नीतीश कुमार क्या जेडीयू, इंडिया गठबंधन और महागठबंधन तीनों को एकजुट रख पाएंगे?

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- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना से
नीतीश कुमार बिहार सरकार के मुखिया हैं. अपनी पार्टी जेडीयू के भी मुखिया बन गए हैं.
बिहार में महागठबंधन को एकजुट रखने की ज़िम्मेदारी भी उनकी ही है और अब विपक्षी दलों के इंडिया गठबंधन के संयोजक की ज़िम्मेदारी भी उन्हें मिलने की बात कही जा रही है.
क्या नीतीश कुमार इतनी ज़िम्मेदारियों को एक साथ निभाने में अब भी सक्षम हैं?
पिछले साल की शुरुआत से ही विपक्षी एकता को लेकर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के चेहरे पर जो उम्मीद दिख रही थी, वह साल के बीच में सफल होती दिखने लगी थी.
लेकिन साल के अंत होते-होते इसमें बिखराव की चर्चा भी शुरू हो गई है.
जून 2023 में पटना में विपक्षी दलों की पहली बैठक हुई थी. यहीं से केंद्र की मोदी सरकार के ख़िलाफ़ विपक्षी एकता की तस्वीर और दावे पेश किए जा रहे थे.
अब पटना में चल रही राजनीति ने ही विपक्षी दलों के दावे पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
माना जाता है कि केंद्र के स्तर पर विपक्षी दलों के गठबंधन ‘इंडिया’ की बुनियाद में बिहार का ‘महागठबंधन’ है.
बिहार में अगस्त 2022 में नीतीश कुमार की पार्टी 'जनता दल यूनाइटेड' एनडीए से अलग हो गई थी.
इस तरह से राज्य में एनडीए सरकार का अंत हुआ था.
नीतीश ने उस वक़्त बिहार विधानसभा में सबसे बड़े दल आरजेडी के साथ गठबंधन कर सरकार बनाई थी.
इस गठबंधन में कांग्रेस और वाम दल भी शामिल हुए थे और इसे ‘महागठबंधन’ का नाम दिया गया था.
अब बीजेपी की ओर से बिहार में जेडीयू और आरजेडी के बीच रिश्तों में खटास आने के दावे किए जा रहे हैं.
बीजेपी का दावा है कि पिछले दिनों आरजेडी से नज़दीकी की वजह से ही नीतीश ने पार्टी के अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह को पद से हटाया है.
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‘विपक्ष में अंदरूनी तनाव’

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नीतीश के विरोधी एक यह दावा भी करते रहे हैं कि जनता दल यूनाइटेड में टूट होने वाली है.
इस राजनीतिक दावे के अलावा कई जानकार ये भी मानते हैं कि बिहार में ‘महागठबंधन’ के दलों में तनाव है.
वरिष्ठ पत्रकार माधुरी कुमार के मुताबिक़, “इतना तो मैं कह सकती हूँ कि इस वक़्त बिहार एक राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुज़र रहा है. भले ही यहाँ सरकार चल रही है और नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने हुए हैं, लेकिन महागठबंधन के अंदर तनाव है और उनका अंदरूनी मतभेद साफ़ दिखने लगा है.”
दरअसल, बिहार में सरकार का नेतृत्व कर रही जनता दल यूनाइटेड में बड़ा बदलाव हो गया है.
पार्टी के सबसे बड़े नेता और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ख़ुद पार्टी के अध्यक्ष बन गए हैं. साल 2024 के लोकसभा चुनावों के पहले के इस बदलाव को नीतीश का बड़ा क़दम माना जा रहा है.
पिछले हफ़्ते ही दिल्ली में जेडीयू कार्यकारिणी की बैठक में राजीव रंजन सिंह उर्फ़ ललन सिंह ने पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा दे दिया था.
जेडीयू ने आधिकारिक तौर पर बताया था कि ललन सिंह साल 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए मुंगेर की अपनी लोकसभा सीट पर ज़्यादा ध्यान देना चाहते हैं.

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हालांकि, बीजेपी दावा करती है कि ललन सिंह को उनके पद से हटाने की वजह उनकी राजद प्रमुख लालू यादव के साथ बढ़ती निकटता है.
यह भी दावा किया गया कि ललन सिंह जेडीयू के कुछ विधायकों को तोड़कर लालू के साथ ले जाना चाह रहे थे.
वरिष्ठ पत्रकार ज्ञान प्रकाश के मुताबिक़, "ललन सिंह जेडीयू के विधायकों को तोड़कर आरजेडी में ले जाना चाहते थे और इन विधायकों की मदद से उनकी नज़र आरजेडी के सांसद मनोज झा की राज्यसभा सीट पर थी."
उन्होंने कहा, “विपक्ष के गठबंधन में दाग़ लग चुका है, नीतीश कुमार महागठबंधन के साथ बहुत सहज नहीं थे, क्योंकि आरजेडी अब भी नहीं बदली है. इसलिए देखना होगा कि वो 14- 15 जनवरी को ‘चूड़ा दही’ (मकर संक्रांति) के बाद क्या करेंगे”.
बिहार में मकर संक्रांति के मौक़े पर सियासी दलों और नेताओं में 'चूड़ा दही’ पार्टी देने की परंपरा रही है.
बिहार में 14 जनवरी को किस नेता की पार्टी में कौन शामिल हुआ है, उससे कई बार भविष्य की राजनीति की तस्वीर भी दिखती है.
बिहार में महागठबंधन में दरार की ख़बरों के बीच राज्य का सियासी पारा चढ़ा हुआ है, इस लिहाज से भी इस साल मकर संक्रांति की पार्टी ख़ास हो सकती है.
साल 2018 के चूड़ा-दही भोज में जेडीयू के नेता वशिष्ठ नारायण सिंह के घर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अशोक चौधरी नज़र आए थे.
उसके डेढ़ महीने बाद अशोक चौधरी जेडीयू में शामिल हो गए थे.

आगामी चुनावों पर असर
माधुरी कुमार के मुताबिक़, “विपक्ष के ‘इंडिया’ गठबंधन में पूरी तरह से मतभेद हैं. किसी पार्टी में सीटों को लेकर कुछ तय नहीं हुआ है. इसलिए मुझे अभी तक नहीं दिख रहा है कि ‘इंडिया’ गठबंधन बीजेपी के लिए कोई बहुत बड़ी चुनौती बन पाएगा”.
ज्ञान प्रकाश मानते हैं कि जिस दिन ममता बनर्जी ने विपक्षी गठबंधन के संयोजक पद के लिए मल्लिकार्जुन खड़गे के नाम का प्रस्ताव कर दिया था उसी दिन से विपक्षी एकता का मामला पूरी तरह बिगड़ गया.
पिछले महीने दिल्ली में हुई ‘इंडिया’ गठबंधन की बैठक में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का नाम गठबंधन के संयोजक और प्रधानमंत्री पद के लिए प्रस्तावित किया था और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस नाम का समर्थन किया था.
वरिष्ठ पत्रकार फ़ैज़ान अहमद कहते हैं, “विपक्ष का कोई संयोजक होगा यह बात विपक्षी गठबंधन के अंदर से कभी नहीं आई थी. यहाँ तक कि कांग्रेस ने भी शुरू से ही इस पर कुछ नहीं कहा था. संयोजक का पद मीडिया और राजनीति की उपज है.”
उनका मानना है कि चुनाव के क़रीब आने पर हर पार्टी या गठबंधन में मतभेद होता है क्योंकि सबको सीटों की साझेदारी पर अपने दावे करने होते हैं.
लेकिन जेडीयू में पिछले दिनों जो कुछ हुआ है, उसका अच्छा संदेश नहीं गया है और इसका चुनावों पर असर पड़ सकता है.

अविश्वास की वजह
बिहार में लोकसभा की 40 सीटे हैं. पिछली बार जेडीयू और बीजेपी ने मिलकर यहाँ 39 सीटों पर जीत दर्ज की थी. इनमें जेडीयू ने 16 और बीजेपी ने 17 सीटें जीती थीं. माना जाता है कि जेडीयू जिस गठबंधन में होता है बिहार में चुनाव उस गठबंधन का पलड़ा भारी होता है.
लेकिन बिहार में महागठबंधन में मतभेद और दरार की ख़बरें जिस तरह से आ रही हैं, उससे इसके भविष्य पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं.
ज्ञान प्रकाश कहते हैं, “22 जनवरी के बाद से बीजेपी हर जगह अयोध्या के मंदिर और राम-राम का नारा लगाएगी. वह ग़रीबों के लिए चलाई जा रही योजनाओं की बात करेगी. किसानों को मिल रहे पैसे की बात करेगी. लेकिन विपक्ष का ‘महागठबंधन’ तो दिखता भी नहीं है.”
माधुरी कुमार कहती हैं, “मैं इसके पीछे लालू और नीतीश दोनों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा देखती हूं. लालू ख़ुद तेजस्वी को बिहार का सीएम बनाना चाहते हैं. नीतीश भी लंबे समय से बिहार के मुख्यमंत्री हैं और वो नहीं चाहेंगे कि इस तरह से कोई उनको उनके पद से हटा दे.”
उनके मुताबिक़, पता चला है कि लालू जी ने नीतीश को विपक्षी गठबंधन का संयोजक बनाने का प्रस्ताव भेजा है, लेकिन नीतीश इसको स्वीकार करेंगे भी या नहीं, यह पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि वो इसके पीछे लालू की मंशा समझते हैं.

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कहा जाता है कि लालू प्रसाद यादव चाहते हैं कि नीतीश कुमार केंद्र की राजनीति में व्यस्त हो जाएं और बिहार की सत्ता तेजस्वी यादव को सौंप दें.
केंद्रीय मंत्री और बीजेपी नेता गिरिराज सिंह ने हाल ही में तेजस्वी को मुख्यमंत्री बनाने की लालू की इच्छा का दावा भी किया था.
वरिष्ठ पत्रकार फ़ैज़ान अहमद विपक्ष के गठबंधन में मदभेद के पीछे हर पार्टी को ज़िम्मेवार मानते हैं.
उनका कहना है कि पटना की पहली मीटिंग के बाद बेंगलुरु, मुंबई या दिल्ली की किसी मीटिंग को लेकर नीतीश कुमार भी बहुत उत्साहित नहीं दिखे.
विपक्ष का ‘इंडिया’ गठबंधन ऐसा है, जिसमें अलग-अलग विचारधारा वाले दल एक साथ जुड़े हैं, लेकिन उनका मक़सद एक है- बीजेपी के ख़िलाफ़ एकजुट होना.
नीतीश कुमार और महागठबंधन शुरुआत में इस मक़सद में सफल होते भी दिखे हैं.
लेकिन पटना की पहली मीटिंग में ही आम आदमी पार्टी के प्रमुख और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की नाराज़गी खुलकर सामने आई थी.
आप के नेताओं ने ‘दिल्ली सर्विस बिल’ के मुद्दे पर कांग्रेस के रवैये पर सार्वजनिक तौर पर गठबंधन से अलग होने की धमकी दी थी.
उसके बाद कभी ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस की तरफ से बयान आया कि बंगाल में टीएमसी अकेले दम पर बीजेपी का मुक़ाबला कर सकती है, तो कभी बंगाल के कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी टीएमसी की राज्य सरकार पर हमलावर दिखे.

‘सम्मानजनक विदाई का इंतज़ार’
कांग्रेस ने हाल के मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों को लोकसभा चुनावों से अलग बताकर अकेले चुनाव लड़ने का फ़ैसला कर लिया.
चुनावों में हार के बाद जेडीयू और आरजेडी समेत कई विपक्षी दलों ने कांग्रेस को गठबंधन को सम्मान देने की सलाह दी थी.
ज्ञान प्रकाश दावा करते हैं कि पिछले महीने 25 दिसंबर को पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिवस के मौक़े पर नीतीश कुमार की वरिष्ठ बीजेपी नेताओं से बात हुई थी और उन्हें राज्यपाल बनने का प्रस्ताव दिया गया है.
हालाँकि, गिरिराज सिंह, जेपी नड्डा और अमित शाह समेत बीजेपी के कई नेता खुलकर कह चुके हैं कि अब नीतीश कुमार के लिए बीजेपी के सारे दरवाज़े बंद हैं.
लेकिन कहा जाता है कि राजनीति में कुछ असंभव नहीं रहा है और सियासी गलियारे से भी ऐसी कोई पक्की ख़बर नहीं है कि नीतीश कुमार बीजेपी के संपर्क में हैं.
फ़ैज़ान अहमद कहते हैं, “मेरा मानना है कि दो बार बीजेपी छोड़ना और आरजेडी के साथ सरकार बनाना फिर बीजेपी में वापस जाना. इससे नीतीश की विश्वसनीयता पर बहुत असर पड़ा है और अब अपने राजनीतिक जीवन के अंतिम दौर में वो फिर से ऐसा कदम नहीं उठाएंगे”.
उनका मानना है कि नीतीश कुमार अगर वापस बीजेपी के साथ जाते हैं वहां उनके लिए काफ़ी असहज हालात होंगे. इसलिए वो अब वो राजनीति से सम्मानजनक विदाई लेने की कोशिश करेंगे और बीजेपी के साथ फिर से नहीं जाएंगे.

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नीतीश कुमार की जेडीयू एनडीए की पुरानी साझेदार रही है. नीतीश कुमार और बीजेपी के बीच ये रिश्ता साल 1996 में शुरू हुआ जब उन्होंने बाढ़ लोकसभा सीट जीतने के बाद बीजेपी से हाथ मिलाया था. नीतीश केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री रहे हैं.
साल 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले नरेंद्र मोदी को पीएम पद का चेहरा बनाने के बाद नीतीश कुमार और बीजेपी के बीच रिश्तों में दरार पैदा हो गयी थी.
कहा जाता है कि नीतीश कुमार के लिए बीजेपी के नए नेतृत्व से तालमेल बिठाना मुश्किल हो रहा था और वो एनडीए से अलग हो गए.
उसके बाद साल 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव से पहले नीतीश ने आरजेडी और कांग्रेस जैसे दलों के साथ ‘महागठबंधन’ बनाया था.
उन चुनावों में जीत के बाद बनी महागठबंधन की पहली सरकार ज़्यादा दिनों तक नहीं चल पाई और नीतीश ने वापस बीजेपी के समर्थन से बिहार में सरकार बनाई थी.
साल 2020 के बिहार विधानसभा चुनावों में बीजेपी और जेडीयू ने चुनाव जीतकर सरकार बनाई थी. लेकिन अगस्त 2022 में एनडीए की यह सरकार गिर गई.
उस वक़्त भी जेडीयू के अध्यक्ष रहे आरसीपी सिंह पर पार्टी को तोड़ने की कोशिश का आरोप लगाकर उन्हें हटाया गया था और और नीतीश महागठबंधन में वापस आए थे.
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