बिहार: हरिवंश क्या राज्यसभा उप-सभापति बने रहेंगे?

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- Author, राघवेंद्र राव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बिहार में नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के भारतीय जनता पार्टी की अध्यक्षता वाले नेशनल डेमोक्रेटिक अलायन्स (एनडीए) से नाता तोड़ लेने के बाद देश की चुनावी राजनीति एक बार फिर गरमा गई है.
नीतीश कुमार ने एनडीए का साथ छोड़ कर बिहार में महागठबंधन का दामन थाम लिया है.
अब जबकि नीतीश कुमार एनडीए के सहयोगी नहीं हैं तो जद(यू) सांसद हरिवंश के राज्यसभा के उप-सभापति पद पर बने रहने को लेकर भी तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं.
ये चर्चा हो रही है कि जदयू के एनडीए को छोड़ देने के बाद क्या हरिवंश राज्यसभा के उप-सभापति पद से इस्तीफ़ा देंगे या अपने पद पर कायम रहेंगे.
हालांकि हरिवंश ने इस विषय पर अभी तक कोई बयान नहीं दिया है लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स में ये अनुमान लगाए जा रहे हैं कि वे जल्द ही नीतीश कुमार से मिलने वाले हैं.
इसी बीच जदयू के अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह उर्फ़ ललन सिंह ने दावा किया है कि जिन लोगों ने नीतीश कुमार को एनडीए में जाने की सलाह दी थी उनमें हरिवंश भी शामिल थे.
ललन सिंह ने साथ ही ये भी कहा कि हरिवंश से फ़ोन पर बात हुई है और हरिवंश ने उन्हें कहा है कि नीतीश कुमार उन्हें सार्वजानिक जीवन में लाये हैं और वो नीतीश कुमार के साथ हैं और उनके साथ ही रहेंगे.

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विकल्प क्या हैं?
पीडीटी अचारी 14वीं और 15वीं लोकसभा के पूर्व महासचिव हैं और संविधान और संसद से जुड़े मसलों पर अच्छी पकड़ रखते हैं. हमने उनसे पूछा कि इस स्थिति में क्या संभावनाएं बन सकती हैं.
उन्होंने कहा, "संवैधानिक स्थिति ये है कि जब तक राज्यसभा उप-सभापति को कोई प्रस्ताव लाकर हटाया नहीं जाता तब तक वो अपने पद पर आसीन रहेंगे. अब चूँकि उनकी पार्टी एनडीए से अलग हो गई है तो अगर बीजेपी उन्हें हटाने के लिए कोई प्रस्ताव लाये तो उन्हें हटाया जा सकता है."
पीडीटी अचारी कहते हैं कि अगर जदयू हरिवंश को इस्तीफ़ा देने के लिए कहती है और अगर वो इस्तीफ़ा नहीं देते हैं तो उनकी पार्टी उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई कर सकती है जैसा कि पूर्व लोक सभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी के मामले में हुआ था. वे कहते हैं, "सोमनाथ चटर्जी को उनकी पार्टी ने इस्तीफ़ा देने के लिए कहा था लेकिन उन्होंने इस्तीफ़ा देने से इंकार कर दिया था और उनकी पार्टी ने उन्हें निष्कासित कर दिया था."
अचारी के मुताबिक अगर हरिवंश पार्टी की बात नहीं मानते हैं तो उन्हें पार्टी से निकाला जा सकता है "लेकिन पार्टी से निकाले जाने के बावजूद उनकी राज्यसभा की सदस्यता ख़त्म नहीं होगी और वो राज्यसभा के सदस्य बने रहेंगे".
वे कहते हैं, "उन्हें सदन ने उप-सभापति चुना है तो जब तक सदन उन्हें उस पद से नहीं हटाता, वे उप-सभापति बने रहेंगे." अचारी ये भी कहते हैं कि उप-सभापति को हटाने का प्रस्ताव कोई भी पार्टी ला सकती है.
प्रोफ़ेसर फ़ैज़ान मुस्तफा नालसार यूनिवर्सिटी ऑफ़ लॉ के पूर्व कुलपति हैं और फ़िलहाल अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के क़ानून विभाग में कार्यरत हैं.
वे कहते हैं कि अगर सरकार उन्हें उप-सभापति के पद पर नहीं रखना चाहेगी तो वो उन्हें हटाने के लिए प्रस्ताव ला सकती है. वे कहते हैं, "उस प्रस्ताव को बहुमत से पास करना होगा लेकिन सरकार के पास राज्यसभा में बहुमत नहीं है. तो क़ानूनी तौर पर देखा जाए तो हरिवंश अपने पद पर बने रह सकते हैं."
प्रोफ़ेसर मुस्तफ़ा कहते हैं, "अगर आप बीजेपी के समर्थन से उप-सभापति बने हैं तो नैतिक रूप से आपको इस्तीफ़ा दे देना चाहिए. अगर उनकी पार्टी उन्हें इस्तीफ़ा देने के लिए कहती है तो ये फ़ैसला उन्हें लेना होगा कि क्या वो पार्टी की बात मानेंगे या नहीं. अगर वो बीजेपी में शामिल हो जाते हैं तो मसला हल हो जाएगा. लेकिन अगर ऐसा होता है तो मुख्य मुद्दा ये है कि क्या वो दलबदल विरोधी क़ानून के घेरे में आ जाएंगे?"
प्रोफ़ेसर मुस्तफ़ा के मुताबिक दलबदल विरोधी क़ानून से तभी बचा जा सकता है जब जदयू के दो-तिहाई राज्यसभा सांसद बीजेपी में चले जाएं और जदयू बीजेपी में मिल जाए. फ़िलहाल राज्यसभा में जदयू के पांच सांसद हैं.
वे कहते हैं कि अगर बीजेपी हरिवंश को हटाने के लिए कोई प्रस्ताव नहीं लाती है तो वो अपने पद पर बने रहेंगे. "वैसे भी परंपरा ये रही है कि अक्सर उप-सभापति विपक्ष के पाले से ही बनता है."

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कौन हैं हरिवंश?
हरिवंश का पूरा नाम हरिवंश नारायण सिंह है लेकिन कहा जाता है कि जयप्रकाश नारायण से प्रेरित होकर उन्होंने उपनाम छोड़ दिया. वे अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर हैं और पत्रकारिता में डिप्लोमा रखते हैं.
राजनीति की दुनिया में आने से पहले वे कई सालों तक पत्रकार रहे और उन्होंने धर्मयुग में एक उप-संपादक के रूप में शुरुआत की और रविवार और प्रभात खबर जैसे प्रकाशनों में काम किया.
वे बाद में वे प्रभात ख़बर के मुख्य संपादक भी रहे. हरिवंश ने पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के सलाहकार के रूप में कुछ समय के लिए काम किया था लेकिन उस सरकार के गिरने के बाद पत्रकारिता में वापस चले गए थे.
साल 2014 में हरिवंश को पहली बार राज्यसभा के लिए चुना गया और 2018 में वे राज्यसभा के उप-सभापति चुने गए. इस चुनाव में उनके पक्ष में 125 वोट और उनके ख़िलाफ़ 105 वोट पड़े थे.
वर्ष 2020 में वो दूसरी बार राज्यसभा के लिए चुने गए और फिर एक बार उप-सभापति पद के लिए ध्वनि मत से चुने गए.

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उप-सभापति पद का महत्व
राज्यसभा के सभापति भारत के उप-राष्ट्रपति होते हैं और जब भी वे सदन में अनुपस्थित होते हैं तो सदन की कार्रवाई को सुचारु रूप से चलाने की ज़िम्मेदारी उप-सभापति की होती है.
अगर किन्ही कारणों से उप-राष्ट्रपति को राष्ट्रपति के रूप में काम करना पड़े, तो भी उप-सभापति ही राज्यसभा की कार्रवाई का संचालन करते हैं.
पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए ही राज्य-सभा के उप-सभापति पद का महत्त्व बहुत अधिक है.
सरकार चाहती है कि उप-सभापति सदन का सुचारु रूप से संचालन करें ताकि महत्वपूर्ण बिलों को सदन से पास करवाया जा सके.
वहीं विपक्ष की कोशिश रहती है कि वे अपनी बात रखने और सरकार की आलोचना करने के लिए उप-सभापति से अधिक से अधिक समय और संरक्षण प्राप्त कर सके.

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चर्चा में रहे हैं हरिवंश
राज्यसभा के उप-सभापति की ज़िम्मेदारी निभाते हुए अपनी कार्य-शैली के लिए हरिवंश सुर्ख़ियों में रहे हैं.
सितम्बर 2020 में राज्यसभा के आठ सांसदों को दो कृषि विधेयकों को पारित करने के दौरान उनके 'दुराचार' के लिए सदन से निलंबित कर दिया गया था.
इनमें से कुछ सांसदों ने नियम पुस्तिका फेंकी, उसके पन्नों को फाड़ दिया और महासचिव की मेज पर चढ़ गए और उप-सभापति हरिवंश की तरफ़ बढ़े क्यूंकि वे बिलों को पारित करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए उप-सभापति से नाराज़ थे.
इस निलंबन के बाद ये सांसद धरने पर बैठ गए. अगली सुबह हरिवंश ने इन सांसदों से मुलाक़ात कर उनका हाल चाल जाना और उन्हें चाय पिलाई.
इस बात की तारीफ़ करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि "कुछ दिन पहले उन पर हमला करने वालों और उनका अपमान करने वालों और धरने पर बैठे लोगों को व्यक्तिगत रूप से चाय परोसना यह दर्शाता है कि श्री हरिवंश जी को एक विनम्र दिमाग और बड़े दिल का आशीर्वाद मिला है. यह उनकी महानता को दर्शाता है. मैं भारत के लोगों के साथ हरिवंश जी को बधाई देता हूं."
साथ ही प्रधानमंत्री ने हरिवंश के आचरण को "प्रेरक" और "राजनेता जैसा" कहा था.
धरने पर बैठे सांसदों के व्यव्हार से आहत हरिवंश खुद भी अनशन पर बैठ गए थे. साथ ही उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद और उप-राष्ट्रपति वेंकैया नायडू को चिट्ठी लिखकर बताया था संसद में हुए घटनाक्रम से वे दर्द और तनाव महसूस कर रहे थे.
हालांकि जिस तरह से उन्होंने कृषि क़ानूनों को सदन में पारित कराया था, उसको लेकर उनकी आलोचना भी हुई थी.
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