बिहारः जेडीयू-आरजेडी सत्ता में, बीजेपी हुई बाहर- कैसे बदल रही सियासत?

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- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना
पटना में मंगलवार की शाम होते-होते राजभवन के सामने 'हम' का हरा-लाल, और राजद के हरे झंडे जगह-जगह लहराने लगे थे, 'चचा-भतीजा ज़िंदाबाद' के नारे भी बीच-बीच में सुनाई देते रहे; तो 'देश का नेता कैसा हो, नीतीश कुमार जैसा हो' के नारे लगाने वाले भला क्यों पीछे रहते!
इसी दौरान मीडिया की चीख़-पुकार, धक्का-मुक्की, और धीरे-धीरे बढ़ते पुलिस बंदोबस्त के बीच गाड़ी में सवार 'चाचा' नीतीश कुमार और 'भतीजा' तेजस्वी यादव राजभवन से निकलकर सामने ही, बाईं तरफ़ मौजूद 1, अणे मार्ग में घुस गए.
1,अणे मार्ग का बंगला जो हाल तक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का निवास स्थान हुआ करता था और जहां हुई जनता दल (यूनाइटेड) की मंगलवार की बैठक में मंगलवार को सहयोगी भारतीय जनता पार्टी से गठबंधन तोड़ने के फ़ैसले पर मुहर लगाई गई.
नीतीश कुमार का ये घंटे-दो घंटों में राजभवन का दूसरा चक्कर था.
पहले चक्कर में वो दोपहर बाद चार बजे राज्यपाल फागू चौहान से मिले थे जिसके बाद उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़े और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) से अलग होने की बात कही थी.
तेजस्वी यादव, पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम माझी और अन्य नेताओं के साथ वो दूसरी बार राज्यपाल को समर्थन में साथ आए दलों का पत्र सौंपने गए थे.
आज बुधवार दोपहर राजभवन में शपथ ग्रहण समारोह होगा. चर्चा यही है कि नीतीश कुमार मुख्यमंत्री और तेजस्वी यादव उप-मुख्यमंत्री बन सकते हैं.
महागठबंधन (राजद , कांग्रेस, वामपंथी पार्टियां), हम, अन्य और नीतीश कुमार की पार्टी जदयू को मिलाकर नई जमात के पास 160 से अधिक सीटें हैं.

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पहली बार राजभवन से निकलने के बाद जिस तरह से नीतीश कुमार सीधे पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के निवास स्थान गए, जहां सुबह महागठबंधन के दलों की बैठक हो चुकी थी, उससे ये बिल्कुल साफ़ था कि जोड़-तोड़, मोल-भाव सारा पहले से ही तय हो चुका था, अब उसे महज़ औपचारिक जामा पहनाना बाक़ी था.
नीतीश कुमार की गाड़ी जब दूसरी बार सहयोगी दल के नेताओं की गाड़ियों के क़ाफिले के साथ राबड़ी देवी के निवास स्थान से चलकर राजभवन में घुसी तो उनकी गाड़ी में बग़ल की सीट पर तेजस्वी यादव बैठे थे.
राजद के संस्थापक और पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव के बेटे होने के चलते तेजस्वी यादव नीतीश कुमार को चाचा कहते हैं. हालांकि, भतीजे और चाचा का एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लोगों ने एक बार नहीं कई बार देखा है.

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समाजवादी विरासत किसकी?
पुराने मनमुटावों का सवाल सोमवार को नीतीश कुमार-तेजस्वी यादव की साझा प्रेस कांफ्रेस के दौरान भी उठा जिसके जवाब में तेजस्वी ने कहा कि 'हम तो चचा-भतीजा हैं, लड़े भी हैं, आरोप भी लगाए हैं. लेकिन हम तो समाजवादी लोग हैं हमारी जो पुरखों की विरासत है कोई और ले जाएगा क्या?'
हालांकि, तेजस्वी यादव ने इस बयान से पहले ये भी कहा था कि बिहार में बीजेपी को छोड़कर सभी दलों ने नीतीश कुमार को अपना नेता मान लिया है, बीजेपी का उत्तरी भारत में अब कोई सहयोगी दल नहीं, और जो बीजेपी के साथ जाता है बीजेपी उसको ख़त्म करने में लगी रहती है, लेकिन तेजस्वी यादव की समाजवादी विरासत वाले बयान को भविष्य में उनकी नेतृत्व की दावेदारी के तौर पर देखा जा सकता है.
हालांकि, वर्तमान में चर्चा है कि मुख्यमंत्री के पद पर नीतीश कुमार ही रहेंगे और उप मुख्य मंत्री की कुर्सी तेजस्वी को जा रही है.
न्यूज़ हॉट नाम की वेबसाइट के संपादक कन्हैया भेलारी ने मंगलवार को पटना में जारी घटनाक्रम के दौरान अगले नेता पर चल रही एक बातचीत के दौरान बीबीसी से कहा कि नेतृत्व के सवाल पर 'नीतीश कुमार भी अपनी इमेज में एक बदलाव चाहते हैं.'
नीतीश कुमार पर मुख्यमंत्री की कुर्सी से चिपके रहने और अपने फ़ायदे के लिए 'कौन है जिसको ठगा नहीं' जैसे आरोप लगते रहे हैं.

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नीतीश विपक्षी उम्मीदवार
कन्हैया भेलारी विपक्ष के संभावित उम्मीदवार के तौर पर उनका नाम आगे बढ़ाये जाने की सूरत में बिहार की राजनीति से नीतीश कुमार की दूरी की बात करते हैं.
पटना में पिछले दो दिनों में एक चर्चा और समाचार ये भी रहा कि कांग्रेस की कार्यकारी अध्यक्ष सोनिया गांधी और नीतीश कुमार के बीच फ़ोन पर कई दफ़ा बातचीत हुई है, लेकिन किन विषयों पर बातचीत हुई इसकी पुष्टि नहीं हुई थी.
पर कयास लगाए गए कि दोनों नेताओं की चर्चा में नीतीश कुमार के विपक्ष के संभावित नेता हो सकने की बात पर भी वार्ता हुई.
राजनीतिक विश्लेषक मणिकांत ठाकुर कहते हैं कि दोनों नेताओं के बीच फ़ोन पर हुई बातचीत को लेकर दोनों दलों की तरफ़ से किसी तरह का इनकार नहीं आया है, और हो सकता है कि ये बात नीतीश कुमार की ओर से ही उठाई गई हो, जैसा वो पहले भी कांग्रेस को इशारों-किनारों में कह चुके थे.
हालांकि, जब प्रधानमंत्री की संभावित उम्मीदवारी की बात नीतीश कुमार से पूछी गई तो उन्होंने इसका कोई जवाब नहीं दिया.
मीडिया के सामने राजभवन से वापसी के बाद बयान में नीतीश कुमार ने सात दलों और एक निर्दलीय के साथ 165 विधायकों के समर्थन की बात कही और बोले कि पार्टी के सारे लोग बीजेपी से नाता तोड़ना चाहते थे.

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क्यों आई गठबंधन में दरार
पुराने सहयोगी, जदयू के पूर्व अध्यक्ष और केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में मंत्री रह चुके आरसीपी सिंह को लेकर नीतीश कुमार ने कहा कि जिस आदमी को कहां से कहां बढ़ाये वो क्या करने लगे.
जदयू ने इल्ज़ाम लगाया है कि बीजेपी आरसीपी सिंह की मदद से पार्टी को तोड़ने की तैयारी कर रही थी.
कहा जा रहा है कि आरसीपी सिंह का मुद्दा दोनों पुराने सहयोगियों की टूट का आख़िरी कारण बना. हालांकि, जदयू और बीजेपी के मतभेद 2020 विधानसभा चुनाव के बाद से ही धीरे-धीरे पटल पर आने लगे थे जब नीतीश कुमार बीजेपी की 74 सीटों की तुलना में 43 सीटों पर ही सिमट गए थे,
मणिकांत ठाकुर कहते हैं कि नीतीश कुमार इस पूरी स्थिति से असहज थे. भले ही बीजेपी के नेता बार-बार दोहराते रहते थे कि बिहार में उनके मुख्यमंत्री का चेहरा वही हैं लेकिन उनके छोटे भाई होने का एहसास उन्हें बराबर दिलाया जाता था.
पिछले माह के अंत में बीजेपी नेताओं की पटना में हुई बैठक में अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा कि बीजेपी अगर इसी तरह काम करती रही तो क्षेत्रीय दल समाप्त हो जाएंगे.
जेपी नड्डा का ये बयान और महाराष्ट्र की सरकार के साथ जो कुछ जिस तरह से हुआ, वो बिहार के नेताओं की नज़र से भी छुपा नहीं था.

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जाने-माने टीवी एंकर और लेखक राजदीप सरदेसाई ने बीजेपी और सहयोगियों के साथ का ब्योरा देते हुए ट्वीट किया है: शिवसेना बंट गई, अकाली कमज़ोर हो गए, तमिलनाडु की एआईएडीएमके में टूट, टीडीपी कमज़ोर, एलजेपी में बिखराव, पीडीपी-नेशनल कांफ्रेस किसी तरह जिंदा रहने की कोशिश करती...
उन्होंने जदयू के नाम के आगे सवालिया निशान छोड़ दिया है.
पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद से लेकर दूसरे बीजेपी नेता नीतीश कुमार पर जनादेश को ठुकराने का आरोप लगा रहे हैं जबकि कल तक पार्टी के नेताओं ने 'ऊपर के नेतृत्व के कहने पर ख़ामोशी' अख़्तियार कर रखी थी.
मणिकांत ठाकुर कहते हैं कि नीतीश कुमार को साथ लेकर चलना बीजेपी की मजबूरी थी क्योंकि वो अब तक कोई ऐसा नेता अपने भीतर नहीं ढूंढ पाए हैं जो बिहार की जातीय गोलबंदी पर आधारित राजनीति को काटकर जीत दिलाने की क्षमता रखता हो.
वो कहते हैं, ''यादवों में पैठ बनाने के लिए बीजेपी ने नंद किशोर यादव से लेकर नित्यानंद राय पर दांव खेला, लेकिन बिहार में यादव पॉलिटिक्स का मतलब है लालू परिवार. इसलिए वो चला नहीं.''
सुशील मोदी को ख़ुद पार्टी नेतृत्व ने बिहार से गौण कर दिया.
कहा जाता है कि सुशील कुमार को अपने उस बयान की सज़ा मिल रही है जिसमें उन्होंने कह दिया था कि नीतीश कुमार प्रधानमंत्री बनने की क्षमता रखते हैं.

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बीजेपी आगे क्या करेगी
मणिकांत ठाकुर के मुताबिक़ फिलहाल बीजेपी हर तरह के आरोप लगाती रहेगी, इंतज़ार करेगी कि जदयू-राजद के बीच पुरानी दरारें फिर से उभरें, सरकार काम-काज में विफ़ल हो जिसे लेकर वो जनता को बता सके कि देखो ये है अंजाम.
आरजेडी के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी कहते हैं, ''बिहार की राजनीति के तीन मुख्य धड़े हैं, लालू यादव, नीतीश कुमार और बीजेपी. इन तीनों में से सिर्फ़ अपने दम पर कोई नहीं जीत सकता और अगर दो साथ आ जाएं तो हराना मुश्किल है. जैसे 2015 विधानसभा चुनावों में हुआ था, नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद, बीजेपी ने नेताओं की यहां झड़ी लगा दी लेकिन कुछ ख़ास हुआ नहीं.'
शिवानंद तिवारी हमसे बातचीत में ये भी कहते हैं, ''जिस तरह फिलहाल सभी के बीजेपी की ओर जाने की होड़ दिख रही थी उसी बीच नीतीश कुमार का बीजेपी से अलग होना और विपक्ष के कई दलों का साथ आना न सिर्फ बिहार बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में भी विपक्ष पर बहुत सकारात्मक मनोवैज्ञानिक छाप छोड़ेगा.''
संभावनाओं की बात को मणिकांत ठाकुर भी मानते हैं, लेकिन कहते हैं कि जिस तरह के हालात हैं उसमें बदलाव के लिए किसी क्रांति की ज़रूरत होगी, जो 1970 के दशक में जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुई थी, जो इस वक़्त तो संभव नहीं दिखती.
वैसे जेपी की संपूर्ण क्रांति का बिगुल बिहार से ही फूंका गया था. लेकिन एक और बात भी थी उसमें तब जनसंघ (बीजेपी के पहले का दल) भी शामिल थी.
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