेपी को उत्तर प्रदेश के 80 लोकसभा सीटों में से 62 पर जीत मिली थी और सहयोगी अपना दल को दो सीटों पर. वहीं मायावती और अखिलेश यादव का गठबंधन 15 सीटों पर ही सिमटकर रह गया था.

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तेजस्वी-नीतीश, अखिलेश-मायावती से कैसे अलग
2019 के लोकसभा चुनाव में मायावती और अखिलेश यादव का गठबंधन बीजेपी के सामने नाकाम रहा तो बिहार में नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव का गठबंधन कामयाब क्यों रहेगा?
इस सवाल के जवाब में टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस में प्रोफ़ेसर रहे पुष्पेंद्र कहते हैं, ''अखिलेश और मायावती के गठबंधन से ग़ैर-यादव ओबीसी और ग़ैर-जाटव दलित बहुत क़रीब नहीं थे. बीजेपी ने इन दोनों को ज़्यादा साध लिया था. हिन्दुत्व का ज़ोर भी यूपी में रहता है. बिहार में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण नहीं हो पाता है.''
''बिहार में नीतीश कुमार ने अपने साथ एमबीसी को जोड़ा है. नीतीश कुमार ने पिछड़े वर्ग में अति पिछड़ा और दलितों में महादलित की अलग कैटिगरी बनाई. उन्होंने इन दोनों के लिए अलग से आरक्षण की भी व्यवस्था की. बिहार में अति-पिछड़े वर्ग की तादाद 30 फ़ीसदी है. इसलिए हम 2019 के मायावती और अखिलेश के गठबंधन से बिहार के महागठबंधन की तुलना नहीं कर सकते हैं.''
प्रोफ़ेसर पुष्पेंद्र कहते हैं, ''कर्पूरी ठाकुर अति-पिछड़े वर्ग से थे लेकिन ओबीसी की ताक़तवर जातियों के वह नेता नहीं बन पाए. यादव और कुर्मियों ने उन्हें अपना नेता माना भी नही. इस गठबंधन के साथ मुसलमान भी पूरी तरह से आ सकते हैं और बिहार में अब ओवैसी के लिए बहुत जगह नहीं बची है. यूपी में कोशिश की गई लेकिन महागठबंधन वाला सामाजिक समीकरण नहीं बन पाया था. जैसे इस बार यूपी विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव और जयंत चौधरी ने पश्चिम उत्तर प्रदेश में यादव और जाटों को जोड़ने की कोशिश की लेकिन दलित ख़ुद को इस गठबंधन से नहीं जोड़ पाए थे. बिहार में यह स्थिति नहीं है.''

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समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता घनश्याम तिवारी कहते हैं, ''2019 के लोकसभा चुनाव में हमारा गठबंधन इसलिए भी बहुत कामयाब नहीं रहा क्योंकि बालाकोट और पुलवामा का मुद्दा सब पर हावी हो गया था. लेकिन बिहार ने 2024 के लिए राह दिखा दी है और यह बदलाव में अहम साबित होगा.''
2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार आरजेडी और कांग्रेस के साथ उतरे थे. इसे ही तब महागठबंधन कहा गया था. महागठबंधन को 243 में से 178 सीटों पर शानदार जीत मिली थी जबकि बीजेपी के नेतृत्व वाला एनडीए 58 सीटों पर ही सिमटकर रह गया था. महागठबंधन को 41.9 फ़ीसदी वोट मिला था जबकि एनडीए 34.1 फ़ीसदी वोट तक ही सीमित रह गया था. इसलिए बीजेपी को पता है कि नीतीश कुमार का साथ होना, उसके लिए सत्ता की राह तय करता है.
बिहार में 2019 के लोकसभा चुनाव जब बीजेपी और जेडीयू ने साथ मिलकर लड़े तो नतीजे चौंकाने वाले रहे. न केवल एनडीए का अब तक का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन रहा बल्कि 53 फ़ीसदी वोट भी हासिल किया. बिहार की 40 में से 39 सीटों पर एनडीए की जीत हुई.
गठबंधन के भीतर बीजेपी और एलजेपी ने जितने सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, सब पर जीत हुई थी. बीजेपी ने 17 सीटों पर चुनाव लड़े थे और सभी पर जीत हुई थी. साथ ही एलजेपी को सभी छह सीटों पर जीत मिली थी. जेडीयू को केवल 17 में से किशनगंज सीट पर हार मिली. यहाँ भी कांग्रेस के उम्मीदवार को जीत मिली थी. आरजेडी को एक भी सीट पर जीत नहीं मिली थी.
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