तेजस्वी यादव क्या बिहार में 10 लाख सरकारी नौकरी दे पाएंगे?

तेजस्वी यादव

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    • Author, रजनीश कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

गोविंदा कुमार बिहार के औरंगाबाद ज़िले के एक गाँव में 2014 में शिक्षक के तौर पर नियुक्त हुए. यह इंटर स्कूल था. 2014 में नियुक्ति के दौरान इनकी सैलरी 11 हज़ार प्रति महीने थी. लेकिन यह भी हर महीने नहीं मिलती. सैलरी मिलने में तीन से चार महीने लग जाते थे. बिहार में नीतीश कुमार के शासन में सभी नियोजित शिक्षक इस परेशानी से आज भी जूझ रहे हैं. उन्हें सैलरी के लिए तीन महीने का इंतज़ार करना पड़ता है.

गोविंदा ने बिहार की नौकरी छोड़ दी और झारखंड के पलामू ज़िले में शिक्षक बन गए. अब उनकी सैलरी 80 हज़ार रुपए है लेकिन समय पर सैलरी वहाँ भी नहीं मिलती है. गोविंदा कहते हैं कि बिहार सरकार वर्तमान कर्मियों को ही समय पर वेतन देने नहीं दे पा रही है, ऐसे में 10 लाख नई नौकरियों को लेकर भरोसा नहीं होता.

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तेजस्वी यादव के अगुआई वाले राष्ट्रीय जनता दल ने 2020 के विधानसभा चुनाव में वादा किया था कि उनकी सरकार बनी तो वह बिहार में 10 लाख लोगों को सरकारी नौकरी देंगे. तेजस्वी ने कैबिनेट की पहली बैठक में ही 10 लाख नौकरियों की भर्तियां निकालने का वादा किया था.

तब नीतीश कुमार बीजेपी के साथ एनडीए में थे और उन्होंने तेजस्वी के इस वादे का मखौल उड़ाया था.

नीतीश कुमार ने 20 अक्टूबर 2020 के गोपालगंज के भोरे और सीवान के जीरादेई में चुनावी रैली को संबोधित करते हुए कहा था, ''आजकल कई लोग कह रहे हैं कि सत्ता में आने पर ख़ूब नौकरियां देंगे. लेकिन इसके लिए पैसे कहाँ से लाएंगे? क्या ये पैसे जेल से लाएंगे या जाली नोट से सैलरी देंगे?'' तब आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव चारा घोटाले के मामलों में दोषी ठहराए जाने के बाद जेल में थे.

नीतीश कुमार ने रैली को संबोधित करते हुए कहा था, ''आप नौकरी देने के झाँसे में मत आइए. हमने बिहार को पटरी पर लाने के लिए बहुत मेहनत की है. अगर आप दूसरा मौक़ा देंगे तो हम और कड़ी मेहनत करेंगे. मैं आपसे पूछना चाहता हूँ कि 1990 से 2005 तक आरजेडी की सरकार बिहार में रही और इस दौरान कितनी सरकारी नौकरियां आईं? इनके राज में न सड़क थी, न बिजली. जंगल राज का वो दौर आप सबको याद है न?''

तेजस्वी यादव

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इमेज कैप्शन, बिहार के उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव

क्या पूरा हो पाएगा वादा?

अब नीतीश कुमार तेजस्वी यादव के साथ आ गए हैं. तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री बन गए हैं. तेजस्वी से पूछा जा रहा है कि अब सत्ता में आने के बाद क्या वह 10 लाख नौकरी देने का वादा पूरा करेंगे?

इस सवाल के जवाब में तेजस्वी यादव ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद 10 अगस्त को बीबीसी हिन्दी से कहा था, ''हमने मुख्यमंत्री जी से बात की है और कुछ न कुछ करेंगे. कम से कम चार-पाँच लाख नौकरियों के लिए कुछ तो करेंगे ही. ये हमारे लिए चुनौतीपूर्ण है लेकिन हम रास्ता निकालेंगे.''

तेजस्वी यादव को रास्ता उसी मुख्यमंत्री के साथ निकालना है तो दो साल पहले कह रहे थे कि क्या जाली नोट के ज़रिए दस लाख नौकरियाँ देंगे?

दअसल, नीतीश कुमार बिहार की बदहाल आर्थिक स्थिति नावाकिफ़ नहीं होंगे और इसी झुंझलाहट में उन्होंने कहा होगा कि दस लाख नौकरियों के लिए क्या जाली नोट छापेंगे?

टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस के पूर्व प्राध्यापक पुष्पेंद्र कहते हैं कि नीतीश कुमार ने तेजस्वी यादव के साथ ख़ुद को रीइन्वेंट कर लिया तो ये लंबे समय तक सत्ता में बने रह सकते हैं.

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पुष्पेंद्र कहते हैं, ''10 लाख सराकारी नौकरी अभी मासिक सैलरी वाली संभव नहीं लगती है. बिहार बहुत ही आर्थिक बदहाली के दौर से गुज़र रहा है. इसमें स्वरोजगार जैसी स्थिति भी पैदा करनी होगी. दूसरी बात यह कि तेजस्वी यादव को नीतीश कुमार से नीति के स्तर पर टकराना होगा. नीतीश कुमार ने बिहार में इन्फ्रास्ट्रक्चर पर काम किया है लेकिन गुणवत्ता वाली नौकरी को तबाह कर दिया है. नीतीश कुमार के राज में जितनी नौकरिया आई हैं, सबमें गुणवत्ता बहुत नीचे गई है. नीतीश कुमार अब तक नियोजित और कॉन्ट्रैक्ट वाली नौकरी के हिमायत करते रहे हैं, जिसमें कोई काम नहीं करना चाहता है और जो काम कर रहे हैं, उनमें भारी असंतोष है.''

पुष्पेंद्र कहते हैं, ''नीतीश कुमार को अपनी नीति की आमूलचूल समीक्षा करनी होगी. उन्होंने गुजरात की तर्ज़ पर इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए काम करने की कोशिश की लेकिन बिहार गुजरात की तरह कोई कारोबार वाला राज्य नहीं है. नीतीश कुमार ने सड़क, बिजली और फ्लाईओवर बना दिए. अब उन्हें गुणवत्ता वाले रोज़गार पर काम करना होगा.''

''अगर नहीं किया तो वह भी लालू यादव की तरह अप्रासंगिग हो जाएंगे. लालू ने हाशिए के लोगों को स्वर दिया तो 20 साल तक राज किए लेकिन इसके दम पर ही हमेशा राजनीति नहीं कर सकते थे. उसी तरह नीतीश कुमार भी केवल सड़क, बिजली और फ्लाईओवर के दम पर हमेशा शासन नहीं कर सकते हैं. नीतीश कुमार ने ख़ुद को नहीं बदला तो वो भी लालू की तरह अप्रासंगिक हो जाएंगे और अगर बदल लिया तो यह गठबंधन लंबे समय तक चलेगा.''

पुष्पेंद्र कुमार कहते हैं कि बिहार में अभी 10 लाख रिक्त पद भी नहीं हैं, ऐसे में नई नौकरियां पैदा करना भी आसान नहीं है. वह कहते हैं, ''बिहार में आमदनी का ज़रिया बहुत बचा नहीं है. शराब से एक बड़ा राजस्व बिहार को मिलता लेकिन नीतीश ने उसे भी बंद कर दिया है. अभी हर बात के लिए केंद्र की ओर देखना होता है. केंद्र ने भी टैक्स को सेंट्रलाइज कर दिया है. ऐसे में पैसे जुटाना बहुत मुश्किल है."

प्रवासी मज़दूर

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आंकड़े क्या कहते हैं?

क्या बिहार की जो अभी आर्थिक स्थिति है, उसमें दस लाख लोगों को सरकारी नौकरियां दी जा सकती हैं?

इस सवाल के जवाब में पटना यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर रहे नवल किशोर चौधरी कहते हैं, ''बहुत ही मुश्किल काम है. मैं ये नहीं कहूंगा कि असंभव है लेकिन बहुत कठिन है. बिहार का बजट 2021-22 में 2.17 लाख करोड़ था जो कि 2022-23 में बढ़कर 2,37,691 करोड़ हो गया है. अब अगर ये 10 लाख सरकारी नौकरियां देते हैं तो कम से कम 22 हज़ार करोड़ के अतिरिक्त बजट की ज़रूरत पड़ेगी. ऐसे में यह चुनौती होगी कि यह पैसा कहां से लाएंगे?''

प्रोफ़ेसर नवल किशोर चौधरी कहते हैं, ''बिहार के किसी भी सरकार में इच्छा शक्ति नहीं है. नीतीश को तो हम पिछले कई दशक से देख रहे हैं. तेजस्वी भी उन्हीं के मातहत काम करेंगे. लेकिन तेजस्वी विल पावर दिखाएंगे तो इस वादे को पूरा कर सकते हैं. मैं कुछ उपाय बताता हूँ. सरकार अनावश्यक खर्चों में कटौती करे. मरीन ड्राइव और नया म्यूज़ियम बनाने के बदले लोगों को रोज़गार देने पर पैसे खर्च करे. मैं पूछना चाहता हूँ कि हर साल बजट बढ़ रहा है लेकिन पैसे जा कहाँ रहे हैं? बिहार का कोई भी इकनॉमिक इंडिकेटर सकारात्मक नहीं है. जिस विल पावर के साथ सत्ता में आने के लिए आप चुनाव में अरबों रुपए खर्च कर देते हैं, वही विल पावर लोगों को रोज़गार देने में दिखाएंगे तो समाधान मिल जाएगा.''

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बिहार आबादी के लिहाज से भारत का तीसरा सबसे बड़ा राज्य है. नीति आयोग के मल्टिडायमेंशनल पोवर्टी इंडेक्स यानी एमपीआई के अनुसार, बिहार भारत का सबसे ग़रीब राज्य है. एमपीआई के हिसाब से 2015-16 में बिहार का हर दूसरा व्यक्ति ग़रीब था जबकि राष्ट्रीय स्तर पर हर चार में एक व्यक्ति ग़रीब था. बिहार में प्रति व्यक्ति औसत आय 2020-21 में 50,555 रुपए था जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह 146,087 है.

प्रोफ़ेसर चौधरी कहते हैं कि औसत आय भी एक छलावा है क्योंकि इससे विषमता की तस्वीर सामने नहीं आती है.

वह कहते हैं, ''औसत वाले डेटा से मुझे एक कहानी याद आती है. एक पंडित अपने छात्रों के साथ नदी पार करने की योजना बना रहा था. छात्रों से पंडित ने कहा कि यह नदी कितनी गहरी है, इसका औसत निकालो. आकलन के बाद नतीजा आया कि नदी औसत तीन फुट गहरी है. पंडित ने कहा कि हमारा कोई छात्र पाँच फुट से कम नहीं है. नतीजा यह हुआ कि पंडित समेत सारे छात्र डूब गए क्योंकि नदी हर जगह तीन फुट ही गहरी नहीं थी. इसलिए औसत सबसे बड़ा छलावा है.''

बिहार में बेरोज़गारी

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अन्य राज्यों की तुलना में बिहार की स्थिति

इसके बावजूद बिहार में प्रति व्यक्ति आय भारत के तमाम राज्यों में सबसे कम है.

रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया की स्टडी के अनुसार, बिहार में क़र्ज़ उसकी जीडीपी का एक तिहाई से ज़्यादा है. बिहार उन पाँच राज्यों में शामिल है, जिनकी जीडीपी का औसत क़र्ज़ सबसे ज़्यादा है. अन्य चार राज्य हैं- केरल, पंजाब, राजस्थान और पश्चिम बंगाल. 15वें वित्तीय कमिशन ने 2020-21 में क़र्ज़ और राजस्व घाटे की जो सीमा तय की थी, बिहार उसे भी तोड़ चुका है. इनमें आंध्र प्रदेश, राजस्थान और पंजाब भी शामिल हैं.

एएन सिन्हा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर रहे डीएम दिवाकर कहते हैं, ''रोज़गार देने से अर्थव्यवस्था में आर्थिक गतिविधियां बढ़ती हैं न कि आर्थिक संकट पैदा होता है. मुझे लगता है कि सरकार में विल पावर है तो दस लाख लोगों को सरकारी नौकरी देना कोई असंभव काम नहीं है. बिहार की मौजूदा बदहाली मिसमैनेजमेंट के कारण है.''

''बिहार की अर्थव्यवस्था खेती-किसानी से चल रही है और सबसे ज़्यादा संकट में यही क्षेत्र है. बिहार की मिट्टी में तीन फसलें हो सकती हैं लेकिन सिंचाई के अभाव में ऐसा नहीं हो पा रहा है. बिहार में पानी की भी कोई कमी नहीं है लेकिन पानी को ठीक से मैनेज नहीं किया जा रहा है. यहां कृषि में रोज़गार की अपार संभावनाएं हैं लेकिन इस ओर किसी का ध्यान नहीं है.''

बिहार के कई विभाग आर्थिक बदहाली के कारण बंद हो गए. लोगों को दशकों तक सैलरी नहीं मिली और वे अब भी अदालतों में अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं. बिहार राज्य पथ परिवहन निगम उन्हीं में से एक है. बिहार सरकार ने इस विभाग को ही बंद कर दिया. ऐसे में दस लाख नई नौकरियों को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि सरकार पैसे कहाँ से लाएगी.

किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए यह ज़रूरी होता है कि उसकी कमाई और खर्च के बीच का संतुलन हो. बिहार राजस्व हासिल करने का ज़रिया लगातार सीमित हो रहा है लेकिन आबादी लगातार बढ़ रही है.

नरेंद्र मोदी ने 2014 में चुनावी वादा किया था कि वह प्रधानमंत्री बनेंगे तो हर साल दो करोड़ लोगों को नौकरी देंगे लेकिन यह अब भी वादा ही है. तेजस्वी यादव का यह वादा भी इसी कैटिगरी में न आ जाए इसका डर है.

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