नीतीश कुमार को आरजेडी में भी चैन नहीं मिला तब कहाँ जाएंगे?

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- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना से
जाने-माने शायर शेख़ इब्राहिम ज़ौक़ का मशहूर शेर है- अब तो घबराकर ये कहते हैं कि मर जाएंगे, मर के भी चैन नहीं पाया तो किधर जाएंगे.
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बीजेपी छोड़ एक बार फिर से राष्ट्रीय जनता दल से हाथ मिला लिया है. बिहार के कुछ नेता चुटकी लेते हुए पूछ रहे हैं कि नीतीश कुमार को आरजेडी में भी चैन नहीं मिला तो कहाँ जाएंगे?
बिहार कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष कौकब क़ादरी कहते हैं कि नीतीश कुमार को जेडीयू को अपग्रेड करने की ज़रूरत है.
क़ादरी कहते हैं, ''नीतीश कुमार का बीजेपी और आरजेडी में आना-जाना उनके भीतर की एक बेचैनी को दिखाता है. नीतीश कुमार की लोकप्रियता 2005 से 2010 के बीच जो थी, वह 2022 तक कमज़ोर पड़ी है. वह बिहार में सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने का रिकॉर्ड बना चुके हैं. बिहार उनको आजमा चुका है.''
''उनके एजेंडे में पसमांदा मुसलमान और महादलित रहे. महिलाओं की प्रगति के लिए अलग-अलग योजनाएं भी बनाईं. लेकिन नीतीश कुमार को एक काम और करना चाहिए था जो शायद नहीं कर पाए. उनके बाद जेडीयू में कोई नेता नहीं दिखता है. उन्हें दूसरी पीढ़ी का नेतृत्व पैदा करना चाहिए था. इसके साथ ही उनके पास कुछ नया आइडिया होना चाहिए.''
''मंडल पॉलिटिक्स से निकले हैं लेकिन फिर से पुरानी राजनीति ज़िंदा नहीं हो सकती. नीतीश कुमार फिर से पुरानी लोकप्रियता हासिल कर लेंगे, ऐसा भारतीय राजनीति में बहुत कम होता है. नोकिया मोबाइल एक वक़्त में सबके हाथ में था लेकिन समय के साथ वह पीछे छूट गया और अब हर कोई आईफ़ोन पसंद कर रहा है. आज की राजनीति में लोकप्रियता भी इसी तरह से काम करती है. नीतीश कुमार आरजेडी में चैन पाएंगे या नहीं यह कहना मुश्किल है.''

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नीतीश और बीजेपी का नाता
बिहार की राजनीति पिछले 32 सालों से लालू यादव और नीतीश कुमार के इर्द-गिर्द घूम रही है. 2012 के बाद बस इतनी बदली है कि नीतीश कुमार का गठबंधन पार्टनर बदल जाता है लेकिन मुख्यमंत्री की कमान उन्हीं के पास रहती है.
बीजेपी और नीतीश कुमार का साथ 1996 से ही है. तब नीतीश कुमार समता पार्टी में थे. 1995 में नीतीश कुमार की समता पार्टी महज़ सात सीटें जीत पाई थी. 1996 के लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार बीजेपी के साथ आ गए थे. बीजेपी के साथ नीतीश कुमार का यह जुड़ाव 1995 के बिहार विधानसभा में लालू यादव से अलगाव के बाद ही हुआ था.
नीतीश कुमार का लालू से अलगाव और बीजेपी से जुड़ाव हो या बीजेपी से अलगाव और लालू से यादव जुड़ाव, यह सिलसिला पुराना है. लेकिन नीतीश कुमार अपनी राजनीतिक बेचैनी में 'एकला चलो' का साहस नहीं कर पाते हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में नीतीश कुमार ने अकेले चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया था और उनकी पार्टी महज़ दो सीटों तक सिमट कर रह गई थी. दूसरी तरफ़ बीजेपी ने 30 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे और 22 पर जीत मिली थी.
इस हार के बाद ही नीतीश कुमार ने 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल से गठबंधन किया था और बीजेपी महज़ 53 सीटों पर सिमट कर रह गई थी. लेकिन नीतीश कुमार को उनकी राजनीतिक बेचैनी ने 16 महीने के भीतर ही बीजेपी के साथ जाने पर मजबूर कर दिया.

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बीजेपी ने किया बर्दाश्त?
पर यह बीजेपी अटल-आडवाणी के खाँचे से बाहर निकल चुकी थी. नई बीजेपी नीतीश कुमार के पुराने तेवर को बर्दाश्त नहीं करने वाली थी. नीतीश कुमार 2013 से पहले नरेंद्र मोदी को बिहार में बीजेपी का प्रचार करने तक नहीं आने देते थे और बीजेपी इसे बर्दाश्त कर लेती थी.
पूर्व केंद्रीय मंत्री और पटना साहिब से लोकसभा सांसद रविशंकर प्रसाद से पूछा कि बीजेपी नीतीश कुमार को इतनी तवज्जो क्यों देती थी? नरेंद्र मोदी को बिहार में चुनाव प्रचार नहीं करने देने की नीतीश की मांग क्यों मान लेती थी?
रविशंकर प्रसाद कहते हैं, ''नीतीश कुमार को हमने अपने कंधों पर बैठाकर नेता बनाया है. हम गठबंधन चलाने के लिए नीतीश कुमार की यह बात भी मान जाते थे कि नरेंद्र मोदी बिहार में चुनाव प्रचार करने नहीं आएंगे. गठबंधन चलाने के लिए हमने क्या नहीं किया. ये राजनीतिक हक़ीक़त है लेकिन यह ठीक नहीं था. लेकिन नरेंद्र मोदी ने उन सारे आचरणों की उपेक्षा की और नीतीश को नेता को रूप में स्वीकार किया.''
रविशंकर प्रसाद ने कहा, ''नीतीश कुमार अभी जिस गठबंधन में गए हैं, उसमें भी चैन से रह लें तो बड़ी बात है. लेकिन यह ज़रूर कह सकता हूँ कि लालू राज में जो गुंडई होती थी, उसकी वापसी फिर से होगी.''
जेडीयू और आरजेडी दोनों पार्टियों के नेता रहे प्रेम कुमार मणि कहते हैं कि नीतीश कुमार जितने असहज एनडीए के साथ रहते थे, वैसी असहजता आरजेडी में भी है.
मणि कहते हैं, ''हो सकता है कि नीतीश कुमार को अभी इस गठबंधन में कम असहजता लग रही हो लेकिन यहाँ भी चुनौतियां कम नहीं हैं. नीतीश बिहार में आरजेडी और बीजेपी दोनों से एक साथ नहीं लड़ सकते हैं, इसलिए इन्हें आना-जाना पड़ता है और यह आना-जाना कब थमेगा, इस पर कुछ कहा नहीं जा सकता है.''
रविशंकर प्रसाद का यह कहना कि नरेंद्र मोदी को बिहार में चुनाव प्रचार नहीं करने देने की नीतीश की शर्त बीजेपी इसलिए मान लेती थी कि वह गठबंधन धर्म निभा रही थी पर प्रेम कुमार मणि कहते हैं कि यह ठीक नहीं है. मणि कहते हैं कि बिहार में बीजेपी लंबे समय तक अपनी सांप्रदायिक नीतियों के कारण अछूत रही थी और इस अछूतपन को नीतीश कुमार ने गठबंधन कर ख़त्म किया था.
प्रेम कुमार मणि कहते हैं कि नीतीश के मातहत बीजेपी चुनाव लड़ रही थी तो बात भी उन्हीं की मानते.
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नीतीश कुमार की राजनीति
प्रशांत किशोर 2015 में नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले महागठबंधन के चुनावी कैंपेन को संभाल रहे थे. प्रशांत किशोर की पहचान एक चुनावी रणनीतिकार की भी बनी है. प्रशांत से पूछा कि नीतीश कुमार का बीजेपी और आरजेडी में आना-जाना थमेगा या यह उनकी राजनीति की स्थायी रणनीति है?
इस सवाल के जवाब में प्रशांत किशोर कहते हैं, ''2017 में जब महागठबंधन छोड़ नीतीश कुमार एनडीए में आए तो कुछ ही समय में अहसास हो गया था कि वह यहाँ सहज नहीं हैं. 2012 तक जो एनडीए था, वह 2013 के बाद पूरी तरह से बदल चुका था. नीतीश कुमार के समर्थकों से आप बात करें तो वे यही बताएंगे कि अपने मन के मुताबिक वो जिस गठबंधन में काम कर सकते हैं, उसी गठबंधन में रहेंगे. जब नीतीश कुमार को लगता है कि अपने मन के मुताबिक़ काम नहीं कर पा रहे हैं तो रास्ता बदल लेते हैं. लेकिन नीतीश कुमार के विरोधी तो यही कहते हैं कि सत्ता के लिए वह पाला बदलते रहते हैं.''
क्या नीतीश कुमार ने 2017 में जल्दबाज़ी में आरजेडी छोड़ने का फ़ैसला ले लिया था?
जेडीयू के प्रवक्ता राजीव रंजन कहते हैं, ''हम अतीत में नहीं जाना चाहते हैं लेकिन इस बात को समझिए कि 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में कैसे चिराग पासवान के ज़रिए जेडीयू को कमज़ोर करने की कोशिश की गई.''
''हमारी सीटें कम आईं और उन्होंने सीएम बना दिया कि एक अहसान भी चढ़ा रहे. दो-दो उपमुख्यमंत्री बनाए. उनके मंत्री भी ज़्यादा बने और मुख्यमंत्री पर आक्रामक भी रहे. बीजेपी क्षेत्रीय पार्टियों और अपने सहयोगी दलों को ख़त्म करने में लगी है. मायावती को यूपी में कमज़ोर बीजेपी ने किया. शिव सेना के साथ भी ऐसा ही किया और पंजाब में प्रकाश सिंह बादल को भी बीजेपी ने ठिकाने लगा दिया. ऐसा तब है जब बीजेपी पंजाब में बिल्कुल कमज़ोर है.''
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राजीव रंजन कहते हैं कि बिहार में नया सामाजिक समीकरण बन गया है और इससे बीजेपी ईडी या किसी भी एजेंसी से पार नहीं पा सकती है.
क्या तेजस्वी यादव के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के मामले जो चल रहे हैं, उनमें तेज़ी आएगी? इस पर रविशंकर प्रसाद ने कहा, ''तेजस्वी ज़मानत पर रिहा हैं. आरोप तय हो गया है. न्यायिक प्रक्रिया अपनी गति से चलेगी.''
बिहार बीजेपी अध्यक्ष संजय जायसवाल का कहते हैं कि जब नीतीश कुमार उनके साथ थे तो जेडीयू नेता ही कहते थे कि सभी दस्तावेज़ होने के बावजूद तेजस्वी को जेल क्यों नहीं भेजा जा रहा है.
संजय जायसवाल कहते हैं, ''नीतीश कुमार के लिए आरजेडी के साथ गठबंधन कोई आख़िरी ठिकाना नहीं है. वह जल्द ही तेजस्वी को धोखा दे सकते हैं.''
तेजस्वी यादव ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली है. वह इससे पहले 2015 के विधानसभा चुनाव के बाद भी 16 महीने के लिए उपमुख्यमंत्री बने थे. प्रशांत किशोर मानते हैं कि इस बार का जो महागठबंधन है, वह 2015 से अलग है क्योंकि तब चुनाव के पहले बना था और अभी चुनाव के क़रीब दो साल बाद एक सरकार चलाने के लिए एक व्यवस्था बनी है.
तेजस्वी यादव से पूछा गया कि क्या इस बार नीतीश कुमार उनके साथ गठबंधन में टिकेंगे? इसके जवाब में उन्होंने कहा, ''अभी से इतना नकारात्मक क्यों सोचना है. अभी तो शपथ ही ली है और काम तो शुरू करने दीजिए. अभी मैं बहुत सकारात्मक हूँ.''
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