नीतीश कुमार बिहार की राजनीति के केंद्र में क्यों हैं?

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- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
बिहार में अटकलें तेज़ हैं कि मुख्यमंत्री और जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) प्रमुख नीतीश कुमार राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और कांग्रेस के साथ महागठबंधन को छोड़कर एक बार फिर एनडीए में जा सकते हैं.
मीडिया रिपोर्ट्स में तो नीतीश कुमार के भाजपा के साथ मिलकर सरकार बनाने तक की ख़बरें चल रही हैं.
हालांकि बिहार जेडीयू प्रमुख उमेश सिंह कुशवाहा ने इन ख़बरों को केवल कयास बताया और कहा उनकी पार्टी 'अभी भी महागठबंधन का हिस्सा' है और इसमें कोई 'भ्रम' नहीं है.
उन्होंने कहा, "हमें कोई जानकारी नहीं है. हम तो इतना ही जानते हैं कि हमारे नेता काम कर रहे हैं और वो उसमें व्यस्त हैं."
उमेश कुशवाहा ने कहा, "हमारे नेता विपक्षी एकता के सूत्रधार हैं. उन्होंने सभी विपक्षी दलों को एक जगह लाने का काम किया, तभी इंडिया गठबंधन ने अपना आकार लिया... जो हमारे नेता चाह रहे थे कि जल्द से जल्द सीटों का बंटवारा हो, तो उस पर कांग्रेस को सोचना चाहिए, उनको आत्ममंथन करना चाहिए."
वहीं भाजपा नेता रेनु देवी ने बताया, "इसके बारे में मुझे कुछ नहीं पता है. अभी हमारा एक ही लक्ष्य है कि हम लोकसभा चुनाव की तैयारी में लगे हुए हैं."
ग़ौरतलब है कि इससे पहले नीतीश कुमार कह चुके हैं कि वो एनडीए में वापस नहीं जाएंगे और भाजपा भी ये कह चुकी है कि नीतीश कुमार का एनडीए में स्वागत नहीं है.
इसी सप्ताह नीतीश कुमार ने बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर की जयंती पर श्रद्धांजलि देते बिना किसी का नाम लिए कहा कि कर्पूरी ठाकुर अपने परिवार का पक्ष नहीं लेते थे लेकिन आज लोग परिवार को आगे बढ़ाने में लगे हैं. इसके बाद ये कयास लगाए जाने लगे कि वो महागठबंधन से बाहर जा सकते हैं.
बहाना या पहले से थी तैयारी...

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नीतीश कुमार साल 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले साल 2013 में एनडीए से अलग हुए थे. बाद में उन्होंने आरजेडी और कांग्रेस के साथ मिलकर महागठबंधन बनाया.
2017 में वो महागठबंधन से अलग होकर फिर से एनडीए में शामिल हुए. बाद में वो एनडीए से नाता तोड़कर फिर महागठबंधन में आए. अब एक बार फिर एनडीए में उनकी वापसी के कयास लग रहे हैं.
इतनी बार पाला बदलने के कारण मीडिया के कई हलकों में उन्हें 'पाला बदलने वाले' तक की उपाधि दी गई है.
नीतीश सत्ता की राजनीति करते हैं. वो अनप्रेडिक्टिबल हैं और इस बात को समझते हैं कि हाथ में अगर सत्ता रहेगी तो सब कुछ ठीक रहेगा.
पटना में एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल स्टडीज़ के पूर्व निदेशक डीएम दिवाकर कहते हैं, "नीतीश सत्ता की राजनीति करते हैं. वो अनप्रेडिक्टिबल (अप्रत्याशित) हैं और इस बात को समझते हैं कि हाथ में अगर सत्ता रहेगी तो सब कुछ ठीक रहेगा."
वहीं पटना में वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद कहते हैं, "(अगर ये ख़बरें सच हैं तो) ये बहुत ज़्यादा आगे-पीछे कर रहे हैं. जो लोग लालू यादव के साथ हैं, वो उनके बारे में कह रहे हैं कि लालू जी का एक स्टैंड रहा है. उधर नीतीश जी को देखिए, डेढ़ साल पहले ही आप आए हैं, अध्यापकों की बहाली करवाई, और अब ये? क्या ये कर्पूरी ठाकुर मामला (बहाना) था, या फिर ये सब पहले से ही चल रहा था?"
मीडिया में कई दिनों से ये बातें चल रही थीं कि इंडिया अलायंस का चेहरा न बनाए जाने से नीतीश नाखुश थे. अलायंस के सहयोगी पार्टियों के बीच सीटों को लेकर तालमेल में देरी भी उनकी नाखुशी की एक और वजह थी.
बिहार में 'नीतीश फ़ैक्टर'

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राहुल गांधी की 'भारत जोड़ो न्याय यात्रा' की शुरुआत से ठीक पहले जेडीयू नेता केसी त्यागी ने बीबीसी से बातचीत में चिंता जताई थी कि दिल्ली में राहुल गांधी की अनुपस्थिति का इंडिया गठबंधन के दलों के बीच सीट शेयरिंग को लेकर हो रही बातचीत पर असर पड़ सकता है.
इसके बाद नीतीश कुमार ने बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए वंशवाद की राजनीति पर निशाना साधा था. मीडिया में इसे लालू परिवार पर निशाने के तौर पर देखा गया, हालांकि जनता दल यूनाइटेड ने इससे इनकार किया था.
लेकिन बीते सालों में ये देखा गया है कि चाहे बीजेपी हो या फिर आरजेडी, दोनो ही पक्षों के लिए नीतीश कुमार ने खुद को प्रासंगिक बना कर रखा है.
डीएम दिवाकर कहते हैं, "बिहार में जब तक कोई दल किसी दूसरे का साथ न ले तब तक सरकार नहीं बना सकता है. नीतीश ने दोनों ओर से मौक़े खुले रखे हैं - राजद के लिए भी और भाजपा के लिए भी. जब उनको राजद के साथ मुश्किल होती है तो वो भाजपा के साथ चले जाते हैं. जब भाजपा के साथ मुश्किल होती है तो वो राजद के साथ चले जाते हैं."
वो कहते हैं, "नीतीश के पास अपना बहुत वोट नहीं हैं लेकिन जब वो किसी के साथ होते हैं तो उसके प्रभाव के साथ वो वोट उनके साथ होता है. जाति की राजनीति इतनी हावी हो गई है और जानिगत जनगणना के बाद हर जाति को अपना प्रतिनिधित्व भी दिख रहा है."
नीतीश "सुशासन बाबू" कुमार

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नीतीश कुमार ने अपनी राजनीति का सफ़र लालू यादव और जॉर्ज फ़र्नांडीस के साथ में शुरू किया था. इसकी शुरुआत 1974 के छात्र आंदोलन से शुरू हुई थी.
1990 में लालू प्रसाद यादव जब बिहार के मुख्यमंत्री बने तब नीतीश कुमार उनके अहम सहयोगी थे. लेकिन जार्ज फर्नांडीस के साथ उन्होंने 1994 में समता पार्टी बना ली.
पहली बार 1995 में नीतीश कुमार की समता पार्टी ने लालू प्रसाद यादव के राज के 'जंगलराज' को मुद्दा बनाया था. इसी मुद्दे पर विपक्ष ने 2000 और 2005 का चुनाव लड़ा, 2005 में नीतीश कुमार के नेतृत्व में सरकार बनी.
शुरुआती सालों में 'ईमानदार' और 'सुशासन बाबू' की छवि वाले नीतीश कुमार खुद को लालू यादव के ख़िलाफ़ एक ठोस विकल्प बनाने में कामयाब रहे.
पटना में वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद बताते हैं, "साल 2005-2010 में उन्होंने जो काम किया उसी वजह से राज्य में उनका नाम हुआ. चाहे वो कोई जाति, समुदाय, पार्टी या समाज हो, वो अपने स्तर पर 12 से 13 प्रतिशत वोट लाते रहे हैं. बहुत सारे वामपंथी सोच वाले लोग उनके पास इन्हीं कारणों से गए. लालू के ख़िलाफ़ विकल्प बनने पर उन्हें जो जगह मिली, वो जगह अभी भी है, चाहे वो जगह कम ही क्यों न हो गई हो."
नीतीश कुमार ने बिहार के अत्यंत पिछड़े समुदाय और दलितों का एक बड़ा वोट समूह बनाया और इस समूह ने लगातार उनका साथ दिया है.
2007 में नीतीश कुमार ने दलितों में भी सबसे ज़्यादा पिछड़ी जातियों के लिए 'महादलित' कैटेगरी बनाई. इनके लिए सरकारी योजनाएं लाई गईं. नीतीश ख़ुद कुर्मी जाति से आते हैं.
फिलहाल वो राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और कांग्रेस के साथ महागठबंधन का हिस्सा हैं.
बीते दिनों की हलचल और अटकलें

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पिछले कुछ वक्त से मीडिया में राजद और जदयू के बीच दिक्कतों की ख़बरें आती रही हैं.
डीएम दिवाकर के मुताबिक़ राजद के साथ जदयू के तकरार की अपनी कुछ वजहें हैं.
वो बताते हैं, "जैसे बिहार में राजद ने दबाव बनाना शुरू किया था कि मुख्यमंत्री तेजस्वी को बना दीजिए और आप केंद्र की राजनीति देखिए."
2019 लोकसभा चुनाव में जदयू ने भाजपा के साथ चुनाव लड़ा और पार्टी ने 17 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए. लेकिन दिवाकर के मुताबिक़, इस बार जदयू से कहा गया कि समीकरण और गठबंधन अलग होने की वजह से जदयू को 17 सीटों से कम सीटें मिलनी चाहिए.
इंडिया अलायंस के घटक दलों के बीच दिक्कतों से भी नीतीश खुश नहीं थे. उनका मानना था कि सीटों पर तालमेल पर काम बहुत धीमी गति से हो रहा है.
हाल ही में बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने और पंजाब में आम आदमी पार्टी ने अकेले लोकसभा चुनाव लड़ने की घोषणा की है.
इसे एक ऐसे इशारे के तौर पर देखा गया कि विपक्षी दलों के अलायंस में सब ठीक नहीं है. विपक्ष के सामने चुनौती है कि कैसे भाजपा को लगातार तीसरी बार चुनाव जीतने से रोका जाए और तमाम सर्वे कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री देश के सबसे लोकप्रिय नेता हैं.
डीएम दिवाकर के मुताबिक़, "भाजपा को ये फ़ायदा है कि अगर वो बिहार में सत्ता में आ जाती है तो लोकसभा चुनाव उसके शासनकाल में होगा जिसका फ़ायदा उसे चुनाव में मिल सकता है."

साथ ही नीतीश का साथ लेना भाजपा की मजबूरी इसलिए भी है क्योंकि पार्टी के पास बिहार में कोई बड़ा चेहरा नहीं है.
सुरूर अहमद कहते हैं, "भाजपा के पास कोई बड़ा चेहरा बिहार में नहीं था और नहीं है. उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह रहे. मध्य प्रदेश में उमा भारती थीं. बाद में शिवराज सिंह चौहान को आगे किया गया. उस तरह का चेहरा बिहार में नहीं रहा."
क्या बिहार में है ‘मंदिर लहर’?

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22 जनवरी के दिन जब उत्तर प्रदेश के अयोध्या में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में शिरकत कर रहे थे, उस दिन देश के कई हिस्सों में दिए जलाए गए, हवन और विशेष पूजा की गई. इस दिन को एक महत्वपूर्ण दिन की तरह मनाया गया.
राजनीतिक विश्लेषक पवन वर्मा की मानें तो चाहे उत्तर, पश्चिम, पूर्व और दक्षिण हो, देश का ऐसा कोई हिस्सा नहीं रहा, जहां राम मंदिर से जुड़े कार्यक्रम का असर न हुआ हो.
लेकिन पत्रकार सुरूर अहमद पूछते हैं कि अगर भाजपा नीतीश कुमार से दोबारा राजनीतिक रिश्ता जोड़ रही है तो क्या इसका मतलब है कि राम मंदिर के कार्यक्रम का असर बिहार में उम्मीद के मुताबिक़ नहीं हुआ?
वहीं डीएम दिवाकर कहते हैं, "श्रीराम का मंदिर तो बन गया. अब आगे उसका असर बना रहेगा, ये ज़रूरी तो नहीं है."
वो कहते हैं, "बिहार में मंदिर का मुद्दा अचानक से या स्वतंत्र रूप से काम नहीं करता. ऐसे में भाजपा चाहती है कि वो मंडल, कमंडल साथ लेकर चले. उसने यहां (भाजपा ने) पिछड़ा कार्ड खेला है."
"राजनीति में कभी किसी के लिए दरवाज़ा बंद नहीं होता है. संसदीय राजनीति अवसरवाद के दलदल में फंस गई है. अब कैडर, मर्यादा, या कार्यक्रम इससे चीज़ें तय नहीं होतीं. अब चीज़ें तय होती हैं ताक़त, मसल पॉवर और फ़ाइनेंस से."
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